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8/2/12
आज कुछ तूफानी करते हैं

4/8/12
कोटि कोटि परनाम चल गयी दूकान

इन दिनों काफी एनर्जाइस्ड महसूस कर रहा हूं. अरे बसंत-वसंत का चक्कर या
व्रत का कमाल नहीं है. लेकिन बात कुछ खास है कि रात बारह बजे के आसपास
अचानक मूड फ्रेश हो जाता है, सारी थकान दूर हो जाती है और पूरे शरीर में
करेंट सा दौडऩे लगता है. ये सब होता है बिल्कुल फ्री. न, न आप बिल्कुल
गलत समझ रहे हैं. ना मैं किसी मसाज पॉर्लर में जाता हूं ना ही बॉर में.
सामने टीवी और हाथ में रिमोट. दिन में खबरों का लेकर चीखने वाले कुछ
खबरिया चैनल रात होते ही तरह-तरह की ऊर्जा वाले 'प्राश' बेचने लगते हैं.
'प्राश' समझ गए होंगे, अरे वही च्यवनप्राश का कजिन. हमने तो बचपन में
बहुत च्यवनप्राश खाया है. लेकिन अब तो नए पैकेज वाले एनर्जी पैक्ड
'प्राश' आ गए हैं. किसी में सोना, किसी में चांदी का भस्म. अब समझ में
आया कि सोना- चांदी के दाम क्यूं बढ़ रहे हैं. मिडनाइट बाजार के इन
प्रॉडक्ट्स में एक और खास बात होती है कि हमेशा अपने एक्चुअल प्राइस से
काफी कम दामों में उपलब्ध रहते हैं. इन 'प्रॉश' का प्रजेंटेशन इतना
शानदार होता है कि नजरें प्रॉडक्ट से शिफ्ट होकर प्रेजेंटर के
'पावरप्वाइंट' पर जा टिकतीं हैं. इनमें ह्यूमर भी होता है. बस आपको
थोड़ा एमैजिनेटिव होना पड़ेगा.
रात होते ही टीवी शो एकदम पावर पैक्ड हो जाते हैं. जड़ी-बूटी का कमाल तो
देखिए कि लाठी टेक कर चलने वाले लोग टेनिस खेलने का दावा करने लगते हैं.
चाहे 'प्रॉश' हो या बूटी, सबका प्रजेंटेशन एक जैसा- आगे की लाइन में बैठे
जाने-पहचाने स्टार और सेलेब्रिटी टाइप पेशेंट. सब के पास चमात्कारिक
क्योर की कहानी. वैसे रात के पैकेज में और भी बहुत कुछ है- रहस्य-रोमांच,
रुहानी ताकतों से रूबरू कराने वाले ताबीज, शैतानी शक्तियों से बचाने वाले
कवच, तरह तरह के यंत्र और मंत्र.
आधी रात को अलग अलग चैनल्स पर अलग डॉक्टर अपनी-अपनी माइक्रसकोप लिए आपकी
'पावर' को परखते मिल जाएंगे. तम्बाकू से काले पड़ गए दांत लिए जबरन
अंग्रेजी बोलने की कोशिश करने वाले ये डाक्टर पहले आपको किसी 'सब्जबाग'
में घुमाएंगे और बताएंगे कि कैसे आपकी 'पावर' बढ़ाने वाली जड़ी-बूटियों
को उनकी देखरेख में निजी बगीचे में उगाया जाता है. वो बार-बार माइक्रसकोप
से क्या देखते हैं पता नहीं. लेकिन ऐसा हर डाक्टर अपने ग्राहकों से
बार-बार ये तस्दीक जरूर करता है कि असली डाक्टर वही हैं बाकी सब नकली
हैं. वो ये भी बताते हैं कि 24 घंटे उनकी एम्बुलेंस स्टेशन के बाहर खड़ी
रहती है ग्राहकों, सॉरी पेशेंट्स की ताक में. अब सोचिए कीजिए जरा. स्टेशन
से निकल रहे किसी अजनबी को एम्बुलेंस वाले कैसे पहचानते होंगे कि गुरू,
बस यही है यौन रोगी, दगोच लो. और अचानक नीलीबत्ती चमकाते, सायरन बजाते
एम्बुलेंस उसके सामने आ रुकेगी, स्ट्रेचर लिए दो लोग उसमें से कूदेंगे और
उस अजनबी को हाथ-टांग पकड़़ स्ट्रेचर पर लिटाया जाएगा और सर्र से
एम्बुलेंस दौड़ पड़ेगी क्लीनिक की ओर जहां एक डाक्टर माइक्रसकोप लिए उसके
इंतजार में बैठा होगा. वो उसकी बेल्ट खुलवाएगा, कुछ टटोलेगा और फिर गंभीर
होकर माइक्रसकोप में कुछ देखने लगेगा.
