3/24/09

जैसा बोया वैसा काटा

जैसा बोया वैसा काटा ये रेशिसन मिसमैनेजमेंट का ही परिणाम है. मंदी हमारी ही करनी का फल है. यही तो मौका है इनोवेटिव और क्रिएटिव होने का. डिलिवर मोर फॉर लेस.हाल ही में एक सेमिनार में यूपीटीयू के वाइस चांसलर प्रो. प्रेमव्रत ने कुछ ऐसा ही कहा था. करीब एक हजार स्टूडेंट्स की गैदरिंग में प्रो. प्रेमब्रत एक घंटे धाराप्रवाह बोले. पूरे हाल में सन्नाटा फिर जोरदार तालियां. ये न तो किसी नेता का भाषण था ना ही बात बात पर ताली बजाने वाले लम्पट श्रोता. कहा जा रहा है कि हम कठिन दौर से गुजर रहे हैं. आगे का टाइम शायद और टफ हो. लेकिन एक बात तय है इस टफ टाइम से निकल कर अगर कोई चमकेगा तो वो इंडिया ही होगा. ऐसा यंग जेनरेशन को देख कर लगता है. इस समय दुनिया के कई डेवलप्ड कंट्रीज में आधी से ज्यादा आबादी बूढ़े और थक चुके लोगों की है तो दूसरी ओर इंडिया की आधी से ज्यादा पॉपुलेशन यंग है. एंड दिस यंग पापुलेशन इज रेयरिंग टू गो. वो सीख रहे हैं कि आग के दरिया को कैसे पार करना है. इस समय इंडियन यूथ सपने देख रहा है, डरने के लिए नहीं कुछ करने के लिए. समय के साथ उसकी सोच में जबर्दस्त बदलाव आया है. दे आर टाकिंग नो नॉनसेंस, दे मीन बिजनेस. कहा जा रहा है कि इस दौर में अगर आगे बढऩा है तो ज्यादा इनोवेटिव और क्रिएटिव होना होगा, नए आइडियाज पर रिसपांसिबल मैनर में काम करना होगा. टाई लगाए, लैपटॉप लिए अर्बन यूथ हों या बैग लटकाए हाथ में कॉपी लिए गंाव से शहर की ओर भागते यंगस्टर्स, सब की आंखों में सपना है आगे बढऩे का, सब में दिखती है ग$जब की पॉजिटिवटी. अपने इर्दगिर्द इन युवा चेहरों पर नजर डालिए. इन्हें पॉकेटमनी पेरेंट्स से न लेकर खुद अर्न करने की चिंता है. अब यंगस्टर्स लर्निंग विद अर्निंग का तरीका सीख रहे हैं. उन्हें पता है कि परफार्म नहीं किया तो पेरिश होने से कोई बचा नही सकता. उन्हें पता है कि जॉब क्रंच में 'क्रशÓ होने से बचना है तो इंटरप्रन्योरशिप के बारे में सोचना होगा, अपने को सेल करना है तो इनोवेटिव होना होगा, उन्हें पता है कि स्लोडाउन में सूख रही विदेशी धरती पर भटकने से बेहतर है कि अपने देश में रिर्सोसेज के भंडार को एक्सप्लोर कर उस पर अपने महल बनाए जाएं.

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