12/6/11

दोस्त-वोस्त...यार-व्यार...!


साहित्य समाज का आइना होता है लेकिन लगता है आजकल समाज का आइना सोशल नेटवर्किंग साइट्स भी हैं. सो आज उन लोगों की बात जो किसी ना किसी की फ्रेंड लिस्ट में हैं. हर फ्रेंड जरूरी होता है चाहे वो फेक, फ्रस्ट्रेटेड, फ्लर्ट, फाल्तू, फ्रैंक, फुरसत में या फेंकने वाले ही क्यों ना हों. कुछ दिन पहले किसी फेसबुकिया ने कमेंट किया था, गुरू... तुम्हारी फ्रेंड लिस्ट में गल्र्स की लम्बी लाइन है. उसे बताना पड़ा कि दोस्त ये गल्र्स की नहीं फ्रेंड्स की लिस्ट है और इसमें 13 साल के बच्चों से लेकर 73 साल की बुजुर्ग भी हैं. ये लिस्ट इससे कई गुना लम्बी होती, लेकिन वीड्स की छंटनी और सूखे ठूंठनुमा लोगों को हटाते रहने से ये मैनेजेबल है. कौन फ्रेंड हैं और कौन फ्रॉड, ये तो कुछ दिन साथ-साथ चलने पर पता लगता है. दोस्त के कमेंट के बाद सोचा चलो इन चेहरों के पीछे के चेहरे को पहचानने की कोशिश करते हैं. उनको रुक्रैच करने पर एक अलग ही दुनिया सामने आई. फीमेल मेंबर्स से पूछा कि अगर आप मेरी फ्रेंड लिस्ट में हो तो मेरी क्या हुई? सब ने कहा.. फ्रेंड. फिर पूछा, अगर फ्रेंड फीमेल हैं तो गर्लफ्रेंड हुई ना...? कुछ ने टप कहा ...बिल्कुल नो प्रॉब्लम- ये था फ्रैंक चेहरा. लेकिन कुछ लड़कियां तुरन्त हॉय, हाऊ आर यू, आई एम फाइन वाला फॉरमैट बदल कर बाय... कैच यू लेटर वाले मोड में आ गईं और आगे कुछ पूछ पाता, इसके पहले ही ऑफ लाइन. कुछ दिन तक वो ‘देखते ही निकल लो’ वाले मोड में रहीं और फिर कंट्रोल डिलीट एंड- ये था फाल्तू चेहरा.
लिस्ट में एक पेयर भी था. लडक़ा-लडक़ी बचपन से एक दूसरे को जानते थे और पढ़ाई के बाद शादी करने का पक्का इरादा था. अचानक लडक़ी का ब्वॉयफ्रेंड मेरी लिस्ट से गायब हो गया. लडक़ी से पूछा सब ठीक-ठाक तो? एक सपाट सा जवाब था, फॉरगेट दैट. अरे... क्या हो गया. कुछ नहीं... मुझे क्या करना है, कौन सा कैरियर चुनना है, ये मैं तय करूंगी. कोई जरूरत से ज्यादा पजेसिव हो ये भी बर्दाश्त नहीं. मुझे लगा वो मेरा फ्रेंड कभी था ही नहीं- ये था कांफिडेंट चेहरा.

अब बारी थी फ्रेंडलिस्ट की एक ऐसी फीमेल की जिसकी इंगेजमेंट हो चुकी थी और वो अपने को इंडिपेंडेंट कहती थी. उसके करियर अभी शुरुआती दौर में था. उससे भी यही सवाल किया. जवाब ऑन लाइन नहीं आया बल्कि आधा दर्जन एसएमएस आ गिरे एक के बाद एक. पढऩे के बाद लगा कि मैसेज उसके मंगेतर के पास जाने थे लेकिन हड़बड़ी या गड़बड़ी से मेरे नंबर पर दे मारे. पहले मैसेज में परमीशन मांगी गई थी कि ..फलां पूछ रहे हैं, क्या आंसर दूं. दूसरे में लिखा था...मतलब? मैं तुम्हें बता रही हूं ना.. जो लगा वो पूछा, इसमें गलत क्या है? फिर तीसरा मैसेज... उन लोगों ने मुझे टच भी नही किया...फलां बहुत सीधे हैं. ओके और हम..मैं तुम्हें बता क्या रही हूं और तुम क्या समझ रहे हो? बीवी हूं तुम्हारी. उसको जब चेताया कि ये क्या दनादन भेजे जा रही हो. इसके बाद सफाई देते हुए 4-5 मैसेज कि वो गलती से आपको चला गया. असल में हमारे रिलेशन पर बात हो रही थी. क्यूंकि हमारे परिचित का पांच साल बाद ब्रेकअप हो गया है तो हम डिस्कस कर रहे थे. फिर कहाकि मेरी तो इंगेजमेंट हो चुकी है ब्वाय फ्रेंड का क्या करूंगी. फिर कहा, ब्वाय फ्रेंड और गर्लफ्रेंड वही नहीं होते जिनसे हम शादी करें. वैसे मैं पर्सनली मानती हूं कि जो ब्वायफ्रेंड हो वही हसबैंड भी. अब तक दिमाग का दही जम चुका था और सवाल वहीं का वहीं था- ये था कन्फ्यूज्ड चेहरा.

