10/30/09

अब कहां जाएगी पिंकी!!


स्टार बनना किसे अच्छा नहीं लगता. यंगस्टर्स का सपना होता है सेलिब्रिटी बनने का. पैरेंट्स भी तो चाहते हैं उनके बच्चे नाम रौशन करें पूरी दुनिया में. सपनों को साकार होते देखना अच्छा लगता. टीवी-फिल्म एक्टर, राइटर, डाइरेक्टर, स्कॉलर, क्रिकेटर, दूसरे प्लेयर, छोटे-बड़े सबको सेलिब्रिटी स्टेटस लुभाता है. रियलिटी शो की अफशां-धैर्य, सिंगिंग का लिटिल सरप्राइज हेमंत, कॉमेडी की बच्ची सलोनी या फिर विजकिड युगरत्ना ऑफ यूएन फेम. इन सब की चमक देख याद आने लगती है राइम-ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार हाउ आई वंडर व्हॉट यू आर...
लेकिन फिर 'स्टारडम' की डुगडुगी इस तरह बजते देख डर लगता है. जिसे देखो वही डुगडुगी लेकर इस खेल में भागीदार बनना चाहता है. इस खेल में पिंकी (स्माइल पिंकी फेम) कभी इस शहर में स्माइल करती है, कभी उस शहर में, कभी यहां सम्मान, कभी वहां एडमिशन. और अचानक स्माइलिंग पिंकी सहमी-सहमी लगने लगती है. सुना है वो एक महीने से स्कूल नहीं जा रही. पिंकी अपने गांव में विकास कार्यों की सिफारिश लेकर विंध्याचल मंडलायुक्त कार्यालय के चक्कर लगा रही है. इसी तरह सारेगामापा के टॉप फाइव के राउंड में तो लखनऊ की प्रतीक्षा जम कर गाती है लेकिन मीडिया के लौट कर मीडिया के सामने रोने लगती है. इन लिटिल वंडर्स पर इतना दबाव कौन डाल रहा है. वे खुद कतई दोषी नहीं हैं. युगरत्ना की विजडम और इंटेलिजेंस पर उसके पैरेंट्स और स्कूल को ही नहीं पूरे देश को गर्व है. धन्य हैं ये बच्चे लेकिन इनके स्टारडम को कहीं हम ओवर यूज तो नहीं कर रहे. कहीं इनकी एनर्जी समय से पहले तो निचोड़ नहीं नहीं ले रहे. ये स्टार्स किसी भी शहर के हों, इनके शेड्यूल पर नजर डालिए. आज इस फंक्शन में तो कल दूसरे फंक्शन में. आज यहां उद्घाटन तो कल वहां दीप जलाना. शहर के बडे प्रोग्राम या गैदरिंग में इन स्टार्स का पार्टिसिपेशन जरूरी समझा जाता है. इनकार कर नहीं सकते क्योंकि ऑनर में दिए जा रहे इनविटेशन को ठुकराने पर 'स्नॉब' समझे जाने का खतरा है. लेकिन इन्हें बार-बार किसी मंच पर खड़ा होने को मजबूर कर, क्या हम इनका सही मायने में सम्मान कर रहे हैं? जो समय पढ़ाई का होना चाहिए, उस समय को सेमिनार और भाषण में खर्च कर हम इनके विकास के सहज मार्ग में बाधएं तो नहीं खड़ी कर रहे?

10/19/09

'तंदुरुस्ती गुरू'


