4/23/10

पाsss ! की पावर



प से पवार, प से पॉवर, प से प्रफुल्ल पटेल, प से पापा, प से पूर्णा, प से पॉवर प्ले, प से प्लेन, प से पैसा, प से पुष्कर, प से प्रेमिका
प की महिमा अपरम्पार. प में आ की मात्रा लग जाए तो हो जाता है पाsss! पा माने पापा.
पॉवरफुल पवार की पार्टी के पॉवरफुल मंत्री प्रफुल्ल पटेल की बेटी पूर्णा की पावर तो देखिए- पूरे पैसेंजर्स को उतार कर प्लेन को डायवर्ट कर दिया.

4/10/10

एक ‘नाइस’ चपत



चलिए आज थोड़ी नोकझोंक, थोड़ी दिल्लगी, थोड़ी बंदगी और थोड़ा इमोशनल अत्याचार हो जाए. ब्लॉग के मैदान में भी क्रिकेट की तरह हर कैटेगरी के खिलाड़ी मिल जाएंगे. कुछ टेस्ट मैच की तरह टुक-टुक कर देर तक खेलने वाले, कुछ वन डे मैच की तरह मौके की नजाकत समझ कर शाट लगाने वाले और कुछ ट्वेंटी-ट्वेंटी स्टाइल में हमेशा चौके-छक्के लगाने के मूड में रहने वाले. अब खिलाड़ी हैं तो दर्शक भी होंगे. दर्शक भी तरह- तरह के. कुछ खा-म-खा ताली बजाते हैं, कुछ अच्छे खेल पर एक्साइटेड हो हर्ष ध्वनि करते हैं तो कुछ बात बात पर नोकझोंक करने को आतुर रहते हैं. कुछ तो एग्र्रेसिव हो मैदान मे ं कचरा भी फेंकने लगते हैं. अब वो खिलाड़ी कैसा जिसे शाबाशी या गाली ना मिले. आप समझ गए होंगे खिलाड़ी से यहां मतलब ब्लागर्स से है. उसके रीडर्स और कमेंट करने वाले हैं दर्शक. सो आज ब्लॉग्स में कमेंट्स के खेल पर ही कंसन्ट्रेट करते हैं.
मुझे लगता है कि लोग ब्लॉगिंग की शुरुआत तो अक्सर स्वान्त:सुखाय या अभिव्यक्ति के लिए करते हैं लेकिन जब उन पर कमेंट बरसने लगते हैं, तो उनके अंदर के क्रियेटिव किड की भूख बढ़ जाती है और वो कुछ भी खाकर कुछ भी उगलने और उगलवाने पर उतारू हो जाता है. कल का बच्चा अचानक सचिन तेंदुलकर की तरह ब्लॉगिंग के मैदान में शाट लगाने लगता है. जिस तरह अच्छे शाट पर तालियां मिलती उसी तरह अच्छी पोस्ट पर अच्छी टिप्पणियां भी मिलती हैं. जितने ज्यादा कमेंट्स उतनी ज्यादा पोस्ट. धीरे-धीरे स्वान्त:सुखाय लिखने वाला ब्लॉगर बावलों की तरह किसी भी विषय पर कुछ भी लिखने लगता है. एक अच्छा भला लिखने वाला सर्वज्ञानी, अभिमानी उपदेशक और आलोचक की भूमिका में कब आ जाता है, उसे पता ही नहीं चलता. उसके लेखन में मौलिकता की जगह मैनेजमेंट हावी हो जाता है. किसी अच्छे भले लेखक का दिमाग खराब करने में टिप्पीबाजों की बड़ी भूमिका होती है. कोई कैसा भी लिखे, हर पोस्ट पर ये टिप्पणीबाज वॉह-वाह, शानदार पोस्ट, नाइस, एक्सेलेंट, बधाई, ऐसा ही लिखते रहें, जैसे चालू कमेंट कर अपना राग एक ही सुर में आलापते रहतें हैं. जैसे हाल ही में दंतेवाड़ा में नक्सिलियों ने सीआरपीएफ के जवानों का नरसंहार किया. उस पर एक ब्लॉगर ने दुख व्यक्त करते हुए नक्सली समस्या के समाधान पर बड़ी संजीदगी से कुछ कुछ बातें लिखीं थीं. उस पर एक कमेंट आया ‘नाइस’. इस कमेंट से ये पता नहीं चल पाया कि वो सज्जन किसको नाइस कह रहे हैं. एक और कमेंट था ‘बिल्कुल सही लिखा है’. अब आप दिल पर हाथ रख कर बताइए कि आप जो भी पोस्ट लिखते हैं उसे सही समझ कर ही तो लिखते हैं. कुछ टिप्पणीबाज कमेंट तो संक्षिप्त करेंगे लेकिन अपनी गली-मोहल्ले और घर का पता मोबाइल नंबर के साथ विस्तार से लिखेंगे. ऐसे ही एक और चिंतक-विचारक और बौद्धिक किस्म के ब्लागर हैं. वो चाहते हैं कि उनकी हर पोस्ट पर नेशन वाइड डिबेट हो लेकिन खुद आपकी पोस्ट पर एहसान करते हुए संक्षिप्त टिप्पणी ‘पान पर चूने की तरह’ लगा आगे बढ़ जाते हैं.
(जैसा आई नेक्स्ट के ब्लॉग-श्लॉग कालम में लिखा)

