11/23/13

हेल्लो, अपमार्केट....!


हेल्लो, अपमार्केट ! पता है ये क्या बला है? अपमार्केट का मतलब अमीर और डाउनमार्केट का मतलब गरीब नहीं होता. कहने भर से ही थोड़े हो जाता हैअप और डाउन. सब दिमागी कीड़ा है बॉस. ये तो स्टेट ऑफ माइंड है. जिसे देखो वही कद्दू जैसी तोंद और भिंडी जैसी टांगों पर बरमुडा टांगे घूम रहा है अपमार्केट बना. तो चलिए आपको मार्केट की थोड़ी सैर करा दूं - नोएडा टू लखनऊ वाया दिल्ली. वैसे हर जगह मार्केट एक जैसा ही है- थोड़ा अपथोड़ा डाउन.

  आप नोएडा के किसी सेक्टर में हैं और मेट्रो स्टेशन के लिए के ऑटो हायर करते हैं तो आप अपमार्केट और अगर शेयरिंग वाले डग्गेमार ओवरलोडेड टेम्पो पर बैठते हैं तो डाउन मार्केट. लेकिन मेट्रो में बैठते ही अप-डाउन का भेद मिट जाता है. पूरी ट्रेन एसी और वहां थूकने-गंदगी फैलाने की बहुत गुंजायश नहीं. इसके बाद आ जाता है नई दिल्ली रेलवे स्टेशन. अप और डाउन मार्केट को समझने के लिए भारतीय रेल से बेहतर कुछ नहीं. जब एसी कोच नही थे तब ट्रेन में फर्स्टसेकेंड और थर्ड क्लास हुआ करते थे. फर्स्ट और सेकेंड अपमार्केट और थर्ड क्लास डाउन मार्केट था. फिर सेकेंड और थर्ड क्लास खत्म कर एसी स्लीपर और जनरल कम्पार्टमेंट शुरू किए गए. तब जनरल कम्पार्टमेंट डाउनमार्केट और एसी और सेकेंड क्लास स्लीपर अपमार्केट था. धीरे-धीरे सेकेंड क्लास स्लीपर भी डाउनमार्केट हो गया और जनरल कम्पार्टमेंट तो वेजीटेबल क्लास हो गया माने यहाँ यात्री बोरियों में साग-सब्जी की तरह ठुंसे रहते हैं.

  तो चलते हैं दिल्ली से लखनऊ. सेकेंड क्लास स्लीपर या साधरण दर्जे की चेयरकार अप-डाउन मार्केट का मिक्स मसाला है. सामने बैठा बंदा ‘एक्स’ फैक्टर वाला परपफ्यूम लगाए अपनी सूखी टांगों में घुटन्ना फंसाए समार्ट फोन से चैट कर रहा हो तो वो अपमार्केट है लेकिन जैसे ही एक रूपये छाप सस्ता गुटखा पाउच फाड़ कर फांके और पिच्च करे तो डाउन मार्केट है. ईयर फोन लगा ढिंचैक म्यूजिक का मजा लेने वाली जींस क्लैड लेडी अपमार्केट लेकिन अगर वो बैग से तीखे लहसुन की गंध वाली रसेदार-मसालेदार सब्जी और चावल सीट पर फैला कर खाने-खिलाने  लगे तो सीट पर रायता और कम्पार्टमेंट में जो बॉस फैलेगी वो डाउनामर्केट है....अरे बात करते करते लीजिए लखनऊ आ गया...चमकता चारबाग स्टेशन.
रिक्शा.. गंज चलोगे ? जी बाबूजी, एक और सवारी बैठा लें ? नहीं... एक और सवारी बैठा ली तो दोनों डाउनामर्केट.   उफ्फ...अचानक अपनी सोच डाउनमार्केट लगने लगी थी. क्या बिगड़ जाता अगर उसको एक सवारी बैठा लेने देता. लेकिन कभी-कभी हम इन जरा सी बातों पर अपने बड़े से ईगो के कारण कितने छोटे हो जाते हैं. अपमार्केट और डाउनमार्केट तो सोच होती है, व्यक्ति नहीं. तभी हजरतगंज आ गया. गंज में फुटपाथ पर दुकान सजाए चाट, चनाजोर और मूंगफली वाले सब अपमार्केट हैं. एसयूवी से सफेद जूतों और सफारी में उतरे बाबूसाहब अपमार्केट हैं लेकिन वो जैसे ही फुटपाथ की स्टायलिश बेंच पर बैठ कनमैलिए से कान साफ करने लगते हैं तो डाउनमार्केट हो जाते हैं. किसी शोरूम के सामने बोरा बिछाए कंधों खिलौने सजाये कोई विकलांग डाउन मार्केट कैसे हो सकता है क्यूंकि उसके कस्टमर्स अपमार्केट हैं... अब घूरिये मत, घूरने वाले भी डाउन मार्किट केटेगरी में आते हैं .


