12/20/10

चिरकिन और विकिलीक्स


चिरकिन और विकिलीक्स
सब विकिलीक्स-विकिलीक्स चिल्ला रहे हैं. कुछ समय पहले तक इसका नाम भी नहीं सुना था. पूरी दुनिया विकिलीक्स की लीक ’ से दहली हुई है. इसके करता-धरता असांजे तो रातों रात सुपर स्टार बन गए हैं. ये भी कोई लीक है. लीक तो इंडिया के चिरकू किया करते हैं।असांजे इनफारमेशन हैक करके लीक करता है लेकिन विकीलीक्स के इंडियन वर्जन, जनता के पैसे को हैक कर डकार जाते हैं. नीरा राडिया, राजा बैजल, लाली और भी ना जाने कितने इंडियन वर्जन हैं विकीलीक्स के यानी चिरकू. पैसा डकारने के बाद इन चिरकुओं को कब्जियत हो जाती है उसको दूर करने के लिए सीबीआई एनीमा लगाती है. लेकिन हम भारतीय तो अपनी चीजों की कीमत ही नहीं समझते. असांजे हैं क्या? एक इंटरनेशनल चिरकू भर. अपने देश में तो ऐसे चिरकू की भरमार है. यहां के चिरकिन शायर तो विकिलीक्स के बाप थे. जैसे विकिलीक्स का खुलासा सब पर भरी पड़ रहा है उसी तरह शायर चिरकिन का शेर सब शायरों पर बीस पड़ता था। तभी तो उनके लिए कहा जाता था ‘चिरकिन ने चिरक दिया गुलाब के फूल पर, बाकी सब शायर उनके ठेंगे पर.’
चिरकिन का एक शेर अर्ज है:-

चिलकन --महफिल में
इस कदर आना हुआ
पहले थोड़ी ऐंठन हुई
फिर जम के पखाना हुआ
समझ गए ना, चिरकू कहते हैं चिरकने वाले को . अब ये मत पूछिएगा चिरकना क्या होता है. कोई भी इलाहाबादी इसके अलग अलग मायने विस्तार से समझा सकता है. वैसे जब साफ सुथरी जगह कोई गंदगी कर दे तो समझिए किसीने चिरक दिया है. जैसे साफ दीवार पर पीक करने वाले भी एक तरह से चिरकते ही हैं, बस ‘आउटलेट’ का फर्क होता है. चिरकना एक ऐसी कला है जो गॉड गिफ्टेड होती है जिसको चिरकू कंट्रोल करने की लाख कोशिशों के बाद भी कट्रोल नहीं कर पता. चिरकू यानी एक ऐसा शख्स, जो हमेशा अगड़म-बगड़म खाता रहता है और इस वजह से ज्यादातार उसका मेदा आउटऑफ कंट्रोल रहता है. उसमें हमेशा मरोड़ होता रहता है. उसे पता ही नहीं चलता कि कब कब्जियत दस्त में बदल जाती है और वो जहां-तहां चिरक देता है.
इलाहाबाद जीआईसी में छात्रों की एक चिरकू जमात भी थी जो चिरकू के रूप में आडेंटीफाइड थे. खर्च करने के मामले में भी उनको कब्ज रहता था. पत्रकारों में भी चिरकुओं की कमी नहीं. कोई खबर ठीक से लिखने को कहो तो संक्षिप्त में चिरक देते हैं और जब संक्षिप्त कहो तो पसेरी भर गोबर भांट देते हैं. अब बटोरिए देर तक.
वैसे चिरकुट और चिरकू दो अलग तरह के प्राणी हैं. जरूरी नहीं कि चिरकुट , चिरकू भी हो लेकिन हर चिरकू चिरकुट होता है. चिरकने पर अच्छा खासा शोर मचता है चिरकने वाले को कोई फर्क · नहीं पड़ता.
अब असांजे को ही लीजिए, उन्होंने भी भरतीय चिरकुओं से प्रेरणा लेकर ही चिरकने वाले संगठन का नाम विकिलीक्स रखा है. वो किस देश और व्यक्ति पर चिरक दे, कहा नहीं जा सकता. अभी भी उसका चिरकना जारी है. उनकी ताजी चिरक के लपेटे में आए हैं अपने राहुल भाई. आगे देखिए किसकी बारी है.

12/18/10

मार्निग वॉकिंग


आजकल वॉक का मौसम है. क्रॉनिक वॉकर्स यानी बारहमासी वॉकर्स तो आलू की तरह कहीं भी मिल जाएंगे लेकिन मौसमी वॉकर्स दिसंबर में ज्यादा पाए जाते हैं. सुबह-शाम धुंध के बीच घूमने का मजा ही कुछ और है. वॉक करते समय दूसरे वॉकर्स को वॉच करने में घूमने का मजा बढ़ जाता है. इस बार एक बनारसी अड़ीबाज के ब्लॉग की चर्चा करेंगे. ब्लॉग का नाम है बेचैन आत्मा. रचयिता देवेंद्र पांडे बनारस में रहते हैं. किसी बडे़ शहर के मॉर्निग वॉकर्स और छोटे शहर के वॉकर्स में काफी फर्क होता है. बड़े शहर के वॉकर्स ब्रैंडेड स्पो‌र्ट्स शूज और ट्रैक सूट में नजर आते हैं, तो छोटे शहरों में पीटी शू, धोती, पजामा, चप्पल कुछ भी पहने नजर आ सकते हैं. तोंदियल वाकर्स दोनों जगह पाए जाते हैं. जो वॉक के बाद अक्सर दही-जलेबी उड़ाते हैं. देवेंद्र की नई पोस्ट मेरी पहली मार्निग वॉकिंग.. में बात हो रही है एक छोटे शहर बस्ती की. देवेंद्र लिखते हैं.छोटे शहरों की एक विशेषता होती है कि आपको कुछ ही दिनों में सभी पहचानने लगते हैं. इस शहर में नौकरीपेशा लोगों के लिए जीवन जीना बड़ा सरल है. 4-5 किमी लम्बी एक ही सड़क में दफ्तर, बच्चों का स्कूल, अस्पताल, सब्जी मार्केट, डाकखाना, बैंक, खेल का मैदान सभी है. एक पत्‍‌नी और दो बच्चे हों और घर में टीवी न हो तो कम कमाई में भी जीवन आसानी से कट जाता है. एक दिन कद्दू जैसे पेट वाले वरिष्ठ शर्मा जी मेरे घर पधारे और मॉर्निग वॉक के असंख्य लाभ एक ही सांस में गिनाकर बोले, पांडे जी आप भी मार्निग वॉक किया कीजिए आपका पेट भी सीने के ऊपर फैल रहा है. घबराकर पूछा,सीने के ऊपर फैल रहा है, क्या मतलब? शर्मा जी ने समझाया, सीने के ऊपर पेट निकल जाए तो समझना चाहिए कि आपके शरीर में कई रोगों का स्थाई वास हो चुका है. हार्ट अटैक , शुगर, किडनी फेल होने आदि की प्रबल संभाना हो चुकी है. डरते-डरते पूछा, कब चलना है? शर्मा जी ने कप्तान की तरह हुक्म दिया, कल सुबह ठीक चार बजे हम आपके घर आ जाएंगे.तैयार रहिएगा. आगे क्या हुआ, इसके लिए क्लिक करिए http://devendra-bechainaatma.blogspot.com

12/11/10

एल्युमनी मीट सी कुछ रातें


इस बात को दो दशक से ज्यादा हो गए लेकिन अभी भी किसी मीठी नींद वाली रातों में क्यूं दिखाई देता है कांफ्रेंस रूम में मेजर का वो चेहरा, कांफिडेंस से भरा जिंदगी में हार ना मानने की नसीहत देता हुआ. सामने चेस्ट नंबर वाले वो चेहरे धडक़ते दिल से अपनी बारी के इंतजार में- सेलेक्शन होगा, नहीं होगा, होगा, नहीं होगा..अब भी क्यूं दिखते हैं कुछ चेहरे, याद आने लगतीं हैं कुछ पुरानी बातें. यादे हैं तो सपने हैं और सपने तो आएंगे ही. माना कि सपने टूटते हैं लेकिन तभी तो हम सपने बुनते हैं. ना जाने क्यूं एल्युमनाई मीट सी लगती है कुछ रातें.
चलिए हो जाए एल्युमनाई मीट जरा हट के. क्यों होती है एल्युमनाई मीट? पुरानी यादों को रिफ्रेश करने के लिए, पुराने दोस्तों को खोज निकालने के लिए, उनसे मिलने और साथ ठहाके लगाने के लिए, नोस्टेल्जिक होने के लिए. एल्युमनाई मीट में ऐसा लगता है कि ढेर सारी विंटेज कारें जमा हों और उनके इंजन शोर मचा रहे हों, इतरा रहे हों. आप भी शामिल हुए होंगे ऐसी किसी किसी मीट में. पता चलता है कि फलां तो बड़ा नेता बन गया, अरे वही चिरकुट दोस्त जो दीवाली के एक हफ्ते पहले से हॉस्टल में जुआ खेलने लगता था. खेल-खेल में एक बार उसका दूसरे हॉस्टल के एक लडक़े से झगड़ा हो गया था और उसने हाथ में काटने की कोशिश की तो उसके सामने के सारे दांत हिल गए थे और सब उसे लेकर भागे तो चीनी डाक्टर के पास. तब पता चला कि ये चीनी डाक्टर दांत पर भी प्लास्टर चढ़ा देते हैं. दो दशक बाद टीवी पर एक चेहरा दिखा मीडिया से मुखातिब. नाम जाना पहचाना, ध्यान से देखा तो याद आ गया...अरे ये तो एंडी राबट्र्स है. पहले तो इसके खूब घुंघराले बाल थे अब तो मैदान साफ है. जीआईसी में साथ पढ़ता था. उसके कैरेबियंस की तरह घुंघराले बाल थे बिल्कुल एंडी राबट्र्स की तरह. कॉलेज के बाद कभी मुलाकात नहीं हुई लेकिन टीवी पर देख सबकुछ याद आ गया. किसी ने बताया कि आर्मी में चला गया था फिर आर्मी छोड़ इंडियन पुलिस सर्विस में आ गया.
आर्मी से याद आया कि एसएसबी एल्युमनाई तो मैं भी हूं. एसएसबी समझ गए ना, डिफेंस सर्विसेज के अफसर बनाने वाला सर्विस सेलेक्शन बोर्ड. मुझे भी झक सवार हुई थी फौजी अफसर बनने की. रिटेन तो हर बार क्वालिफाई कर जाता लेकिन एसएसबी में गाड़ी अटक जाती थी. लेकिन पॉजिटिव सोच और जोश इतना कि ताबड़तोड़ फेस कर डाले कई एसएसबी बोर्ड. इलाहाबाद, बनारस, देहरदून, भोपाल, बेंगलुरू सब. आर्मी, एअरफोर्स, नेवी, कोई भी ब्रांच नहीं छोड़ी. इस दौरान ढेर सारे दोस्त बने. पता नही क्यों अब भी सपनों में कभी दिख जाता है सर्विस सेलेक्शन बोर्ड. याद आ जाते हैं एक मजेदार लमहे और शुरू हो जाती है एल्युमनाई मीट.
एसएसबी के लिए कॉल किए जाने वाले कुछ कैंडीडेट स्मार्ट होते और कुछ नमूने. ऐसा ही एक नमूना भोपाल के एसएसबी बोर्ड में था. चेस्ट नंबर और बेड एलॉट होन के बाद एक चुटई वाले साथी ने अपना बैग खोला तो उसमें एक छोटा प्रेशर कुकर और बड़ी सी कैंडल भी थी. ..अबे खाना तो यहां मिलेगा फिर कुकर क्यों ले आए, और ये कैंडल? ...कॉल लेटर देखो साफ लिखा है ट्रवेल बिद लाइट लगेज. सो लाइट के लिए कैंडल और राशन? आर्मी वाले तो राशन देते हैं सो पकाने के लिए कुकर. अगले दिन ग्रुप टॉस्क में जब उसकी कमांडर बनने की बारी आई तो वो एक कोने में खड़ा हो अपने ग्रुप को भाषण देने लगा ..साथियों मुझे लैंड माइंस से भरी इस खाई पार करने की टास्क दी गई, मैं तुम्हारा कमांडर हूं, इस खाई को पार करने का आर्डर देता हूं, कैसे? ये तुम्हारा काम है. कुछ साथी अवाक थे और कुछ लोटपोट हुए जा रहे थे.
एसएसबी बोर्ड बैंगलुरु. जज एडवोकेट जनरल ब्रांच के लिए हम सब वहां थे. मेरे स्कूल दिनों का एस साथी मेरे बैच में था. सब को किसी टॉपिक पर तीन मिनट का एक्सटेम्पोर लेक्चर देना होता था इंग्लिश में. हम सब हिन्दी मीडियम. यस को ‘या’ बोलने वाले को अंग्रेजीदां समझते थे. उसकी बारी आई तो पता नहीं क्यों वो हर सेंटेंस के बाद बोलता था-या.. जेंटिलमैन ..आज भी जब कोई येस को ‘या’ कहता है तो वो दोस्त याद आने लगता है. पास्ट जैसा भी हो अच्छा लगता सो सेलेक्शन भले ही ना हुआ हो लेकिन एसएसबी बोर्ड जब कभी सपनों में दिखता है तो मैं भी नॉस्टेल्जिक हो जाता हूं एल्युमनाई मीट के साथियों की तरह.

12/6/10

जीयो जी भर के!


जिंदगी है तो ख्वाहिशें हैं और ख्वाहिशें होती हैं हजार. कुछ होती है पूरी और कुछ रह जाते हैं ख्वाब. काश ये होता, काश वो होता. काश, ऐसा हमारे जमाने में होता. जिंदगी के उजाले में जीने के बाद कौन देखना चाहता है अंधेरी रात. लंबी उम्र की तमन्ना किसमें नही होती. सब चाहते हैं कि वक्त गुजरता रहे लेकिन उम्र थम सी जाए. उम्र के हर पड़ाव पर दिल धडक़ता रहे, मचलता रहे, बहकता रहे, कभी बच्चों की तरह कभी युवाओं की तरह. साइंस ने हमारी कितनी ही ख्वाहिशें पूरी की हैं. इसकी बदौलत हम चांद-सितारों तक पहुंचने में कामयाब हुए. तो फिक्र मत कीजिए, साइंस अब हम सब को चिंरजीवी बनाने में जुटा है. आज इसी पर थोड़ी गम-शप हो जाए.
आपको मिलवाते हैं एक खास तरह के ‘एडिक्ट’ से. इनका नाम है प्रवीण साह. जैसे कोई अल्कोहलिक होता और कोई वर्कोहलिक, उसी तरह प्रवीण ‘सा’ साइंसकोहलिक हैं. यानी जो सांइटिफिकली प्रूव किया जा सके वो सच, बाकी सब झूठ. जो तर्कसंगत है वही सच है. इनके ब्लॉग का नाम है ‘सुनिए मेरी भी’. प्रवीण कहते भी हैं कि सुनिए सब की लेकिन विश्वास उसी पर करएि जो साइंस कहे. अपनी ताजा पोस्ट ‘ फिकर नॉट! अब आप रहेंगे ‘जवान’ हमेशा-हमेशा...पर, बच के रहना इस बंदूक से... प्रवीण लिखते हैं- मेरे चिर-यौवन-आकांक्षी मित्रों, एक बड़ी अच्छी खबर है. संभावना व्यक्त की गई है कि अगले दस सालों में ऐसी दवा खोजी जा सकती है जो एजिंग को रोक ही नहीं बल्कि रिवर्स भी कर सके. अब देखिए कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है विज्ञान...क्लोनिंग, स्टेम सेल रिसर्च से खुलती अपार सं भावनाएं, अॅार्गन हारर्वेस्टिंग, टिशू कल्चर, एंटी एजिंग रिसर्च, जीन मैपिंग, जेनेटिक इंजीनियरिंग एक तरफ, दूसरी तरफ यह सभावना भी कि शीघ्र ही मानव मस्तिष्क की सारी इंफारमेशन (एक्सपीरिएंस, रिफ्लेक्सेस, लर्निंग एंड बिहेवियर पैटर्न को) नैनो चिप्स में स्टोर व ट्रांसफर किया जा सकेगा...यानी साफ साफ संकेत हैं कि अमरत्व अब दूर नहीं. आंखें बंद कर सोचिए कि किस तरह का होगा मानव समाज आज से डेढ़-दो सौ साल बाद का.
अब इसी समय एक खबर.. यह भी है..एक्सएम 25 राइफल या यों कहें कि वेपन सिस्टम के बारे में. किसी भी युद्ध में होता क्या है कि योद्धा दीवार, मिट्टïी का टीले या सैंड बैग के पीछे ‘कवर’ लेता है, थोड़ी सी देर के लिए अपना सिर उठाता हैऔर विरोधी पर फायर करता है. यह राइफल सामान्य लड़ाई में कवर लेने को एकदम बेमानी कर देगी..इसको चलाने वाला अपने विरोधी को हर आड़ के पीछे मार सकता है. यानी अब हो गई अफगानिस्तान में तालिबानियों की छुट्टïी. मैं तो आज दिन भर यही सोचूंगा कि मानव जाति पहले क्या पाएगी, कहां पहुंचेगी? अमरत्व या महाविनाश. praveenshah.blogspot.com/2010/12/blog-post_03.html पर क्लिक कर आप भी सोचिए न...

11/2/10

जा बढ़ा के...


