5/12/09

फुफ्फा फिर रिसिया गए




कहते हैं शराब जितनी पुरानी होती है उतना ही मजा देती. लोग कहते हैं स्कॉच जितनी पुरानी होती जाती है उसका महत्व उतना ही बढ़ता जाता है. शराब में जो दर्जा पुरानी स्कॉच का है, रिश्तेदारों में वही दर्जा जीजा का है. फर्क बस इतना है कि जीजा जब पुराने हो जाते हैं तो फुफ्फा (फूफा) बन जाते हैं. लेकिन इम्पार्टेंस की इंटेसिटी वैसी ही रहती है. यह जरा सी भी कम होती दिखती है तो फुफ्फा रिसिया कर (नाराज हो कर) उसे जता देते हैं. जैसे स्कॉच का सुरूर धीरे धीरे चढ़ता है वैसे ही फुफ्फा की नाराजगी भी हौले-हौले बनी रहती है लेकिन उतनी नहीं की वो बेकाबू हो जाए. शादी-बारात और घर का कोई भी बड़ा आयोजन जीजा या फूफा के बिना अधूरा होता है. और जिसमें फुफ्फा रिसियाएं ना वो शादी कैसी. जैसे अदरक जब पुरानी या सूख जाती है तो सोंठ कहलाती है. उसी तरह दामाद जब पुराना हो जाता है तो फूफा कहलाता है. फूफा यानी घर का पुराना दामाद. वैसे शादी-ब्याह में अब समाजवाद आ गया है. शादी में घराती और बाराती में बहुत अंतर नहीं रह गया है. वधू पक्ष के रिश्तेदार अब अपने को वर पक्ष के रिश्तेदारों से किसी माने में नीचा नहीं समझते. शहर की शादियों में बारात आने में जरा देर हुई नहीं कि लड़की पक्ष के गेस्ट भोजन पर टूट पड़ते हैं. बाद में दूल्हे के यार दोस्त दरवाजे पर कितना ही नागिन डांस करें और जयमाल में नखरे दिखाएं , उन्हें देखने के लिए मुïी भर लोग ही बचते हैं. बाकी सब भोजन भट्ट बुफे फील्ड में नजर आते. ऐसे में गले में गेंदा फूल की माला डाले जीजा और फूफा घूमा करें, कोई उन्हें नहीं सेटता. घराती उन्हें ठेल-ठेल कर आगे से कचौड़ी और पूड़ी उचक ले जाते हैं. बस फूफा नाराज. जीजा-फूफा घराती हों या बाराती, अगर किसी ने पानी नहीं पूछा तो नाराज, उनके ठहरने का अलग से प्रबंध नहीं किया तो नाराज, उनका ठीक से इंट्रोडक्शन नहीं कराया तो नाराज, ठीक से विदाई नहीं दी तो नाराज. और तो और फूफा खा म खा बिना बात के नाराज. कई पुरायठ फुफ्फा तो रंग में भंग के लिए पहचाने जाते हैं. शादियों में एक से एक लजीज पकवान बने हों लेकिन फूफा की हांड़ी अलग से चढ़ती है और जरा सी लापरवाही हुई नहीं कि फूफा का चूल्हा अशुद्ध. इसके लिए अलग से एक आदमी तैनात किया जाता है कि घर के लड़के-गदेले उधर ना जाएं जिधर फूफा की हांड़ी चढ़ी होती है. वह आदमी चिल्ला-चिल्ला कर आगाह करता रहता है कि उधर नहीं जाओ फुफा खाना पका रहे हैं. गलती से गुजरे नहीं कि फूफा रिसियाए. फूफा अक्सर रिसियाए हुए ही विदा होते हैं. यह नाराजगी अगले किसी शुभ आयोजन में ही मान-मौव्वल के बाद दूर हो पाती है. लेकिन उस नए आयोजन में फुफ्फा फिर से रिसिया जाते हैं. अरे.. अरे.. उधर कहां, फुफ्फा रिसिया जाएंगे?