प्रेमचंद को बहुत नहीं पढ़ा लेकिन जितना भी पढ़ा है मन लगा के. बचपन से अब तक कहीं किसी रोज किसी मेड़ पर, किसी मोड़ पर, अनायास कोई मिल जाता है तो प्रेमचंद का कोई पात्र या बचपन में सुनी कहानी का कोई किरदार याद आने लगता है. ऐसे ही एक कैरेक्टर थे मेरे दादाजी के बड़े भाई. उनका असली नाम था पं. आदित्य प्रसाद ओझा लेकिन निक नेम कई थे. इसमें से एक नाम था 'तंदुरुस्ती गुरू'.
किसी गांव-कस्बे में त्योहारों पर मेला-खेला देखता हूं तो बचपन के कहानी - किस्से याद आने लगते हैं. कहानियां जो कभी दादाजी ने सुनाई थी, कहानी जो पिता जी सुनाते थे. पढ़ाई के लिए वो अक्सर अपने बचपन और मेरे दादाजी के बचपन की कहानियां सुनाया करते थे कि कैसे अत्यंत गरीबी में विद्या के बल पर परिवार आगे बढ़ा और विद्या ही परिवार की पूंजी है. इस प्रसंग में तंदुरुस्ती गुरू के उदाहरण बार बार आते थे. कभी दरियादिल के रूप में, कभी जीवट वाले यंगमैन के रूप में, कभी मेहनतकश तो कभी गरीबी से जूझते इंसान के रूप में.
तंदुरुस्ती गुरू मजबूत कद-काठी वाले साढ़े छह फुट के इंसान थे. उनके माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे शायद प्लेग से. सो ज्यादा पढ़ नहीं सके. लेकिन वर्जिश खूब करते थे. मेहनती इतने कि दिन भर हल चलाते रहें. सुना एक बार बैल अचानक मर गया, दूसरे के लिए पैसे नहीं थे सो उसकी जगह खुद बैल के साथ हल में जुत गए थे 'मदर इंडिया' स्टाइल में. जाहिर है कि इतनी मेहनत करने वाला खाना तो ज्यादा खाएगा ही. उनके भोजन भट्ट होने की ख्याति आसपास के गांवों में भी थी. दादा जी के तीनों भाइयों के बीच थोड़ा बहुत जो खेत था उसका बंटवारा नही हुआ था लेकिन एक एमओयू के तहत चूल्हे अलग अलग थे. तंदुरुस्ती गुरू सबसे तंगी में थे. बजरी (बाजरे) का भात पर गुजारा करना पड़ता था. कभी तो दाल छौंकने के लिए लिए भी घी नहीं होता था. ऐसे ही एक बार सादी दाल परोसे जाने पर तंदुरुस्ती गुरू भड़क गए. बताया गया कि घी नहीं है. तुनक के बोले मैं सिखता हूं बिना घी के तड़का लगाना. उन्होंने खाली कल्छी ली आग में तपाया और देगची में छोंओं....लग गया तड़का. न्योता-दावत में ओझा फैमिली को वे ही रिप्रेजेंट करते थे. दस-दस कोस पैदल चले जाते थे न्योता खाने. लोटा, लाठी और साफा उनकी ड्रेस थी. न्योता में इतना खा लेते की दो-तीने दिन वहां से हिलने की हालत में नहीं होते थे. वहीं टिके रहते स्थिति सामान्य होने तक. अच्छे बैल रखने का उन्हें शौक था. कोई बड़ा मेला लगे तो नया बैल जरूर लाते थे. एक- दो महीने बर्धा (बैल)की खूब सेवा होती. लेकिन छह महीने बीतते न बीतते वह बैल घोर उपेक्षा का शिकार हो जाता और खाए बिना मरने लगता. नौबत ये आ जाती कि उसी बैल को दो आदमियों की मदद से पूंछ पकड़़ कर बमुश्किल खड़ा किया जाता. मर जाता तो फिर नए बैल के साथ वही प्रक्रिया दोहराई जाती. मेरे गांव के पास सिरसा बाजार है. दादाजी ने कभी बताया था कि दीपावली के पास एकबार मेला लगा था. पंजाब से सर्कस कंपनी आई थी. वहां डुगडुगी पीटी जा रही थी कि उनके पहलवान को जो पंजा लड़ाने में हरा देगा उसे दो रुपए ईनाम. इंट्री फीस एक आना थी. तंदुरुस्ती गुरू ने दादाजी से एकन्नी उधार ली और उतर गए पंजा लड़ाने. वो पहलवान भी साढ़े छह फुटा था गोरा चिट्टा, इधर तंदुरुस्ती गुरू का काम्प्लेक्सन डार्क टैन. यू समझिए एक तरफ देसी मुर्गा दूसरी तरफ ब्रॉयलर. तंदुरुस्ती गुरू की सख्त चीमड़ फौलादी उंगलियों ने सर्कस के पहलवान का पंजा जकड़ कर जो मसला तो उसकी दो उंगलियों में फ्रैक्चर हो गया. तंदुरुस्ती गुरू दो रुपए जीत गए. उस पैसे से उन्होंने सबके लिए कुछ ना कुछ खरीदा. लेकिन एक हादसे के बाद तंदुरुस्ती गुरू बीमार रहने लगे. हुआ ये कि एक बार मिर्जापुर से मेजारोड के लिए दिल्ली एक्सप्रेस में बैठ गए. उस समय दिल्ली एक्सप्रेस का मेजारोड स्टापेज नही था. मेजारोड आया तो ट्रेन की रफ्तार थोड़ी धीमी हुई. जब उन्हें लगा कि ट्रेन नही रुकेगी तो छलांग लगी दी प्लेटफार्म पर. ज्यादा चोट तो नहीं आई लेकिन उसके बाद से उन्हें हार्निया हो गया. उसके बाद उनाक स्वास्थ्य पहले जैसा कभी नहीं रहा. यह खुश दिल इंसान पूरी जिंदगी आभावों से जूझता लेकिन वह जैसा भी था जिंदादिल था, सरल था. अब उनके बेटे और ग्रैंडसन बड़े बड़े पदों पर देश-विदेश में हैं. गांव में उनके ग्रैंड सन ने बड़ा सा पक्का मकान बनवा लिया है लेकिन उस माटी से बजरी के भात और बिना घी की दाल की खुशबू आभी भी आती है. लगता है गंगा किनारे कछार में साफा बांधे कोई अभी भी हल चला रहा है गुनगुना रहा है..गंगा बहे, बहे रे धारा..तुझको चलना होगा.. तुझको चलना होगा...

