3/16/13

इस रात की सुबह नहीं...



बात इसी सर्दी के दिनों की है जब रात का पारा जीरो के नीचे चला गया था. रजाई भी उस रात बहुत कारगर नहीं था. ठंड ने कई बार जगाया. सिहरन भरी रात उसकी याद बार-बार डरा रही थी. उस फेरी वाले की काया आंखों के सामने घूम गई.. क्या वो मर जाएगा, क्या इस ठंड का झेल पाएगा? वो रोज ही तो मिलता था प्राइमरी स्कूल की दीवार के सहारे फुटपाथ पर कूबड़ निकाले बैठा हुआ. मैला पजामा, फटा कोट और उस पर हिलता हुआ उसका सिर. दीवार से टिकी लाठी, पेप्सी की बोतल में पानी और बगल में रखी चप्पल. पर फटपाथ पर दुकान बड़े करीने से लगाता था वो. अखबार बिछा उस पर संभाल कर रखता था पान मसाला की चार-पांच लडिय़ां. सुबह करीब दस बजे से शाम चार बजे तक वो वहीं बैठता था. कभी कभार मसाला खरीदता कोई ग्राहक भी दिख जाता था वहां. कभी-कभी उसकी दुकान नहीं दिखती. कभी दुकान तो दिखती लेकिन वो नहीं दिखता. लेकिन नजर दौड़ाने पर दिख भी जाता, कभी थोड़ी दूर पर पेशाब करते या चाय पीते हुए.
    ...तो जीरो डिग्री वाली रात की अगली सुबह वो नहीं था उस जगह. लगा कि ठंड में हो गया उसका काम तमाम. इधर-उधर नजर दौड़ाई तो रोड की दूसरी साइड बैठा मिल गया. वहां धूप पहले आती थी शायद इस लिए वहां बैठा था. उसकी दुकान के सामने उस दिन मेरे कदम ठिठक गए थे. मैंने दस का नोट बढ़ाया...वो पूछ रहा था...कौन सा दें बाबूजी.. मैं मसाला नही खाता..उसके हिलते चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी.. रोज कितना कमा लेते हो?.. दो-चार पैसे मिल जाते हैं...लो चाय पी लेना..उसने नोट लेकर सिर पर लगाया और उसी तरह सिर झुका कर बैठ गया. चेहरे पर कोई खुशी न गम. मैं भी आगे बढ़ गया. मैंने उसे दस रुपए दिए थे लेकिन वो तो रोज मुझे कुछ ना कुछ देता था...जूझते रहने, कभी लडऩे और कभी हार ना मानने की प्रेरणा. सुबह उसे देखते ही निराशा के सारे बादल छंट जाते थे. उसे जूझते देख ऑफिस में हर दिन एक नई शुरुआत होती थी. लेकिन अब मेरे ऑफिस का रास्ता बदल गया है इस लिए वो नहीं दिखता. शायद अब भी वो वहीं बैठा होगा हिलते हुए सिर को संभालने के लिए जूझता हुआ, पर न जाने क्यूं लगता है कि उसकी जिंदगी तो एक सिहरन भरी रात है जिसकी सुबह नहीं.

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