इसी तरह आपको याद होगा कि कुछ महीनें पहले तक सर्वे कंपनियों की भरमार
थी. जिसे देखो सर्वे भर रहा था और साथियों को बता रहा था कि तुम भी भरो,
हमने तो इतना कमाया. लोगों ने बिना सोचे-समझे गाढ़ी कमाई लगा दी और अचानक
सब कंपनियां फरार. टीवी चैनल्स पर आजकल ऐसे ही कुछ प्रोग्राम्स चल रहे
हैं. दिन-रात और शाम के प्राइम टाइम में भी. खचाखच भरा बड़ा सा हाल,
सिंहासन पर विराजमान बाबा. भक्त बीच-बीच में खड़े होकर अपनी समस्या बताते
हैं. कुछ फिर ये भी बताते हैं कि बाबा की कृपा से वो मालामाल हो गए. बाबा
बीच-बीच में प्रवचन औश्र आशीर्वाद देते रहते हैं. शो के दौरान टीवी
स्क्रीन पर मैसेज आता है कि आप किस खाते में पैसा जमा कर इस जमात में
शामिल होने के लिए अपनी बुकिंग करा सकते हैं. साथ में ये भी मैसेज चलता
है कि चार महीने तक बुकिंग फुल है और आप अगर टीवी पर भी बाबा का
प्रोग्राम देखेंगे तो भी कल्याण होगा. ये है पैसे के साथ टीआरपी का भी
जुगाड़. भविष्य में बाबा के प्रोग्राम में कमर्शियल ब्रेक भी आने लगे तो
आश्चर्य नहीं. इस मिडनाइट बाजार से आपको पावर, प्लेजर या इंटरटेनमेंट में
से क्या मिलता है, ये इस बात पर डिपेंड करता है कि आप विवेक का इस्तेमाल
कितना करते हैं. ..तो समझने वाले समझ गए हांगे, जो ना समझे वो अनाड़ी है.
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1/9/12
चिकनी चमेली वाला पौव्वा
पार्टीज में बहकता तो मैं भी नहीं क्योंकि मैं ड्रिंक नहीं करता लेकिन हॉस्टल लाइफ में कोई भी ऐसी प्रीमियम ब्रांड नहीं बची थी जिसे टेस्ट नहीं ·किया हो. लोग ·हते हैं हर ब्रांड किक अलग होती है लेकिन रम से लेकर स्कॉच तक तक सब ने मुझे एक जैसी ही किक लगाई. इसी टेस्ट के चक्कर में एक बार तो मेरे ·कान में जिन घुस गया था. बात कई साल पहले है, वो भी ऐसे ही 31 दिसंबर की रात थी. न्यू इयर ईव पर हॉस्टल में साथियों ने व्यवस्था की साथी कहीं से जिन ले आया था. बोला थोड़ा ले लो जुकाम ठीक हो जाएगा. लाओ देखें जरा.. स्टाइल में मैंने भी थोड़ी जिन ले ली. पता नहीं क्या हुआ कि गले 15 दिन तक मेरा सीना जकड गया, सूंघने और सुनने की क्षमता जाती रही, लोग कुछ बोलते थे तो मैं कान के पास हाथ ले जाकर आंय-आंय करता था. जब दोस्तों को पता चला कि ये जिन का नतीजा है तो सब ने खूब मजा लिया. बात पूरे हॉस्टल में फैल गई कि ·अबे.. ओझवा के कान में जिन्न घुस गया है. उसे सुनाई नही पड़ रहा है. बाद में यह जिन एंटीबायटि· लेने से ही भागा. उस दिन से कान पकड़ा .तो दोस्तों पार्टी होती ही मस्ती के लिए. पार्टी ऐसी हो जो बार-बार याद आए. जम कर मस्ती करिए लेकिन इतना टल्ली ना हो जाएं कि घर ना पहुंचने पर आप· अपने घबराएं. बार-बार फोन आएं और अगले दिन लोगग खिल्ली उड़ाएं.