10/17/13

बत्ती बना लो ...!


...हमरी न मानो रंगरेजवा से पूछो ... जिसने गुलाबी रंग दीना दुपट्टा मेरा..जी हाँ जब फिल्म पाकीज़ा बनी थी तो रंगरेज दुपट्टे गुलाबी कर दिया करते थे, तब गाल और चेहरे भी शर्म से लाल हो जाया करते थे लेकिन आजकल रंगरेज नहीं रंगबाजों का जमाना है . जो जहाँ, जब, जिसकी चाहें उसकी लाल कर दें. लॉ एंड आर्डर की भी लाल करने में वो परहेज नहीं करते क्यूंकि वो लालबत्ती वालों के लाल हैं. अब आप पूछेंगे ये लालबत्ती वाले कौन हैं? ये लालबत्ती वाले वो लोग हैं जो डिजर्व नहीं करते फिर भी लाल बत्ती लगा कर घूमते हैं और लॉ की बात करने पर क्रोध से लाल हो जाते हैं और नियम-कानून की बात करने वालों की लाल कर कर देते हैं. वैसे ये लॉ एंड आर्डर के लूज होते करेक्टर की ही अवैध संताने हैं. ये हैं अवैध रूप से लालबत्ती लगाकर सडकों पर घूमने वाले रंगबाज. लालबत्ती के फ़्लैश के साथ इनकी गाड़ियों में हूटर भी बजता रहता है जो चीख चीख कर निरीह आम जनता को आगाह करता रहता है – लाल बत्ती लगा लो, लॉ एंड आर्डर की बत्ती बना लो.
   कितना क्यूट सा शब्द है ‘बत्ती’ लेकिन इसकी मारक क्षमता बहुत घातक है. आप किसी से कह कर तो देखिये ‘बत्ती’ बना लो. वो इसे भीतर तक महसूस करेगा, तिलमिला जाएगा. शर्त लगा लीजिये, वो पलट के जवाब जरूर देगा. वैसे ‘बत्ती’ शब्द बहुत पुराना है. स्कूलों में बच्चे स्लेट-बत्ती लेकर ए बी सी डी सीखते थे. हमारी कोशिश होती थी की स्लेट पर बत्ती टूटे ना. दिमाग में भी बत्ती होती है जो कभी जल जाती है और कभी गुल हो जाती है. पहले पंसारी के यहाँ स्लेट वाली बत्ती के आलावा एक ‘बत्ती’ और मिलती थी. मुझे लगता है आजकल ‘बत्ती बना लो’ का जो जुमला लोकप्रिय है उसका ओरिजिन वही ‘बत्ती’ है. उस ‘बत्ती’ का इस्तेमाल एक जगह और होता था. ये बत्ती भी पंसारी के यहाँ बड़े सस्ते में मिलती थी और बच्चों को कांस्टेपेशन की समस्या होने पर यदाकदा इसका प्रयोग किया जादा था. लेकिन आजकल ये बच्चों की चीज नहीं रह गयी. बड़े लोग बात बात पर ‘बत्ती’ बना रहे हैं. इसका प्रयोग मास स्केल पर किया जा रहा है. लेकिन ध्यान रहे, आप दूसरों की क्षमता आक कर ही उसे ‘बत्ती’ बनाने को कहें नहीं तो अपनी ‘बत्ती’ का प्रयोग खुद ही करना पड सकता है. सो प्लीज हैंडल योर ‘बत्ती’ विथ केयर. 
  लेकिन अब उन बत्तियों से ज्यादा जलवा लाल बत्ती का है. चौराहे पर लाल बत्ती ? नो टेंशन , अपनी गाडी में लाल बत्ती लगा लो और ट्रैफिक सिपाही से कहो- अपने सिग्नल की ‘बत्ती’ बना लो.  और कहीं इन लाला बत्ती वाले  रंगबाजों की गाडी रोक कर ट्राफिक पुलिस ने चालान की पर्ची काटने की कोशिश की तो वो तमंचे की स्टाइल में अपना मोबाइल निकाल कर कॉल दागेगा - लो बात करो...बात करने के बाद सिपाही बोलेगा जी सर...और लाल बत्ती वाला रंगबाज टेढ़ा होकर गाड़ी स्टार्ट करेगा, सिपाही की चालान बुक को कुछ इस अंदाज़ में घूरेगा जैसे कह रहा हो...इसकी बत्ती बना लो...