मुंबई से आया मेरा दोस्त, उड़ गए उसके होश. सामान उतरना था लखनऊ लेकिन पहुंच गया पटना, अब दोस्त घूमे पहने घुटन्ना. पिछली बार गो एअर दिल्ली जाने वालों को पटना ले गई थी. इस सोमवार को इंडीगो लखनऊ में उतरे 32 यात्रियों का सारा सामान लेकर पटना उड़ गई. मुबई से आए इन यात्रियों ने एअरपोर्ट पर खूब हंगामा किया. पता चला मुंबई से आई इंडीगो की फ्लाइट लखनऊ कुछ लेट पहुंची थी. लखनऊ में उसने जल्दी में 32 यात्रियों को तो एअरपोर्ट पर गेर दिया लेकिन उनका बोरिया बिस्तर उतारे बिना पटना उड़ गई. काफी देर तक यात्री अपने सामान का इंतजार किया. फिर हंगामा शुरू हो गया. पहले तो पता ही नहीं चल रहा था कि 32 यात्रियों का सामान आखिर गया कहां. कहा गया कि उनका सामान मुंबई में ही रह गया है. लेकिन मुंबई से संदेशा आया कि नहीं यहां किसी ‘भैया’ की गठरी नही छूटी है फिर कहा गया कि गलती से लखनऊ के यात्रियों का सारा सामान पटना चला गया है. एक-दो दिन में लखनऊ वापस पहुंच जाएगा. यात्रियों का समझ नहीं आ रहा कि वो क्या करें. किसी को गोरखपुर इंटरव्यू देने जाना था तो कोई दीवाली पर छुट्टियां मनाने आया, कोई अपनों के लिए त्योहार में गिफ्ट लेकर आया था. लेकिन सबका सामान इंडीगो ले गई पटना... जा बढ़ा के...

10/24/10

चांदा चमके चम-चम...


आधा है चंद्रमा रात आधी..रह ना जाए बात आधी..मुलाकात आधी.. ये गाना तो सुना होगा. आज भी ये गाना रोमांटिक लगता है. और जब बात शरद पूर्णिमा की हो तो चांद दीवाना बना देता है. सो आज आधे चंद्रमा की नहीं पूरे चांद यानी शरद पूर्णिमा की बात. इसके अमृत का नशा तो पूरी शरद रितु में छाया रहेगा. और ब्लॉगर्स तो पक्के नशेड़ी होते हैं. किसी को व्यंग्य लिखने का नशा होता है किसी को राजनीति में मजा आता है. कुछ तो छुट्टे सांड़ की तरह नथुने फुलाए सींग उठाए ब्लॉगर हाट में इधर-उघर मुंह मारते फिरते हैं. कुछ बिल्कुल गऊछाप हैं, जो कुछ मिला प्यार से जुगाली करते हजम कर जाते हैं. और कुछ रोमांटिक ब्लॉगर हैं जिन्हें फैंटसी की दुनिया में घूमने का नशा होता हैं. तो आज शरद रितु की ओपनिंग सेरेमनी का जाम फुलमून के नाम.
पता नहीं आपने फील किया है या नहीं.जब बारिश और उमस खत्म हो जाती है, दूब और फूलों में लिपटी ओस धीरे से सहलाती है, चंादनी रात में हरसिंगार की भीनी महक कुछ याद दिलाती. लगता है कही दूर कोई गा रहा है ..आधा है चंद्रमा रात आधी..रह ना जाए तेरी-मेरी बात आधी.. मुलाकात आधी.. मन करता है चलो थोड़ा रूमानी हो जाएं. शरद- शिशिर, ये तो उमंग और उत्सव की रितु हैं. ये उमंग ब्लॉग्स में भी रिफ्लेक्ट होती हैं. पहले शरद पूर्णिमा की रात खुले आकाश के नीचे खीर की कटोरी रखने की परम्परा थी. कहते हैं शरद पूर्णिमा के दिन आसमान से अमृत बरसता है. अमृत का तो पता नही लेकिन अब भी ओस का शीतल अहसास सुकून देता है. शायद यही अमृत है.
शरद पूर्णिमा की शाम कई ब्लॉगर्स ओस रूपी इस अमृत में सराबोर मिले. ‘सहज समाचार’ में अखिलेश उपाध्याय की पोस्ट ‘आज आसमान से पूरी रात बरसेगा अमृत’ में शरद पूर्णिमा के पौराणिक महत्व का बखान है. इसमें बड़ी सहज भाषा में यह बताने की कोशिश की गई है कि यह एक मात्र ऐसा उत्सव है जो सचमुच प्रकृति का अनुपम तोहफा है. जो उत्सव हमें पॉजिटिवटी से भर दे, जो आनंद की प्रेरणा दे और भाईचारे का संदेश लेकर आए, उसे तो अमृत बरसना ही कहा जाएगा. यह कृष्ण की रासलीला का भी उत्सव है. उत्सव का आनंद लेने के लिए http://sahajsamachar.blogspot.com/2010/10/blog-post_3185.html क्लिक करें.
चांद में है कुछ बात ऐसी जो हमें कल्पना लोक में खीच लाती है. चांद ही क्यों, मन की और भी बातें दिल खोल कर लिखने के साथ ही सुनने का भी मन करे तो आपको ले चलते हैं पॉडकास्टिंग या कह सकते हैं ऑडियो ब्लॉग की दुनिया ‘ष्टत्रस्वर’ में. दीवाना बना देने वाले चांद के मस्त गाने सुनने हों तो क्लिक करें http://cgswar.blogspot.com/2010/10/blog-post_21.html

10/22/10

जाना था जापान पहुंच गए चीन



जाना था जापान पहुंच गए चीन वाह भई वाह... साला ये जहाज ना हुआ टेम्पो हो गया. अभी तक ये तो देखा और सुना था कि गलत ट्रेन में बैठ कर कोलकात्ता के बजाय मुंबई पहुंच गए. बनारस में था तो एक दोस्त लाला को लखनऊ के लिए वरुणा पकडऩी थी. लाला चार बजे उनीदा सा उठा. उसे किसी तरह रिक्शा करवाया और मैं सो गया. एक घंटे बाद दरवाजा खटका तो देखा लाला लुंगी लपेटे अटैची लिए खड़ा है. क्या बे लाला, ट्रेन छूट गई क्या? नहीं यार नीद मैं वरुणा के बजाय बक्सर वाली पैसेंजर में बैठ गया था. मुगलसराय से आ रहा हूं्. गलत बस भी लोग पकड़ लेते हैं और टेम्पो सवारियां तो रोज ही रूट को लेकर झिक झिक करती हैं. बस या रेल से आप रास्ते में उतर सकते हैं लेकिन हवाई लहाज से कैसे कूदेंगे. शुक्रवार को तो लखनऊ के अमौसी एअरपोर्ट पर गजबै हो गया. गो एअर के जहाज में पटना के बजाय दिल्ली के यात्रियों को बैठा दिया गया. जब पटना में लैडिंग हुई तो यात्री चकराए कि गुरू ये तो दिल्ली नहीं है. फिर शुरू हुआ हंगामा. सडक़ और रेल पर होते तो स्टेशन और कस्बा पहचान का हल्ला मचाते. अब हवा में कैसे पहचाने के ये पटना वाला रूट है या दिल्ली वाला. और अगर पता भी लग गया कि गलत बैठ गए हैं तो पायलट से भी नहीं कह सकते कि ..अबे उधर कहां ले जा रहा है. और जबरिया रास्ते में उतर भी तो नहीं सकते. धन्य है गो एअर और धन्य हैं यात्री.

10/9/10

नया मोबाइल और तैयार लडक़ा


सेलफोन हो या शादी के लिए सूटेबल ब्वॉय, जिसको देखो वही उनके पे्रजेंटेशन में परेशान है. मौका मिला नहीं कि लोग शुरू हो जाते हैं फीचर्स गिनाने. उपभोक्तावाद ने एक नई तरह का समाजवाद ला दिया है. जिसे देखो वही बीटेक किए और क्वर्टी की-पैड वाले स्टाइलिश मोबाइल लेकर इतराता घूम रहा है. नामी इंटरनेशनल ब्रांड्स के जवाब में हैं चीनी और कोरियाई प्रॉडक्ट और चीन-कोरिया के जवाब में आ गए हैं लोकल ब्रांड्स पॉलिश मार के, हममें है दम नहीं किसी से कम, स्टाइल में. नकल ऐसी कि बड़े-बड़े पारखी धोखा खा जाएं. फीचर्स ऐसे कि बड़े बड़े इंटरनेशनल प्रॉडक्ट भी उन्नीस नजर आएं. और अगर गलती से आपने पूछ लिया कि भाई नया लिया है क्या? तो वो दाम से पहले उसके फीचर्स गिनाने लगता है. भला हो इन चीनियों और खेत-खलिहान में उग आए कालेजों का, जो हसरत पूरी करने का मौका सब को दे रहे हैं. आपके पास ब्लैकबेरी या नोकिया है तो उनके पास ब्लैकचेरी और योकिया है. देखने में बिल्कुल वैसा और फीचर्स उनसे कही ज्यादा. आपके बेटे ने आईआईटी कानपुर या बिट्स पिलानी से बीटेक किया है तो उनके बेटे ने दुर्जनपुर के इंस्टीट्यूट आफ इंजीनियरिंग से बीटेक किया है. ये अलग बात है कि बीएससी के इंटरेंस टेस्ट में वो फेल हो गया था. एक तरफ मोबाइल दूसरी तरफ शादी योग्य सूटेबल ब्वॉय विद बीटेक. दोनों के फीचर्स कितने मिलते-जुलते हैं इसके लिए आपको ले चलते हैं एक पेज थ्री पार्टी में.
मिस्टर रिजवी आपे चमकते चाइनीज मोबाइल की खासियत अपने साथी को गिना रहे हैं तो बगल में मिसेज मेहता अपने इंजीनियर बेटेे को मिस्टर चोपड़ा से इंट्रोड्यूस करा रहीं हैं. मोबाइल और मैरिजेबल ब्वॉय के फीचर्स कितने मिलते-जुलते हैं देखिए जरा-
मोबाइल- डुअल सिम फैसेलिटी, सूटेबल ब्वॉय- बी टेक बिद एमबीए
मोबाइल- 8 जीबी एक्सपैंडेबल मेमेरी, सूटेबल ब्वॉय- सैलरी इन सिक्स फिगर, पक्र्स के अलावा
मोबाइल- मल्टीमीडिया, एफएम एंड फ्लैश, सूटेबल ब्वॉय- पीएचडी विद 3 गोल्ड मेडल्स
मोबाइल- स्लिम, स्क्रैच रेजिस्टेंट बॉडी, सूटेबल ब्वॉय- फेयर काम्प्लेक्शन, स्लिम एंड टॉल
मोबाइल- 48 घंटे का बैटरी बैकअप, सूटेबल ब्वॉय- शहर और गांव में पुश्तैनी जायदाद
मोबाइल- विद आंसरिंग मशीन एंड पॉलिफोनिक रिंग टोंस, सूटेबल ब्वॉय - सॉफ्ट स्पोकेन एंड कूल टेम्परामेंट
मोबाइल- फुल टचस्क्रीन एंड मैपिंग फेसिलिटी, सूटेबल ब्वॉय- वेरी सेंसिटव एंड केयरिंग
मोबाइल- एलसीडी स्क्रीन, डबल टू पिक्सेल कैमरा, सूटेबल ब्वॉय- ब्रॉड आउटलुक एंड कीन ऑब्जर्वर
मोबाइल- जीएसएम एंड सीडीएमए कम्पैटेबल, सूटेबल ब्वॉय- वर्किंग इन मल्टी नेशनल, पोस्टिंग छह महीने इंडिया में और छह महीने विदेश में.

और भी ढेर सारी सिमिलैरिटी दिखी दोनों में. पार्टी में तभी किसी ने अपने बिट्स पासआउट बेटे को इंट्रोड्यूस कराया तो दूसरे ने अपने ‘पिट्स’ (खेतों में खुले कालेज) पास लाडले को पेश कर दिया. यानी सबके पास बराबर का मौका.
ये तो रही पार्टी की बात, अब पब्लिक प्लेस पर नजर डालें. एक साहब बार-बार कॉस्टली फोन लहराकर भौकाल दिखा रहे थे तभी बगल में एक ‘डार्लिंग टाइप’ चुलबुल ने टप से अपना ‘चाइनीज बेबी’ कवर से निकाला, सटा सट दो-तीन स्नैप लिए. फिर वीडियो बनाने के पोज में मोबाइल कैमरे को पैन किया, एक दो बार फ्लैश चमकाया और ईयर फोन लगा कर ढिंचैक- ढिंचैक करता मुंडी और कमर मटकाता खिसक लिया. साहब मुंह खोले देखते रहे...माफ कीजिए मेरी एक कॉल आ रही है न्यूयार्क से. वैसे कोई अच्छी लडक़ी हो तो बताइगा, एक सूटेबल ब्वॉय है नजर में.

10/2/10

हुक्म करो मेरे आका!


चलिए इस बार ब्लॉग के बहाने थोड़ा और नेट सैवी हो जाएं. नो पॉलिटिक्स, नो लिटरेचर, नो सटायर, नो फैंटसी. बस थोड़ा टेक्निकल. कम्प्यूटर है तो इंटरनेट है, इंटरनेट है तो पूरी दुनिया मुट्ठी में. की-बोर्ड पर उंगलियां थिरकी नहीं कि स्क्रीन पर अलादीन के चिराग वाला जिन्न प्रकट हो कर कहता है, हुक्म करो मेरे आका. अलादीन के पास तो एक जादुई चिराग था, इंटरनेट पर इनकी भरमार है. बस, एक क्लिक और जिन्न प्रकट. हां, एक बात जरूर है कि कुछ ई-जिन्न कभी-कभी सर्विस फीस भी वसूलते हैं. लेकिन ढेर सारे जिन्न समाजसेवी स्टाइल में सर्विस देते हैं बिल्कुल फ्री. और अगर गलती से आपने किसी ऐसे जिन्न को कॉल कर लिया जो आपकी डिमांड पूरी नहीं कर पा रहा तो वो आपको चट से दूसरे जिन्न का पता बता देगा. आप समझ गए होंगे, यहां जिन्न से मतलब वेब साइट्स से है. तो आज ब्लॉग के बहाने ऐसी वेब साइट्स की बात करेंगे तो आपके कम्प्यूटर के लिए मददगार हो सकती है और इंटरनेट के सफर को और सुहाना बना सकती है.
चिंता मत करिए, ये सर्विस फ्री है और अगर फ्री नहीं भी होगी तो है ना जुगाड़ डॉट कॉम.
इसके लिए आपको हरिद्वार ले चलते हैं मयंक भारद्वाज के पास. उनके पास एक पिटारा है जिसका नाम है ‘मेरी दुनिया’. वो नेट पे्रमी भक्तों को इसे पिटारे से प्रसाद बांटते रहते हैं. सबसे पहले उनके पिटारे में मौजूद ऑनलाइन टीवी की बात करते हैं. इसके लिए एक साइट है watchanytv.com . इस पर आप केवल इंडिया के ही नहीं, पूरी दुनिया के प्रमुख चैनल्स देख सकते हैं. एक और मस्त साइट है hindilinks4u.net . इस पर आप भी करिए आर एंड डी (रिसर्च एंड डेवलपमेंट). ये ऐसी चीज है जो हमारी फितरत में शामिल है. इंटरनेट तो ऐसी दुनिया है जहां हर दूसरी गली लोगों को ‘आर एंड डी’ के लिए प्रवोक करती है. कभी इन अंजान रास्तों पर अच्छे दोस्त मिलते हैं तो कभी पॉकेटमार, उचक्के और लफंगे भी टकरा जाते हैं जिन्हें हम वायरस या हैकर्स कहते हैं. यानी सज्जन और बदमाश दोनों तरह के लोग हैं यहां. कभी नेट की इस भूलभुलैया से निकलने के लिए हेल्पलाइन इस्तेमाल करनी पड़ती है. मंयक की दुनिया सही रास्ता दिखाने में मददगार साबित हो सकती है. रास्ता ही नहीं, आपको स्टाइल भी सिखाने वाली वेबसाइट्स हैं वहां. आजकल प्रजेंटेशन का जमाना है, इस लिए स्टाइल को एप्लाई कैसे करना है इसके लिए है computerlife2.blogspot.com है. यहां मिलेंगे नए-नए फांट, होमपेज, एंटी वायरस, एंटी वायरस प्रोग्राम्स, उपयोगी टूल्स और भी न जाने क्या-क्या. सब कुछ बिल्कुल मुफ्त. तो सोच क्या रहे हैं जुट जाइए आर एंड डी में और फंस गए तो mayankaircel.blogspot.com है ना निकालने के लिए. मैंने भी ‘आर एंड डी’ के चक्कर में एक जगह उंगली कर दी है अब निकलने का भूलभुलैया से निकलने का रास्ता खोज रहा हूं.

8/28/10

भौकाली ब्लॉगर


कालेज डेज में हम लोगों को नसीहत दी जाती थी कि खाली, बीए-एमए करने से कुछ नही होगा. कुछ बनना है तो स्पेशलाइज्ड फील्ड चुनो. इसी तरह जर्नलिस्टों की जमात में घुसने पर सीनियर्स ने कहा आगे बढऩा है तो स्पेशलाइज्ड फील्ड पकड़ो. उस समय एड्स के बारे में कम ही लोग जानते थो सो इस पर खूब ज्ञान बघारा. उसके बाद तो साइंस का ऐसा चस्का लगा कि यूनिवर्स तक खंगाल डाला. कुछ साल स्पोट्र्स पर भी हाथ घुमाया. यानी स्पेशलाइज्ड फील्ड में किस्मत आजमाई. अपना तो नहीं मालुम लेकिन दूसरे कई स्पेशलाइज्ड जर्नलिस्टों का गजब का भौकाल है. सो ब्लॉगर अगर स्पेशलाइज्ड फील्ड का है तो उसका भौकाल होना स्वाभाविक है. आज थोड़ी चर्चा ऐसे ब्लॉगर्स पर.
चौथे खम्भे में सबसे पहले बात तीसरे खम्भे की. यानी हिन्दी ब्लॉग का एक मजबूत खम्भा. इस मजबूत ब्लॉग का नाम भी इत्तफाक से तीसरा खम्भा है. इस खम्भे के रचयिता हैं दिनेश राय द्विवेदी. पेशे से वकील दिनेश राय कोटा के कोर्ट में पाए जाते हैं लेकिन साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में भी इनकी नीव बहुत मजबूत है. लेकिन पेशे के अनुरूप इनका स्पेशलाइजेशन कानून की फील्ड में है. न्याय व्यवस्था के ज्वलंत मुद्दों को बड़ी ही सहज, सरल भाषा में उठाने में उन्हें महारत हासिल है. वकील जब ब्लॉगर हो तो वो सोशल वर्कर भी बन जाता है. तभी उनकी पोस्ट में ढेर सारे लोग, छोटी-छोटी कानूनी बातों पर उनसे सलाह लेना नहीं भूलते. और इसमें दिनेश दरियादिल हैं.
आइए अब राजस्थान से झारखंड चलें. यहां स्टील सिटी बोकारो में संगीता पुरी के संगीत का आनंद लेते हैं. संगीता पुरी ना तो गीतकार हैं ना संगीतकार. अर्थशास्त्र पढ़ कर वो नक्षत्रशास्त्र की टीचर बन बैठीं. उन्होंने ज्योतिषशास्त्र को बड़े तर्कसंगत और वैज्ञानिक ढंग से लेागों के सामने रखने की कोशिश की है. उनके ब्लॉग का नाम है गत्यात्मक चिंतन. उनकी पोस्टों में ईमानदारी और गति दोनों दिखती है. वो ‘बाबा’ तो नहीं हैं लेकिन अपने ब्लॉग फालोअर्स को निशुल्क ज्योतिष सलाह और भाग्य बांचने में किसी साध्वी से कम नही हैं. हां, संगीता पुरी की व्यस्त ‘नक्षत्रशाला’ में अपनी ग्रहदशा जाननी हो तो अपने कृपया लाइन से आएं और धैर्य रखें.
कानून हो गया, ज्योतिष हो गया. अब शब्दों के अजायबघर की सैर करते हैं. इसके लिए आपको अजित वडनेरकर के ब्लॉग ‘शब्दों का सफर’ का सफर करना होगा. अजित शब्दों के जादूगर हैं और उनके अजायबघर में एक से एक बिंदास, खड़ूस, राप्चिक और झंडू शब्दों की जो व्याख्या यहां मिलेगी वो दूसरे शब्दकोष में कहां. इसी तरह शरद कोकास का ब्लॉग ‘ना जादू ना टोना’ अंधविश्वास, भ्रांतियों और जादू-टोना करने वाले ओझा गुनिया का धंधा चौपट करने पर तुला है. आप ब्लॉगरों में जैकाल (सियार नहीं, जैक ऑफ ऑल) हैं तो कुछ नही होने वाला. कद्दू तोरई और बकरी पर लिखने से कुछ नहीं होगा. कुछ स्पेशल करिए और बनिए भौकाली.

