1/3/10

सुना है उस चौखट पर अब शाम रहा करती है ...




मुझे पता नही क्यों एक गाना याद आ रहा है- चुन-चुन करती आई चिडिय़ा, दाल का दाना लाई चिडिय़ा, मोर भी आया कौआ भी आया...ये गाना तो बहुत पुराना है. लेकिन ऐसा ही गाना तो आजकल भी गाया जा रहा है. हां, सुर और स्वर थोड़ा बदले हुए हैं. आजकल चुन-चुन करनेवाली चिडिय़ा से कही ज्यादा पॉपुलर है ट्वीट-ट्वीट करने वाली चिडिय़ा और इसका नाम है ट्विटर. बात चाहे खास की हो या आम की, ट्विटर बोलती जरूर है. कभी कभी तो ट्वीट-ट्वीट के बाद कांव-कांव शुरू हो जाती है. शशि थरूर, चेतन भगत, आमिर खान, अमिताभ बच्चन और ऐसे ही दूसरे सेलेब्रिटी की ट्वीट्स, स्क्रैप्स और ब्लॉग्स पर बीच-बीच में हंगामा खड़ा हो जाता है. लेकिन सोशल कम्युनिटी साइट्स पर इन सब के अलावा भी ढेेर सारे ऐसे लोग भी हैं जो सेलेब्रिटी तो नहीं हैं लेकिन आपके अपने हैं, अजीज हैं. कोई आपकी सामने वाली लेन या कालोनी रहता है, कोई दूसरे शहर में, कोई विदेश में और कोई पता नहीं कहां रहता है लेकिन है आपका दोस्त.
कुछ ऐसे दोस्त या जाने-पहचाने चेहरे होते हैं जिनको रोज हैलो कहने, देखकर मुस्कराने और यूं ही गपियाने की आदत पड़ चुकी होती है. इसमें होता है आपका पुराना क्लासफेलो जो दूसरे शहर में रहता है, अपका कोई कलीग जो अब दूसरे आर्गेनाइजेशन में काम करता है या कोई पुराना साथी जो कई वर्षों बाद अचानक आपको खोज निकालता है. ऑरकुट और फेसबुक पर अचानक उसका चेहरा प्रकट हो जाता है और ट्विटर पर उसकी ट्वीट सुनाई पडऩे लगती है. अपको रोज कुछ ना कुछ भेजता है. कम्प्यूटर खोलते ही आपके काम के बीच अचानक आ टपकता है. चैटिंग करता है कभी शरारत तो कभी संजीदगी से कि यार मेरा ब्लॉग देखो, मेरा प्यार देखो, ये देखो वो देखो, कुछ याद आया. कभी कोई प्यारा सा कमेंट तो कभी मैसेज यूं ही आ टपकता है. चैटिंग और ब्लॉगिंग करते हुए हमें उनकी आदत पड़ चुकी होती है. कब वो हमारी जिंदगी के एक जरूरी हिस्सा बन जाते हैं, हमें पता ही नहीं चलता.
लेकिन कभी सोचा है कि ब्लॉग्स, ऑरकुट, ट्विटर, फेसबुक जैसे तानेबाने से अचानक कोई चला जाए तो कैसा लगता है. हम, आप, कोई भी हो सकता है. तब उनके ब्लॉग्स को कौन आगे बढ़ाएगा, कौन ट्वीट करेगा.
सोशल कम्युनिटीज में कितने लोग हैं जो अपना पासवर्ड शेयर करते हैं? यहां तक कि उनके अपनों को भी नहीं पता होता. नेट पर तो हम बहुत सोशलाइज्ड दिखते हैं लेकिन पासवर्ड के मामले में बहुत पजेसिव.
सब कुछ ठीक चलता रहता है. तभी अचानक किसी के ब्लॉग पर नई पोस्ट् आना बंद हो जाती हैं, ऑरकुट पर स्क्रैप रुक जाते हैं, मिलने की प्रॉमिस धरी रह जाती है, बहस बंद हो जाती हैं, लोग उसके ब्लॉग पर बार-बार आते हैं, बार-बार मायूस होते हैं. नो चैटिंग, नो ब्लॉगिंग, नो हैलो...ट्विटर फुर्र से उड़ जाती है. क्लिक्स धीरे-धीरे कम होते होते खत्म हो जाते हैं. पता चलता है कि नेट का कोई नॉटी अब नहीं रहा या कोई हादसा किसी ब्लॉगर को ले गया. तब याद आने लगती हैं ये लाइनें...छोड़ आए हम वो गलियां... जहां तेरी एड़ी से धूप उड़ा करती थी सुना है उस चौखट पर अब शाम रहा करती है ...
उसके ब्लॉग और बातें कुछ दिन तक याद आते हैं फिर धीरे धीरे सब भूल जाते हैं. जैसे साथ चलते चलते कोई यूं ही खो जाए. सुबह दोपहर शाम, रात चौबीस घंटे जिससे बात होती हो वो अचानक चुप हो जाए, बिना किसी गिले शिकवे, किसी अपेक्षा के चुपके से निकल जाए. उस गली में, उस रास्ते पर दोस्तों का जाना धीरे-धीरे कम हो जाए और फिर वो रास्ता ही गुम हो जाए. कैसे जीवंत सा लगने वाला वाला स्क्रैप बोर्ड अचानक इतिहास का एक दस्तावेज बन जाता है और आर्काइव्ज में रह जातीं कुछ यादें कुछ बातें, कुछ सवाल अनसुलझे, अनुत्तरित.
हाल ही में कुछ ऐसे ही जाने पहचाने चेहरे और नाम अचानक गुम हो गए तो नॉस्टेल्जिक हो गया. इस बारे में तो सोचा ही नहीं था. लेकिन वो सच था तो ये भी सच है कि जब हम सोशल कम्युनिटीज पर हैपी मोमेंट्स शेयर कर सकते हैं तो पासवर्ड भी शेयर करें, कम से कम उससे जो आपके सबसे करीब हो, सबसे अजीज हो. ताकि उस चौखट पर शाम को कोई चिराग टिमटिता रहे कोई बार-बार याद आता रहे.

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