लिस्ट में हाल में शामिल एक मेंबर ने तीसरे ही कनवर्सेशन में इतना खुल गया कि दिमाग की लाल बत्ती जल गई. जब कहा कि तुम्हारी फीमेल आडेंटिटी पर डाउट है तो ‘डीके बोस’ वाली लिंगो पर आ गया- ये था फेक चेहरा. थर्टी प्लस की ओर बढ़ रही मेंबर को जब ‘जीएफ’ का ऑफर दिया तो लगा वो धन्य हो गई. ...अच्छी फमिली से हो, जॉब है, शक्ल-सूरत भी खराब नहीं तो शादी क्यूं नही कर लेती. बस फिर क्या था उसके दिल का दर्द सामने आ गया. बोली जीने का दिल नहीं करता इस दुनिया से मन ऊब गया है- ये था फ्रस्ट्रेटेड चेहरा।
लेकिन ढेर सारे ऐसे लोग भी थे जो शुरू में हिचके लेकिन बाद में अच्छे दोस्त साबित हुए. इतने सारे लोगों से बात करने के बाद फ्रेंड लिस्ट फिर लम्बी लगने लगी थी. लेकिन कंट्र्रोल डिलीट एंड की पर बढ़ती उंगलियां ये सोच कर रुक गईं कि जब सोसायटी में विश्वास का संकट बढ़ रहा रहा है तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स इससे अलग कैसे हो सकती है. यहां भी तो विश्वास का संकट है. जरा रुकिए...एक और फ्रेंड रिक्वेस्ट आ गई...हेलो.. ग्लैड टू मीट यू.. आई एम राजीव..!

7/31/11

फ्रेंच किस!



आज थोड़ा वॉक करते हैं. जिंदगी को करीब से देखने और समझने के लिए पैदल चलना जरूरी है. पैदल चलने का मतलब पैदल होना कतई नहीं है, यहां तो बस कुछ दूर पैदल चलने की बात हो रही. पैदल होने और पैदल चलने में बड़ा फर्क है. ऐसा भी नहीं कि आपको कार या टू व्हीलर से नहीं चलना चाहिए. ये सब नहीं होगा तो लोग कहेंगे कि पैदल है. लेकिन वाहन होते हुए भी अगर आप कुछ दूर पैदल चलेंगे तो जिंदगी को और करीब पाएंगे. घबराइए नहीं, यहां वॉकिंग के फायदे, स्वस्थ जीवन और मोटापा कम करने के टिप्स या प्रवचन देकर पकाने का इरादा नहीं है. बस गुजारिश है कि आइए थोड़ी दूर पैदल चलते हैं, जिंदगी को थोड़ा और करीब से देखते हैं.
छुट्टी का दिन और शाम का खुशनुमा मौसम सो चल दिए पैदल. वही रास्ते, वही बिल्डिंग्स और वही दुकानें, लेकिन अहसास नया. पता चला कि स्पीड ब्रेकर्स सिर्फ वाहन वालों को ही नहीं झटके देते, पैदल चलने वालों को भी झकझोरते हैं. तभी सामने दिखा स्पीड ब्रेकर- फुटपाथ पर डब्लूडब्लूएफ के दो फाइटर्स नजर आए. पत्नी से कहा पटरी बदलो, इन सांड़ों के मूड का क्या ठिकाना. थोड़ी दूर आगे निकला तो दूसरा स्पीड ब्रेकर मिला- चटपट-चटपट की आवाज और सोधीखुशबू. मैं फिर ठिठक गया. ठेले पर भुट्टे भूने जा रहे थे और चार-पांच लोग अपने भुट्टों के इंतजार में जले-भुने से खड़े थे. पत्नी ने घुड़का, इस तरह तो पहुंच चुके अम्बेडकर पार्क. मन मारकर हम बढ़ चले. पहली बार महसूस किया कि बारिश के बाद फुटपाथों पर उग आए घास में भी