12/6/11
दोस्त-वोस्त...यार-व्यार...!

साहित्य समाज का आइना होता है लेकिन लगता है आजकल समाज का आइना सोशल नेटवर्किंग साइट्स भी हैं. सो आज उन लोगों की बात जो किसी ना किसी की फ्रेंड लिस्ट में हैं. हर फ्रेंड जरूरी होता है चाहे वो फेक, फ्रस्ट्रेटेड, फ्लर्ट, फाल्तू, फ्रैंक, फुरसत में या फेंकने वाले ही क्यों ना हों. कुछ दिन पहले किसी फेसबुकिया ने कमेंट किया था, गुरू... तुम्हारी फ्रेंड लिस्ट में गल्र्स की लम्बी लाइन है. उसे बताना पड़ा कि दोस्त ये गल्र्स की नहीं फ्रेंड्स की लिस्ट है और इसमें 13 साल के बच्चों से लेकर 73 साल की बुजुर्ग भी हैं. ये लिस्ट इससे कई गुना लम्बी होती, लेकिन वीड्स की छंटनी और सूखे ठूंठनुमा लोगों को हटाते रहने से ये मैनेजेबल है. कौन फ्रेंड हैं और कौन फ्रॉड, ये तो कुछ दिन साथ-साथ चलने पर पता लगता है. दोस्त के कमेंट के बाद सोचा चलो इन चेहरों के पीछे के चेहरे को पहचानने की कोशिश करते हैं. उनको रुक्रैच करने पर एक अलग ही दुनिया सामने आई. फीमेल मेंबर्स से पूछा कि अगर आप मेरी फ्रेंड लिस्ट में हो तो मेरी क्या हुई? सब ने कहा.. फ्रेंड. फिर पूछा, अगर फ्रेंड फीमेल हैं तो गर्लफ्रेंड हुई ना...? कुछ ने टप कहा ...बिल्कुल नो प्रॉब्लम- ये था फ्रैंक चेहरा. लेकिन कुछ लड़कियां तुरन्त हॉय, हाऊ आर यू, आई एम फाइन वाला फॉरमैट बदल कर बाय... कैच यू लेटर वाले मोड में आ गईं और आगे कुछ पूछ पाता, इसके पहले ही ऑफ लाइन. कुछ दिन तक वो ‘देखते ही निकल लो’ वाले मोड में रहीं और फिर कंट्रोल डिलीट एंड- ये था फाल्तू चेहरा.
लिस्ट में एक पेयर भी था. लडक़ा-लडक़ी बचपन से एक दूसरे को जानते थे और पढ़ाई के बाद शादी करने का पक्का इरादा था. अचानक लडक़ी का ब्वॉयफ्रेंड मेरी लिस्ट से गायब हो गया. लडक़ी से पूछा सब ठीक-ठाक तो? एक सपाट सा जवाब था, फॉरगेट दैट. अरे... क्या हो गया. कुछ नहीं... मुझे क्या करना है, कौन सा कैरियर चुनना है, ये मैं तय करूंगी. कोई जरूरत से ज्यादा पजेसिव हो ये भी बर्दाश्त नहीं. मुझे लगा वो मेरा फ्रेंड कभी था ही नहीं- ये था कांफिडेंट चेहरा.