5/11/09

लाइफ इज ब्यूटीफुल




एक छोटी सी बच्ची. उम्र करीब चार साल. सैलून में अपने बाल कटवा रही थी. साथ में शायद उसके दादा या नाना थे. जैसा कि बच्चों के साथ होता है वह बाल कटाते हुए कम्फर्टेबल नहीं थी. सिर झुकाए कस कर आंख बंद किए हुए. बीच बीच में दबी सी आवाज...अब बस हो गया, डर लग रहा है. मम्मी के पास जाना है. नाना उसे बीच-बीच में डपट रहे थे ...किस चीज से डर लग रहा है. चुपचाप बैठो नहीं तो यहीं छोड़ दूंगा. मैंने उसके डर को डायवर्ट करना चाहा.. अरे ये तो बहादुर बच्ची है. कितना स्टायलिश बाल कट रहे हैं. शीशे में देखना कितनी स्मार्ट दिख रही हो. उसके नाना जी बोल पड़े.. अंकल को नमस्ते करो और बताओ कि दिल्ली के किस स्कूल में पढ़ती हो. उसने आंख बंद किए किए नन्हे हाथों से नमस्ते किया .. थोड़ी तोतली आवाज में बोली... आरकेपुरम ब्लाइंड स्कूल फार चिल्ड्रेन. ..अच्छा बताओ बिल्ली कैसे बोलती है? ..मियाऊं.. और बच्ची धीरे से मुस्करा दी. मैंने ध्यान से उस बच्ची को देखा. उसकी आंखें बंद थीं. लेकिन उसकी मन की आंखों तो दूसरे बच्चों की तरह ही थीं. उनमें डर और संवेदना थी तो सपने भी थे, खुशियां थीं, उम्मीदें थीं. जिंदगी वहां भी मुस्करा रही थी, किसी दूसरे बच्चों की तरह. जाने के बाद बार्बर ने बताया कि इस बच्ची को बाबू जी ने अनाथालय से गोद लिया है और उसे दिल्ली के बोर्डिंग स्कूल में रख कर पढ़ा रहे हैं. उस छोटी सी बच्ची ने मेरे मन की आंखें खोल दी थीं. मन के आकाश पर छाई धुंध कुछ कम हो गई थी. मैं राजा-तुम रंक, मैं बड़ा-तुम छोटे, मैं ज्ञानी, तुम मूरख, मेरा-तेरा और भी न जाने कितनी मृग मारीचिकाओं में फंसे हम जिंदगी के छोटे-छोटे लेकिन खूबसूरत लमहों को क्यों नहीं देख पाते, नहीं महसूस कर पाते?

5/7/09

तिनका-तिनका, ज़रा-ज़रा






चिडिय़ा, गौरैया, परिंदे, फाख्ता, घोसले, इनकी कहानियां ब्लॉग्स में भरी पड़ीं हैं. ज्यादातर ब्लागरों के परिंदे कल्पना और संवेदना की उड़ान भरते दिखते हैं. आज आपको सुनाता हूं आंखों देखी एक सच्ची कहानी. पहली मंजिल पर मेरे कमरे की खिड़की से सटा हुआ एक आम का पेड़ है. खिड़की और पेड़ की शाखाओं में बस दो हाथ का फासला. उस पर ढेर सारे परिंदे रोज आते हैं. छोटी ललमुनिया, बुलबुल से लेकर बाज, कौवे और उल्लू तक. बात एक साल पहले की है. पेड़ुकी (फाख्ता) के एक जोड़े ने न जाने क्या सोच कर मेरी खिड़की से लगी डाल पर एक घोसला बनाया था एक-एक तिनका जोड़ कर बड़ी मेहनत से. उस डाल पर बैठ फाख्ता घंटों टेर लगाते रहते थे. लगता थे कि आपस में बातें कर रहे हों. उन्हें निहारने को रोज कुछ मिनट निकाल ही लेता था.
खिड़की में जाली थी इस लिए शायद फाख्ता को मुझसे डर नहीं लगता था. फिर एक दिन उसमें दो अंडे दिखे. मेरी रुचि थोड़ी बढ़ गई. फाख्ता बारी बारी से उस पर बैठते थे. फिर एक दिन घोसले से चीं-चीं की आवाज से पता लगा कि अंडों से बच्चे निकल आए हैं. दोनों फाख्ता बारी-बारी से बच्चों को चुगाते थे. बच्चे तेजी से बढऩे लगे और उनके साथ मेरी रुचि भी. अब उनके पंख निकल रहे थे. इस हैप्पी फेमिली को देख कर सारी थकान दूर हो जाती थी. रात को एक फाख्ता जो शायद उनकी मां थी, घोसले में जरूर रहती थी. एक दिन रात दस बजे के करीब कमरे में बैठा टीवी देख रहा था कि पत्तों की तेज खड़खड़ाहट और पंखों की फडफ़डा़हट ने चौंका दिया. कुछ अनिष्ट की आशंका से खिड़की के बाहर देखा तो अंधेरे में कुछ नजर नहीं आया. घोसले पर टार्च डाली तो दोनों बच्चे सहमें से दुबके थे लेकिन फाख्ता गायब थी. सुबह भी सिर्फ बच्चों को दख कर चिंता बढ़ गई. थोड़ी देर में फाख्ता दिखी लेकिन शायद वह बच्चों की मां नहीं पिता था. कुछ देर घोसले में बैठने के बाद उड़ गया. अगली रात भी घोसले में सिर्फ बच्चे ही दिखे. शायद किसी बाज या उल्लू ने उनकी मां को निवाला बना लिया था. अगली सुबह घोसले में सिर्फ एक बच्चा था और कोई फाख्ता नहीं. दो दिन बाद वह भी नहीं दिखा. घोसला सूना हो गया था. बचे थे सिर्फ तिनके. धीरे-धीरे कर कौवे और कबूतर उन तिनकों को ले गए अपना घोसला बनाने. इस तरह एक घोसला उजड़ता देख मन भारी हो गया. कुछ दिनों बाद एक सुबह उसी दरख्त की किसी डाल पर फाख्ता के एक जोड़े की टेर सुनाई दी. कहीं कोई परिन्दा फिर से घोसला बना रहा था. पास ही फोन के खंभे में लगे जंक्शन बाक्स में गौरैया दाना लेकर आ- जा रही थी अंदर उसके बच्चे शोर मचा रहे थे. वो सहर मुझे कुछ खास लगी, रात के बाद उम्मीदों की सुबह फिर अंगड़ाई ले रही थी.

