4/23/09

बुरे फंसे दूल्हे राजा


चुनाव में बुरे फंसे दूल्हे राजा। ना कार ना बाजा। खबरें तो कुछ ऐसी ही आ रही हैं. चुनाव वाले जहां कार देख रहे हैं, झट से छीन कर चुनाव ड्यूटी में लगा दे रहे हैं. और अक्षय तृतीया के चलते बैंड बाजे वालों की एक एक दिन में तीन-तीन पारियां बुक हैं. बड़ी मारा मारी है. पॉलिटिकल कैंडीडेट के चक्कर में शादी के कैंडीहडेट्स की वॉट लगी जा रही है. साइत ना निकले इस लिए कुछ तो करना ही है. सो कुछ ने नगाड़ा और पिपिहरी वाले कड़कड़उआ बाजा पार्टी बुक करा ली है. इस क्राइसिस में मुझे एक रेस्क्यू ऑपरेशन याद आ रहा है. मेरे घर नई स्कूटर लैंब्रेटा आई थी. मेरे गांव उपरौड़ा में कजिऩ की शादी थी. मेरा गांव इलाहाबाद से 35 किलोमीटर ही दूर था. बस दाब दी लैंब्रेटा. बराती तैयार, बाजा वाला तैयार लेकिन टैक्सी वाला गच्चा दे गया. समय निकला जा रहा था. दूसरी कार का प्रबंध नहीं हो पा रहा था. किसी ने कहा टेम्पो करो. लेकिन उसमें टाइम लगता सो लोगों की नजर मेरे नए स्कूटर पर पड़ी. तय हुआ दूल्हा इसी पर जाएगा. फिर क्या था मौर (मुकुट) और जोरा-जामा (पादरियों के गाउन की तरह लगने वाला वस्त्र) पहने दूल्हे राजा पिछली सीट पर विराज गए. झोरा-झामा के कारण दूल्हा लड़कियों की तरह एक ही तरफ पैर कर के बैठा था. आगे-आगे कड़कड़उआ बैंड उसके पीछे मेरी मंद गति से रेंगती स्कूटर पर सवार दूल्हे राजा. क्या नजारा था. पट्टीदार इस जुगाड़ से थोड़ा चिढ़े हुïए थे लेकिन उस समय गर्व से मेरा सीना चौड़ा हुआ जा रहा था. अब होता तो ये गाना याद आता...बाराती गारी देवैं, देवरजी स्कूटर खेवैं ससुराल गेंदा फूल...ओए होएं॥ होएं॥ओए होएं..होएं..

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