8/21/10

‘लफंगे’ परिन्दे



ब्लॉगरी के बाजीगरों के करतब देख ये कहावत याद आती है- गए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास. ब्लॉगर की प्रोफाइल में झांकना ही पड़ता है कि आखिर इस मदारी की असलियत क्या है. कई टॉप हिन्दी ब्लॉगरों की प्रोफाइल देखी तो यही कहावत याद आने लगी. इंसान बनना कुछ चाहता है और बन जाता है कुछ और. कई दुर्दांत साइंटिस्ट, इंजीनियर, डाक्टर, गणितबाज और टेक्नोक्रेट्स के ब्लॉग देखिए. ये जिस तरह से हिन्दी में लिखते हैं उससे लगता है कोई साहित्यकार, कोई संस्कृताचार्य तो कोई ज्योतिषाचार्य और भाषा शास्त्री जरूर होगा. जैसे रवि रतलामी को ही लें. पहली बार नाम सुना तो लगा कि रतलाम में नमकीन-सेव बेचने वाले कोई बड़े कारोबारी होंगे. जो गद्दी से लौटने के बाद मन बहलाने के लिए कुछ लिखते हैं. लेकिन पता चला पांच-पांच ब्लॉग हैं, रतलामी सेव की तरह पांच अलग-अलग फ्लेवर वाले. चुपके से उनकी प्रोफाइल पर नजर डाली तो ये तो हार्डवेयर और साफ्वेयर दोनों के धुरंधर निकले. इसी तरह ज्ञानदत्त पांडे इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग पढ़ कर रेलगाड़ी की रेलमपेल में फंसे-फंसे किसी गुरुकुल के आचार्य की तरह गंगा तीरे ज्ञान की गंगा बहा रहे हैं. शिवकुमार मिश्र चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं लेकिनअपने ब्लॉग में मनी मैटर और वाणिज्य-व्यापार की बातें कम व्यंगबाण ज्यादा छोड़ते हैं. गिरिजेश राव, प्रवीण पांडे, अभिषेक ओझा, स्तुति पांडे, कितने नाम गिनाऊं, ऐसे साइंटिस्ट-इंजीनियर और टेक्नोक्रेट्स की हिन्दी ब्लॉग जगत में भरमार है. यहां पंकज शर्मा जैसे मैनेजमेंट गुरू भी हैं जो हैं तो बुजुर्ग लेकिन उनकी कलम में टीनएजर्स वाले लटके-झटके है. यहां मनीष कुमार जैसे बिजली बनाने वाले इंजीनियर भी हैं. उनकी कविताओं, गजल और शायरी पढ़ शरीर में करंट दौडऩे लगता है. उनका शौक है लफंगे परिदों की तरह घूमना.
इन सबकी प्रोफाइल देख मुझे मिस्टर क्वात्रा याद आने लगते हैं. मि. क्वात्रा नाम के एक सीनियर आर्किटेक्ट पड़ोस में रहते थे. उनकी ख्याति अपने प्रोफेशन में कम कुंडली बांचने में ज्यादा थी. वो कहा करते थे कि हर इंसान में कुछ गॉड गिफ्टेड टैलेंट होती है और उनके हॉरस्कोप में ग्रह दशा इस ओर इशारा भी करती है. बस जरूरत है इसे पहचानने की. सो मैं भी पहुंचा अपना कुंडली लेकर. हाथ जोड़ कहा, हे आर्किटेक्टाचार्य कृपया इस ‘इमारत’ की अंधेरी कोठरियों पर अपने दिव्य चक्षु से प्रकाश डालें. उन्होंने हॉरस्कोप को ध्यान से देखा. फिर बोले, घोर अनर्थ. मैं डर गया कि कहीं ये हॉरस्कोप देख कोई हॉरर स्टोरी तो नहीं सुनाने जा रहे. वो बोले, आपको साइंटिस्ट होना चाहिए था. मैंने कहा, प्रभू इच्छा तो फौजी बनने की थी, अब देर हो चुकी है अगली बार देखा जाएगा. वैसे सपने तो अब भी आते हैं कि आर्मी सर्विस सेलेक्शन बोर्ड में घूम रहा हूं लफंगे परिंदो की तरह. इन ब्लॉगर्स में भी मुझे कोई घूमता दिखता है ऐसे ही परिंदो की तरह.
(जैसा आई नेक्स्ट में लिखा)

8/8/10

झंडुओं का बाम



दो गाने टाप पर बाकी सब झंडू. एक महंगाई डायन दूसरा मुन्नी डार्लिंग का झंडूबाम. झंडू खुदा की नियामत है, ऊपर वाले का नायाब तोहफा. कब कौन झंडू हो जाए कहा नहीं जा सकता. पहले दर्द भगाने वाला एक ही बाम होता था अमृतांजन लेकिन झंडूबाम ने बाकी सब बामों की वाट लगा दी है. झ़ंडुओं का दर्द समझना है तो बनारसियों से पूछिए. अब झंडूबाम की ठंडी-ठंडी जलन सभी झंडुओं को महसूस होने लगी है. ‘मलाई-का’ भाभी ने ठुमके लगा-लगा के जिस तरह अपने कूल्हे पर झंडूबाम मला है उसकी चुनचुनाहट उनको भी हो रही है जिनकी बैटरी डाउन हो चली थी. फिलिम आने से पहले ही गाना सुपरहिट. लेकिन डर तो ये लग रहा है कि ये झंडूबाम सल्लू भाई का काम ना लगा दे. वैसे झंडू शब्द सबसे पहले बनारस में सुना था. तब सिंगल डिजिट वाला एक रुपए का डेली लॉटरी टिकट उसी तरह पॉपुलर था जैसे आजकल गुटखे का पाउच. उस समय दिन में कई बार हल्ला होता था...का राजा दुग्गी निकलल कि छक्का? नंबर मैच कर गया तो आवाज आती थी... जीया राजा बनारस.. और जिनकी नहीं निकली वो ...का हो ..हो गइ-ल झंडू.. यानी बर्बाद.
कब कौन सा शब्द चलन में आ जाए कहा नहीं जा सकता. जैसे एक शब्द है डेंगू. दूसरों का पता नहीं लेकिन मीडिया में ‘डेंगू’ शब्द का खास मतलब होता है-लीचड़. अगर किसी का फीडबैक लेते समय किसी ने कह दिया कि अबे वो तो ‘डेंगू’ है, तो समझिए उसका लग गया काम.
इसी तरह पहले कुछ शब्द थे जिसका प्रयोग सिर्फ लौंडे-लपाड़ी करते थे अब तो लड़कियां भी धड़ल्ले से कर रही हैं. ये शब्द हैं ‘बजाना’ और ‘फाडऩा’. अब तो कब कौन लडक़ी किसकी बजा दे या फाड़ दे पता नही. टीवी रियलिटी शो में तो बात-बात पर महिला एंकर और जज एक- दूसरे की बजा और फाड़ रहे हैं. इन शब्दों का असली अर्थ पता चलने पर बड़ों-बड़ों की बज जाएगी. शायद तब वो बजाने से बाज आएंगे. लेकिन ये शब्द लोगों की जुबान पर इतने चढ़ गए हैं कि सुन कर किसी की नहीं फटती. लेकिन जब से मुन्नी ने झंडूबाम कूल्हे पर मलना शुरू किया है दूसरे गानों की बज गई है.खतरा तो इस बात का है कि दबंगई में मुन्नी मल कर निकल जाए और सल्लू झंडू ना बन जाए. सोच सोच कर उनके फैंस की फट रही है. फिलहाल आप झंडूबाम की चुनचुनाहट का मजा लें.

7/31/10

कौन हैं ये रात में टिमटिमाते जुगनुओं की तरह


रात में टिमटिमाते जुगनू देखे हैं? पहले बरसात के बाद खूब जगमगाते थे जुगनू. पेड़ों पर, बगिया में, घर के बाहर लगी झाड़ में रोशनी के इन छोटे छोटे बुलबुलों को देख कर लगता था जैसे बारिश के बाद रात जश्न मना रही हो, जैसे शबेरात हो या फिर किसी की बारात हो. कभी तो ये टिमटिमाते जुगनू कमरे में घुस आते थे. जैसे वो खेलना चाहते हों, बात करना चाहते हों. लेकिन अब ये जुगुनू कम ही दिखते हैं. शहरों में अब ना वैसे बाग-बगीचे रह गए ना ही जुगनू. न्यू जेनरेशन में बहुतों ने तो जुगनू देखे भी नहीं हैं बस उनकी बातें किताबों में पढ़ी हैं. कहीं पढ़ा था कि बया चिडिय़ा तो अपने घोसलों को रोशन करने के लिए जुगनुओं को पकड़ लाती है. इसमें कितनी सच्चाई है पता नही लेकिन जुगनू हमेशा से इंसपायर करते रहे हैं अंधेरी सुरंग में आशा की किरण की तरह. तो आइए आज जुगनुओं की बात करें.
बरसात की ऐसी ही एक स्याह रात में थकान दूर करने के लिए मन किया थोड़ा घूम आएं. सोचा चलो आज नेट के किसी गलियारे का चक्कर लगा आते हैं. फेसबुक पर लॉग-इन करते समय उम्मीद कम थी किरात एक-डेढ़ बजे कोई दोस्त, कोई परिचित ऑनलाइन मिलेगा. लेकिन यह क्या, अभी भी इतनी सारी हरी बत्तियां जल रही थीं. लगा कि रात में जुगनुओं की बस्ती में आ गया हूं. इतनी रोशनी, इतनी चहलपहल जैसी आधी रात में लखनऊ का चौक और बनारस का गोदौलिया चौराहा हो. कहीं गप-शप, कहीं चैटिंग-शैटिंग, सब अपनी धुन में मस्त. ध्यान से देखा कि कहीं ये अमेरिका, कनाडा और आस्ट्रेलिया वाले दोस्त तो नहीं, क्योंकि वहां तो इस समय दिन होता है. लेकिन एक-दो को छोड़ कर सब हिन्दुस्तान के दोस्त थे. ज्यादातर यंग. इसमें हाईस्कूल, यूनिवर्सिटी, प्रोफेशनल कालेजों के स्टूडेंट से लेकर एक्जीक्यूटिव और आईटी प्रोफेशनल तक थे. सब को जानता था. डेढ़ बजे रात ये सब आखिर कर क्या रहे थे. जानने के लिए किसी को धीरे से टीप मारी, कुछ को कुरेदा, कुछ के स्क्रैप और कमेंट्स देखे तो फिर जुगनू याद आने लगे, जल कर बुझते, बुझकर जलते, टिमटिमाते से. कहीं किसी के बर्थ डे पर ढेर सारी बधाइयां थीं, ई-गिफ्ट्स और चाकलेट थे तो कहीं कोई उदास था..किसी ने भी उसको बर्थ डे विश नहीं किया था. कोई पेरशान था. उसके मम्मी-पापा शादी कर देना चाहते थे. लेकिन वो पढऩा चाहता था, करियर बनाना चाहता था. कोई बहुत खुश थी, उसकी शादी होने वाली थी. सपनों के राजकुमार के साथ वह कल्पना की जगमगाती दुनिया में उड़ती फिर रही थी.. कहीं कोई यूं ही किसी इनोसेेंट के साथ खेल रहा था, फ्लर्ट कर रहा था. कोई बेअंदाज था तो काई बिंदास. रात की इस बस्ती में हाईस्कूल की एक बच्ची भी थी. पूछा इतनी रात को क्या कर रही हो, पेपर है क्या? उसने चट से कहा, दिन में मस्ती रात में स्टडी, रात में पढऩे में मजा आता है. ढेर सारे टीन एजर्स ऐसे थे जो सिर्फ चैटिंग कर रहे थे. कोई किसी के टैडी की तारीफ कर रहा था तो कोई किसी के नए स्नैप को देख कर कह रहा था वॉव, लुकिंग सो क्यूट.
फेसबुक के इस चौराहे पर कब कौन हैलो कह दे, दोस्ती का हाथ बढ़ा दे, कहा नहीं जा सकता. हैंडसम, ब्यूटीफुल और ग्लैमरस फोटो और शानदार प्रोफाइल देख कर कर ली दोस्ती. फिर खुलने लगते है उस अनजानी किताब के पन्ने. किसी के ग्रेे होते बालों के बावजूद एक यंग साफ्टवेयर इंजीनियर ने उन पर कमेंट किया था, यू लुक सो ब्यूटीफुल और साथ में हार्ट का साइन भी भेज रखा था. माथा ठनका कि कहीं ये ‘वो’ तो नही. लेकिन ऐसा है नहीं. इन कमेंट्स पर सरसरी नजर डाले तो लगेगा कि नेट की बस्ती में जगमगाती इस इस यंग जेनरेशन का ‘आई क्यू’ तो हाई है लेकिन ‘ई क्यू’ यानी इमोशनल कोशेंट में ये कहीं ना कहीं कमजोर है. तभी तो इमोशनल सपोर्ट के लिए इन्हें तलाश है अच्छे दोस्तों की. जैसी भी है ये बस्ती है अपनों की, जहां हर मोड़ पर मिल जाएगा कोई जल कर बुझता, बुझ कर जलता, जुगनुओं की तरह.

7/19/10

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इश्क-विश्क, हाय रब्बा


सावन आ गया है. झमाझम बारिश हो रही है. लोग भीगते ही रोमांटिक हो रहे हैं, मन का रेडियो गुनगुनाने लगा है, कहीं नई कविता आकार ले रही है तो कहीं पुरानी ‘कविता’ याद आ रही है. बारिश में भीगते ही यंगस्टर्स को कालिदास का मेघदूतम याद आने लगता है और वे यक्ष और यक्षणियों के रोल में आ जाते हैं. तो इश्क-विश्क, प्यार-व्यार की बातें हो जाएं.
वैसे तो इश्किया टाइप ब्लॉगर्स के रोल माडल हैं गुलजार. लेकिन कुछ ऐसे ब्लॉगर भी हैं जिनकी शैली थोड़ी जुदा है और वो सावन की नम हवाओं की तरह तन मन को भिगो जाती है. ऐसी ही एक ब्लॉगर हैं पूजा उपाध्याय. वो भी गुलजार, बशीर बद्र और दुष्यंत कुमार की फैन हैं. उनके ब्लॉग लहरें में एक पोस्ट है - इश्क की बाइनरी थीसिस. पूजा का लिखने का अंदाज बेहतरीन है. सीधी सरल भाषा लेकिन गहराई सागर सी. जैसे- ‘किसी प्रोफाइल में गूगल उससे पूछता है बताओ ऐसा क्या है जो मैं तुम्हें नहीं बता सकता...वो बंद आंखों से टाइप करती है ‘वो मुझे याद करता है या नहीं?’ गूगल चुप है. पराजित गूगल अनगिनत तसवीरें उसके सामने ढूंढ लाता है. बर्फ से ढके देश, नीली पारर्शी सुनहली बालुओं किनारों के देश. उनकी तस्वीरें बेतरह खूबसूरत होती हैं. वेनिस, पेरिस, विएना कुछ शहर तो इश्क की दास्तानों में जीते लगते हैं आज भी. उसकी आवाज सुन कर आज भी वो भूल जाती है कि क्या कर रही थी. हां, वो गूगल से पूछ रही थी, बताओ दिल के किसी कोने में मैं हूं कि नहीं, क्या कभी दिन के किसी समय वह मुझे याद करता है कि नहीं. गूगल खामोश है. वह गूगल को नाराज भी तो नहीं कर सकती...आफिस का काम जो है आज रात खत्म करना होगा. ..उसकी उंगलियां कितनी खूबसूरत थीं, और वो जब कम्प्यूटर पढ़ाता था कितना आसान लगता था. उसके जाते ही सब कुछ बाइनरी हो जाता था, जीरो और वन..वो मुझसे प्यार करता है-वन, वो मुझसे प्यार नही करता-जीरो. डेरी मिल्क, उसी ने तो आदत लगाई थी... कि आजतक वो किसी से डेरी मिल्क शेयर नही करती.’
एक और ब्लॉगर हैं प्रवीण पांडे. पहले अतिथि ब्लॉगर थे अब अपना घर बना लिया है. बेहद सेंसिटिव, सरल और पोलाइट. उनके ब्लॉग का नाम है- न दैन्यं न पलायनम्. इसमें उनही एक पोस्ट है 28 घंटे. उसकी कुछ लाइनें- मैं ट्रेन में चढ़ा, तुमने पीछे मुड़ कर नही देखा. एक आस थी कि तुम एक बार पीछे मुड़ कर देख लेती तो 28 घंटे की यात्रा 28 घंटे की ना लगती...खिडक़ी पर बूंदे उमड़ती हैं, लुप्त हो जाती हैं, विंध्य पर्वत के हरे जंगल पीछे छूट रहे हैं, यात्री उत्साह में बतिया रहे हैं..तुम रहती तो दिखाता. तुम नहीं हो पर तुम्हारा मुड़ कर न देखना सारे दृष्य रोक कर खड़ा है, हर क्षण इन 28 घंटों में.
इस तरह की इमोशनल फुहारों का मजा लेना हो तो http://laharein.blogspot.com/2010/07/blog-post_12.html और http://praveenpandeypp.blogspot.com/2010/07/28.html पर क्लिक करें.