4/3/10

...चंद्रवदन मृगनयनी बाबा कहि कहि जाय



केशव केशन अस करी अरिहु ना जस कराय, चंद्रवदन मृगनयनी बाबा कहि-कहि जाय. केशव जी व्यथित हो कहते हैं कि उनके बालों ने उनकी जो गत बनाई है वैसा तो कोई दुश्मन के साथ भी नही करता. सफेद बालों के चलते सुंदर बालाएं उन्हें बाबा कह कर संबोधित करती हैं. केशव के जमाने के ‘बाबा’ आज के जमाने के ‘अंकल’ ही हुए ना. केशव तो महान कवि थे और मैं साधारण आदमी लेकिन केशव की तरह मुझे भी बच्चों को छोड़ कर कोई अंकल कहता है तो अच्छा नहीं लगता. मैं सभी स्त्रियों का सम्मान करता हूं लेकिन इस मनोविज्ञान पर मेरा वश नहीं. क्यों? इस पचड़े में नही पडऩा, बस अच्छा नहीं लगता तो नहीं लगता. जब संजू बाबा, शहरुख, सलमान या आमिर खां के आधे उम्र की बालाएं उन्हें अंकल नहीं कहती तो मैं क्यों अंकल कहलाऊं. माना कि मैं उन जैसा हैंडसम अब नहीं रहा लेकिन दिल उनसे ज्यादा युवा अब भी है.
जब कवि केशव ‘बाबा’ कहने पर अफसोस जता सकते हैं तो मैं क्यों नहीं. वो सम्मानित कवि हैं ऐसे में उनकी लाइन पकड़ लूं तो क्या हर्ज है. अब ये तो ह्यूमन साइकॉलजी है कि मनुष्य तन से नहीं तो मन से अपने को युवा समझता है और जब तक उसके अंग-प्रत्यंग जवाब नहीं देने लगते तब तक उसे पता ही नहीं चलता की वो बूढ़ा हो रहा है. मैं भी अपवाद नहीं. लेकिन ईश्वर की कृपा से अंग-प्रत्यंग अभी दुरुस्त हैं. सो थोड़े दिन यूथाफुल होने में कोई बुराई नहीं.
अब आपको बताता हूं कि इतना प्रपंच क्यों कर रहा हूं. ईश्वर की बड़ी कृपा होने पर ही ब्यूटी विद ब्रेन का काम्बिनेशन बनता है. ऐसे ही एक काम्बिनेशन वाली बाला को गूगल पर बजबजाते हुए अचानक मेरा ब्लॉग पसंद आ गया. अच्छी बात ये कि उसने फोन पर भी बात की और ब्लॉग की प्रशंसा की, बुरी बात ये कि उसने मुझे अंकल कहा भले ही इसकी अनुमति ले कर कहा हो. अब कोई अंकल कहना चाहे तो शिष्टाचार में मैं मना कैसे कर सकता हूं. मैंने खीसें निपोर कर कह दिया कहो-कहो कोई बात नहीं, लेकिन बात तो है. अरे मन से कुछ और दिन युवा रह लेने दो भाई. अंकल या बाबा कहना जरूरी है क्या? माना कि मन में मेरे प्रति बड़ा सम्मान है लेकिन नाम के आगे जी लगाने से भी तो काम चल जाता है.
खैर, कोई बात नहीं. उस बाला के ब्लॉग पर आए कमेन्ट्स में अपने जैसे चच्चुओं की लाइन लगी देखी तो बड़ा अच्छा लगा कि उस बाला ने इनमें कइयों से अंकल कहने की अनुमति जरूर ली होगी. अगर नहीं तो केशव की लाइनें एक बार फिर याद कर मैं तसल्ली कर लेता हूं.