खुशबू होती है. पार्क करीब था कि तभी आ गया एक और स्पीड ब्रेकर-कुछ लेडीज और बच्चों से घिरा गोलगप्पे का एक ठेला. गोलगप्पे वाला धकाधक जलजीरा में बताशों को यूं डुबकी लगवा रहा था जैसे कोई पंडा जजमानों को गंगा में स्नान करवाता है. मुंह में पानी आ गया. आंखें सिर्फ एक 'पत्तेÓ की गुजारिश कर रहीं थी लेकिन साथी का रिस्पांस निगेटिव था, सो बढ़ चला पार्क की ओर.
पार्क के भीतर थी छुट्टी की परफेक्ट पिक्चर. चारों तरफ हरी घास, बीच-बीच में फौव्वरे, लाइट्स और मस्ती करते ढेर सारे लोग. कुछ कपल्स फव्वरे की फुहारों में तनमन भिगो रहे थे. थोड़ी दूर पर एक लड़की ईयरफोन लगाए बड़ी देर से ना जाने किससे बतिया रही थी. हमने भी एक खाली टीला तलाश ही लिया. उसके ऊपर एक बाड़े में पीपल का पेड़ रोपा गया था. हम उसकी ढलान पर बैठ दूब की खुशबू को महसूस करने लगे...और भी बहुत सी इधर-उधर की बातें. शाम ढल रही थी. अचानक पीपल के उस पार एक कपल पर नजर पड़ी. उम्र होगी यही बीस-इक्कीस साल. एक-दूसरे में खोए हुए. दोनों किसी कॉलेज के स्टूडेंट लग रहे थे. वाइफ से कहा देख रही हो ना लव बड्र्स, वो दोनों जो कर रहे हैं उसे 'फ्रेंच किस' कहते हैं. इसके साथ ही अपनी टीनएज की फ्लैशबैक रील चलने लगी. 'फ्रेंच किस' तो दूर स्टूडेंट लाइफ में 'नार्मल किस' का मौका भी नहीं मिला. किस पर डिस्कशन तो बहुत होते लेकिन उस 'पप्पी' और इस 'किस' में बड़ा फर्क है. किस से ना जाने कितने पुराने किस्से याद आने लगे. वाइफ की तरफ देखा.. कहीं फिर झिड़की ना मिले कि यही सब देखने आते हो. लेकिन वो थोड़ा कंसन्र्ड दिखी...अंधेरा होने को है, ये लड़की घर से क्या बता कर निकली होगी? शायद यह कह कर निकली हो कि कोचिंग में एक्स्ट्रा क्लास है. हो सकता है गल्र्स हॉस्टल या फिर पीजी में रहती हो. वहां तो नौ बजे रात तक की छूट होती है. फ्रेंच किस में मशगूल ये टीनएजर्स कितने सीरियस हैं अपनी रिलेशनशिप को लेकर, आर दे मेच्योर एनफ? फ्रेंच किस की बात पर वाइफ पैरेंट के रोल में आ चुकी थी और मैं फैंटसी की बाइक पर सवार बीते दिनों के चक्कर लगा रहा था. तभी उसने कहा अच्छा, अब चलो, घर में बच्चे अकेले हैं...फिर झटका लगा.. स्पीड ब्रेकर आ गया था. फैंटसी खत्म और रियल लाइफ शुरू. अब हम दोनों घर लौट रहे थे. मैं भी पैरेंट के रोल में आ चुका था. फ्रेंच किस के फीचर्स की जगह उस टीन कपल्स को लेकर कंसर्न था...पता नहीं वो दोनों वहां कब तक बैठे रहेंगे, जरूर उनके पैरेंट्स इंतजार कर रहे होंगे या शायद उनको पता ही ना हो...हमारा घर आ गया था. कॉलबेल बजी, आवाज आई...पापा आ गए...पता नहीं क्यों लगा कि पार्क वाली वाली वो लड़की भी शायद घर पहुंच गई होगी.