7/9/10

अब लौकी की शामत



अब लौकी की शामत है. वही लौकी जो रूप और गुण, दोनों में बिल्कुल सात्विक और साध्वी लगती है. आपने सुना है लौकी ने कभी किसी को नुकसान पहुंचाया हो. चाहे जितना खाएं, ना तो पेट खराब होगा और ना ही एसिडिटी. लौकी तो स्वभाव से ही मीठी होती है और सादगी तो कूट कूट कर भरी होती है. लेकिन अब उसके दामन पर भी दाग लग गया. दिल्ली में आईसीएमआर के एक वैज्ञानिक की लौकी और करेले का जूस मिला कर पीने से मौत हो गई. वैज्ञानिक और उनकी पत्नी ने जूस का ये मिक्सचर पीया था. मिक्सचर तो वो पिछले चार साल से पी रहे थे. कहा जा रहा है कि जूस ज्यादा ही कड़वा था और इसके विषैले तत्व से वैज्ञानिक की मौत हो गई. यह दुर्र्भाग्यपूर्ण है लेकिन लेकिन लौकी पर लांछन भी दुखद है. करेला कम्बख्त तो अपने कड़वेपन के लिए मशहूर है लेकिन उसके चक्कर में बहन लौकी पर भी उंगलियां उठाना उचित नहीं. चैनल वाले उस जूस के विषैले तत्व का विश्लेषण कर मौत के कारणों का पता लगाने के बजाय लौकी पर लाल-पीले हो रहे हैं. अब लौकी में जहर का इंजेक्शन देकर किसी को खिलाएंगे तो भला वो क्या करे. लेकिन हो सकता है कि कुछ दिन लौकी को तिरस्कार और बहिष्कार झेलना पड़े. आज शाम को बाजार में लौकी देख कर मैं भी एक बार ठिठका लेकिन जिस मासूमियत और निरीह भाव से वो टुकुर टुकुर ताक रही थी तो रहा नहीं गया और एक ले आया. लोग जो भी कहें लेकिन मैं तो लौकी के साथ हूं और आप?

7/7/10

हनीमून लाइव



आपको पता ही होगा कि धोनी हनीमून कोलम्बो में मना रहे हैं. तो आपको दिखाते हैं हनीमून लाइव, एक्सक्लूसिव. बिल्कुल सटीक, ना कोई पपराजी ना अश्लीलता. धोनी ने अपनी फटाफट शादी में मीडिया को पास नहीं फटकने दिया. कई महारथी मनमसोस कर रह गए. मजबूरन उन्हें धोनी की ‘पोनी’ से लेकर पंडित और पंडाल तक सब का नाट्य रूपांतर ही दिखाना पड़ा. धोनी हनीमून पर निकल पड़े हैं तो पेश है माही का हनीमून लाइव.
लेकिन जरा ठहरिए, हनीमून लाइव हम कैसे दिखा सकते हैं. इसमें फ्रीडम ऑफ प्राइवेसी का उल्लंघन होगा और इसके लिए ‘ए’ सर्टिफिकेट भी नहीं लिया है. मजबूरन हम भी आपको लाइव का नाट्य रूपांतर ही दिखा सकेंगे. आपको बता दूं कि माही ने हनीमून को भी एक मैच की तरह ही लिया है. उनकी इच्छा के अनुसार इसे डी- ट्वेंटी नाम दिया गया है. यह भी सीमित ओवरों का मैच है. कितने ओवर फेंके जाएंगे इसका फैसला अम्पायर ग्राउंड की कंडीशन देख कर करेंगे. ये मैच डे-नाइट की तरह फ्लड लाइट में नहीं बल्कि रात में बिना लाइट के खेला जा रहा है. दर्शकों की सुविधा के लिए विकेट के पास कैमरे की जगह माइक्रोफोन लगा दिया गया है जिससे दर्शक भी खेल के रोमांच को महसूस कर सकें और अम्पायर को भी फैसला लेने में आसानी हो.
...और मैच शुरू. पहला ओवर मेडन रहा. दर्शक सुन सकते हैं कि धोनी किस तरह उत्साहित हैं और शाबास, कमऑन कह कर बकअप कर रहे हैं. बिल्कुल सटीक गेंदबाजी हो रही है. कभी इन स्विंगर, कभी यार्कर. इस बीच एक फुलटॉस बाल को बल्लेबाज ने सीधे टांगों पर खेला ...और इसके साथ ही धोनी ने एलबी डब्लू की जोरदार अपील की- हाऊ इज दैट? लेकिन अम्पायर ने कहा नॉटआउट. अब उत्साहित धोनी बार-बार हाऊ इज दैट शाउट कर रहे हैं लेकिन बल्लेबाज क्रीज पर टिका हुआ है और लूज बॉल पर करारा शॉट लगा रहा है. इस बीच किसी तकनीकी गड़बड़ी के कारण लाइट्स ऑन हो गई हैं और मैच थोड़ी देर के लिए रुक गया है. खैर, लाइट बुझ गई हैं और मैच शुरू. धोनी ने पहला पॉवर प्ले ले लिया है. खेल रोमांचक हो चला है. एक आउट स्ंिवगर को बल्लेबाज ने धीरे से फस्र्ट स्लिप के बगल से निकाल दिया है. धोनी ग्लब्ज उतार कर गेंद के पीछे दौड़ रहे हैं...और डाइरेक्ट हिट ने गुल्ली उड़ा दी लेकिन थर्ड अम्पायर ने बल्लेबाज को नॉट आउट करार दिया है. इस बीच पहला ड्रिंक्स इंटरवल. मैदान में कोल्ड ड्रिंक की जगह हल्दी वाला दूध जा रहा है. मैच फिर शुरू हो गया है. पिच पर नमी बढऩे के साथ बॉल ज्यादा टर्न लेने लगी है. अब बल्लेबाज हर बॉल पर बीट हो रहा है और धोनी फिर शाउट कर रहे हैं हाऊ इज दैट.
दूसरा पॉवर प्ले ले लिया गया है और प्लेयर्स ने अपनी पोजीशन बदल ली है...और ये नो बॉल. अम्पायर ने फ्री हिट का इशारा किया. भरपूर शाट लेकिन बॉल बाउंड्री के पहले ही रुक गई. इस बीच तीन रन लिए गए. अंतिम दो गेंदे फेंकी जानी है और जीत के लिए उतने ही रन चाहिए. इस नेल बाइटिंग फिनिश से सभी एक्साइटेड हैं. धीमी गेंद पर एक रन और बन गया. धडक़ने बढ़ गई हैं. अंतिम गेंद पर बल्लेबाज चूका और गेंद सीधे धोनी के ग्लब्ज में. इस तरह मैच टाई. पसीने पसीने धोनी अब टीवी वालों को बाईट दे रहे हैं- येस, इट वाज अ एक्साइटिंग मैच. द अदर टीम आल्सो प्लेड वेरी वेल, होप वी बिल डू बेटर नेक्स्ट टाइम...थैंक्स.

7/3/10

''बहुरूपिया'' ब्लॉगर



शोरूम कितना भी शानदार हो लेकिन उसमें माल घटिया हो तो ग्राहक दोबारा नहीं आता. इसी तरह किसी भी ब्लॉग की लोकप्रियता की पहली शर्त है बेहतर कंटेंट. ब्लॉग के टेम्पलेट्स कितने भी आकर्षक हों, उसे कितना भी सजाया गया हो लेकिन अगर कंटेंट अच्छा नहीं है तो रीडर फिर उस ब्लॉग पर नहीं लौटता. लेकिन अगर ब्यूटी बिद ब्रेन हो यानी अच्छे कंटेंट के साथ प्रेजेंटेशन भी ाूबसूरत हो तो सोने पे सुहागा. इस लिए आज रंगरूप और बहुरूपिया ब्लॉगर्स पर चर्चा हो जाए. आपके शहर के अच्छे पेट्रोल पंप पर तेल और हवा के साथ यूजिक और ठंडे पानी की भी व्यवस्था होती है और पलक झपकते ही कोई लडक़ा आपकी कार पर डस्टर फेर देता है. अब तो बड़े पेट्रोल पंप पर स्टोर और फास्टफूड ज्वाइंट्स भी होते हैं. जमाना प्रजेंटेशन का हो तो ब्लॉगर्स पीछे कैसे रह सकते हैं. जब कोई ब्लॉग जगत में कदम रखता है तो वो बच्चा ब्लॉगर होता. लेकिन बहुत जल्दी ही वो बड़ा और फिर सयाना हो जाता है. वो प्रेजेंटेशन का तरीका सीख जाता है. पब्लिसिटी और प्रमोशन के फंडे भी उसे धीरे-धीरे मालूम पड़ते जाते हैं. इसी लिए हिन्दी ब्लॉग्स की तीन कैटेगरी दिखाई देती हैं- मैनेज्ड, मनपसंद और मस्त.
मैनेज्ड ब्लॉग वो होते हैं जो जितना लिखते हैं उससे ज्यादा उसका ढिंढोरा पीटते हैं. ब्लॉग पर चि_ïाजगत, इंडली ब्लॉगवाणी, ट्विटर, फेसबुक और ना जाने कौन-कौन से एग्रीगेटर और लिंक का जाल फैला रहता है. कई ब्लॉग पर तो इतने आइकॉन चस्पा रहते हैं कि खोपड़ी घूम जाती है कि क्या-क्या देखें. फालोवर्स और पंसदीदा ब्लॉग की सूची तो आम हंै. लेकिन कुछ ब्लॉग पर इतने मीटर और घ्डिय़ां लगे रहते हैं कि लगता है ब्लॉग नहीं किसी हवाई जहाज के कॉकपिट में बैठे हों. रीडर असली पोस्ट भूल जाता है और गली पकड़ कर कहीं का कहीं पहुंच जाता है.
मनपसंद ब्लॉग वो होते हैं जिनके तामझाम कम होता है. टेम्पलेट साफ सुथरे होते हैं और कंटेंट बढिय़ा होता है. लिखने की एक खास शैली होती है. पढऩे वाला उसका मुरीद हो जाता है. ब्लॉग्स की एक और कैटेगरी होती है जिसे हम कहते हैं मस्त. ये ऐसे ब्लॉग हैं जो आपको चौंकाते हैं. इसके कंटेंट को किसी एक शैली या कैटेगरी में नही बांधा जा सकता. ये कभी ह्यूमर, कभी सरोकार तो कभी संजीदगी से भरे होते हैं. कुछ भी लिख देने वाले ये मस्त ब्लॉगर हैं जिन्हें रीडर इग्नोर नहीं कर सकते.
लेकिन बहुरूपिया ब्लॉगर भी कमाल के हैं. यानी प्रोफाइल और फोटो दख उनकी थाह नही पाई जा सकती. कोई अपनी फोटो की जगह गोभी का फूल लगाए हुए है तो किसी ने किसी हीरोइन की फोटो चेंप रखी है. कुछ तो बुढ़ा चले हैं लेकिन जवानी की फोटो लगा रखी है. एक महिला ब्लॉगर ने तो अपनी ऐसी फोटो लगाई है जैसे इंटरनेशनल मॉडल हों लेकिन ऑरकुट पर उनकी एलबम देखने पर पता चलता कि अब तो बहुत मोटी हो चली हैं. पे्रजेंटेशन के जमाने में ये सब करना ही पड़ता है. लेकिन शोरूम का शीशा चमकाते समय भीतर के माल पर भी ध्यान देना जरूरी है नहीं तो ग्राहक, माफ कीजिए रीडर दोबारा नहीं आएगा.

6/24/10

साइलेंस इज गोल्ड


स्पीच इज सिल्वर साइलेंस इज गोल्ड, ये कहावत मेरे एक साथी पर बिल्कुल सटीक बैठती है. छह फुटी कद-काठी, बेकहम जैसी लुक लेकिन बोलते ही लगता है गई भैंस पानी में. पंचकुला (चंडीगढ़ में ) इस साथी को करीब से देखने के मौका मिला. युवाओं वाले सभी गुण-अवगुण थे या हैं उसमें . पानीपत से आए इस बंदे का नाम है .... कभी दूसरों को पानी पिला देने की काबिलियत तो कभी उसके कारनामों से पानी-पानी होने की स्थिति. उसे देखने या उसकी बात से नहीं लगता था कि ये इश्क-विश्क भी कर सकता है और कविता भी लिख लेता होगा. जब उसने बताया कि भाग कर लव मैरेज की थी तो विश्वास नहीं हुआ. बिल्कुल फिल्मी कहानी जैसा. एक दिन उसकी दोनों कलाइयों के नीचे पुराने कटे के निशान के बारे में पूछा तो पता चला कि भाग कर शादी करने के बाद रोजी-रोटी के लिए संघर्ष में होटल में प्लेटें भी साफ की. एक बार हताशा में हाथ की नसेंं काटने की कोशिश की थी.
उसमें कुछ ऐसा था कि रोज उसे डांटने का एक राउंड जरूर होता था. कभी किसी खबर को लेकर, कभी किसी दूसरे रिपोर्टर की चुगली करने पर कभी, कभी लम्पटों की तरह टेढ़े खड़े होने पर, कभी कडक़ी में भी सिगरेट पर पैसा बरबाद करने पर. और कुछ नही मिलता तो इस बात पर डाटता कि तुम्हारे शरीर से दाढ़ी वाले बकरे जैसी स्मेल क्यों आती है. लेकिन कई अच्छी आदतें भी थीं उसमें. जैसे कभी उसने पलट कर जवाब नहीं दिया. साथियों की मदद को हमेशा तैयार रहता था. हां, थोड़ा झगड़ालू जरूर है. एक बार किसी खबर के सिलसिले में पंचकूला सरकारी अस्पताल में अधीक्षक के चमचों से झगड़ा हो गया. उन्होंने उसे अस्पताल के कमरे में बंद कर दिया था. काफी हंगामा के बाद वो छूटा. मैंने कहा, लम्बे-चौड़े हो चमचों की ठोंकाई क्यों नही की. बोला, ठोंकाई कर रहा था लेकिन एक की लात ‘वहां’ पड़ गई . इसके बाद हिम्मत जवाब दे गर्ईं. मामले पर पंचायत हुई और सभी अखबरों ने पत्रकार के साथ अभद्रता की खबर छापी. अंत में माफी मांगने के बाद मामला शांत हुआ. गुरुमुखी में निकलने वाले एक अखबार ने उसकी खबर तीन कालम में छापी थी. उसने बड़े चाव से मुस्काते हुए हेडलाइन पढ़ी, पत्रकार नू कुट्टया. मैंने कहा, शर्म नही आती अपनी पिटाई की खबर पढ़ते. तो ढीठ के तरह हंस पड़ा. उसके पास कए पुरानी टीवीएस बाइक थी. उस बाइक पर मैंने भी कसौली और मोरनी हिल्स के कई चक्कर लगाए थे. चंडीगढ़ के बाद वो अब दिल्ली में एक बड़े अखबार का रिपोर्टर है. दिल्ली सीरियल ब्लास्ट के समय वो इत्तफाक से अपनी खटारा मोटर साइकिल के साथ स्पॉट पर था. उसकी मोटरसाइकिल धमाके की भेंट चढ़ गई लेकिन वो बच गया. अब उसने दूसरी बाइक ले ली है. लिखता तो अच्छा है लेकिन बोली उसकी स्मार्ट काया से मैच नहीं खाती. इस लिए उसका नाम यहां नहीं ले रहा हूं. कहते हैं ना साइलेंस इज गोल्ड.

