11/1/09

इस धुंधली सुबह बसी है रात की खुशबू



थोड़ी खुशबू, थोड़ी खुनक, थोड़ी खुश्की और थोड़ी खामोशी. और कैसी होती है खुशनुमा सुबह. विंटर को वेलकम करने का इससे सुंदर तरीका और क्या हो सकता है. ऑटम तो आता ही है विंटर को वेलकम करने. उफ्, शरद ऋतु की ये शीतल चांदनी और मिस्टी मॉर्निंग दीवाना बना रही है. लोग वसंत को ऋतुराज कहते हैं लेकिन मुझे तो शरद से शानदार कुछ नही लगता. चांदनी में ओस की बूंदों में जैसे अमृत बरसता है. सुबह वो बूंदें पत्तों की हथेलियों और फूलों की पलकों पर ठहर कर जैसे आपका ही इंतजार करती रहती हैं. सुबह की धूप में इनकी चमक देख कर लगता है जैसे किसी स्कूल में ढेर सारे बच्चे मॉर्निंग एसेंबली में प्रेयर कर रहे हों या राइम गा रहे हैं. साल भर इंतजार कराने के बाद शेफाली (हरसिंगार) फिर महकने लगा है. इसके फूल शाम ढलते ही अपनी खुशबू से अहसास करा देते हैं कि अगले दिन मॉर्निंग वॉक में अपके रास्ते में वो पलक-पांवड़े बिछाए मिलेंगे. बचपन में ऋतुओं का ये राज समझ नहीं आता था. बस लगता था कुछ बदल गया है, कुछ नया सा है कुछ ठंडा सा है. सुबह थोड़ी-थोड़ी धुंध, बाक्स से निकाले गए गर्म कपड़ों और रजाई की खुशबू, किचेन में चाय के लिए कूटे जा रहे अदरक की खुट-खुट और रात में करारे चीनिया बादाम वाले की आवाज के साथ करीब आती ढिबरी की रोशनी बता देती थी कि ठंड आ गई है. फिर रात को रजाई में दुबक कर सोना..कितना सुखदाई है ये गुनगुना अहसास.
अब ये मत कहिएगा कि ये सब पुरानी बाते हैं, बक्त बदल गया है. वक्त तो होता ही है बदलने के लिए. छोटे शहर बड़े हो गए, बड़े शहर मेट्रो हो गए. बाग बगीचों वाले बंगले अपार्टमेंट्स में तब्दील हो गए. पार्क के कोने में आम का जो दरख्त था वहां अब एक मिल्कबूथ है. अब स्कूल जाते समय मफलर बांधे हाथ में दूध की डिब्बा और छड़ी लिए वो बुजुर्ग भी नहीं मिलते. हाथ में फूल का दोना लिए मंदिर जाती बूढ़ी काकी भी नहीं मिलतीं. शाम को स्कूल से लौटता-खिलखिलाता लड़कियों का झुंड भी नहीं मिलता. नुक्कड़ पर मोहन बागड़ की चाट का ठेला भी नहीं लगता. लेकिन शरद ऋतु तो अब भी आती है, हरसिंगार तो अब भी महकते है. आपकी छत या अपार्टमेंट की मुंडेर पर ग्लैडियस, कॉलियस या गुलाब के जो गमले रखे हैं उनकी पत्तियों पर अभी भी ओस की वैसी ही बूंदें किसी का इंतजार करती हैं. देखिए टेरेस में जो बॉगिनवीलिया आपने लगा रखा है उसमें आए लाल फूलों को देख ये छोटी से फिंच कितनी खुश है. घर के पास बरसाती पानी और और ऊबड़-खाबड़ गड्ढों से भरा जो मैदान था वहां कितना सुंदर पार्क है. गुलमोहर और अमलताश की कतार के बीच दूब में खेलते ये बच्चे कितनी एनर्जी से भरे लगते हैं. और झाडिय़ों की ओट में वो जोड़ा अपने में खोया हुआ भविष्य के ना जाने कितने सपने बुन रहा है, कसमें खा रहा है. पार्क किनारे बेंच पर बैठे वो चार बुजुर्ग कितनी निश्चिंतता से गपशप में मशगूल हैं. कोई मंकी कैप लगाए है कोई पेपर में छपी किसी खबर पर चर्चा कर रहा है. सब ठहाके लगा रहे हैं. क्या इन्होंने अपने जीवन के उतार-चढ़ाव और बदलाव नही झेले हैं. ये सब खुश हैं क्योंकि उन्हें पता है चेंज तो इनएविटेबल है, शाश्वत कुछ भी नहीं. शाश्वत है तो ये दिन-रात और नेचर. कल की उधेड़बुन में हम अपने आसपास बिखरी इन खुशियों को क्यों नही महसूस कर पाते. घर के पास ही पुरानी सी एक कोठी थी. उस पर एक नेमप्लेट लगी थी...मिसेज..चैटर्जी. ध्यान उधर चला ही जाता था क्योंकि वहां से गुजरने पर फूलों की खुशबू मन को वहां तक खींच लाती थी. वहां एक ओल्ड लेडी अक्सर खड़ी नजर आती थीं अकेली. शायद बच्चे बाहर रहते होंगे. फिर उनका दिखना बंद हो गया. बोर्ड भी हट गया. एक दिन देखा कोठी टूट रही है. पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लगा. अब वहां एक नर्सरी स्कूल है. फिर शरद की एक सुबह शेफाली की खुशबू स्कूल तक खीच लाई. देखा, एक कोने में फूलों से लदा हरसिंगार अभी भी वहां है. लगा मिसेज चैटर्जी वहां खड़ी मुस्करा रहीं हैं और कहीं से आवाज आ रही है...रहें ना रहें हम.. महका करेंगे बन के फिजा...
आप कह सकते कि ये सब रूमानी और काल्पनिक बाते हैं और ये शहर के पॉश इलाके की तस्वीर हैं. शहर में इतनी हरियाली अब कहां बची? जी नहीं, इसमें कुछ भी काल्पनिक नहीं हैं. जानते हैं पार्क की बेंच पर बैठे सत्तर साल के वो
बुजुर्ग पुराने शहर की एक गली से चार किलोमीटर का फासला तस कर रोज यहां आते हैं. एक दिन नर्सरी से गेंदे और बेला के पौधे ले जा रहे थे. किसी ने पूछा गली में कहां लगाएंगे. बोले टेन बाई टेन के टेरेस में मैंने क्या किया है कभी आइए, दिखाउंगा. ठीक है शहर बड़ा हो रहा है. जहां बड़े बड़े पेड़ थे वहां अब मल्टी-स्टोरीड अपार्टमेंट्स हैं. उसमें रहना लोगों की मजबूरी हो सकती है. लेकिन आसपास कहीं प्रकृति आपका वैसे ही इंजतार कर रही है. तो आइए शरद की इस धुंधली सुबह शेफाली की खुशबू के बीच थोड़ा टहल आएं.

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