अब बारी थी फ्रेंडलिस्ट की एक ऐसी फीमेल की जिसकी इंगेजमेंट हो चुकी थी और वो अपने को इंडिपेंडेंट कहती थी. उसके करियर अभी शुरुआती दौर में था. उससे भी यही सवाल किया. जवाब ऑन लाइन नहीं आया बल्कि आधा दर्जन एसएमएस आ गिरे एक के बाद एक. पढऩे के बाद लगा कि मैसेज उसके मंगेतर के पास जाने थे लेकिन हड़बड़ी या गड़बड़ी से मेरे नंबर पर दे मारे. पहले मैसेज में परमीशन मांगी गई थी कि ..फलां पूछ रहे हैं, क्या आंसर दूं. दूसरे में लिखा था...मतलब? मैं तुम्हें बता रही हूं ना.. जो लगा वो पूछा, इसमें गलत क्या है? फिर तीसरा मैसेज... उन लोगों ने मुझे टच भी नही किया...फलां बहुत सीधे हैं. ओके और हम..मैं तुम्हें बता क्या रही हूं और तुम क्या समझ रहे हो? बीवी हूं तुम्हारी. उसको जब चेताया कि ये क्या दनादन भेजे जा रही हो. इसके बाद सफाई देते हुए 4-5 मैसेज कि वो गलती से आपको चला गया. असल में हमारे रिलेशन पर बात हो रही थी. क्यूंकि हमारे परिचित का पांच साल बाद ब्रेकअप हो गया है तो हम डिस्कस कर रहे थे. फिर कहाकि मेरी तो इंगेजमेंट हो चुकी है ब्वाय फ्रेंड का क्या करूंगी. फिर कहा, ब्वाय फ्रेंड और गर्लफ्रेंड वही नहीं होते जिनसे हम शादी करें. वैसे मैं पर्सनली मानती हूं कि जो ब्वायफ्रेंड हो वही हसबैंड भी. अब तक दिमाग का दही जम चुका था और सवाल वहीं का वहीं था- ये था कन्फ्यूज्ड चेहरा.
लिस्ट में हाल में शामिल एक मेंबर ने तीसरे ही कनवर्सेशन में इतना खुल गया कि दिमाग की लाल बत्ती जल गई. जब कहा कि तुम्हारी फीमेल आडेंटिटी पर डाउट है तो ‘डीके बोस’ वाली लिंगो पर आ गया- ये था फेक चेहरा. थर्टी प्लस की ओर बढ़ रही मेंबर को जब ‘जीएफ’ का ऑफर दिया तो लगा वो धन्य हो गई. ...अच्छी फमिली से हो, जॉब है, शक्ल-सूरत भी खराब नहीं तो शादी क्यूं नही कर लेती. बस फिर क्या था उसके दिल का दर्द सामने आ गया. बोली जीने का दिल नहीं करता इस दुनिया से मन ऊब गया है- ये था फ्रस्ट्रेटेड चेहरा।
लेकिन ढेर सारे ऐसे लोग भी थे जो शुरू में हिचके लेकिन बाद में अच्छे दोस्त साबित हुए. इतने सारे लोगों से बात करने के बाद फ्रेंड लिस्ट फिर लम्बी लगने लगी थी. लेकिन कंट्र्रोल डिलीट एंड की पर बढ़ती उंगलियां ये सोच कर रुक गईं कि जब सोसायटी में विश्वास का संकट बढ़ रहा रहा है तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स इससे अलग कैसे हो सकती है. यहां भी तो विश्वास का संकट है. जरा रुकिए...एक और फ्रेंड रिक्वेस्ट आ गई...हेलो.. ग्लैड टू मीट यू.. आई एम राजीव..!
7/31/11
फ्रेंच किस!

7/25/11
मिल गए डीके बोस..!