6/19/10

दांत चियारे गिफ्ट निहारे



गर्मी की छुट्टियां, ऊपर से शादियों का मौसम. आपने भी कई पार्टियां निपटा दी होंगी. मीठे से तो आपका मन भर गया होगा और गर्मी में ज्यादा खाने-पीने से बचना चाहिए. तो क्यों ना आज खाने के बजाय कुछ इनविटेशंस और गिफ्ट का मजा लिया जाए. राजू श्रीवास्तव और उन जैसे दूसरे कॉमेडियन और मिमिक्री आर्टिस्ट शादी और रिसेप्शन में भेाजन के लिए मचने वाली भगदड़ का जिक्र तो बार-बार कर चुके हैं. चलिए पार्टियों के कुछ और रोचक पहलुओं पर नजर डालते हैं. आप सोच रहे होंगे कि ब्लॉग के इस कॉलम में शादी-व्याह, पार्टी और गिफ्ट की बातें क्यों कर रहा हूं. अरे, ब्लॉगर कोई दूसरे लोक के जीव तो होते नहीं. वो भी इसी समाज में रहते हैं और पार्टी-वार्टी अटेंड करते रहते हैं. ऐसे में ब्लॉग में उनका जिक्र तो होगा ही.
कोई बारात हो या रिसेप्शन, सामने स्टेज पर एक जोड़ी सिंहासन होता है. बाराती जब नागिन डांस कर लस्त-पस्त हो जाते हैं तो द्वारचार के बाद दूल्हे को उठा कर सिंहासन पर बैठा दिया जाता है. फिर मंथर गति से सिर झुकाए दूल्हन आती है. ‘सालियो’ं और ‘जिज्जुओं’ के सपोर्ट से जयमाल होता है. दूल्हन भी सिंहासन पर विराजती है. फिर फोटो सेशन और न्योता और गिफ्ट देने का दौर चलता है. बीच में ही आधे लोग वार जोन यानी भोजन स्थल की और कूच कर जाते हैं. इधर दूल्हा लगातार दांत चियारे और दूल्हन गंभीर मुस्कान के साथ बैठे रहते हैं. उनके ठीक बगल में बारात हुई तो वधू पक्ष की सबसे विश्वसनीय महिला और रिसेप्शन हुआ तो वर पक्ष की खास महिला कॉपी-कलम लिए बैठी रहती हैं जो गिफ्ट और लिफाफे देने वालों के नाम नोट करती हैं. बड़े गिफ्ट पैकेट लेकर आने वाली ‘पार्टी’ स्टेज पर वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ पैकेट सौंपती है और 51-101 वाले धीरे से लिफाफा थमा सटक लेते हैं. अगर लिफाफे में हेफ्टी अमाउंट हुआ तो पार्टी लडक़े या लडक़ी के माता-पिता के हाथ में ही उसे सौंपती है. बर्थ डे पार्टी में भी ढेर सारे गिफ्ट पैकेट मिलते हैं. फर्क बास इतना होता है कि पैकेट, पार्टी के बाद खोले जाते हैं लेकिन कुछ लंपट किस्म के बच्चे आपके सामने पैकेट खोल कर आपकी पोल खोल देते हैं. हालांकि अक्सर होस्ट ‘बैड मैनर्स’ कह उन्हें ऐसा करने से रोक कर आपकी इज्जत बचा लेता है.
इंडियन सोसाइटी के इन ट्रेडीशंस और यादों को लेकर जब कोई भारतीय विदेश जाता है और वहां पार्टी के डिफरेंट नाम्र्स और रूल्स से रू-ब-रू होता है ब्लॉग की एक नई पोस्ट का जन्म होता है. अमेरिका और यूरोप में भी गिफ्ट्स की लिस्टिंग होती है लेकिन डिफरेंटली. कई बार तो इनविटेशन में इतने इंस्ट्रकशंस होते हैं कि गेस्ट को शक होने लगता है कि वो गेस्ट है या होस्ट. लंदन में रहने वाली शिखा वाष्र्णेय के ब्लॉग स्पंदन में उनकी पोस्ट ‘कैरेक्टर लेस गिफ्ट’ का रैपर खोल कर देखिए मजा ना आए तो गिफ्ट वापस. लिंक है http://shikhakriti.blogspot.com/2010/06/blog-post_17.html. इसी तरह स्तुति के ब्लॉग भानुमति का पिटारा में अतिथि देवो भव! शीर्षक वाली पोस्ट इस लिंक http://stutipandey.blogspot.com/2010/05/blog-post_13.html पर देखिए और मजा लीजिए पार्टी का. अच्छा चलता हूं, आज मुझे भी एक पार्टी में लिफाफा देना है.

6/8/10

इति मूत्राभिषेक!


वो रातें अभी भी मुझे याद हैं. सुस्सू वाली रात के बाद की सहर (सुबह), कहर बन कर टूटती थी मेरे कोमल मन पर. मेरी तरह आप भी तो बिस्तर पर सुस्सू करते बड़े हुए होंगे. अब सुस्सूआएगी तो करेंगे ही. कभी साफ टॉयलेट में, कभी गंदे टायलेट में, कभी दीवार पर, कभी किसी कोने में तो कभी खुले आम तो कभी चोरी छिपे. खबर तो ये भी है कि अमेरिका में स्वीमिंग पूल्स में नहाने के दौरान 25 प्रतिशत लोग पानी में ही सुस्सू कर देते हैं. ये प्रतिशत कुछ ज्यादा नहीं लगता? मान लिया जाए कि दो-तीन फीसदी लोग ही पानी में सू करते होंगे तो भी पूरा पूल सू युक्त हो गया ना? यूरिक एसिड का कंसंट्रेशन भले ही थोड़ा कम होगा और बाद में उस पानी को फिल्टर कर लिया जाए लेकिन उस समय तो आपका मूत्राभिषेक हो ही गया ना. वैसे सू-आचमन की तरह सू-स्नान भी इतना बुरा नहीं होता. याद हैं ना अपने मोरारजी भाई. हम सब तो बिस्तर पर सू-स्नान करते ही बड़े हुए हैं. पहले डायपर-वायपर कहां होते थे.
सच बताऊं, मैं तो छठे क्लास तक बिस्तर पर सू कर देता था. सू वाली रात के बाद की सहर मेरे कोमल मन पर कहर बन कर टूटती थी. छोटे-बड़े सब ताने मारते-घोड़े जैसा हो गया है फिर भी बिस्तर गीला कर देता है, शरम नहीं आती? शरम तो आती थी. पक्का इरादा कर सोता था कि आज रात बिस्तर गीला नहीं करूंगा. लेकिन गहरी नींद में सपना आता कि जोर की सू-सू आई है, मैं राजा बेटा की तरह ट्वायलट में प्रेशर रिलीज कर रहा हूं. प्रेशर खत्म होने की प्लीजेंट फीलिंग के बीच अचानक कुछ गुनगुनेपन का अहसास होता और आंख खुल जाती, टेंशन बढ़ जाता. गीले बिस्तर पर लेटे-लेटे सुबह का इंतजार करता. पोल खुलते ही फिर तानों का सिलसिला. जाड़ों में जब सू वाला गद्दा मुंडेर पर सुखाने के लिए डाला जाता तो लगता कि पूरे मोहल्ले के सामने खड़ा होकर सू सू कर रहा हूं और लोग हंस रहे हैं- वो देखो घोड़ा सू कर रहा है. किसी ने कहा, पेट में कीड़े होंगे तो कीड़े की दवा दी गई. फिर भी फर्क नहीं पड़ा. कुछ ने कहा साइकोलॉजिकल प्राब्लम है.
बिस्तर गीला करना कैसे छूटा पता नहीं. लेकिन साइकोलॉजिकल प्राब्लम तो है सू सू को लेकर शरारत करने को मन अब भी करता है. एक बार टे्रन में भारी भीड़ थी. सब टायलेट में लोग भरे हुए थे और मेरे ब्लैडर काप्रेशर बढ़ता जा रहा था. अगला स्टाप दो घंटे बाद था. जब नहीं रहा गया तो कोच के गेट पर खड़े हो कर पूरी ताकत से प्रेशर रिलीज कर दिया. उस दिन सौ की स्पीड में भाग रही ट्रेन में पीछे की कोचों में गेट पर खड़े या खिडक़ी के पास बैठे कितने लोगों ने ना चाहते हुए भी सू-आचमन किया, पता नहीं.
एक और वाकया. हॉस्टल में सेकेंड फलोर पर मेरा रूम था. मेरे विंग में दस कमरों के बाद ट्वायलेट था. जाड़ों की रात में दस कमरों को पार कर सू करने जाना पहाड़ पार करने जैसा लगता. कोशिश रहती कि नींद में ही ये काम निपटा दिया जाए. उस दिन ट्वायलेट की लाइट नही जल रही थी. आव देखा ना ताव, अंदाज से ही टारगेट की तरफ तड़-तड़ा दिया. तभी कोई चिल्लाया ये क्या हो रहा है. आवाज मारकंडे गुरू की थी जो कान पर जनेऊ चढ़ा कर नियमानुसार बैठकर मूत्र विसर्जन कर रहे थे और मैंने अंधेरे में उनका मूत्राभिषेक कर दिया था. तब से खड़े हो कर सू करने में सुरक्षित महसूस करता हूं. वैसे भी गंदे ट्वायलेट के बजाय खुले में कच्ची जमीन पर या झाड-झंखाड़ को यूरिया से पोषित करना बेहतर लगता है. हां, स्वीमिंग पूल वाला प्रयोग नहीं किया है. वैसे ऐसा कर के ‘अपने ही सुस्सू में फिसलने’ की कहावत चरितार्थ नहीं करना चाहता.

6/6/10

‘जहर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा’



लोगों को सिगरेट पर सिगरेट फूंकता देख बशीर बद्र का ये शेर बरबस याद आने लगता है-
‘मैं खुदा का नाम लेकर पी रहा हूं दोस्तों,
जहर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा’

दवा कितनी है ये तो पता नहीं लेकिन टोबैको के अर्ज के मर्ज में लोगों की जिंदगी तेजी से खर्च हो रही है. लेकिन वो नहीं सुधरेंगे. ऐसे लोगों को आगाह करने के लिए ही पिछले मंडे को वल्र्ड नो टोबैको डे मनाया गया. कुछ साल पहले तक कुछ गिनेचुने ‘डे’ होते थे. जैसे इंडिपेंडेंस डे, रिपब्लिक डे, टीचर्स डे और मे डे. लेकिन अब महीने में दो-तीन बार कोई ना कोई ‘डे’ मना ही लिया जाता है. कोई भी डे क्यों मनाया जाता है? सब के कारण अलग-अलग हैं. किसी बड़ी ऐतिहासिक घटना या महापुरुष के जन्मदिन या फिर किसी बड़ी समस्या या बीमारी के खिलाफ अभियान और अवेयरनेस के लिए खास ‘डे’ मनाया जाता है. बहुत सारे ‘डे’ तो यह बताने के लिए मनाए जाते हैं कि संभल जाइए वरना आपके डेज पूरे होने जा रहे हैं. लेकिन कुछ ‘डे’ ये बताने के लिए भी मनाए जाते हैं कि डोन्ट वरी, रोजी डेज आर अहेड. जैसे वैलेंटाइन्स डे, फ्रेंडशिप डे, चाकलेट डे वगैरह. कोई डे ना हो तो जब मन करे हॉलीडे मना लेना चाहिए.
डेज कोई भी हों, ये सब की सेहत की बेहतरी के लिए होते हैं. ये डेज किसी ना किसी रूप में इंसपायर करते हैं. कोई शक नहीं की टोबैको सेहत को तबाह कर देता है. फिर, सिगरेट के कश में ऐसी कौन सी कशिश है कि लोग जानते हुए भी कश पर कश खीचते हुए हर फिक्र को धुंए में उड़ाते चलते हैं. लेकिन ये धुंआ तो सदियों से उड़ाया जा रहा है. राजा-महराजा के जमाने में भी तम्बाकू की तलब लगती थी. तब लोग चिलम और स्टाइलिश हुक्का गुडग़ुड़ाते थे. हुक्का हैसियत और सोशल एक्सेप्टबिलिटी का प्रतीक था. तभी तो बात-बात पर हुक्का-पानी बंद करने की धमकी दी जाती थी. उस समय सगरेट नहीं था. हां, हुक्के की बहन बीड़ी जरूर मौजूद थी लेकिन तब भी उसे बहुत डाउन मार्केट ही समझा जाता था. भला हो गुलजार जी और मार्डन इंटलेक्चुअल्स का जिन्होंने कारपोरेट कल्चर में बीड़ी का बेड़ा गर्क होने से बचाए रखा है. गुलजार जी ने बीड़ी जलइ ले...गाना क्या लिखा लोगों के जिगर में सुलग रही चिंगारी आग की तरह धधक उठी. यंगस्टर्स तो सिगरेट भी बीड़ी जलइले के तर्ज पर ही सुलगाते हैं. लेकिन मार्डन सोसाइटी में बीड़ी दो ‘एक्स्ट्रीम’ पर ही सुलगती दिखती है. एक बिल्कुल डाउन मार्केट मजदूर और लेबर तबका में और दूसरा बिल्कुल हाई इंटलेक्चुअल्स में. इनमें रंगकर्मी, आर्टिस्ट, क्रिटिक या सोशल एक्टिविस्ट्स कोई भी हो सकता है. किसी ने बताया कि हाई सोसाइटी में ‘समथिंग डिफरेंट’ के बहाने कुछ लोग ‘बीड़ी जलइले’ की तर्ज पर बीड़ी फूकतेे हुए जताने की कोशिश करते हैं कि उनके जिगर में कितनी आग है.
वैसे इंटलेक्चुअल्स हों या कॉमनमैन, मोटर मैकेनिक हो या मैनेजमेंट गुरू, थोड़ी सी माथा-पच्ची करते ही उनकी बाडी में निकोटीन की अर्ज बढ़ जाती है. और अर्ज पूरा करने का फर्ज तो निभना ही पड़ेगा. इसके लिए कोई सिगरेट सुलगाता है, कोई पानमसाला फांकता है तो कोई मुंह में खैनी दबा लेता है. सवाल उठता है कि निकोटीन की अर्ज पैदा होने की नौबत आती ही क्यों है? कई चेन स्मोकर्स और खैनीबाजों से बात की कि गुरू ये लत लगी कैसे? सब आहें भरते बताते हैं कि शुरूआत तो शौकिया की थी. किसी ने स्टाइल मारने के लिए, किसी ने गल्र्स को इंप्रेस करने के लिए तो किसी ने माचो लुक के लिए सिगरेट सुलगाई थी. कुछ लोगों ने टाइमपास के लिए तम्बाकू का पाउच मुंह में रखा था तो कुछ ने टेंशन रिलीज करने के लिए. टेंशन कितनी दूर हुई ये तो पता नहीं लेकिन निकोटीन की अर्ज पूरी ना होने पर उनका टेंशन जरूर बढ़ जाता है. अर्ज का मर्ज कहीं इतना ना बढ़ जाए कि टाइमपास के चक्कर में हार्ट बाइपास की नौबत आ जाए. सो टोबैको छोडऩे में क्या हर्ज है.

5/22/10

ब्लॉगिंग में ब्रेक



ब्लॉगिंग में भी ब्रेक होते हैं. ब्रेक लेना तो जैसे फैशन हो गया है. थोड़ा काम किया नहीं कि ब्रेक, थोड़ा बात की नहीं कि ब्रेक, मूड बना तो ब्रेक, नहीं बना तो भी ब्रेक. बिना रुके कोई अगर सरपट भागा जा रहा है तो वो बैकवर्ड है. मार्डन कहलाना है तो भागिए मत ब्रेक लीजिए. और बौद्धिक लोगों को तो ब्रेक की कुछ ज्यादा ही जरूरत हेाती है. थोड़ा सा ज्ञान बघारिए फिर लंबी सांस लेकर कहिए, ‘आई एम टायर्ड नॉव, लेट्स हैव कॉफी’. अब कॉफी बिना तो ब्रेक बनता नहीं. ब्लॉक जगत में तो घुसते ही बौद्धिकता का ठप्पा लग जाता है. जैसे आज के जमाने में अगर आपका ई-मेल आईडी नहीं है, आप ट्विटर या फेसबुक पर नहीं है तो निहायत ही पिछड़े किस्म के व्यक्ति हैं और अगर आपका ब्लॉग नहीं है या ब्लॉगर नहीं हैं तो प्रबुद्ध नहीं. प्रबुद्ध नहीं तो ब्रेक कैसा.
ब्लॉग जगत में भी ऐसे लोगों की भरमार है जो फैशन के तौर पर ब्रेक लेते हैं. उसी तरह जैसे किसी बारात या जनवासे में दूल्हा या उसका जीज्जू नाराज हो जाए और पूरे घराती-बाराती उसे मनाने में जुट जाएं. ये लोग बीच-बीच में जायजा लेने के लिए कि कहीे ब्लॉगरों में उनका महत्व कम तो नहीं हो रहा, रिसियाने का नाटक करते हैं. ये किस बात पर तुनक जाएं कहा नहीं जा सकता. बस अचानक घोषणा कर डालते हैं कि आज से ब्लॉग लिखना बंद. कुछ नियमित ब्लॉगर पूरी तरह ‘कपाट’ बंद नहीं करते. नाराजगी जताने के लिए बस इतना कह देते हैं कि पोस्ट की फ्रीक्वेंसी कम कर रहा हूं. इसके बाद कपाट की झिरी से कनखिया कर देखते रहते हैं कि उसके ‘गोल’ के लेागों पर इसका कैसा असर हुआ और विरोधी खेमे में कैसी प्रतिक्रिया है. रिसपांस जबर्दस्त हुआ तो नाराजगी थोड़ा लम्बी चलती है और रिसपांस फीका हुआ तो किसी बहाने झोला-झंडा लेकर फिर वापस आ जाते हैं.
लेकिन ऐसे ब्लॉगर भी कम नहीं जो बीच बीच में टीवी चैनल्स की तरह अपनी टीआरपी टेस्ट करने के लिए दूसरे ‘गोल’ के छत्ते को छेड़ देते हैं. फिर तो एक-दूसरे को डंक मरने का जो युद्ध शुरू होता है वो एक दो हफ्ते बाद ही शांत होता है. ब्लॉगरों का एक तीसरा गोल भी है जिसके डंक विषैले नहीं होते लेकिन ‘ये क्या हो रहा है’ स्टाइल में व्याकुल हो कर ब्लॉग से विरक्ति का भाव दर्शाने लगते हैं. हिन्दी ब्लॉग्स पर नियमित नजर रखने वाले समझ गए होंगे कि यहां किन ब्लॉगरों और उनके ‘गोल’ की बात हो रही है लेकिन यहां उनका नाम लेकर एक और ‘ब्लॉगर बलवा’ शुरू नही करवाना चाहता. अंत में एक बात और, कोई भी ब्लॉगर कितना भी अच्छा क्यों ना लिखता हो कभी ना कभी उसकी पोस्ट में मोनोटॅनी आ ही जाती है. इस एकरूपता को तोडऩे के लिए भी बीच-बीच में ‘ब्लॉगर बलवा’ जरूरी है. इतने डंक झेलने के बाद ब्लॉगर्स के लिए ब्रेक तो बनाता ही है. तो, मिलते हैं छोटे से ब्रेक के बाद.

