6/15/09

झूठ बोले कुत्ता काटे.



न तो मैं नगर निगम की डॉग कैचर स्क्वाड में हूं न पशु प्रेमी और ना ही पशुओं के प्रति हिंसा का भाव रखता हूं. आवारा कुत्ते हों या किसी घर के दुलारे स्वान, उनके प्रति तटस्थता का भाव ही रहता है. मैं एक आम आदमी हूं जिसे कभी पैदल, कभी साइकिल से तो कभी स्कूटर से सड़कों पर रोज ही गुजरना पड़ता है और जो किसी कुत्ते या उनके झुंड को आसपास देखते ही एक अनजाने भय और रोमांच से घिर जाता है. क्योंकि अलग अलग परिस्थितियों में कुत्तों को पुचकारने और दुत्कारने के फारमूले आजमा चुका हूं लेकिन दोनों का इफेक्ट सेम होता है यानी कुत्तों को जो करना हैं करेंगे. कई बार कुत्ते काटते काटते रह गए और दो बार डॉग बाइट झेल चुका हूं. दोनों ही बार मुझे 'लूसी' ने ही काटा. 'लूसी' मेरे एक अजीज मित्र की दुलारी .....? थी. कुत्तों की वाइफ को क्या कहते हैं, आप जानते ही होंगे लेकिन मित्र उस शब्द का प्रयोग करने पर नाराज हो जाते थे सो 'लूसी' ही ठीक है. मित्र के घर जाने पर इंश्योर करवाता था कि 'लूसी' आसपास ना हो लेकिन फिर भी उस कम्बख्त ने दो बार काटा. पिछले जनम की कोई खुन्नस रही होगी. मैंने दोनों बार सिंगल डोज के महंगे एंटी रैबिक इंजेक्शन ठोंकवाए. ऐसे ही एक दिन मित्र के यहां पहुचा. कॉलबेल बजाने पर 'लूसी' के भूंकने की आवाज नहीं आई. लगा कि आज जरूर उसी सोफे के नीचे दुबक कर बैठी होगी जहां से निकल कर दो बार मुझे काट चुकी है. मित्र मुहं लटकाए निकले, मैं सहमा सा ड्राइंगरूम की तरफ यह कहते हुए बढ़ा कि 'लूसी' को बांध दो. तभी भाभी जी की उदास आज आई, भाइया 'लूसी' कहीं चली गई है. चली गई मतलब? कोई उसे उठा ले गया. अरे अड़ोस पड़ोस के कुत्तों के साथ होगी, आ जाएगी. नहीं भइया सुबह से है गायब है. इन्होंने तो तब से एक निवाला मुंह में नहीं डाला है.
शाम के सात बज रहे थे. मित्र का परिवार बिना खाए पीए बैठा था लेकिन मुझे लगा रहा था कि अचानक किसी ने मेरे मुहं में गुलाब जामुन डाल दिया हो, खुशखबरी सुना दी हो. लेकिन खुशी को भरसक दबाते हुए मैंने भी सहानुभूति जताई कि कैसे पूरे घर को गुलजार रखती थी. अब कितना सूना लग रहा है. लेकिन उम्मीद मत छोड़ो रातबिरात शायद लौट आए. अगले दिन सुबह ही मित्र को फोन कर पता किया कि लूसी लौटी कि नहीं. लूसी अब तक नही लौटी थी. जिसने भी लूसी को गायब किया था उसके प्रति मन श्रद्धा से भर गया. मित्र के प्रति भी सहानुभूति थी लेकिन ये भी पता था कि कुछ दिन में वो दूसरा स्वान ले ही आएंगे. इसके बाद मैं निर्भय होकर मित्र के घर लाने लगा. जैसा फील किया सच सच बता दिया. झूठ बोलूं तो कुत्ता काटे. ये तो है पहली कड़ी. अगली कड़ी में कलुआ की कहानी.

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