6/4/11
ये डीके बोस कौन हैं

ये डीके बोस कौन हैं, क्यों भाग रहे हैं, उन्होंने कौन सा क्राइम किया है. भागना डीके बोस की मजबूरी है. नहीं भागेंगे तो ‘पप्पू साला’ बन जाएंगे जो डांस नही कर सकता. पीछे ना छूट जाए, इसके लिए वक्त के साथ भागते रहना डीके बोस की मजबूरी है. करीब दो दशक पहले एक फिल्म आई थी ‘कयामत से कयामत तक’. हीरो के तौर पर ये आमिर खान की पहली फिल्म थी. उसमें एक गाना बहुत हिट हुआ था..पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा, बेटा हमारा ऐसा काम करेगा..दो दशक बाद आमिर खान की एक और फिल्म आ रही है ‘डेल्ही बेली’. ये फिल्म आमिर खान की है लेकिन इसमें हीरो उनका भांजा इमरान है. दो डिकेड्स में यंगस्टर्स कितना बदल गए हैं. उनके एटीट्यू में कितना फर्क आ गया है- ‘पापा कहते हैं’ से ‘डैडी मुझे से बोला.. तू गल्ती है मेरी, तुझ पे जिंदगानी गिल्टी है मेरी, साबुन के शकल में बेटा तू तो निकला केवल झाग...भाग-भाग...डीके बोस-डीके बोस भाग..
वाह, क्या फाड़ू गाना है. ‘डीके बॉस’ अब ‘डीके बोस’ बन कर लौटे हैं. स्टाइल बदल गई लेकिन माने नहीं बदले हैं. नहीं सोचा था कि हॉस्टल के दिनों के डीके बॉस दो दशक बाद किसी हिन्दी फिल्म में डीके बोस बन कर धमाल मचा देंगे. ये डीके बोस और कोई नहीं आज के युवा हैं जो स्लैंग पर सवार हो फर्राटे भर रहे हैं. इनकी लिटरल मीनिंग पर मत जाइए, बस इसे बोलचाल की भाषा का स्पाइस समझ कर इंज्वाय कीजिए. अपने डीके बॉस यानी दुर्गेश कुमार ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके नाम का एब्रीविएशन एक दिन गदर काटेगा. समझ गए ना बॉस.
स्लैंग का जमाना है इसीलिए नाम जरा सोच समझ कर रखना चाहिए. याद है ना वो ऐड जिसमें हरी साडू जैसे फाड़ू बॉस के नाम का ऐसा एब्रीविएशन बताया गया कि उनकी हाथ में आ गई और वो भी हरीसाड़ू से ‘डीके बोस’ की कैटेगरी में आ गए. अब लिटरल मीनिंग मत पूछिए कि हाथ में क्या आती है. एम टीवी के रोडीज हों या उनके टकले बॉस रघु और राजीव, सब ऐसा स्लैंग यूज करते हैं कि सबकी बीप.. बीप.. करने लगती है. रिएलिटी शो में तो जज से लेकर कंटेस्टेंट तक सब एक-दूसरे की बजाते रहते हैं. वैसे आजकल इस बैंड, बाजा, बारात का ही शोर है. इसमें कोई रोडी है तो कोई डीके बॉस.