8/16/13

काशी में बौराए से गिरिजेश !

आपने कभी किसी जवान बछड़े या गाय को सड़क पर पूंछ उठा के दौड़ते देखा है अगर नहीं तो किसी बछड़े के सामने अपना छाता भक से खोलिए फिर देखिए तमाशा...बछड़ा दुम उठा कर कड-बड, कड-बड दौड़ेगा. गली या सड़क पर पर ये दृय देख बड़ा मजा आता है.  मेरे एक मित्र हैं गिरिजेश राव, अरे लुंगी लगा कर रसम और इडली सांभर सुड़कने वाले राव गारू नहीं, अपने पर्वांचल के बाबू सा हैं. गलती से आजकल बनारस की गलियों में पहुंच गए हैं. उनकी स्थिति उसी बछड़े की तरह हो गई है जिसे हर बनारसी छाता खोल कर भड़का रहा है. और गिरिजेश थूंथन फुफकारते हुए बनारसियों को रपटा रहे है ऐसा फेसबुक पर उनकी टिप्पणियों से जाहिर हो रहा है. गए तो लखनऊ से हैं और रहने वाले कुशीनगर के हैं लेकिन बनारस पहुंच कर उनकी हालत बूटी वाले बाबा की तरह हो गई है. निहायत शरीफ और सेंसिटिव किस्म के इंसान का भोले बाबा भला करें.

8/4/13

हमहूं सलमान


हमहूं सलमान....