7/25/11

मिल गए डीके बोस..!



गाना उनका आफत इनकी. शीला...शीला की जवानी...सही कहा जवानी को ठीक से हैंडल ना किया जाए तो आफत हो जाती है. शीला क्या जवान हुई उन सब शीलाओं पर आफत आ गई जो जवानी की उम्र पा कर चुकी थी. एक्सपायरी डेट के बाद भी इतना असर होता है, यह पहली बार पता चला. वही हाल डीके बोस का है. बोस छोडि़ए, डीके वर्मा, डीके शर्मा और डीके सिंह, सब का बोसीकरण हो गया. अब नाम तो बदला जा नहीं सकता लेकिन डीके टाइप लोगों ने अपने घर से नेम प्लेट हटा दिए हैं. जिन्होंने नहीं हटाए हैं उन्हें खोज खोज कर दूसरे लोगों को बताया जा रहा है कि देखो यहां भी रहते है डीके बोस. किसी ने आसनसोल के डीके बोस के घर पर लगा नेम प्लेट की तस्वीर भेजी है सो आपसे भी शेयर कर रहा हूं.

6/4/11

ये डीके बोस कौन हैं


ये डीके बोस कौन हैं, क्यों भाग रहे हैं, उन्होंने कौन सा क्राइम किया है. भागना डीके बोस की मजबूरी है. नहीं भागेंगे तो ‘पप्पू साला’ बन जाएंगे जो डांस नही कर सकता. पीछे ना छूट जाए, इसके लिए वक्त के साथ भागते रहना डीके बोस की मजबूरी है. करीब दो दशक पहले एक फिल्म आई थी ‘कयामत से कयामत तक’. हीरो के तौर पर ये आमिर खान की पहली फिल्म थी. उसमें एक गाना बहुत हिट हुआ था..पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा, बेटा हमारा ऐसा काम करेगा..दो दशक बाद आमिर खान की एक और फिल्म आ रही है ‘डेल्ही बेली’. ये फिल्म आमिर खान की है लेकिन इसमें हीरो उनका भांजा इमरान है. दो डिकेड्स में यंगस्टर्स कितना बदल गए हैं. उनके एटीट्यू में कितना फर्क आ गया है- ‘पापा कहते हैं’ से ‘डैडी मुझे से बोला.. तू गल्ती है मेरी, तुझ पे जिंदगानी गिल्टी है मेरी, साबुन के शकल में बेटा तू तो निकला केवल झाग...भाग-भाग...डीके बोस-डीके बोस भाग..
वाह, क्या फाड़ू गाना है. ‘डीके बॉस’ अब ‘डीके बोस’ बन कर लौटे हैं. स्टाइल बदल गई लेकिन माने नहीं बदले हैं. नहीं सोचा था कि हॉस्टल के दिनों के डीके बॉस दो दशक बाद किसी हिन्दी फिल्म में डीके बोस बन कर धमाल मचा देंगे. ये डीके बोस और कोई नहीं आज के युवा हैं जो स्लैंग पर सवार हो फर्राटे भर रहे हैं. इनकी लिटरल मीनिंग पर मत जाइए, बस इसे बोलचाल की भाषा का स्पाइस समझ कर इंज्वाय कीजिए. अपने डीके बॉस यानी दुर्गेश कुमार ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके नाम का एब्रीविएशन एक दिन गदर काटेगा. समझ गए ना बॉस.
स्लैंग का जमाना है इसीलिए नाम जरा सोच समझ कर रखना चाहिए. याद है ना वो ऐड जिसमें हरी साडू जैसे फाड़ू बॉस के नाम का ऐसा एब्रीविएशन बताया गया कि उनकी हाथ में आ गई और वो भी हरीसाड़ू से ‘डीके बोस’ की कैटेगरी में आ गए. अब लिटरल मीनिंग मत पूछिए कि हाथ में क्या आती है. एम टीवी के रोडीज हों या उनके टकले बॉस रघु और राजीव, सब ऐसा स्लैंग यूज करते हैं कि सबकी बीप.. बीप.. करने लगती है. रिएलिटी शो में तो जज से लेकर कंटेस्टेंट तक सब एक-दूसरे की बजाते रहते हैं. वैसे आजकल इस बैंड, बाजा, बारात का ही शोर है. इसमें कोई रोडी है तो कोई डीके बॉस.
तो क्या नई जेनरेशन सटक या भटक गई है जो बेतहाशा भागी जा रही है? इस जेनरेशन को पता है कि अगर वो नहीं बजाएंगे तो उनकी बजा दी जाएगी. ‘डेल्ही बेली’ के गाने को देखने से भी लगता है. फिल्मों में, टीवी पर, सडक़ों पर आजकल यंगस्टर्स का यही लिंगो है और इस भाषा को बोलने वाले ये बच्चे बिगड़ैल नहीं हैं. ये है जेनरेशन नेक्स्ट, वेरी इंटेलीजेंट, प्रोफेशनल, फोकस्ड एंड दे मीन बिजनेस. उन्हें पता है कि कि टाइम टफ और करम्पटीशन कड़ा है. जमाने के साथ चलना है तो जमाने के नियम से चलो और उसी की भाषा बोलो. नैतिक-अनैतिक के पैरामीटर्स वक्त के साथ बदलते रहते हैं और अगर हम अपडेट नहीं हुए तो कोई भी पोपट बना कर आगे निकल जाएगा. लड़कियों को ही लीजिए. वो ‘बहन जी’ टाइप इमेज से बाहर आ चुकी हैं. ये टीन गल्र्स ज्यादा कांफिडेंट और प्रैक्टिकल हैं. आपसे से कुछ भी, किसी भी टॉपिक पर बिंदास बातें कर सकती हैं लेकिन आप उनको बेवकूफ नहीं बना सकते. जो बेवकूफ बनती हैं वो ही एमएमएस स्कैंडल या कि सी दूसरे इमोशनल अत्याचार का शिकार हो जाती हैं लेकिन लेकिन उनका परसेंटेज काफी कम है. यंग जेनरेशन होशियार है और उसमें एक डीके बोस भी बसता जो अपना काम निकालने के लिए किसी की भी वॉट लगा सकता है. अब तो गल्र्स भी इस मामले में लडक़ों से पीछे नहीं हैं. स्लैंग्स पर ब्वॉयज की मोनोपली नहीं रह गई है. गल्र्स भी अब ऐसी लैंग्वेज यूज करती हैं कि बड़ों-बड़ों की बीप..बीप..हो जाए. उनका फंडा बिल्कुल क्लियर है. बाईचांस एक दिन दो टींस के कनवरसेशन को इंटरसेप्ट किया... उनकी लिंगो कुछ ऐसी थी..
-Arre Ye DK Bose type hai..usase bhi khatarnak ..lekin kisi se poochna mat

-ahahahahahah... ¬
go to ...facemoods•com
-jara meri bhi knowledge badhe?
-are kya bataun it is bellow dignity..
-are wat is below nd above dignity?? its v who think so...
-¬ ¬

-ahahahahahahah....

समझने वाले समझ गए जो ना समझे वो अनाड़ी है.