10/8/09

बारिश, बादल और सूंस



अक्टूबर के पहले हफ्ते में कई ऐसी चीजें हुई जो अलग-अलग होते हुए एक-दूसरे से जुड़ी हुईं हैं. पूरे देश में वन्य जीव सप्ताह मनाया गया. पिछले संडे शरद पूर्णिमा थी और 7 अक्टूबर को करवाचौथ था. ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में आकाश से अमृत बरसता है. इस लिए रात को छत पर खुले आसमान के नीचे खीर रखने की परम्परा है. सुबह उस अमृत युक्त खीर को लोग ग्रहण करते हैं. अब कम ही लोग ऐसा करते हैं क्योंकि आसमान पॉल्युशन से भरा होता है. करवाचौथ पर महिलाएं चांद देख कर व्रत तोड़ती हैं लेकिन अब पक्का नहीं कि 7 अक्टूगर को कहां-कहां आसमान साफ था. हो सकता है कि आकाश बादलों से ढंका हो. शरद पूर्णिमा के आसपास तो आसमान साफ और शीतल होता था. इस बार सब उल्टा-पुल्टा हो रहा है. बारिश के मौसम में सूखे की नौबत थी और अब शरद ऋतु में झमाझम पानी. इसी बीच एक और खबर आई कि सरकार ने गंगा की डालफिन को नेशनल एक्वाटिक एनिमल घोषित कर दिया है. ऐसा विलुप्त होती डालफिन को बचाने के लिए किया गया है. कभी पूरी गंगा डॉलफिंस से भरी रहती थी, कहा जा रहा है कि अब यहां मुश्किल से दो सौ ही बची हैं. बादलों में शरद ऋतु का चांद, बेमौसम बारिश और गायब होती डॉलफिंस, ये सब पर्यावरण में बदलाव के खतरनाक संकेत हैं. बचपन में अपने गांव में गंगा किनारे मुश्किल से आधा घंटा खड़े रहने पर पानी में गोता लगाती सूंस(डॉलफिन) दिख जाती थीं लेकिन अब नहीं दिखतीं. गंगा की डॉलफिन समुद्र्र में नहीं रह सकती और गंगा का पानी हमने इनके रहने लायक नहीं छोड़ा. बाघ और मोर के बाद गंगा की डॉलफिन को नेशनल एक्वाटिक एनिमल का दर्जा मिलना गर्व की बात तब होगी जब इनके वजूद को बनाए रखने में हम कामयाब होंगे. डॉलफिन के बहाने हमें पर्यावरण के खतरों को समझना होगा. वरना कहीं डॉलफिंस हमेशा के लिए ना चली जाएं.

10/2/09

गांधी बोले तो मुन्नाभाई वाले बापू!



साल में एक बार फिर याद आए बापू. अब आप इसे मजबूरी का नाम महात्मा गांधी कहें या कुछ और. अखबार के दफ्तर में ढेर सारे प्रेस नोट आए गांधी जयंती को लेकर. लगा कल कुछ और नहीं होगा सिर्फ गांधी जयंती मनाई जाएगी. पूर्व संध्या पर हमने भी शहर का चक्कर लगाया कि पता करें लोग गांधी जी के बारे में क्या सोचते हैं. कुछ को गांधी जी का पूरा नाम याद नही था. कुछ के लिए गांधी जयंती का मतलब था छु्ट्टी, गांधी का मतलब था मुन्नभाई वाले बापू और गांधीगिरी, गांधी का मतलब था फेशन लेकिन थोड़ा डिफरेंट. गांधी उनके हीरो थे लेकिन अलग कारणों से. गांधी साहित्य कम ही लोग पढ़ते हैं लेकिन माई एक्सपेरिमेंट विद ट्रुथ लोग इस लिए पढऩा चाहते हैं क्योंकि यह बेस्ट सेलर है. अब यहां 'बेस्टसेलर' की बहस में नही पडऩा चाहता. बेस्ट सेलर तो जसवंत सिंह की जिन्ना भी है. आज गांधियन थॉट नहीं, गांधी का नाम बिकता है अब यह चाहे टी-शर्ट पर हो या फिल्मों में. आज गांधी जयंती के दिन दोपहर शहर में संडे जैसा सन्नाटा है. लोग हफ्ते में दूसरी बार संडे मना रहे हैं गांधी की बदौलत. हो सकता है शहर के कुछ सभागारों में मुट्ठीभर लोग गांधी पर चर्चा कर रहे हों, हो सकता है कुछ लोगों ने सुबह गांधी की प्रतिमा पर फूल चढ़ाए हों, हो सकता है शाम को कुछ लोग उनकी प्रतिमा पर कैंडल भी जलाएं लेकिन ये भी सच है कि आज शाम मॉल्स में भीड़ कुछ ज्यादा होगी, रेस्त्रां में लोग कुछ स्पेशल खाएंगे और ये भी सच है कि आज मैं देर से उठा क्योंकि आज छुट्टी है, क्योंकि आज गांधी जयंती है.

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