मेरे घर के पास एक डेवलप्ड झोपड़पट्टी है नाम है रमैयाजीपुरम. जब रमैयाजीपुरम से गुजरता हूं तो अक्सर रमैया वस्तावैया की ये लाइंस सुनाई पड़ती हैं...जीने लगा हूं...पहले से ज्यादा तुम पर मरने लगा हूं.. रमैयाजीपुरम में रमैया वस्तावैया का गाना, –क्या बात है. मुझे मुंबई की डेवलप्ड झोपड़पट्टी धारावी याद आने लगती है. रमैयाजीपुरम.. नाम कैसे पड़ा ये तो पात नहीं लेकिन रमैयाजी कोई दलित महानुभाव थे या दक्षिण भारतीय नेता, इसकी कोई जानकारी मेरे पास नही है. वैसे तो ये बेतरतीब पक्के मकानों की ऐसी बस्ती है जहां लोग अपने घर के सामने ही कूड़ा फेंकते हैं, मुर्गी और बकरी भी पालते हैं+ और उनके सामने ही बच्चों को शौच भी कराते हैं. पॉश कालोनी के पहलू में पली-बढ़ी इस गली पट्टी और कॉलोनी वासियों में कूड़ा फेंकने को लेकर हमेशा सीमा विवाद रहा है. यहां के हर तीसरे घर में सल्लूभाई बनने का सपना पाले कोई ना कोई मिल जाएगा. 
  रमैयाजीपुरम में बाई, नाई और चारपाई के बीच में एक जिम भी है नाम है अर्नाल्ड जिम. अरे वही अपने अर्नाल्ड शवाजनेगर. दरवाजे पर बंधी बकरियों और दाना चुगती मुर्गियों को देख कर नहीं लगता कि अंदर कोई जिम भी है. यह जिम ऐसावैसा नहीं, मोहल्ले के सल्लुओं और गोविंदाओं और किंग खानों से लबरेज है. इस जिम की मशीने  सेकेंड हैंड हैं, हर मशीन  के सामने  शीशा  लगा हुआ है और बैकग्राउंड म्यूजिक भी बजता रहता है. बस एसी नहीं है. अब पसीना बहाना है तो एसी का क्या काम.
    निठल्लई में डोले-शोले बनाना सबसे बढ़िया टाइमपास है. सो लाल और काली गंजी वाले मोहल्ले के रोमियो सुबह-शाम यहां बैकग्राउंड म्यूजिक ...जीने लगा हूं...के साथ धका-पेल पुशअप्स करते हैं नजर आते हैं. कभी कभी-कभी पारा गरम छाप भोजपुरी फिल्मों के गाने भी सनाई पड़ते हैं लेकिन गाने चाहे जितने इशकिया  और छिछोरेपन वाले बजे, जिम के अंदर का माहौल बिलकुल सीरियस होता है, कोई हंसी-मजाक नहीं.. डम्बल उठाओ, डंड पेलो और पुशअप्स करो, वो भी लगातार शीशा में देखते हुए. लखनउ में वैसे तो ढेर सारे हाई-फाई जिम है लेकिन जितनी भीड़ इस जिम में दिखती है उतनी कहीं और नहीं. यहां कर हर मेम्बर  डोले-शोले बना कर जरूर सोचता होगाकि ...हमहूं सलामन. इस जिम के मालिक का नाम नहीं पता है क्योंकि खाली मोबाइल नंबर लिखा है, कभी फोन रक के बोलूंगा जरूर...रमैया वस्तावैया, जिम से निकलेगे सल्लू भैया... 

3/16/13

इस रात की सुबह नहीं...