5/7/11

चकर-चकर


दिनभर चकर-चकर करना, दोस्तों के साथ किसी भी सब्जेक्ट पर गपियाना, किसी मसले पर बेवजह टांग अड़ाना और किसी मुद्दे पर गंभीर बतियाना, सबकुछ ब्लॉगिंग के दायरे में आता है. जैसे कोई किसी अनजान शहर की सडक़ों पर यूं ही घूमने निकल जाए और वहां मिले कोई नई दुनिया, कुछ नए लोग. फिर उसमें कुछ से दोस्ती हो जाए. कुछ ऐसी ही है ब्लॉग की दुनिया. कभी बात का बतंगड़, कभी बात से निकले जज्बात और कभी कोरी बकवास. तो चलिए इस बार की जाए अपनी, उनकी, सबकी बातें. और बात कर रहीं हैं रश्मि रवीजा. जब उनके ब्लॉग का नाम ही ‘अपनी उनकी सबकी बात’ है तो अंदाजा हो गया होगा कि अंदर किस तरह का मसाला होगा. याद आता है कि स्कूल डेज में हम लोग कोई भी फिल्म देखकर आते थे, उसकी पूरी कहानी दोस्तों को सुनाते थे और अपनी बुद्धि के हिसाब से उसकी समीक्षा भी करते थे. रश्मि ने भी अपनी पोस्ट में एक नई चर्चित फिल्म आईएम की कहानी सुना कर उसकी समीक्षा की है. रश्मि सिनेमा देखते देखते पहुंच गई हैं क्रिकेट मैदान में. वल्र्ड कप के बाद क्रिकेट की हरारत अभी भी मौजूद है आई पीएल के रूप में. सो उन्होंने क्रिकेट प्रेमियों की नब्ज पर एक सधे हुए हकीम की तरह टटोली है, नाम है ‘गावस्कर की स्टेट ड्राइव का राज’.
ब्लॉगर ने जिस कुशलता से ब्यूटी कांटेस्ट को को क्रिकेट से जोड़ा है कि वैसा ही एक्साइटमेंट होता है जैसा क्रिकेट में छक्का पडऩे पर होता है. इसमें शुरुआत होती है मिस यूनविर्स ब्यूटी कांटेस्ट से. सुष्मिता सेन से कई साल पहले मधु सप्रे भी टॉप थ्री में पहुंची थीं. उनसे पूछा गया था कि अगर आपको एक दिन के लिए देश का मुखिया बना दिया जाए तो वो क्या करेंगी. उनका जवाब था, वो पूरे देश में खेल के अच्छे मैदान बनवा देंगी. मधु सप्रे मुंबई की थी और उस समय उनका ये उत्तर सुन कर गु्रस्सा आया था. लेकिन सुनील गावसकर की किताब ‘सनी डेज’ में उनके पंसंदीदा शॉट स्ट्रेट ड्राइव का राज जिस तरह से खोला गया है उससे लगता है कि मधु का उत्तर बिल्कुल रेलेवेंट था. एक और पोस्ट है ‘साथी ब्लागर्स के साथ गूजरे कुछ खुशनुमा पल’. ब्लॉगर्स जब फेस टू फेस मिलते हैं तब क्या होता है, उसका जिक्र है इस पोस्ट में वैसे तीन महिला ब्लॉगर्स के बीच सैंडविच हुआ एक पुरुष ब्लॉगर कैसा लगता है, ये देखना है तो क्लिक करें rashmiravija.blogspot.com और शामिल हो जाएं चकर-चकर में.

4/17/11

Donkey calling Murga



आज कल मोबाइल के बिना काम नहीं चलता. थोड़ी देर के लिए नेटवर्क गायब हुआ नहीं कि सब बेचैन हो जाते हैं. किसी की जरूरत है तो किसी को नशा है बात करने का. बात करनी है तो करनी है. नेटवर्क बिजी है या कनेक्टिविटी प्रॉब्लम, या कोई कॉल लेने की पोजीशन में नहीं है तब भी गधों की तरह कॉल किए जाएंगे...आर यू देयर ..आर यू देयर..?.. और दूसरे को मुर्गा बनने पर मजबूर करेंगे. ये रोल रिवर्स भी हो सकता है जो कभी मुर्गा बनता है वो मौका पडऩे पर गधा बन कर हिसाब चुकता कर देता है. इस फोटो को देखिए..इसे कहते हैं डॉन्की कॉलिंग मुर्गा.

3/9/11

Hats Off




वैसे तो आजकल लोग एक-दूसरे को टोपी पहनाने से नही चूकते. मौका मिला नही कि टोपी ट्रांसफर..फिर खुजाते रहिए सिर. लेकिन अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं जो टोपी ट्रांसफर करने में विश्वास नही रखते बल्कि अपनी टोपी उतार देते हैं. अभिषेक ओझा ऐसे ही शख्स हैं. बहुत दिनों तक हैट लगाए रहे...पता नहीं क्या समझ कर. अब हैट उतार दिया है..शायद माइनस टेम्परेचर उनका हैट नहीं झेल पा रहा था. पिछले संडे को मुंबई लौट आए हैं और अब फ्राई डे ghar जाएंगे. एक हफ्ते के लिए फिर दो दिन दिल्ली और 26 को बैक टू न्यूयार्क. ओझा की इस विजिट को लेकर तरह-तरह की बातें हैं. कोई कह रहा था कि सतुआ खा-खा कर बलिया का मनई अमेरिका की सर्दी नही झेल पा रहा है. कोई कह रहा है शादी तय होने जा रही है, लडक़ी देखने आ रहे हैं. कोई कह रहा था कि शादी तय है, करने आ रहे हैं. एक बार अपने स्टेटस में लिखा था कि कोई लडक़ी बोर हो रही हों तो बात करे. इस पर उनकी कई दोस्त पिनक गई थीं. वैसे अचानक अभिषेक अपने स्टेटस को बार बार बदल रहे हैं और फेसबुक पर अपने फेस को बदल बदल कर कुछ ज्यादा स्टाइल मार रहे हैं. कहीं कुछ पक जरूर रहा है नही तो सालों पुराने माडल का हैट लगाए घूमने वाला अचानक ‘कूल डूड’ हो गया है. कुछ पक जरूर रहा है. आपको भी अभिषेक के बारे में कुछ जानकारी हो तो बताइगा.