5/5/09

सुअर सकते में, मुर्गे मस्त!


मुर्गे मस्त हैं. बटेर, बत्तख, टर्की और पूरे पक्षी समाज में हर्ष की लहर है. मुर्गा एसोसिएशन ने डिस्काउंट ऑफर तक दे दिया है. मुर्गों ने मुर्गियों से और ज्यादा अंडे प्रोड्यूस करने का अपील की है. दो अंडे के साथ एक अंडा फ्री देने का भी प्रस्ताव है. मुर्गे खुश हैं कि इस बार बर्ड फ्लू के कारण बेमतलब मुर्गा संहार नहीं होगा. लेकिन सुअर समाज सकते में है. साउथ ईस्ट एशिया में रेड एलर्ट जारी कर दिया गया है. ठंडे देश के स्वाइन से मेलजोल कम रखने की सलाह दी गई है. पूरी दुनिया इस समय अल कायदा और तालिबान से उतनी दहशत में नहीं है जितनी स्वाइन फ्लू से. बर्ड फ्लू तो पुरानी बात हो गई, लोग अब इससे चिंतित नहीं होते. हां मुर्गे-मुर्गियां जरूर टेंशन में आ जाते थे. मुर्गे की जान जाती और लोगों को खाने में मजा भी नहीं आता. लेकिन 1918 के बाद अब आया है नया फ्लू. मामला स्वाइन फ्लू का है. कुछ लोगों को नहीं पता था कि यह स्वाइन क्या बला है. उन्हें लगता था कि यह स्वाइन कोई बहुत डरावना जीव होता होगा लेकिन जब पता चला कि गली - मोहल्ले में टहलने वाले सुअर को ही स्वाइन कहते हैं तो टेंशन थोड़ा कम हुआ. लेकिन स्वाइन शब्द से सुअरों को कम, कुछ पशु प्रेमियों को ऑब्जेक्शन ज्यादा है. सो सुअर फ्लू की जगह एच1एन1 वायरस ही चलेगा. डब्लूएचओ ने स्वाइन लू को लेकर लेवल-5 के खतरे का साइरन बजा दिया है. इसके बाद तो महामारी का ही ऐलान होगा. जहां तक इंडियन स्वाइन की बात है वे सकते में हैं. स्वाइन समाज ने लोगों से सलामी और सॉसेजेज से परहेज करने की अपील की है. स्वाइन फैमिलीज ने गर्मियों में हिल स्टेशन जाने का इरादा टाल दिया है. बताया गया है कि ठंडे क्षेत्र में एच1एन1 वायरस आसानी से फैलता है. हांलाकि अभी तक कहीं से स्वाइन समाज के सामूहिक संहार की खबर नही आई है. लेकिन अगर स्थिति काबू में नहीं आई तो बड़ी संख्या में सुअरों को भी शहीद होना पड़ सकता है. इंडियन सुअर यूनियन यूरोपीय, मैक्सिकन और अमेरिकी सुअर भइयों के लिए प्रार्थना सभाएं आयोजित कर रही है क्योंकि उनकी सुरक्षा में ही इनकी सुरक्षा है. जान है तो जहान है.

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