7/15/09

ब्लैकबेरी



वो जमाने लद गए जब मोबाइल रखना प्रेस्टिजियस माना जाता था. हां, महंगे मोबाइल अब भी शान समझे जाते हैं जैसे ब्लैकबेरी. हमारा एक साथी रिपोर्टर अचानक कहीं से एक ब्लैकबेरी ले आया है. उसके हाथ में ब्लैकबेरी किसी ब्रेकिंग न्यूज से कम नहीं. ले आया इस लिए कि इस पर विवाद है कि ये फोन उसे कहां से मिला. आप कुछ और समझें इसके पहले बताता चलूं कि वह अल्लाह से डरने वाला एक मेहनतकश रिपोर्टर है. जहां ना पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि की स्टाइल में काम करता है. आइडियाज इतने इनोवेटिव कि बाकी रिपोर्टर दांतों तले उंगली दबा लें लेकिन कभी कभी इनोवेशन के चक्कर में सीनियर्स की डांट भी खा जाता है. फिलहाल उसके ब्लैकबेरी को लेकर जितने मुहं उतनी बातें. किसी ने कहा, अबे किसी ने गिफ्ट किया होगा, उस जैसा सूम और इतना महंगा मोबाइल. दूसरा बोला, महंगा मोबाइल लेने से चिरकुटई थोड़े ही कम हो जाएगी, अभी भी ब्लैकबेरी से मिसकॉल मारता है. तीसरा बोला, सेकेंडहैंड लिया होगा. चौथे ने ध्यान से उसेे उलटा पलटा, ये तो डुप्लीकेट है-चाइनीज. और बेचारा ब्लैकबेरी, अपनी किस्मत को कोस रहा है कि कहां फंस गया डाउन मार्केट लोगों के बीच. तीन दिनों में उसे इतने हाथों ने नचाया कि उसकी हालत वैसी हो गई जैसे रजिया फंस गई हो गुंडों में. कोई उसके फीचर्स परख रहा है कोई नेट सर्फिंग और एसएमएस भेजने के जुगाड़ देख रहा है. और रिपोर्टर साहब हैं कि कमर में ब्लैकबेरी रिवाल्वर की तरह खोंसे टेढ़े टेढ़े घूम रहे हैं. जेब में नही रखते. पूरी कोशिश है कि ये फोन ज्यादा से ज्यादा लोगों की नजरों में आए. किसी बड़े अधिकारी से मिलने जाता है तो बहाने से सेलफोन सामने टेबुल पर जरूर रख देता है. हद तो तब हो गई जब खादी आश्रम में 75 साल के वृद्ध भैया जी के सामने भी उसने तीन बार ब्लैकबेरी घुमाया. भैया जी को देख कर नहीं लग रहा था कि उन्होंने कभी साधारण मोबाइल भी प्रयोग किया होगा. रिपोर्टर साथियों में चर्चा है कि ब्लैकबेरी पाकर वो बौरा गया है. कॉल आती है तो हैलो भी स्टाइल से बोलता है. किसी ने बता दिया है कि इस फोन में आवाज छन छन कर आती है. सो बात करने वाले से पूछना नहीं भूलता कि बताओ मेरी आवाज कैसी आ रही है, बिल्कुल साफ छन कर आ रही है कि नहीं? दरअसल मैं ब्लैकबेरी से बात कर रहा हूं. आपके पास उसका फोन आए तो कुछ पूछने से पहले ही कह दीजिए कि यार तुम्हारी आवाज छन छन कर आ रही है. उसका नंबर है 09450874346.

7/12/09

व्हाट ऐन आइडिया सर जी!



पॉपुलेशन कंट्रोल के लिए बिजली जरूरी है. बिल्कुल सही बात है. बिजली मतलब विकास, विकास मतलब बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य यानी बेहतर जीवन स्तर और बेहतर जीवन स्तर से आबादी अपने आप काबू में आने लगती है. ये तथ्य प्रमाणित है. लेकिन गांव-देहात में आबादी पर काबू पाने के लिए बिजली की एक और भूमिका पर तो ध्यान ही नहीं गया था. गांवों में बिजली होगी तो लोग टीवी ज्यादा देखेंगे. इतना ज्यादा देखेंगे कि उनको रतिक्रीड़ा का समय ही नही मिलेगा. मिलेगा भी तो टीवी देख देख कर इतना थक चुके होंगे कि कमरे की बत्ती बुता कर चुपचाप सो जाएंगे. यानी नो मोर बच्चा. बिजली और टीवी का प्रयोग कंट्रासेप्टिव के रूप में ? क्या आइडिया है सर जी!
सर जी का एक आइडिया और है कि शादी ३० तीस साल के बाद की जाए. शहरों में तो लोग अब वैसे ही कैरियर बनाते ३० के हो जाते हैं. शादियां ३० के बाद ही होती हैं. लेकिन गांव में ३० साल के लोग पुरायठ माने जाते हैं यानी शादी की एक्सपायरी डेट पार कर चुके. काश, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद जैसा सोचते हैं वैसा ही होता लेकिन व्यावहारिक रूप में स्थिति तो ठीक उलट है. सर जी ने ये कैसे मान लिया कि रात को जितने लोग टीवी देखते हैं वो प्रवचन, भजन कीर्तन और अन्य बड़े सात्विक टाइप के कार्यक्रम ही देखते होंगे और फिर पत्नी से कहते होंगे कि हे प्रिये जब मैं टीवी देख कर इतना थक जाता हूं तो तुम तो और थक जाती होगी क्योंकि तुम्हें तो घर के बाकी काम भी करने पड़ते हैं लिहाजा शुभरात्रि. लेकिन माफ कीजिएगा शालीनता से परे जाकर कर बात कर रहा हूं. रात में टीवी पर पारा गरम जैसे देसी ठुमके वाले मसालेदार सेक्सी कार्यक्रम, एमटीवी और एएक्सएन पर हॉट रियलिटी शोज और एडल्ट मूवी की भरमार होती है. ऐसे कार्यक्रम देख थकाहारा व्यक्ति भी जोश में आ जाता है और अपने पतिधर्म को तत्काल पूरा करना पुनीत कर्तव्य समझता है भले ही उसकी घराली किसी भी स्थिति में हो. नतीजा- पॉपुलेशन में कुछ और वूद्धि. तो सर जी, आपके कश्मीर क्या किसी भी राज्य में ये आइडिया कारगर होगा इसमें संदेह है.