3/4/11

लॉयलटी टेस्ट

सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी...सच है दुनियावालों कि हम हैं आनाड़ी....आजकल दुनियादारों के बीच तो पता ही नहीं चलता कि कौन 'अनाड़ी' है और कौन 'खिलाड़ी'- जिसकी लॉयलटी पर शक किया जा रहा है वो या जो शक कर रहा है वो. सोसायटी में लॉयलटी का संकट आजकल कुछ ज्यादा ही है. रिश्तों पर शक, अपनोंंपर शक, प्यार पर शक और यार पर शक. पार्टनर बहुत प्यार उड़ेले तो शक, कटा-कटा रहे तो शक. तभी तो जिसे देखो वही अपने पार्टनर की लॉयलटी को लेकर सशंकित है. दरअसल ये संकट तो हमारा ही खड़ा किया हुआ है. किसी की जिन क्वॉलिटीज को देख हम फटाफट अट्रैक्ट हो जाते हैं, वो क्वालिटीज दूसरों का भी तो आकर्षित कर सकती हैं. अगर वो आपकी लॉयलटी टेस्ट में फेल हो जाता है तो उसका क्या कसूर. आप भी फेल तो हो सकते हैं. 'प्लांड' लायलटी टेस्ट में भला कौन पास हुआ है. हम चाहते हैं कि टेस्ट के पैरामीटर्स हमारे लिए अलग हों और साथी के लिए अलग हों. लड़का है तो उसे खूबसूरत स्मार्ट लड़की चाहिए और लड़की है तो उसका पार्टनर हैंडसम होना चाहिए. 'एक्स फैक्टर' उन्हें करीब लाता है. इसके बाद शुरू होती हैं 'कमिटेड', 'इन रिलेशनशिप' और 'लिव-इन' की स्टेज. कुछ, दिन कुछ महीने या कुछ कुछ साल रिश्ता ठीक ठाक चलता है. फिर वही 'एक्स फैक्टर' प्राब्लम खड़ी करने लगता है. अट्रैक्टशन अब इरिटेट करने लगता है. अचानक हम पज़ेसिव हो जाते हैं. अपने साथी पर कंडीशंस थोपने की कोशिश करने लगते हैं. अब उसका बनठन कर निकलना अखरने लगता है. हम उस पर शक करने लगते हैं. तब शुरू होता है इमोशनल अत्याचार का सिलसिला. क्या है ये इमोशनल अत्याचार?
एक-दूसरे के प्रति इमोशनल कम्पैटबिलटी या अटैचमेंट ना होते ही भी संबंधों को ढोना इमोशनल अत्याचार की कटैगिरी में आता है. किसी भी रिलेशनशिप की शुरुआत अक्सर फिजिकल अट्रैक्शन से होती है. लेकिन कोई रिश्ता तभी परवान चढ़ता है जब पार्टनर्स इमोशनली कम्पैटबल हों. क्योंकि समय बीतने के साथ धीरे-धीरे फिजिकल अट्रैक्शन की जगह इमोशनल अटैचमेंट लेने लगता है. इसमें फेल होने के बावजूद रिश्तों को निभाते जाना ही इमोशनल अत्याचार है. पार्टनर के प्रति मन में शक पैदा हो गया तो समझिए हो गई इस अत्याचार की शुरुआत. फिर लॉयलटी टेस्ट में पास-फेल का कोई मतलब नहीं रह जाता.