बात इसी सर्दी के दिनों की है जब रात का पारा जीरो के नीचे चला गया था. रजाई भी उस रात बहुत कारगर नहीं था. ठंड ने कई बार जगाया. सिहरन भरी रात उसकी याद बार-बार डरा रही थी. उस फेरी वाले की काया आंखों के सामने घूम गई.. क्या वो मर जाएगा, क्या इस ठंड का झेल पाएगा? वो रोज ही तो मिलता था प्राइमरी स्कूल की दीवार के सहारे फुटपाथ पर कूबड़ निकाले बैठा हुआ. मैला पजामा, फटा कोट और उस पर हिलता हुआ उसका सिर. दीवार से टिकी लाठी, पेप्सी की बोतल में पानी और बगल में रखी चप्पल. पर फटपाथ पर दुकान बड़े करीने से लगाता था वो. अखबार बिछा उस पर संभाल कर रखता था पान मसाला की चार-पांच लडिय़ां. सुबह करीब दस बजे से शाम चार बजे तक वो वहीं बैठता था. कभी कभार मसाला खरीदता कोई ग्राहक भी दिख जाता था वहां. कभी-कभी उसकी दुकान नहीं दिखती. कभी दुकान तो दिखती लेकिन वो नहीं दिखता. लेकिन नजर दौड़ाने पर दिख भी जाता, कभी थोड़ी दूर पर पेशाब करते या चाय पीते हुए.
    ...तो जीरो डिग्री वाली रात की अगली सुबह वो नहीं था उस जगह. लगा कि ठंड में हो गया उसका काम तमाम. इधर-उधर नजर दौड़ाई तो रोड की दूसरी साइड बैठा मिल गया. वहां धूप पहले आती थी शायद इस लिए वहां बैठा था. उसकी दुकान के सामने उस दिन मेरे कदम ठिठक गए थे. मैंने दस का नोट बढ़ाया...वो पूछ रहा था...कौन सा दें बाबूजी.. मैं मसाला नही खाता..उसके हिलते चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी.. रोज कितना कमा लेते हो?.. दो-चार पैसे मिल जाते हैं...लो चाय पी लेना..उसने नोट लेकर सिर पर लगाया और उसी तरह सिर झुका कर बैठ गया. चेहरे पर कोई खुशी न गम. मैं भी आगे बढ़ गया. मैंने उसे दस रुपए दिए थे लेकिन वो तो रोज मुझे कुछ ना कुछ देता था...जूझते रहने, कभी लडऩे और कभी हार ना मानने की प्रेरणा. सुबह उसे देखते ही निराशा के सारे बादल छंट जाते थे. उसे जूझते देख ऑफिस में हर दिन एक नई शुरुआत होती थी. लेकिन अब मेरे ऑफिस का रास्ता बदल गया है इस लिए वो नहीं दिखता. शायद अब भी वो वहीं बैठा होगा हिलते हुए सिर को संभालने के लिए जूझता हुआ, पर न जाने क्यूं लगता है कि उसकी जिंदगी तो एक सिहरन भरी रात है जिसकी सुबह नहीं.

2/21/13

डाउन मार्केट, अपमार्केट...!