5/7/10

कान पर जूं



आप कैसे अपेक्षा कर लेते हैं कि अधिकारियों के कान पर जूं रेंगेगी. मेरे भी कान पर कमबख्त जूं नहीं रेंगी तो नहीं रेंगी. जब खूब घने बाल थे तब भी और अब जब चांद की ओर बढऩे की तैयारी है तब भी. जब खोपड़ी में जूं नहीं है तो कान पर रेंगने का सवाल ही नहीं उठता. लेकिन पब्लिक है कि बिना चेक किए कि किसी अधिकारी के सिर में जूं है या नही, अपेक्षा करने लगती हैं कि बात-बात पर उनके कान पर जूं रेंगे. अब जूं तो उड़ती नहीं कि जहां अधिकारी दिखा उड़ कर उसके कान पर रेंगने लगे. वैसे उड़ती तो छिपकली भी नहीं लेकिन एक- दो बार मेरे जूं विहीन सिर पर लैंड कर चुकी है. किसी ने कहा अपशकुन है तो किसी ने कहा ये राजयोग के लक्षण हैं. राजपाट तो मिला नहीं बाल जरूर कम हो गए. वैसे जब घने बाल थे तब भी जूं नहीं पड़ी और मैं जूं बिनवाने के सुख से हमेशा वंचित रहा. एक दो बार सिर में जूं होने का स्वांग किया लेकिन नियमित जूं बिनवाने कभी सफल नहीं हुआ. क्योंकि पारखी लोग लीक (जूं के अंडे) और डैंड्रफ में फर्क आसानी से कर लेते हैं.
जब हम लोग छोटे थे तो बालों में जूं होना (खास कर लड़कियों के) आम बात थी. जूं बीनने का बाकायदा एक सेशन होता था. ये सामाजिकता का प्रतीक था. दिन में जब भी महिलाएं थोड़ी फुरसत में होती तो, एक-दूसरे की जूं बीनने में जुट जातीं. उसमें बहुत धैर्य और एकाग्रता की जरूरत होती थी. जूं खोज-बीन सेशन का अंत ‘ककवा’ फेरने के साथ होता था. ये जूं कैप्चर करने वाली एक खास किस्म की बारीक कंघी होती है. हमारे तरफ उसे ‘ककवा’ कहा जाता है. हाट-बाजार में तो लकड़ी का भी ककवा मिलता है. इस ‘ककवा’ में खोपड़ी को छील देने की क्षमता होती है. एक बार मैं भी खोपड़ी पर ककवा चलवा चुका हूं. फिर कान पकड़ लिया.
जूं पर सिर्फ लड़कियों का एकाधिकार नहीं है. कुछ लीचड़ किस्म के लडक़ों के बालों में भी जूं रेंगती है लेकिन पता नहीं किस बेवकूफ ने कान पर जूं नहीं रेंगने का मुहावरा इजाद किया था. नीले सियार की तरह भला कौन जूं चाहेगी कि वह बालों के घने झुरमुट से निकल कर कान पर रेंगने लगे और आप उसे पट से मार दें. लेकिन कुछ ना कुछ पेंच है जरूर. बिना उड़े और बिना रेंगे जूं एक खोपड़ी से दूसरी खोपड़ी में कैसे ट्रांसफर हो जाती है. ये आज भी रहस्य है. ये भी रहस्य है कि महिला अधिकारी हो या पुरुष, सिर में झौवा भर जूं हो तब भी कान पर जूं नहीं रेंगती. आपको कभी किसी अधिकारी के कान पर जूं रेंगती मिल जाए तो बताइयेगा, ब्रेकिंग न्यूज चला दूंगा.

5/1/10

...तुम्हारी याद सताती है



चलिए आज फॉरेन घूम आएं. लेकिन यहां फॉरेन की कार, कंपनीं, गेम और मेम का जिक्र नहीं करने जा रहा. एक समय था जब फॉरेन की कारें और फॉरेन रिटर्न लोगों का इंडिया में बड़ा क्रेज था. विदेश से आए लेटर्स को भी लोग सहेज कर रखते थे. जब छुट्टियों में विदेशी इंडियन अपने गंाव-देश आते तो सब पढ़े लिखे लोग उनसे ठेठ अंग्रेजी में ही बात करने की कोशिश करते भले ही विदेशी हिन्दुस्तानी बाबू उनका अवधी या भोजपुरी में जवाब देते हों. भला हो इस इंटरनेट और मोबाइल का, जिसने अंग्रेजी का इंडियनाइजेशन कर दिया और हिन्दी का वैश्वीकरण. अब तो कोई भी अंग्रेजी में एसएमएस और मेल ठोंके देता है. स्पेलिंग गलत हो तो भी चलेगा क्योंकि माना जाता है कि ये तो नेट या एसएमएस की लैंग्वेज है. नेट ने यूनीकोड के रूप में एक ऐसा शस्त्र दे दिया है कि दुनिया के किसी छोर पर बैठ कर दे दना दन थॉट्स की फायरिंग की जा सकती है. सो भाषा के विस्तार से ब्लॉग और ब्लॉगर कैसे बच सकते हैं.

परदेस में घर की याद ज्यादा सताता है. अपने देश की बातों और यादों से जुड़े रहने का बेहतर माध्यम हैं ब्लॉग्स. तो आज बात होगी फारेन में रह रहेे देसी इंडियन ब्लॉगर्स की. फॉरेन में फर्राटेदार हिन्दी में ब्लॉगिंग कर रहे ढेरों ब्लॉगर हैं. इनमें कोई साइंटिस्ट है कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर, कोई ब्रॉडकास्टिंग से जुड़ा है तो कोई प्रोफेसर है. लेकिन ये लोग अपनी भाषा, माटी और संस्कृति से किस कदर जुड़े हैं इसका अंदाज इनके ब्लॉग्स के कंटेंट पर नजर डालने से लग जाता है. इनमें से कुछ लोग तो अपनी भाषा औैर शब्दों का प्रयोग जिस ठेठ देसी अंदाज में करते हैं उससे तो लगता ही नहीं कि ये सात समुंदर पार बैठे हैं. स्तुति पांडे ऐसी ही ब्लॉगर हैं. उनके ब्लॉग का नाम है भानुमति का पिटारा. पिटारा खोलते ही जब चचुआ, सतुआ, बछिया और मचिया निकलने लगती है तो अपनी माटी की सोंधी खुशबू का एहसास होता है. वो पेशे से सिस्टम एनालिस्ट हैं लेकिन ब्लॉग का फ्लेवर ऐसा कि स्तुति पांडे नही सतुआ पांडे ज्यादा लगती हैं. ओटारियो, कनाडा में बैठे उडऩ तश्तरी यानी समीर लाल की चर्चा भी जरूरी है.
आपको सत्या फिल्म के कल्लू मामा तो याद होंगे. उनकी जो रिस्पेक्ट गैंगस्टर्स के बीच थी वैसी ही रिस्पेक्ट उडऩ तश्तरी की ‘ब्लॉगस्टर्स’ के बीच है. वो अच्छे दोस्त की तरह किसी भी ब्लॉगर को टिपिया देते हैं. अब कनाडा से कोई टिपिया रहा है तो ब्लॉगर दांत चियारेंगे ही. इसी तरह राज भटिया जी बैठे हैं जमर्नी में लेकिन उन्हें देसी हुक्के की याद सताती है. लिस्ट तो लम्बी है फिलहाल यादों का मजा लीजिए.

4/23/10

पाsss ! की पावर



प से पवार, प से पॉवर, प से प्रफुल्ल पटेल, प से पापा, प से पूर्णा, प से पॉवर प्ले, प से प्लेन, प से पैसा, प से पुष्कर, प से प्रेमिका
प की महिमा अपरम्पार. प में आ की मात्रा लग जाए तो हो जाता है पाsss! पा माने पापा.
पॉवरफुल पवार की पार्टी के पॉवरफुल मंत्री प्रफुल्ल पटेल की बेटी पूर्णा की पावर तो देखिए- पूरे पैसेंजर्स को उतार कर प्लेन को डायवर्ट कर दिया.

4/10/10

एक ‘नाइस’ चपत



चलिए आज थोड़ी नोकझोंक, थोड़ी दिल्लगी, थोड़ी बंदगी और थोड़ा इमोशनल अत्याचार हो जाए. ब्लॉग के मैदान में भी क्रिकेट की तरह हर कैटेगरी के खिलाड़ी मिल जाएंगे. कुछ टेस्ट मैच की तरह टुक-टुक कर देर तक खेलने वाले, कुछ वन डे मैच की तरह मौके की नजाकत समझ कर शाट लगाने वाले और कुछ ट्वेंटी-ट्वेंटी स्टाइल में हमेशा चौके-छक्के लगाने के मूड में रहने वाले. अब खिलाड़ी हैं तो दर्शक भी होंगे. दर्शक भी तरह- तरह के. कुछ खा-म-खा ताली बजाते हैं, कुछ अच्छे खेल पर एक्साइटेड हो हर्ष ध्वनि करते हैं तो कुछ बात बात पर नोकझोंक करने को आतुर रहते हैं. कुछ तो एग्र्रेसिव हो मैदान मे ं कचरा भी फेंकने लगते हैं. अब वो खिलाड़ी कैसा जिसे शाबाशी या गाली ना मिले. आप समझ गए होंगे खिलाड़ी से यहां मतलब ब्लागर्स से है. उसके रीडर्स और कमेंट करने वाले हैं दर्शक. सो आज ब्लॉग्स में कमेंट्स के खेल पर ही कंसन्ट्रेट करते हैं.
मुझे लगता है कि लोग ब्लॉगिंग की शुरुआत तो अक्सर स्वान्त:सुखाय या अभिव्यक्ति के लिए करते हैं लेकिन जब उन पर कमेंट बरसने लगते हैं, तो उनके अंदर के क्रियेटिव किड की भूख बढ़ जाती है और वो कुछ भी खाकर कुछ भी उगलने और उगलवाने पर उतारू हो जाता है. कल का बच्चा अचानक सचिन तेंदुलकर की तरह ब्लॉगिंग के मैदान में शाट लगाने लगता है. जिस तरह अच्छे शाट पर तालियां मिलती उसी तरह अच्छी पोस्ट पर अच्छी टिप्पणियां भी मिलती हैं. जितने ज्यादा कमेंट्स उतनी ज्यादा पोस्ट. धीरे-धीरे स्वान्त:सुखाय लिखने वाला ब्लॉगर बावलों की तरह किसी भी विषय पर कुछ भी लिखने लगता है. एक अच्छा भला लिखने वाला सर्वज्ञानी, अभिमानी उपदेशक और आलोचक की भूमिका में कब आ जाता है, उसे पता ही नहीं चलता. उसके लेखन में मौलिकता की जगह मैनेजमेंट हावी हो जाता है. किसी अच्छे भले लेखक का दिमाग खराब करने में टिप्पीबाजों की बड़ी भूमिका होती है. कोई कैसा भी लिखे, हर पोस्ट पर ये टिप्पणीबाज वॉह-वाह, शानदार पोस्ट, नाइस, एक्सेलेंट, बधाई, ऐसा ही लिखते रहें, जैसे चालू कमेंट कर अपना राग एक ही सुर में आलापते रहतें हैं. जैसे हाल ही में दंतेवाड़ा में नक्सिलियों ने सीआरपीएफ के जवानों का नरसंहार किया. उस पर एक ब्लॉगर ने दुख व्यक्त करते हुए नक्सली समस्या के समाधान पर बड़ी संजीदगी से कुछ कुछ बातें लिखीं थीं. उस पर एक कमेंट आया ‘नाइस’. इस कमेंट से ये पता नहीं चल पाया कि वो सज्जन किसको नाइस कह रहे हैं. एक और कमेंट था ‘बिल्कुल सही लिखा है’. अब आप दिल पर हाथ रख कर बताइए कि आप जो भी पोस्ट लिखते हैं उसे सही समझ कर ही तो लिखते हैं. कुछ टिप्पणीबाज कमेंट तो संक्षिप्त करेंगे लेकिन अपनी गली-मोहल्ले और घर का पता मोबाइल नंबर के साथ विस्तार से लिखेंगे. ऐसे ही एक और चिंतक-विचारक और बौद्धिक किस्म के ब्लागर हैं. वो चाहते हैं कि उनकी हर पोस्ट पर नेशन वाइड डिबेट हो लेकिन खुद आपकी पोस्ट पर एहसान करते हुए संक्षिप्त टिप्पणी ‘पान पर चूने की तरह’ लगा आगे बढ़ जाते हैं.
(जैसा आई नेक्स्ट के ब्लॉग-श्लॉग कालम में लिखा)

4/3/10

...चंद्रवदन मृगनयनी बाबा कहि कहि जाय



केशव केशन अस करी अरिहु ना जस कराय, चंद्रवदन मृगनयनी बाबा कहि-कहि जाय. केशव जी व्यथित हो कहते हैं कि उनके बालों ने उनकी जो गत बनाई है वैसा तो कोई दुश्मन के साथ भी नही करता. सफेद बालों के चलते सुंदर बालाएं उन्हें बाबा कह कर संबोधित करती हैं. केशव के जमाने के ‘बाबा’ आज के जमाने के ‘अंकल’ ही हुए ना. केशव तो महान कवि थे और मैं साधारण आदमी लेकिन केशव की तरह मुझे भी बच्चों को छोड़ कर कोई अंकल कहता है तो अच्छा नहीं लगता. मैं सभी स्त्रियों का सम्मान करता हूं लेकिन इस मनोविज्ञान पर मेरा वश नहीं. क्यों? इस पचड़े में नही पडऩा, बस अच्छा नहीं लगता तो नहीं लगता. जब संजू बाबा, शहरुख, सलमान या आमिर खां के आधे उम्र की बालाएं उन्हें अंकल नहीं कहती तो मैं क्यों अंकल कहलाऊं. माना कि मैं उन जैसा हैंडसम अब नहीं रहा लेकिन दिल उनसे ज्यादा युवा अब भी है.
जब कवि केशव ‘बाबा’ कहने पर अफसोस जता सकते हैं तो मैं क्यों नहीं. वो सम्मानित कवि हैं ऐसे में उनकी लाइन पकड़ लूं तो क्या हर्ज है. अब ये तो ह्यूमन साइकॉलजी है कि मनुष्य तन से नहीं तो मन से अपने को युवा समझता है और जब तक उसके अंग-प्रत्यंग जवाब नहीं देने लगते तब तक उसे पता ही नहीं चलता की वो बूढ़ा हो रहा है. मैं भी अपवाद नहीं. लेकिन ईश्वर की कृपा से अंग-प्रत्यंग अभी दुरुस्त हैं. सो थोड़े दिन यूथाफुल होने में कोई बुराई नहीं.
अब आपको बताता हूं कि इतना प्रपंच क्यों कर रहा हूं. ईश्वर की बड़ी कृपा होने पर ही ब्यूटी विद ब्रेन का काम्बिनेशन बनता है. ऐसे ही एक काम्बिनेशन वाली बाला को गूगल पर बजबजाते हुए अचानक मेरा ब्लॉग पसंद आ गया. अच्छी बात ये कि उसने फोन पर भी बात की और ब्लॉग की प्रशंसा की, बुरी बात ये कि उसने मुझे अंकल कहा भले ही इसकी अनुमति ले कर कहा हो. अब कोई अंकल कहना चाहे तो शिष्टाचार में मैं मना कैसे कर सकता हूं. मैंने खीसें निपोर कर कह दिया कहो-कहो कोई बात नहीं, लेकिन बात तो है. अरे मन से कुछ और दिन युवा रह लेने दो भाई. अंकल या बाबा कहना जरूरी है क्या? माना कि मन में मेरे प्रति बड़ा सम्मान है लेकिन नाम के आगे जी लगाने से भी तो काम चल जाता है.
खैर, कोई बात नहीं. उस बाला के ब्लॉग पर आए कमेन्ट्स में अपने जैसे चच्चुओं की लाइन लगी देखी तो बड़ा अच्छा लगा कि उस बाला ने इनमें कइयों से अंकल कहने की अनुमति जरूर ली होगी. अगर नहीं तो केशव की लाइनें एक बार फिर याद कर मैं तसल्ली कर लेता हूं.

4/2/10

पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में




पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में आज मैं आजाद हूं दुनिया के चमन में...जब भी परिंदों को उड़ते देखता हूं तो ये लाइनें याद आने लगती हैं. कल्पनाओं को पर लग जाते हैं. उस दिन भी जब पिंजरें से करीब पचास गौरैया मुक्त की गई तो सब फुर्र-फुर्र कर उड़ गई सिर्फ एक चीड़ा नहीं उड़ सका. वो पिंजरें में ही दुबका रहा, शायद बीमार था. उसे हथेली पर रख कर उड़ाने की कोशिश की फिर भी नही उड़ा. ढेर सारी गौरैया को आजाद कराने की खुशी फीकी सी पड़ गई. मेरे एक साथी ने उस चीड़े को चिडय़ाघर के डाक्टर के पास भिजवा दिया. पता नही उसका क्या हुआ. लेकिन बाकी सब खुश थे.

बात 20 मार्च की है. इस दिन अब लोग गौरैया दिवस मनाने लगे हैं क्योंकि गिद्धों के गायब होने के बाद गौरैया भी अब कम ही दिखती हैं. गिद्ध पर रिसर्च हो रहा है लेकिन गौरैया क्यों गायब हुईं इस पर बस बातें हो रही हैं. पता नहीं किसने और क्यों 20 मार्च का दिन गौरैया के लिए चुना. इसके पहले नहीं सुना था कि वल्र्ड स्पैरो डे भी मनाया जाता है. खैर दिवस कोई भी हो एनजीओ उसे जरूर मनाते हैं. अखबारों में एक दो दिन खबरें छपती हैं. प्यारी सी गौरैया की फोटो अच्छा से कैप्शन और कभी-कभी कविता की कुछ लाइनें गौरैया को समर्पित. कुछ लोग अपने बचपन की गौरैया को याद कर लेते हैं. फिर सब कुछ पहले की तरह. हमारे एक साथी हैं कौशल किशोर और विशाल मिश्रा. उन्होंने ने सोचा गौरैया के लिए कुछ किया जाए . वो चौक के अवैध पक्षी बाजार से करीब 50 गौरैया खरीद कर ले आए. सोचिए अब गौरैया भी बिकने लगी हैं. तय हुआ की जू में ले जाकर उन्हें उड़ा दिया जाए. जू में किसी स्कूल के बच्चे पिनिक मनाने आए थे. उनसे पूछा कि किसके घर में गौरैया घोसले बनाती हैं तो तो सिर्फ दो हाथ उठे. उन बच्चों को गौरैया के गायब होने की बात बताई गई और पूछा कि वो उन्हें पिंजरे में बंद रखना चाहते हैं या उड़ाना? तो सब ने कहा उड़ाना. पिंजरा खोल दिया गया और गौरैया फुर्र हो गईं. सिर्फ एक को छोड़ कर.
गौरैया को उड़ते देख बच्चे खुशी से उछल रहे थे. मुझे लगा जैसे मेरे आस पास बच्चे नहीं ढेर सारी गौरैया गा रही हों...पंक्षी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में आज मैं आजाद हूं दुनिया के चमन में..