आजकल एक टीवी शो में ये टेस्ट बड़ा पॉपुलर है. इस टेस्ट में लड़के हों या लड़कियां, 99 परसेंट लोग फेल हो जाते हैं. सिविल सर्विसेज एग्जाम क्वालिफाई करना आसान है लेकिन लॉयलिटी टेस्ट...तौबा-तौबा. ऐसा इम्तहान जिसमें पास ना करने वाला तो पछताता है ही लेकिन पास होने वाले पर भी सवाल खड़े हो ही जाते हैं कि अरे, यंग एज में साधुओं जैसा व्यवहार, सब ठीक ठाक तो है? ये लॉयलटी टेस्ट एक सेट फारमेट और कंडीशन में किए जाते हैं. यू कहिए कि एक खास तरह की सिचुएशन क्रिएट की जाती है और उसमें 'सब्जेक्ट' को परखा जाता है. 'सब्जेक्ट' यंग होते हैं. अंडरकवर ऐजेंट के रूप में कोई अट्रैक्टिव गर्ल रंभा बन कर 'सब्जेक्ट' को रिझाती है या हैंडसम ब्वॉय 'कामदेव' बन कर सामने खड़ा जाता है. ऐसे में पास होने का संभावना न के बराबर रहती है. क्योंकि इस तरह के लायलटी टेस्ट में भी फिजिक्स और केमिस्ट्र के ही फर्मूले लागू होते हैं. यंगस्टर्स जिनमें हारमोनल चेंजेज उफान पर हों वो भला अपोजिट सेक्स के प्रति क्यों नहीं अट्रैकट होगा, खास कर फेवरेबल कंडीशंस में. ये कंडीशंस नेचुरल हों या क्रिएट की हुई, रिजलट तो सेम होगा. जैसे एच2एसओ4 यानी सल्फ्यूरिक एसिड के दरिया में कूद कर शीतल सरोवर का एहसास कैसे संभव है. इसी तरह अगर कोई टीनएजर इस टेस्ट में साधुओं जैसा व्यवहार करे तो लोग कहेंगे कि यार उसमें केमिल लोचा है. क्योंकि नार्मल केमिस्ट्री तो आपको अपोजिट सेक्स के प्रति अटै्रक्ट करेती है. पहली नजर में जो जैसा होता है अक्सर वो वैसा होता नहीं. इसके लिए कुछ महीने या साल नहीं कुछ दिन में ही असलियत सामने आ जाती है.
हाल ही में एक ऐसे साथी के साथ हफ्ते भर होटल रूम शेयर किया जिससे पहले कभी नहीं मिला था. उसको पहले दिन जैसा समझा था वो सातवें दिन तक कुछ और निकला. पहली मुलाकात में लगा कि वाह, ये तो ब्राडेंड चीजों को पसंद करने वाला एक स्मार्ट स्टायलिश युवा है. वो एक दो-दिन थोड़ा संकोच में था. फिर धीरे धीरे खुला. रात में वो रोज एमटीवी पर रोडीज जरूर देखता. मोटा नहीं था फिर भी रुक-रुक कर खर्राटे लगाता. मेरी नींद खुल जाती तो उसकी नाक में तकिए का कोना डालना पड़ता. पांच मिनट के लिए खर्राटे बे्रक होते तब तक मैं सो जाता. हालांकि उसने भी मेरे ऊपर खर्राटे का इल्जाम लगाया. ये इल्जाम और भी लोग लगा चुके हैं. मेरी नींद कुत्तों की तरह कच्ची है तभी तो कभी-कभी अपने ही खर्राटे से ही खुल जाती है.
बनारसी गंगा स्नान के शौकीन होते हैं लेकिन 7 दिन में उसे नहाने का उपक्रम करते नहीं देखा. वो काम तो बढिय़ा करता था लेकिन थकता जल्दी था. जब तक रूम पर रहता तो वो टीवी देखने में थक जाता और थोड़ी देर आराम करता. फिर नाश्ता करने में थकता और आराम करता, खाना खाने में थकता और आराम करता, थोड़ा आराम करने के बाद थक जाता तो फिर आराम करने लगता. ..उसे देख कर पहले दिन ऐसा नहीं लगा था.
सो इस लॉयलटी टेस्ट-वेस्ट से कुछ पता नहीं चलता. बस अपने पर भरोसा रखिए और इन लाइनों को याद रखें..
...साथ सफर में इतना ही सही,
मिल ही जाएंगे फिर हमसफर
तुम ना मिले कोई और सही.
(जैसा आई नेक्स्ट में लिखा )

