2/28/10

संइयां भये लड़कइयां ...


कुछ दिन पहले मालिनी अवस्थी परफार्म कर रहीं थीं-सइयां भये लड़कइयां मैं का करूं. जिसे देखो आजकल वही 'बच्चा' बना हुआ है. ये समय ही ऐसा होता है. पहले बसंत फिर फागुन इसी के बीच में वैलेंटाइंस डे और अब होली. हवा में कुछ ऐसी खुनक, ऐसी महक होती है कि छोटे तो छोटे, बयालीस बसंत दख चुके बुजुर्ग भी बहक कर 'लड़कइयां' मोड में आ जाते हैं.
लोग कहते हैं क्लाइमेट चेंज हो रहा है. इकोलॉजिकल सिस्टम गड़बड़ हो रहा है. अरे कितना भी क्लाइमेट चेंज हुआ करे, फागुन की केमिस्ट्री में कोई बदलाव नहीं आया है. पहले भी आम और आवाम, फागुन में ऐसे ही बौराते थे और अब भी बौरा रहे हैं. पहले इसे बावला होना और आजकल केमिकल लोचा कहते हैं. 'बौराने' या 'लड़कइयां' में आज भी केमेस्ट्री के वही फार्मूले लागू होते हैं बस पे्रजेंटेशन का तरीका बदल गया है. केमिस्ट्री वही है नाम बदल गए हैं. केमिस्ट्री ही आपको मन से यंग या ओल्ड बनाती है. फागुनी हवा में ऐसे कुछ केमिकल एलीमेंट्स जरूर हैं जिनके ज्यादा हो जाने से 'मोड' चेंज हो जाते हैं और 'अंकल मोड' वाले 'बच्चा' या 'लड़ंकइयां मोड' में कब आ जाते हैं पता ही नही चलता.
लेकिन कुछ लोगों में तो इस केमिकल की क्वांटिटी बाई बर्थ कुछ ज्यादा होती है और वो बारहों मास मन से यंग यानी लड़कइयां रहते हैं. ताउम्र कुछ ना कुछ नए प्रयोग और कुछ रोमांचक करने की ललक उनके लिए एंटी आक्सीडेंट्स का काम करती है. लेकिन जब कपल्स में एकबच्चा मोड में और काउंटरपार्ट 'कन्वेंशनल' मोड में तो कम्पैटिबिलिटी प्राब्लम खड़ी हो सकती है. लेकिन यहां साफ कर दूं कि प्राब्लम अक्सर सिर्फ 'कनवेंशनल' मोड वाले को होती है तभी तो वह साथी के लड़कंइयांपन से तंग आकर गाने लगता है- संइयां भये लड़कइयां मैं का करूं. और दूसरी तरफ सैंयां... दिल तो बच्चा है जी, थोड़ा कच्चा है जी.. गुनगुनाते हुए बसंत के पचास ओवर्स खेल कर भी नाटआउट. वैसे ये जब तक घर में यानी नेटवर्क एरिया में रहते हैं तो तब तक कम्पैटिबिलिटी प्राब्लम नहीं होती, लेकिन जहां वे नेटवर्क एरिया से बाहर निकले समस्या, खड़ी हो जाती है.
एक बात और, 'बच्चा' दिखने की कोशिश में बच्चों जैसी हरकत कभी मत करिएगा वरना कयामत आ जाएगी और पहनने पर नहीं पडऩे पर जूता बोलेगा चुर्र. युवा होने के लिए कभी अभिनय की जरूरत नहीं पड़ती. ये फीलिंग तो सेल्फ स्टीम्ड है, अंदर से आती है. एक सज्जन युवा दिखने के चक्कर में हाइपर टेंशन के मरीज हो गए और वक्त से पहले बूढ़े दिखने लगे. उन्होंने युवा दिखने के लिए अपने ग्रे होते बालों पर कलर्स के हर शेड अपनाए लेकिन इस टेंशन से कभी भी मुक्त नहीं हो सके कि कहीं कलर्स के केमिकल रिएक्शन से उनके बाल कम ना हो जाएं. केमिकल रिएक्शन कितना हुआ ये तो पता नही लेकिन टेंशन से उनके बाल जरूर झड़ गए. सो लड़कइयां दिखने की नहीं फील करने की चीज है. जो बात-बात पर टेंशन लेने लगे वो बच्चा कैसे रह पाएगा.
इसके ठीक उलट 'यंग फार एवर' टाइप लोग हैं. उम्र बढ रही हो, बाल सफेद हो चुके हों, पहले जैसे घने भी ना रह गए हों तो भी उनको फर्क नहीं पड़ता. एनर्जी इतनी कि यंगस्टर्स ईष्र्या करने लगते हैं. दरअसल ये एनर्जी पाजिटिव एटीट्यूड से मिलती है. जैसे एक ओल्ड होत 'यंगीज' से जब कोई यंग स्मार्ट गर्ल स्माइल के साथ बात करती तो सारे यंग कलीग्स टांट करते ..अरे उसे उसने अंकल बोला.. चिढऩे के बजाय उनका पलट कर जवाब होता यानी तुम सब अब भी मुझको एक रीयल थ्रेट मानते हो...हा हा..बस उनकी एनर्जी में इजाफा हो जाता. यही केमिकल तो एंटीआक्सीडेंट का काम करता है. इसका सीधा संबंध आपके इमैजिनेशन से है. आप जो भी इमैजिन करते हैं या लिखते हैं वो आपकी पर्सनालिटी में रिफ्लेक्ट होता है. इसमें एक्टिंग या स्वांग नही चलता. मन के रेडियो की ट्यून बदल कर कुछ और राग सुनाने का स्वांग करेंगे तो पकड़े जाएंगे. इस लिए दोस्तों 'बच्चा' बनना बच्चों का खेल नही है. हां, फागुन पार आप 'लड़कइंया' हो सकते हैं. लेकिन ऐसा करते समय इब्नेबतूता को जरूर याद कर लिया करिए.

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