3/20/10

बज़बज़ाते ब्लॉगर



आपने भुन-भुनाहट सुनी है ना. अरे वही जिसे इंग्लिश में बज कहते हैं. भौंरे, भुनगे, मक्खी या मच्छर, भुन-भुनाहट किसी की हो, हम इसे इग्नोर नहीं कर सकते. इनकी साउंड फ्रीक्वेंसी इरिटेट भी करती हैं लेकिन ब$ज इरिटेट नहीं अट्रैक्ट करता है. वो सेलेब्रिटी, इंवेंट या प्रॉडक्ट कैसा जिसमें ब$ज ना हो. सो आज ब्लॉगर्स ब$ज की बात करते हैं. वैसे तो ब्लॉग जगत में भुन-भुनाने वाले भुनगों और भौंरों की भरमार है. इनमें कुछ लुभाते हैं, कुछ डंक मारते हैं. ब्लॉग की भुन-भुनाहट फेसबुक और ट्वीटर पर तो पहले भी सुनाई पड़ती थी पर गूगल दादा के ब$ज ने सबका बाजा बजाना शुरू कर दिया है. कहा तो ये भी जा रहा है कि जल्दी गूगल, ब$ज का बॉस बन बैठेगा. गूगल ने जब से जी मेल पर बज़-बज़ाहट शुरू की है, हर तरफ ब$जर सुनाई पड़ रहा है. ब्लॉगर्स अब ब$जर की भूमिका में भी हैं. उनकी भुन-भुनाहट अचानक तेज हो गई है. फेसबुक और ट्वीटर के भौंरे और भुनगे फेंसिंग पार पर गूगल के बाड़े में मंडराने लगे हैं. बगीचा फूलों से लदा है और ब$जर्स के झुंड के झु़ंड कभी इस फूल कभी उस फूल पर मंडरा रहे हैं. कुछ ब्लागर्स तो ब्लॉग लिखना भूल कर बजिंग में बिजी हैं. और कुछ सयाने ब्लॉगर्स तो अपनी पूरी की पूरी पोस्ट ही ब$ज में उड़ेल देते हैं.
ब$ज की हालत यह है कि कब चुहलबाजी से शुरू हुई बात गंभीर बहस का रूप ले लेती है, पता ही नहीं चलता. ब$ज के बहाने आप अपने कांटैक्ट ग्रुप से होते हुए दूसरों के कांटैक्ट तक पहुंच सकते हैं. किसी को कहीं भी टीप लगाने की पूरी छूट है. किसी को चिकोटी काटिए, उस पर असर ना पड़े तो किसी और को चपत लगा कर देखिए, कभी ना कभी तो भुन-भुनाएगा ही. उनके ऐक्शन-रिऐक्शन का मजा ही कुछ और है. कभी-कभी विषय कुछ होता है और बहस किसी और बात को लेकर शुरू हो जाती है. जैसे किसी ने अपनी फोटो की जगह कैरीकेचर लगा दिया, किसी ने लुक्स पर कमेंट किया तो कोई पहनावे की नापजोख करने लगता है. किसी को कैरीकेचर इनोसेंट लगता है, किसी को फनी. किसी ने कहा कि आपने क्या पहन रखा है-बरमुडा, घुटन्ना या नेकर? बस कोई बरमुडा का इतिहास बताने लगा तो कोई घुटन्ने का बखिया उधेडऩे लगता है. एक साहब ने तो इसकी डिजाइनिंग का ऐसा पाठ पढ़ाया कि बड़े बड़े फैशन डिजायनर पानी भरें. तो आप भी मजा लीजिए ब$ज का. अरे..देखिए कोई भुनभुना रहा है.
(जैसा कि आई नेक्स्ट के ब्लॉग-श्लॉग कॉलम में लिखा)

2/28/10

संइयां भये लड़कइयां ...


कुछ दिन पहले मालिनी अवस्थी परफार्म कर रहीं थीं-सइयां भये लड़कइयां मैं का करूं. जिसे देखो आजकल वही 'बच्चा' बना हुआ है. ये समय ही ऐसा होता है. पहले बसंत फिर फागुन इसी के बीच में वैलेंटाइंस डे और अब होली. हवा में कुछ ऐसी खुनक, ऐसी महक होती है कि छोटे तो छोटे, बयालीस बसंत दख चुके बुजुर्ग भी बहक कर 'लड़कइयां' मोड में आ जाते हैं.
लोग कहते हैं क्लाइमेट चेंज हो रहा है. इकोलॉजिकल सिस्टम गड़बड़ हो रहा है. अरे कितना भी क्लाइमेट चेंज हुआ करे, फागुन की केमिस्ट्री में कोई बदलाव नहीं आया है. पहले भी आम और आवाम, फागुन में ऐसे ही बौराते थे और अब भी बौरा रहे हैं. पहले इसे बावला होना और आजकल केमिकल लोचा कहते हैं. 'बौराने' या 'लड़कइयां' में आज भी केमेस्ट्री के वही फार्मूले लागू होते हैं बस पे्रजेंटेशन का तरीका बदल गया है. केमिस्ट्री वही है नाम बदल गए हैं. केमिस्ट्री ही आपको मन से यंग या ओल्ड बनाती है. फागुनी हवा में ऐसे कुछ केमिकल एलीमेंट्स जरूर हैं जिनके ज्यादा हो जाने से 'मोड' चेंज हो जाते हैं और 'अंकल मोड' वाले 'बच्चा' या 'लड़ंकइयां मोड' में कब आ जाते हैं पता ही नही चलता.
लेकिन कुछ लोगों में तो इस केमिकल की क्वांटिटी बाई बर्थ कुछ ज्यादा होती है और वो बारहों मास मन से यंग यानी लड़कइयां रहते हैं. ताउम्र कुछ ना कुछ नए प्रयोग और कुछ रोमांचक करने की ललक उनके लिए एंटी आक्सीडेंट्स का काम करती है. लेकिन जब कपल्स में एकबच्चा मोड में और काउंटरपार्ट 'कन्वेंशनल' मोड में तो कम्पैटिबिलिटी प्राब्लम खड़ी हो सकती है. लेकिन यहां साफ कर दूं कि प्राब्लम अक्सर सिर्फ 'कनवेंशनल' मोड वाले को होती है तभी तो वह साथी के लड़कंइयांपन से तंग आकर गाने लगता है- संइयां भये लड़कइयां मैं का करूं. और दूसरी तरफ सैंयां... दिल तो बच्चा है जी, थोड़ा कच्चा है जी.. गुनगुनाते हुए बसंत के पचास ओवर्स खेल कर भी नाटआउट. वैसे ये जब तक घर में यानी नेटवर्क एरिया में रहते हैं तो तब तक कम्पैटिबिलिटी प्राब्लम नहीं होती, लेकिन जहां वे नेटवर्क एरिया से बाहर निकले समस्या, खड़ी हो जाती है.
एक बात और, 'बच्चा' दिखने की कोशिश में बच्चों जैसी हरकत कभी मत करिएगा वरना कयामत आ जाएगी और पहनने पर नहीं पडऩे पर जूता बोलेगा चुर्र. युवा होने के लिए कभी अभिनय की जरूरत नहीं पड़ती. ये फीलिंग तो सेल्फ स्टीम्ड है, अंदर से आती है. एक सज्जन युवा दिखने के चक्कर में हाइपर टेंशन के मरीज हो गए और वक्त से पहले बूढ़े दिखने लगे. उन्होंने युवा दिखने के लिए अपने ग्रे होते बालों पर कलर्स के हर शेड अपनाए लेकिन इस टेंशन से कभी भी मुक्त नहीं हो सके कि कहीं कलर्स के केमिकल रिएक्शन से उनके बाल कम ना हो जाएं. केमिकल रिएक्शन कितना हुआ ये तो पता नही लेकिन टेंशन से उनके बाल जरूर झड़ गए. सो लड़कइयां दिखने की नहीं फील करने की चीज है. जो बात-बात पर टेंशन लेने लगे वो बच्चा कैसे रह पाएगा.
इसके ठीक उलट 'यंग फार एवर' टाइप लोग हैं. उम्र बढ रही हो, बाल सफेद हो चुके हों, पहले जैसे घने भी ना रह गए हों तो भी उनको फर्क नहीं पड़ता. एनर्जी इतनी कि यंगस्टर्स ईष्र्या करने लगते हैं. दरअसल ये एनर्जी पाजिटिव एटीट्यूड से मिलती है. जैसे एक ओल्ड होत 'यंगीज' से जब कोई यंग स्मार्ट गर्ल स्माइल के साथ बात करती तो सारे यंग कलीग्स टांट करते ..अरे उसे उसने अंकल बोला.. चिढऩे के बजाय उनका पलट कर जवाब होता यानी तुम सब अब भी मुझको एक रीयल थ्रेट मानते हो...हा हा..बस उनकी एनर्जी में इजाफा हो जाता. यही केमिकल तो एंटीआक्सीडेंट का काम करता है. इसका सीधा संबंध आपके इमैजिनेशन से है. आप जो भी इमैजिन करते हैं या लिखते हैं वो आपकी पर्सनालिटी में रिफ्लेक्ट होता है. इसमें एक्टिंग या स्वांग नही चलता. मन के रेडियो की ट्यून बदल कर कुछ और राग सुनाने का स्वांग करेंगे तो पकड़े जाएंगे. इस लिए दोस्तों 'बच्चा' बनना बच्चों का खेल नही है. हां, फागुन पार आप 'लड़कइंया' हो सकते हैं. लेकिन ऐसा करते समय इब्नेबतूता को जरूर याद कर लिया करिए.

2/20/10

जॉर्ज और लाल मुनिया


आइए आज आपको जॉर्ज शेपर्ड से मिलाता हूं. हमारी टीम के सबसे सीनियर मेंबर. अ जेंटिलमैन विद सिंपल लिविंग. नो कम्प्लेंस नो रिग्रेट्स एंड इंज्वाइंग लाइफ ऐज इट इज. एक अच्छे इंसान और अच्छे नेबर. सो एक दिन उनके पड़ोसी एक हफ्ते के लिए कहीं बाहर जा रहे थे. उन्होंने देखरेख के लिए जार्ज के घर लालमुनिया का अपना पिंजरा रख दिया. जार्ज और उनकी फैमिली ने लालमुनियाओं की अच्छे से देखभाल की. पड़ोसी खुश हुए और वो जार्ज के बेटे के लिए बज्जियों का एक जोड़ा ले आए. जार्ज के घर में इत्तफाक से एक पुराना पिंजरा थ. सो उन्होंने बज्जियों को पिजरें में रखा और उनकी देखभाल करने लगे. लेकिन कुछ दिन बाद एक दिन एक बज्जी मर गया. अकेले बज्जी पर तरस खाकर कर जार्ज बाजार से तीन बज्जी और ले आए. लेकिन कुछ दिन बाद उनमें से दो बज्जी फिर मर गए. लेकिन बचे हुए दोनों पक्षी मेल थे सो अक्सर लड़ते रहते थे. अब जार्ज ने फिर तरस खा कर एक और पिंजरा खरीदा और दोनों को अलग अलग कर दिया. यानी दो बज्जी दो पिंजरे. जार्ज उन्हें रोज दाना चुगाते हैं. पड़ोस में लालमुनिया और जार्ज के यहां बज्जी, सब की जिंदगी आराम से कट रही थी. लेकिन नेबर को फिर कही जाना पड़ा. वो फिर लाल मुनिया का पिंजरा जार्ज के घर रख गए हैं. सो इस समय उनके घर तीन पिजरें हैं और जार्ज सबकी देखभाल कर रहे हैं. इसे कहते हैं हैप्पी एंडिंग.

2/19/10

...और फैल गया रायता




ये रायता क्यों फैला है भाई. बारात तो विदा हो गई लेकिन शादी के पंडाल के किनारे ये गाय, कौवे और कुत्ते किस ढेर पर मुंह मार रहे हैं. अच्छा-अच्छा कल रात में यहां भोज था. भुक्खड़ लोग जिस तरह भोजन पर टूट पड़े थे उसे देख कर रात में ये कुत्ते शरमा कर भाग खड़े हुए. अब फैले रायते का आराम से आनंद ले रहे हैं. अभी भी इन सबका पेट भ्रने के लिए यहां बहुत कुछ है. पुलाव, कचौडिय़ां, मटर पनीर, रायता और भी बहुत कुछ, सब गड्ड-मड्ड .
इस तरह का रायता फैलाने वाले लगता है अखबार नही पढ़ते. हाल ही में एक खबर थी कि लोग शादी-समारोहों में खाना बहुत बर्बाद करते हैं. भोज के बाद ढेर सारा खाना फेंका जाता है. यहां बचे हुए खाने की बात नहीं हो रही. वह तो 'प्रजा' में खप ही जाता है . यहां मामला प्लेट में छोड़ दिए गए खाने का है . 'कुक्कुरभोज' के बाद इस खाने को कुक्कुर ही खाते है. अखबार के उसी पेज पर एक और खबर थी जिसमें ग्राफ के जरिए बताया गया था कि गन्ना, चीनी, दाल, गेहूं और तिलहन के प्रोडक्शन में कमी आई है लेकिन मशीनों के प्रोडक्शन में इजाफा हुआ है . फिर भी लोग खाना बर्बाद करते हैं. मैंने कुक्कुर भोज में 'पार्टिसिपेट' करने वालों को ऑब्जर्व किया और पाया कि -
१. भोजन के पहले लोग चाउमीन, चाट-पकौड़े इतना भर लेते है कि 'मुख्य भोजन' के लिए पेट में जगह ही नही रह जाती फिर मन है कि मानता नहीं की तर्ज पर लोग थोड़ा-थोड़ा हर व्यंजन प्लेट में रखते जाते है. अब प्लेट भर जाने पर रायता तो फैलेगा ही.
२.सामूहिक भोज में लोगों को लगता है कि कहीं कोई आइटम खतम ना हो जाए सो दोबारा लेने के बजाय एक बार में ही प्लेट में पहाड़ बना लेते हैं. तभी तो लगता है जैसे प्रीतिभेज में लेाग हाथ में गोवर्धन पहाड़ उठाए घूम रहे हों.
३.भीड़ की रेलम पेल में कुछ लोग जोखिम ना उठाते हुए एक ही बार में सारा कुछ प्लेट में डाल लेते हैं. फिर आधा खा कर बाकी डस्टबिन के हवाले.
काश लोग थोड़ा कम खाते, गम खाते, कुक्कुरों पर नहीं खुद पर तरस खाते. लेकिन जब तक 'बीपी अंकल' और 'डायबिटीज आंटी' से इन्हें डर नहीं लगेगा तब तक इसी तरह रायता फैलता रहेगा.

2/13/10

ब्लॉगर बाबाओं की जय हो



इस समय मौसम सेंटियाना हो चला है यानी बाबाओं का बोलबाला है. कल शिवरात्रि पर भोले बाबा की धूम थी, हरिद्वार महाकुंभ में शाही स्नान के समय हरि की पैड़ी बाबामय हो गई थी. ज्यादातर न्यूज चैनल्स में बाबा विराजमान थे. अब तो ढाबाओं की तरह हर तरफ बाबा ही बाबा दिख रहे हैं. अब संडेे को वैलेंटाइन बाबा का बोलबाला. तो इस बार ब्लॉग्स में बाबाओं के बारें में बात करते हैं. वैसे ब्लॉगर भी किसी बाबा से कम नही होते. जो जी में आया कहा और किसी ने कुछ पलट कर कुछ सुनाया तो सुन लिया. प्रशंसा और आलोचना को समभाव से लेते हैं. अपने कहे को ज्ञानीवाणी और दूसरों की बात को नादानी कहना इनका शगल है. पॉपुलैरिटी के लिहाज से इंडिया के टॉप बाबाओं की तरह ब्लॉगर भी अपनी ऑरा से मुग्ध रहता है. इनमें में ज्यादातर समय के साथ चलने वाले मार्डन किस्म के बाबा हैं. जो टेक्नालॉजी सैवी हैं, शास्त्रीय बातों को नए तरीके से प्रेजेंट करना जानते हैं, उनका पीआर वर्क शानदार है. यही वजह है कि इसमें से तो कई सेलेब्रिटी स्टेटस को प्राप्त कर चुके हैं. पॉपुलैरिटी के मद में अक्सर बाबा लोग पॉलिटिकल लीडर की तरह बतियाने लगते हैं. ऐसे किसी टीवी चैनल पर या प्रवचन के दौरान कहीं भी हो सकता है. अब किस योग गुरू ने हाल में क्या कहा ये सब तो आप देखते और पढ़ते रहते हैं. आइए ब्लॉगर बाबाओं पर नजर डालें.
भोले बाबा की नगरी काशी के ब्लॉगर बाबा अरविंद मिश्र ने http://mishraarvind.blogspot.com पर शिवरात्रि के बहाने से अपने भक्तों (रीडर्स) को बता दिया कि उन्हें शिव तांडव स्तोत्र कंठस्थ है और उन्होंने प्रसाद स्वरूप भक्तों के लिए अपने ब्लॉग में अपनी लेजर डिस्प्ले युक्त? ऑडियो क्लिपिंग लगा दी है. वैसे उनके ब्लॉग क्वचिदन्यतोअपि.. अपने आप में एक बड़ा टंगट्विस्टर है. इसका उच्चारण करते समय बड़े बड़े लर्नेड लटपटा जाते हैं.
एक और सम्मानित ब्लॉगर हैं सुरेश चिपलूनकर. उन्होंने तो महाशिवरात्रि पर अपने ब्लाग http://blog.sureshchiplunkar.com में भक्तों के लिए एक दानपात्र ही लगा दिया है. उनके इरादे नेक हैं और प्रयास सराहनीय. उनके इस प्रयास ने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए हैं कि चिपलूनकर भाई की तरह कभी मैं भी अपने ब्लॉग पर धर्मार्थ कार्य का कोई 'चिपÓ लगा सकता हूं.
अब थोड़ी बात बाबा वैलेंटाइन की भी. कैसी विडंबना है कि वैलेंटाइंस डे आते ही लोग दो खेमो में बंट जाते हैं. एक प्रो और एक एंटी. बाबा वेलेंटाइन किसी भी देश के रहे हों, उनका निस्वार्थ और निश्छल प्रेम संदेश तो पूरी दुनिया के लिए था इसमें धर्म और संस्कृति कहां से आ गए. वेलेंटाइंस डे पर थॉट प्रवोकिंग पोस्ट लिखी है वीरेंद्र कुमार जैन ने http://rachanakar.blogspot.com/ पर. और भी ढेर सारे ब्लॉगर बाबाओं ने भोले बाबा का प्रसाद परोसा है अपनी पोस्ट के बहाने. सो ग्रहण करने के लिए लाइन से आएं.
-राजीव ओझा ने जैसा आइ नेक्स्ट में ब्लॉग-श्लॉग कॉलम में लिखा

2/6/10

इब्ने बतूता राहुल का जूता..उठाओ तो बोले चुर्र...