2/16/11

‘आओ फिर से खेलें ..’



वैसे तो फरवरी पढ़ाई का महीना होता है. एग्जाम सिर पर होते हैं. लेकिन मौसम के लिहाज से फरवरी बोले तो फन. फरवरी में आता है बसन्त और बौर. इसी महीने वैलेन्टाइन्स डे भी पड़ता है. इस खुशनुमा मौसम में एक अजीब सी खुशबू रहती है कुछ-कुछ शरारती कुछ-कुछ संजीदा, कभी उमंग तो कभी उचाट सा रहता है मन. आइए बसन्त और बाबा वैलेंटाइन के मौसम में एक नए और नॉटी ब्लॉगर की
बहकी-बहकी बातों का मजा लें। इन नए ब्लॉगरों में अच्छी बात होती है कि ये अपनी बात बिना किसी लाग-लपेट के कहते हैं. इनकी पोस्ट कैम्पस की शरारतों का अहसास कराती हैं तो कभी चंद लाइनों में इतने गहरे अर्थ छिपे होते हैं कि विश्वास ही नहीं होता कि ये लोग जिंदगी और रिश्तों के बारे में इतनी संजीदगी से भी सोचते हैं. इनके ब्लॉग का नाम है नीम चढ़ा. करैला वाला नीम चढ़ा नहीं. जो ब्लॉगर ने अपना नाम बताने में नखरा करें उसे उन्हें नकचढ़ा ही तो कहेंगे. जनाब ने ब्लॉग में अपना नाम लिखा है एच2एसओ4. वैसे इनका असली नाम है गौरव आसरी और भाई साहब कुछ दिन पहले तक आरजे थे अब फिर से स्टूडेंट बन गए हैं. ब्लॉगरी में ये अभी नए हैं, चंद पोस्ट ही हैं इनके शो-रूम में. लेकिन हर पोस्ट का अलग ही फ्लेवर. एच2एसओ4 की कई पोस्ट तो सिर्फ चार लाइन की हैं लेकिन वो दूसरों की चालीस लाइनों पर भारी हैं.
ऐसी ही एक पोस्ट है ‘हॉर्न ओके टाटा प्लीज’. इसमें एक
फोटो और चार लाइन की फाइंडिग्स ने बड़े-बड़े सर्वे की वॉट
लगा दी है. कुछ यूं हैं ये लाइंस...‘एक हजार लड़कियों पर रिसर्च
करने के बाद मेरी आखें इस निष्कर्ष पर पहुंची हैं कि 90 प्रतिशत
लड़कियां सिर्फ पीछे से अच्छी लगती हैं. और उन 90 प्रतिशत में से भी
केवल 30 प्रतिशत ही उम्मीदों पर खरी उतरती हैं, यानी आगे से
अच्छी निकलती हैं...’
असके ठीक उलट एक पोस्ट है ‘आओ फिर से खेलें ’. छोटी सी इस पोस्ट में समुन्दर सी गहराई
है. कहानी अंग्रेज के साथ खेलते एक कुत्ते से शुरू होती है...‘ये मेरे इंस्टीट्यूट में पढ़ता है. नहीं कुत्ता नहीं, ये अंग्रेज. ये पालतू नहीं है. नहीं अंग्रेज नहीं कुत्ता. पर ये बड़ा मस्त कुत्ता है. इस फोटो में ये अंग्रेज के खेल रहा है. शायद इस लिए कि इसे बात करने के लिए भाषा की जरूरत नहीं पड़ती. अंग्रेज एक लकड़ी फेंक रहा था, कुत्ता उसे मुंह में उठा कर ला रहा था...इस कुत्ते के सामने आप जो भी फेंको ये तुरन्त उसे मुंह में उठा कर ले आता है. और आपके पास आकर जिद करेगा कि फिर से फेंको. ये आपके साथ खेलते रहना चाहता है. अगर आपका मूड नही है खेलने का तो ये बुरा नहीं मानता. चुपचाप चला जाता है. अगले दिन फिर ये आपसे उसी तरह प्यार से मिलेगा. ये आपकी नाराजगी या डांट याद नहीं रखता, प्यार याद रखता है। हम ऐसा नहीं कर पाते. किसी के मुंह से एक बार कुछ निकल जाए, तो उसे कभी नहीं भूलते ...उदास रहते हैं, दुखी भी रहते हैं, कभी उस से फिर से जाकर नहीं कह पाते, ‘आओ फिर से खेलें..’ कुछ समझ आया, नहीं? तो क्लिक करें neemchadha.blogspot.कॉम

1/10/11

ठंड में हुए छुहारा


हफ्ते दस दिन ठंड और रहेगी, झेल लीजिए. बिना वजह हल्ला मचा रखा है. हर साल ये होता है. चैनल वाले चीखे जा रहे हैं बर्फ दिखा-दिखा कर. कोई पांच साल, कोई 15 साल तो कोई 25 साल का हाड़तोड़ ठंड का रिकार्ड तोड़े डाल रहा है. ठंड में सब छुहारा हुए जा रहे हैं. क्रिसमस तक जब खास ठंड नही पड़ी तो लोग अधीर हुए जा रहे थे ठंड के बिना और जब ठंड पड़ रही है तो मरे जा रहे हैं पारा नापते-नापते. तुम्हारे यहां कितना, हमारे यहां इतना. ये देखो हमारा शहर शिमला से भी ठंडा और देखो पत्तों पर बर्फ जमी है. नहीं दिखी अरे छू के देखो. अरे चिल्लाने से ठंड कम तो होगी नहीं सो मजा लीजिए ठंडी का. गर्मियों में कितना भी अच्छा एसी हो, वैसी नींद नहीं आती जो छोटी सी कोठरी में अपनी रजाई में दुबक कर आती है. और एक-आध दिन नहाने से कल्टी मार जाने पर भी कोई पकड़ नहीं पाता कि पांडे जी ने आज कउआ स्नान नहीं किया है. बड़े बाबू तो कुर्ता-पजामा के ऊपर ही पैंट और जैकेट चढ़ा के आफिस चले आते हैं माजल है कोई भांप ले. ऐसी फेसेलिटी गर्मी या बरसात में मिलती है भला?
हाड़ कंपाने वाली पूस की रात कोई पहली बार तो आई नहीं है. पहले चैनल-वैनल तो थे नहीं और ना ही मौसम विभाग हर घंटे पारे का हिसाब रखता था. ब्लोअर और हीटर के बिना पूस की रातों में मड़ई या ओसारे में कौड़ा (आग) तापते लोग लंठों की तरह ठंड पर चर्चा जरूर करते थे लेकिन हल्ला नहीं मचाते थे. पूस की रात में दूर कहीं जब कानी कुकुरिया भूंकती तो हाड़ कंपाती सर्दी में मास्टर जी को मुंशी प्रेम चंद याद आने लगते और ओसारे में पड़ा बुधिया कौड़ा को पलका (भडक़ा) कर फिर गठरी बन जाता. ..और आप हैं कि जरा सी ठंड में छुहारे की इज्जत उतारने पर तुले हैं.

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