4/2/10

पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में




पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में आज मैं आजाद हूं दुनिया के चमन में...जब भी परिंदों को उड़ते देखता हूं तो ये लाइनें याद आने लगती हैं. कल्पनाओं को पर लग जाते हैं. उस दिन भी जब पिंजरें से करीब पचास गौरैया मुक्त की गई तो सब फुर्र-फुर्र कर उड़ गई सिर्फ एक चीड़ा नहीं उड़ सका. वो पिंजरें में ही दुबका रहा, शायद बीमार था. उसे हथेली पर रख कर उड़ाने की कोशिश की फिर भी नही उड़ा. ढेर सारी गौरैया को आजाद कराने की खुशी फीकी सी पड़ गई. मेरे एक साथी ने उस चीड़े को चिडय़ाघर के डाक्टर के पास भिजवा दिया. पता नही उसका क्या हुआ. लेकिन बाकी सब खुश थे.

बात 20 मार्च की है. इस दिन अब लोग गौरैया दिवस मनाने लगे हैं क्योंकि गिद्धों के गायब होने के बाद गौरैया भी अब कम ही दिखती हैं. गिद्ध पर रिसर्च हो रहा है लेकिन गौरैया क्यों गायब हुईं इस पर बस बातें हो रही हैं. पता नहीं किसने और क्यों 20 मार्च का दिन गौरैया के लिए चुना. इसके पहले नहीं सुना था कि वल्र्ड स्पैरो डे भी मनाया जाता है. खैर दिवस कोई भी हो एनजीओ उसे जरूर मनाते हैं. अखबारों में एक दो दिन खबरें छपती हैं. प्यारी सी गौरैया की फोटो अच्छा से कैप्शन और कभी-कभी कविता की कुछ लाइनें गौरैया को समर्पित. कुछ लोग अपने बचपन की गौरैया को याद कर लेते हैं. फिर सब कुछ पहले की तरह. हमारे एक साथी हैं कौशल किशोर और विशाल मिश्रा. उन्होंने ने सोचा गौरैया के लिए कुछ किया जाए . वो चौक के अवैध पक्षी बाजार से करीब 50 गौरैया खरीद कर ले आए. सोचिए अब गौरैया भी बिकने लगी हैं. तय हुआ की जू में ले जाकर उन्हें उड़ा दिया जाए. जू में किसी स्कूल के बच्चे पिनिक मनाने आए थे. उनसे पूछा कि किसके घर में गौरैया घोसले बनाती हैं तो तो सिर्फ दो हाथ उठे. उन बच्चों को गौरैया के गायब होने की बात बताई गई और पूछा कि वो उन्हें पिंजरे में बंद रखना चाहते हैं या उड़ाना? तो सब ने कहा उड़ाना. पिंजरा खोल दिया गया और गौरैया फुर्र हो गईं. सिर्फ एक को छोड़ कर.
गौरैया को उड़ते देख बच्चे खुशी से उछल रहे थे. मुझे लगा जैसे मेरे आस पास बच्चे नहीं ढेर सारी गौरैया गा रही हों...पंक्षी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में आज मैं आजाद हूं दुनिया के चमन में..

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