इब्ने बतूता राहुल का जूता..ता..उठाओ तो बोले चुर्र... आज कल हर जगह जूतों की जयकार है. भला हो इब्ने बतूता, सर्वेेश्वर दयाल सक्सेना और गुलजार का कि जूता राग लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है. शुक्रवार को राहुल मुंबई में थे. कभी यहां कभी वहां. अम्बेडकर प्रतिमा पर फूल चढ़ाने भी पहुंचे. जूता (या चप्पल) रास्ते में उतारी. एक मंत्री जी ने हाथ से उठा कर किनारे कर दिया. उठाने में जूता बोला चुर्र, शिवसेना ने किया गुर्र्र. बोली, देखा कांग्रेस में हैं चापलूसों की जमात, राहुल की क्या करें बात. सुना है राहुल ने लाइन लगा कर लिया रेल टिकट . फिर एटीएम से पैसे निकाले फटाफट. मान लीजिए राहुल को एटीएम से पैसा निकालते देख कोई कांग्रेसी उन्हें दे देता उधार तो मचता एक नया बवाल. शिवसेना कहती ये रोड शो है फेक, कांग्रेसी कहते पार्टी खुश है मराठियों का राहुल प्रेम देख. इब्ने बतूता किसका जूता..उठाने पर बोले चुर्र..असली मुद्दा हो गया फुर्र..

2/2/10

रूम नं. 317


हे रेल देवता ट्रेन थोड़ी लेट कर देना, बड़ी कृपा होगी. आमीन! जा बच्चा ऐसा ही होगा. और उसके बाद हुआ वो जिंदगी भर नहीं भूलूंगा. इसी लिए कसम खाई है कि विश सोच समझ करूंगा, पता नहीं कब सही हो जाए. पिछले दिन अपने आर्गेनाइजेशन के वार्षिक जलसे में आगरा जा रहा था. जलसा आगरा के मशहूर फाइव स्टार होटल मुगल में था. वहां तीन दिन रुकने की उत्तम व्यवस्था थी. पहले दिन दोपहर बारह बजे रिपोर्ट करना था. ट्रेन के आगरा पहुंचने का टाइम सुबह सात बजे ही था. सोच रहा था कि पांच घंटे कहां बिताउंगा सो काश, ट्रेन दो तीन घंटे लेट हो जाए. लेकिन इसके बाद जो हुआ तो कान पकड़ लिए कि रेल देवता से कभी विश नही करूंगा.
ट्रेन सात बजे के बजाय दो बजे आगरा पहुंची. जलसा एक बजे ही शुरू हो चुका था. हांफते हुए होटल में चेक-इन की फार्मेलिटी पूरी की. बताया गया अपको रूम नं. 317 में रुकना है. उसमें मेरे पार्टनर मनोरंजन सिंह थे. उनकी ट्रेन टाइम से थी सो वो सूट-बूट पहन और टाई- टीका लगा, लंच-वंच कर कांफ्रेंस में जा डटे थे. रिसेप्शन पर एअरहोस्टेस जैसी कई 'मुगल बलाएं' मुस्कराते खड़ी थीं मे आई हेल्प यू स्टाइल में. मैंने कहा मास्टर की से मेरा रूम खोल दीजिए, पहले ही लेट हो चुका हूं. एक मलिका ए मुगल ने कहा फालो मी सर. मैंने कहा फास्ट! उसने दौड़ लगा दी. पीछे-पीछे मैं बैग लिए दौड़ रहा था उसी तरह जैसे हीरोइन के पीछे विलेन दौड़ता है. रूम नं. 317 में घुसते ही 'ट्रिपल एस' (शिट, शेव,शॉवर) को दस मिनट में पूरा करने में जुट गया.
बस यही गड़बड़ हो गई. पहले दो काम तो कुशलतापूर्वक निपट गए लेकिन शॉवर लेते समय शामत आई. बाथरूम में एक तरफ बाथ टब होता है, दूसरी तरफ बेसिन और शीशा वगैरह और दोनो के बीच में कमोड. पूरे फर्श पर टॉवेल बिछी होती है. अब टब में नहाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता, उसी में बैठ कर या खड़े होकर नहाना पड़ता है. लोग फिसलें ना इसके लिए टब के अंदर एक रबर की मैटिंग भी बिछी होती है. मेरे टब में मैटिंग बाहर रखी हुई थी. मैं स्लीपर पहने टब में खड़े होकर शॉवर से नहाने लगा लेकिन जैसे ही साबुन का पानी टब की फर्श पर पड़ा कि मैं सटाक से चारों खाने चित. संभलने का मौका ही नहीं मिला. टब के स्लोप के कारण ज्यादा चोट नही लगी लेकिन 'पिछाड़ीÓ के बल गिरने से दर्द तो महसूस हो ही रहा था. तुरंत खड़े हो देखा कि कूल्हे वगैरह सलामत हैं कि नही. दर्द पर ध्यान ना देकर जल्दी से तैयारहो कांफ्रेंस हाल में पहुंचा. लोग हसेंगे इस लिए किसी से गिरने की बात बताई नहीं.
रात को पार्टी-शार्टी हुई. करीब बारह बजे रूम पर पहुंचा. साथी मनोरंजन से थोड़ी गप मारी और लाइट बुझा कर सो गया. सुबह पहले मैं ही उठा. सो रहे मनोरंजन पर नजर पड़ी तो चौंक गया. उनकी नाक पर कट लगा हुआ था और एक आंख के नीचे काला पड़ गया था. जगा कर पूछा ये क्या हुआ. दरअसल सारी लाइट बुझा दी थी इस लिए मनोरंजन रात को अंधेरे में बाथरूम में जाते हुए दरवाजे या किसी और चीज से जा भिड़े थे. रूम नंबर 317 के बाथरूम में एक और बड़ा हादसा टल गया था. मैंने कहा मुझे जगाया क्यों नहीं? बोले आप नींद में थे इस लिए डिस्टर्ब नहीं किया. अब मैं भी खुला कि गुरू इस बाथरूम में दोपहर में तो मैं भी गिरा था. पिछाड़ी में उसकी टीस अभी भी है. एक जोरदार ठहाका और मैंने तीन कसमें खाईं- 1.अब कोई विश नहीं करूंगा 2.टब में स्लीपर पहन कर नहीं नहाउंगा 3. टब में रबर की मैट है कि नही ये पहले चेक करूंगा.

1/29/10

राजू बिन्दास!: ...और फोन पर आई भूत की आवाज

राजू बिन्दास!: ...और फोन पर आई भूत की आवाज

त्रिवेदी की फोल्डिंग और भटनागर की रजाई



अफवाह उड़ी कि डा. प्रदीप भटनागर उदयपुर जा रहे हैं. खबर कितनी सही है ये तो पता नहीं लेकिन इसी बहाने चंडीगढ़ में उनकी रजाई की याद आ गई, जो पराए की लुगाई की तरह पता नहीं कहां गुम हो गई है. अनिल त्रिवेदी अभी भी चंडीगढ़ में ही हैं और मेरी फोल्डिंग फिर उनके पास पहुंच गई है. जिंदगी की कुछ छोटी-छोटी बातें ऐसी होती हैं जो बार-बार याद आती हैं.
बात बनारस की है. कैरियर शुरू ही किया था. मेरे साथ नगवा में मेरा एक दोस्त रहता था. वो इलाहाबाद बैंक में पीओ था. तीन कमरे के एक शानदार किराए के मकान में हम दोनो रहते थे. एक कमरे में मेरी फोल्डिंग लगी रहती थी, दूसरे में उस दोस्त की और तीसरे कमरे में हम दोनों साइकिल खड़ी करते थे जिससे घर भरा-भरा लगे. एक बड़ा सा किचेन और उससे लगा आंगन भी था. अलग-अलग कमरों में इस लिए सोते थे कि मैं देर रात लौटता था और दोस्त को सुबह जल्दी गंगा पार बैंक जाना होता था. मेरा ऑफिस लहरतारा में था. वही लहरतारा जहां कबीरदास जन्मे थे. मेरा जीवन भी फक्कड़ों जैसा ही था. एक फोल्डिंग, रजाई-गद्दा हवा की तकिया, साइकिल और एक अटैची. मेरा दोस्त राजा बेटा था, मैं सोता ही रहता और वो सुबह नहा धो कर पूरे घर में पोंछा लगा कर स्टोव पर दो कप चाय बनाता था और मुझे डरते-डरते उठाता था. मैं भी ऐसे चाय पीता जैसे बड़ा अहसान किया हो. उसके जाने के बाद फिर रजाई तान कर सो जाता. मेरा दिन 12 बजे शुरू होता. एक बार फिर से चाय बनाता. मस्ती में दिन कट रहे थे.
उस समय हमारे संस्थान में अनिल त्रिवेदी और प्रदीप भटनागर भी थे. दोनों से मेरी खूब छनती थी. एक साल बाद लखनऊ लौटने की घड़ी आ गई. फोल्डिंग बनारस में ही अपने मित्र अनिल त्रिवेदी को दे दी. साइकिल, होल्डाल, अटैची उठा कर चला आया लखनऊ. कैरियर की ज़द्दो-जहद में दो दशक कैसे बीत गए पता ही नहीं चला. इस बीच त्रिवेदी जी कलकत्ता होते हुए चंडीगढ़ पहुंच गए थे. इत्तफाक से प्रदीप भटनागर भी वहीं थे. संयोग से दो दशक बाद मैं भी वहां पहुंच गया. अनिल और मैं एक संस्थान में और प्रदीप दूसरे में. हम तीनों घर-परिवार वाले हो चुके थे लेकिन मैं और प्रदीप बच्चों के कैरियर के चलते परिवार वहां नहीं ले गए थे. हां, त्रिवेदी जी के साथ उनका परिवार था. मैं चंडीगढ़ वासियों के बीच यूपी के पइये (भैये) और छड़े (फोस्र्ड बैचलर) का लेबल लगाए बछड़ों की तरह उछल कूद मचाता था. यहां भी मेरे साथ एक बैग और कंबल ही था. त्रिवेदी जी बगल में ही रहते थे. एक गद्दा खरीद कर जमीन पर डाल दिया था. त्रिवेदी जी ने यह देखा तो बोले यार फोल्डिंग पड़ी है ले लो. अरे वही वाली जो बीस साल पहले दे गए थे. बीस साल बाद उसी फोल्डिंग पर लेट कर सेंटीमेंटल होने की अब मेरी बारी थी.
चंडीगढ़ में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. कंबल अच्छा था इस लिए उसके नीचे एक ऊनी शाल लगा कर ओढऩे से मेरा काम चल जाता था. इसी बीच प्रदीप भटनागर का तबादला भोपाल हो गया. एक दिन मेरे एक और साथी पीयूष मेरे कमरे में आए और सिर्फ कंबल देख कर परेशान हो गए कि अरे आपको तो ठंड लगती होगी. बोले, प्रदीप जी की रजाई मेरे पास रखी है, ले आता हूं. लाख कहने पर कि मुझे कोई दिक्कत नहीं, पीयूष मुझे प्रदीप की रजाई दे गए. मेरी सर्दी और आराम से कटने लगी. कुछ महीनों बाद घर लौटने का संयोग बन गया. मैंने रजाई पीयूष को थमाई, फोल्डिंग फिर धन्यवाद के साथ त्रिवेदी जी को दे दी और गद्दा एक और साथी को पकड़ा दिया. बैग उठाया और चला आया. कुछ दिन बाद पीयूष भी दूसरे शहर चले गए. त्रिवेदी जी अभी भी चंडीगढ़ में ही डटे हैं. कुछ दिन पहले दो खबरें मिली, एक- डा. प्रदीप भटनागर उदयपुर में संपादक बन कर जाने वाले हैं. दूसरी- पीयूष फिर चंडीगढ़ लौट रहे हैं. सो त्रिवेदी जी की चारपाई (फोल्डिंग) और प्रदीप जी की रजाई और अपनी तनहाई (फोरस्र्ड बैचलरशिप) याद आने लगी. पीयूष से पूछा कि वो रजाई कहां हैं लेकिन उन्हें ठीक से याद नही. फिलहाल प्रदीप जी हिसार में ही हैं और उनकी रजाई की खोज की जा रही है.

1/22/10

...और फोन पर आई भूत की आवाज


अचानक मेरे एक साथी का फोन आया नए वर्ष की बधाई देने के लिए लेकिन मुझे भूत-पिशाच याद आने लगे. मेरे नाम के आगे ओझा जरूर लगा है लेकिन भूत से कोई वास्ता नहीं पड़ा है अभी तक. पता नहीं क्यों मेरे साथी अमित गुप्ता का फोन आते ही भूत याद आने लगते हैं. अमित अम्बाला के रहने वाले हैं. अभी पानीपत में एक बड़े अखबार में बड़े पद पर हैं. बात उन दिनों की है जब मैं चंडीगढ़ में था और अमित अम्बाला में हमारे अखबार के करेस्पांडेंट थे. एक दिन परेशान से अमित ने फोन किया कि सर तबियत ठीक नहीं है. पूछा, वायरल हो गया या कोई और परेशानी है? अमित ने जो कारण बताया तो परेशान होने की बारी मेरी थी. अमित ने फोन पर एक भूत से बात कर ली थी और तब से परेशान थे. अमित गंभीर किस्म के संजीदा इंसान हैं और उनसे किसी मस्खरेपन की उम्मीद नहीं की जा सकती. लेकिन उनके साथ जो कुछ हुआ, उसका कारण अमित को नहीं समझ आ रहा था.
हुआ ये कि अमित के एक साथी ने राजस्थान से लौटने पर उसे बताया कि आज कल वहां के कुछ शहरों में एक भूत का फोन चर्चा में है. उसने अमित को एक नंबर दिया और कहा कि ये भूत का नंबर है और कई लोगों ने उससे बात की है. अमित ने नंबर तो ले लिया लेकिन मजाक समझ कर इस पर ध्यान नहीं दिया. फिर शाम को अचानक उसने अपने मोबाइल से वह नंबर डॉयल किया. उधर से कोई रिस्पांस नहीं मिला.
अगले दिन सुबह करीब नौ बजे अमित ने यूं ही सोचा कि चलो पीसीओ से ट्राई करते हैं. उसने पीसीओ से नंबर घुमाया तो उधर से किसी ने कहा हैलो. अमित को लगा कि शायद रांग नंबर लग गया. 'आप कौन?' उधर से आवाज आई , यार अमित परेशान क्यों कर रहे हो. अमित के रोंगटे खड़े हो गए. उसने हिम्मत करके फिर पूछा, आप मुझे कैसे जानते हैं, अपना नाम बताइए. उधर से किसी महिला के सिसकने और बच्चे के रोने की हल्की आवाज बीच बीच में सुनाई पड़ रही थी. उधर से फिर आवाज आई कि नाम जानने से क्या होगा, तुम हमारी मदद तो कर नही सकते. अमित बोला नहीं, मैं जर्नलिस्ट हूं. तुम्हारी मदद कर सकता हूं. उसने कहा, तो मैं आ जाऊं? हां, आओ, अमित के इतना कहते ही उसे करेंट के तेज शॉक जैसा लगा और रिसीवर हाथ से छूट गया. अमित का दिल तेजी से धड़क रहा था. उसने फिर हिम्मत कर नंबर घुमाया लेकिन उधर से, दिस नंबर डज नाट एग्जिस्ट की रिकार्डेड टोन सुनाई पड़ी. उलझन और बढ़ गई जब पीसीओ वाले ने बताया कि आप की बात तो हुई है लेकिन मीटर जीरो काल बता रहा है, कोई बिलिंग नही हुई. दिन में अमित ने कई बार कोशिश की लेकिन उस नंबर से यही जवाब मिलता रहा कि दिस नंबर डज नाट एग्जिस्ट. अमित ने अगले दिन एक्चेंज से संपर्क किया तो पता चला कि ये नंबर जयपुर साइड का है पीसीओ के नबर पर कॉल का रिकार्ड नहीं है. . अमित के साथी ने जयपुर एक्चेंज से जानकारी मांगी तो बताया गया कि ये नंबर जिनका था उनकी पूरी फैमिली की एक साल पहले रोड एक्सीडेंट में डेथ हो चुकी है. अब तो अमित को बुखार चढ़ गया. दो तीन दिन बाद नार्मल होने पर अमित ने ऑफिस आकर ये दास्तान सुनाई.
फिर क्या था वो नंबर पूरे ऑफिस में बट गया. हम लोंगों ने खबर भी छापी. सब ने नंबर लगाया लेकिन रिसपांस नही मिला. मैंने तो कई बार अकेले अपने रूम में अंधेरा कर रात दो बजे फोन लगाया कि शायद भूत से बात हो जाए लेकिन नो रिसपांस.
जब भी अमित का फोन आता है तो ये घटना याद आ जाती है. सुना है ठंडी स्याह रातों में सुनसान रास्तों पर भूतों का डेरा होता. रोज रात को करीब एक बजे अकेले की लौटता हूं. रास्ते में मिलता है 200 साल पुराना एक बरगद का पेड़, ठिठुरता हुआ चौकीदार, दुकान के शेड में रिक्शे के ओट में लेटा जाड़े को कोसता रिक्शेवाला, उसके फटे कम्बल में दुबका एक पिल्ला. और एटीएम केबिन में ऊंघता गार्ड. मुझे तो नही मिले आपको भूत या चुड़ैल तो कभी मिले हों तो बताइएगा.

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