ये कहानी कानपुर शहर की है. स्टेशन से ऑफिस तक रिक्शेवाले के साथ एक छोटा सा सफर...
ओ रिक्शा.. खाली है? जी बाबूजी. चलो.. एक सवारी और बैठा लें बाबू? क्यों, पैसा तो पूरा दे रहे हैं, सीधे चलो, लेट हो जाऊंगा. बाबू, पांच रुपया और कमा लेते..! नहीं.. ठीक बाबू, जैसा कहें... और रिक्शा वाला बढ़ चला कभी 'साम्बा' कभी 'हिप-हॉप' करते. पता नहीं क्यों ज्यादातर रिक्शे वाले सीट होते हुए भी उसी तरह 'हिप-हॉप' स्टाइल में रिक्शा चलाते हैं. जी हां, इसे 'हिप-हॉप' ही कहूंगा. वो ऐसे ही चलाते हैं. एक बार हिप्स उछाल के दाएं साइड, फिर उछाल के बाएं, भले ही सवारी हो ना हो. ये बात मुझे हमेशा परेशान करती है कि रिक्शे वाले अपनी सीट पर बैठ कर क्यों नहीं चलाते.
तभी 'हिप-हॉप' करते उस रिक्शे वाले का मोबाइल बजा. वो रिक्शा चलाते बतियाने लगा. एक हाथ में मोबाइल दूसरे में हैंडल...अरे यार ड्राइव करते समय मोबाइल पर बात नहीं करते...रिक्शा पल्टाओगे क्या? उस पर कोई असर नहीं पड़ा था. 
वो कुछ परेशान सा फोन पर बाते कर रहा था...मम्मी जी अब और नहीं कर सकता, घर छोड़ आया हूं. मेरा ध्यान उसके हुलिए पर गया. पैंट-शर्ट, साधारण सा जूता और स्वेटर. मुझे लगा ये स्कूली बच्चों को ले जाता होगा, कुछ तकरार हो गई होगी, शायद उसी बारे में किसी मेमसाहब से बातें कर रहा है. ..ये मम्मी जी कौन हैं? जी, मेरी सास हैं...कितना पढ़े हो?..ग्रेजुएट हूं..नाम? फलाने शुक्ला..सास क्या करती हैं? ..ग्राम प्रधान हैं.
अचानक मुझे लगा कि परेशान सा यंग ग्रेजुएट, जिसके हाथ में मोबाइल था और जो अपनी ग्राम प्रधान सास को मम्मीजी बोल रहा था, वो भला डाउन मार्केट कैसे हो सकता था. भले ही वो चला रिक्शा रहा था. 
  अब सास थी तो वाइफ भी होगी, सो मैंने पूछ ही लिया.. कितने दिन पहले शादी हुई है?...15 जनवरी को. अरे वाह..फिर क्या प्रॉब्लम है? बाबूजी वही तो प्राब्लम कर रही है. क्यों..? ठीक से नहीं रखते क्या, लव मैरेज की थी? बहुत ज्यादा दहेज तो नही मांग लिया, सताते तो नहीं..? सवालों की बौछार से वो थोड़ा नाराज हो गया... अरे बाबू जी, पांच भाइयों के बीच छह एकड़ खेत है. क्यों सताऊंगा, ससुराल वालों ने अच्छा दहेज दिया है, पल्सर बाइक भी दी है. उसका बहुत ध्यान रखता हूं. आज उसका व्र्रत था, आधा किलो अंगूर और सेब रख कर आया हूं. किसी चीज की कमी नहीं है फिर भी पता नही क्यों नाराज रहती है...अच्छा तुमने वाइफ को बताया है कि रिक्शा चलाते हो? नहीं.. 
रोज रिक्शे से कितना कमा लेते हो? ...जब तक चार सौ नहीं कमा लेता घर नहीं जाता. रोज वाइफ को चालीस रुपए देता हूं,जबकि सारा राशन-पानी घर से आता है...
उफ्फ...अचानक, मुझे अपनी सोच डाउन मार्केट लगने लगी थी. क्या बिगड़ जाता अगर उसको एक सवारी बैठा लेने देता, दस रुपया और कमा लेता. लेकिन कभी-कभी हम इन जरा सी बातों पर अपने बड़े से ईगो के कारण कितने छोटे हो जाते हैं. रिक्शा चला रहे उस ग्रेजुएट की सोच तो किसी भी अपर या अपर मिडिल क्लास यंगस्टर्स जैसी ही थी, जिसमें सेल्फ रिस्पेक्ट था. तभी तो वो घर से पैसा नहीं लेना चाहता था. अपने बूते आगे बढऩा चाहता था, वाइफ साथ नहीं दे रही थी फिर भी हार मानने को तैयार नहीं था.
क्या ये मेड सर्वेंट, चौकीदार, चायवलों और रिक्शेवालों जैसे सो-कॉल्ड डाउन मार्केट लोग सपने नहीं देख सकते? सो-कॉल्ड अपमार्केट सोसायटी का काम क्या इन सो कॉल्ड डाउन मार्केट मेड सर्वेंट, माली, गार्ड, ड्राइवर और रिक्शेवालों के बिना चल पाएगा? दरअसल अपमार्केट और डाउनमार्केट तो सोच होती है, व्यक्ति नहीं. पता नही क्यूं रिक्शेवाले ने वाइफ को नहीं बताया कि वो रिक्शा चलाता है? ये उसका ईगो था या सेल्फ रिस्पेक्ट, पता नहीं. पर ये सवाल मुझे परेशान कर रहा था और रिक्शे वाला मेरी इस उधेड़-बुन से बेखबर बढ़ा जा रहा था अपनी मंजिल की ओर- हिप-हॉप, हिप-हॉप..हिप-हॉप, हिप-हॉप..