7/1/09

किसिम किसिम के एटीएम






छोटा एटीएम, मोटा एटीएम, खोटा एटीएम, सोता एटीएम, रोता एटीएम. एक साल में हर तरह के एटीएम से मेरा पाला पड़ चुका है. ना तो मैं कोई धन्नासेठ हूं ना जालसाज और ना ही चिरकुट लुटेरा. मैं बंधी पगार वाला एक आम नागरिक जो महीने में एटीएम का तीन-चार चक्कर जरूर लगाता है. दरअसल एटीएमीकरण से जो समाजवाद आया, उसी का नतीजा है ये. अब तो सब धान बाइस पसेरी. कोई कार्ड किसी में ढुकाइए (ठेलिए) पैसा बराबर मिलेगा. आपके पास किसी सिटी बैंक का कार्ड हो या घाटे वाले नेशनलाइज्ड बैंक का अब तो सब कार्ड सब में चलता है. जहां तक याद पड़ता है मेरे शहर में टाइम और आईडीबीआई बैंक ने एटीएमए कार्ड सबसे पहले शुरू किए लेकिन इसकी लिए खाते में मिनिमम दस हजार बैलेंस की शर्त थी. लोग एटीएमए कार्ड उसी तरह शान से चमकाते फिरते थे जैसे शुरू में मोबाइल. मैंने भी उस समय हिम्मत कर एक कार्ड बनवाया था. पैसा निकालने से ज्यादा ध्यान इस पर रहता था कि बैलेंस दस हजार से कम न हो जाए. अब तो समाजवाद है. पूरा खंगाल लो, जीरो बैलेंस नो प्राब्लम. जहां मैं रहता हूं वहां दो किलोमीटर के दायरे कम से कम दस एटीएम तो होंगे ही. सब की नब्ज टटोल चुका हूं.
सबसे पहले एक बड़े बैंक के छोटे एटीएम बात करें. मजाल है कभी उसने पूरा पैसा दिया हो. मांगो दस हजार देता है पांच. थोड़ी दूर पर है एक मोटा एटीएमए. केबिन में एक नहीं तीन मशीनें. मस्त एसी. शीशा भी लगा है सूरत देखने के लिए (सुना है शीशे के पीछे खुफिया कैमरा लगा होता है). लेकिन तीनों मशीनें तीन तरह की. एक में टच स्क्रीन, जिसको कई बार अपना पैसा टच कराने में उंगली दुखने लगती है. दूसरे में कार्ड स्वैपिंग सिस्टम है. अक्सर कई बार स्वैप करने पर ही रिसपांस देता है. और तीसरी मशीन तो पूरा कार्ड गड़प कर जाती है. पैसा देने के बाद ही कार्ड उगलती है. कभी कभी ना पैसा देती है ना कार्ड उगलती है. जब नया कस्टमर कार्ड ठेलता है तब जाकर पुराना कार्ड उगलती है. बगल में ही एक खोटा एटीएम है जिसमें कभी पैसा नहीं होता कभी स्टेटमेंट स्लिप. एसी तो शायद ही कभी चलता हो. पास में एक सोता एटीएम भी है. पांच में चार बार आउट आफ आर्डर. कभी चालू मिलेगा तो गारंटी नहीं कि कब बीच में ही ठेंगा दिखा दे, कार्ड बैरंग लौटा दे. और एक है रोता एटीएमए. मैं उस पर अधिक भरोसा करता हूं क्योंकि वो जैसा भी है, दगाबाज नहीं है. उस एटीएमए मशीन की चेचिस तो ठीक है लेकिन भले ही सौ रुपए निकाले, आवाज इजना करता है कि किसी पुरानी एंबेसडर का इंजन अंदर लगा दिया गया हो. बड़ी देर तक खड़ खड़ खड़-घर्र घर्र घर्र जैसे सौ रुपया देने से पहले गुस्से में मशीन बार बार पैसा गिन रही हो और कह रही हो पता नहीं कहां से चले आते हैं कंगाल. कभी लगता है आपनी पूरी थैली खाली कर देगी या नाराजगी में आपका पूरा बैलेंस ही मुहं पर दे मारेगी. लेकिन गनीमत है इन मशीनों ने कभी पैसा कम नहीं गिना और फर्जी नोट नहीं दिए. पड़ोस में एक और नया एटीएम खुल रहा है जल्द ही उस पर भी कार्ड फेरूंगा, देखें किस कैटेगरी में आता है.

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