2/20/13

Ek chinta....


गंगा..तुम बहती हो क्यूं..!
चाहे चार करोड़ लोग गंगा में डुबकी लगाएं या दस करोड़, तब भी ढेर सारे पापी बचे रहेंगे क्योंकि वो डुबकी लगाएंगे तो भी उनके पाप नही धुलेंगे. हां, गंगा पहले से ज्यादा गंदी हो जाएंगी. इलाहाबाद स्टेशन पर जो भगदड़ मची उसके लिए जिम्मेदार लोगों के पाप तो कभी नही धुलेंगे भले ही जिंदगी भर गंगा में खड़े रहे.  पानी फिर भी अभी समय है आप नहीं जाएंगे संगम में डुबकी लगाने? सारे पाप धुल जाएंगे! ऐसा हम आस्था की वजह से कह रहे हैं. इंडिया में तो नदियों को पूजा जाता है, उन्हें मां और देवी का दर्जा दिया गया है. कहा जाता है कि कुंभ के दौरान संगम में डुबकी लगाने से सारी बुराई धुल जाती है क्यों कि वो जल अमृत के समान होता है. वैसे गंगा हों या यमुना, उद्गम स्थल पर इनका निर्मल जल अमृत समान ही होता है. लेकिन सालों साल हमने इतनी गंदगी, मैल और पाप इन नदियों में धोए हैं कि अमृत तो दूर, नदियों का पानी पीने लायक भी नहीं रह गया. बुरा मत मानिएगा लेकिन आपको क्या लगता है साल भर जो पाप हम सब इन नदियों को गंदा करने में करते हैं वो क्या कुछ मिनट की डुबकी से धुल जाएगा?
आस्था को जाने दें, वैज्ञानिक आधार पर भी ये बात सिद्ध हो रही है कि देश भर की नदियों को गंदा करने में हमने कोई कसर बाकी नहीं रखी है. कहां तो नदियों को जीवनदायिनी कहा जाता लेकिन अब इन नदियों का पानी हमने पीने लायक छोड़ा है क्या? लेकिन गंगा फिर भी यूं ही बहती रहेगी, मां जो ठहरी.

1/25/13


'मिस्ड टॉपअप'
निर्मल बाबा की तरह और लोग भी किरपा बरसाते हैं कभी कभी. ये किरपा डावर्ट  हो कर आपके फोन  में घुस जाती है, कभी मिस्ड काल के रूप में तो कभी 'मिस्ड टॉपअप' के रूप में. एक बार एक ब्वायफ्रेंड ने अपनी गर्ल फ्रेंड के नंबर पर टॉपअप कराया. पता नहीं कैसे नंबर के घालमेल से टॉपअप मेरे सेल पर आ गया. तुरन्त बाद ही उस जीएफ का फोन आ गया कि गल्ती से आप के सेल मे चला गया, प्लीज किसी पीसीओ से मेरे नंबर पर वो आमउंट डाल दीजिए. पहले मैं तैयार हो गया फिर डर गया कि ये लड़की फंसा ना दे कि मेरे पीछे पड़ा है कि फोन पे बात करो, बिना कहे मेरे सेल में पैसा डाल दिया. सो मैंने कहा, देवी जी आप अपने बीएफ को मेरे ऑफिस भेज दीजिए, कैश दे दूंगा. फिर बीएफ का फोन आया कि अच्छा मेरे सेल में डाल दीजिए. मैंने मना कर दिया कि कैश ही मिलेगा. फिर न फोन आया ना वो आए. मैं इंतजार में हूं कि निर्मल बाबा की किरपा से मिस्ड कॉल आए ना आए लेकिन एक बार  फिर 'मिस्ड टॉपअप' हो जाए...कोटि कोटि परनाम..

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