तो क्या नई जेनरेशन सटक या भटक गई है जो बेतहाशा भागी जा रही है? इस जेनरेशन को पता है कि अगर वो नहीं बजाएंगे तो उनकी बजा दी जाएगी. ‘डेल्ही बेली’ के गाने को देखने से भी लगता है. फिल्मों में, टीवी पर, सडक़ों पर आजकल यंगस्टर्स का यही लिंगो है और इस भाषा को बोलने वाले ये बच्चे बिगड़ैल नहीं हैं. ये है जेनरेशन नेक्स्ट, वेरी इंटेलीजेंट, प्रोफेशनल, फोकस्ड एंड दे मीन बिजनेस. उन्हें पता है कि कि टाइम टफ और करम्पटीशन कड़ा है. जमाने के साथ चलना है तो जमाने के नियम से चलो और उसी की भाषा बोलो. नैतिक-अनैतिक के पैरामीटर्स वक्त के साथ बदलते रहते हैं और अगर हम अपडेट नहीं हुए तो कोई भी पोपट बना कर आगे निकल जाएगा. लड़कियों को ही लीजिए. वो ‘बहन जी’ टाइप इमेज से बाहर आ चुकी हैं. ये टीन गल्र्स ज्यादा कांफिडेंट और प्रैक्टिकल हैं. आपसे से कुछ भी, किसी भी टॉपिक पर बिंदास बातें कर सकती हैं लेकिन आप उनको बेवकूफ नहीं बना सकते. जो बेवकूफ बनती हैं वो ही एमएमएस स्कैंडल या कि सी दूसरे इमोशनल अत्याचार का शिकार हो जाती हैं लेकिन लेकिन उनका परसेंटेज काफी कम है. यंग जेनरेशन होशियार है और उसमें एक डीके बोस भी बसता जो अपना काम निकालने के लिए किसी की भी वॉट लगा सकता है. अब तो गल्र्स भी इस मामले में लडक़ों से पीछे नहीं हैं. स्लैंग्स पर ब्वॉयज की मोनोपली नहीं रह गई है. गल्र्स भी अब ऐसी लैंग्वेज यूज करती हैं कि बड़ों-बड़ों की बीप..बीप..हो जाए. उनका फंडा बिल्कुल क्लियर है. बाईचांस एक दिन दो टींस के कनवरसेशन को इंटरसेप्ट किया... उनकी लिंगो कुछ ऐसी थी..
-Arre Ye DK Bose type hai..usase bhi khatarnak ..lekin kisi se poochna mat
-ahahahahahah... ¬
go to ...facemoods•com
-jara meri bhi knowledge badhe?
-are kya bataun it is bellow dignity..
-are wat is below nd above dignity?? its v who think so...
-
-ahahahahahahah....
5/7/11
चकर-चकर

दिनभर चकर-चकर करना, दोस्तों के साथ किसी भी सब्जेक्ट पर गपियाना, किसी मसले पर बेवजह टांग अड़ाना और किसी मुद्दे पर गंभीर बतियाना, सबकुछ ब्लॉगिंग के दायरे में आता है. जैसे कोई किसी अनजान शहर की सडक़ों पर यूं ही घूमने निकल जाए और वहां मिले कोई नई दुनिया, कुछ नए लोग. फिर उसमें कुछ से दोस्ती हो जाए. कुछ ऐसी ही है ब्लॉग की दुनिया. कभी बात का बतंगड़, कभी बात से निकले जज्बात और कभी कोरी बकवास. तो चलिए इस बार की जाए अपनी, उनकी, सबकी बातें. और बात कर रहीं हैं रश्मि रवीजा. जब उनके ब्लॉग का नाम ही ‘अपनी उनकी सबकी बात’ है तो अंदाजा हो गया होगा कि अंदर किस तरह का मसाला होगा. याद आता है कि स्कूल डेज में हम लोग कोई भी फिल्म देखकर आते थे, उसकी पूरी कहानी दोस्तों को सुनाते थे और अपनी बुद्धि के हिसाब से उसकी समीक्षा भी करते थे. रश्मि ने भी अपनी पोस्ट में एक नई चर्चित फिल्म आईएम की कहानी सुना कर उसकी समीक्षा की है. रश्मि सिनेमा देखते देखते पहुंच गई हैं क्रिकेट मैदान में. वल्र्ड कप के बाद क्रिकेट की हरारत अभी भी मौजूद है आई पीएल के रूप में. सो उन्होंने क्रिकेट प्रेमियों की नब्ज पर एक सधे हुए हकीम की तरह टटोली है, नाम है ‘गावस्कर की स्टेट ड्राइव का राज’.
ब्लॉगर ने जिस कुशलता से ब्यूटी कांटेस्ट को को क्रिकेट से जोड़ा है कि वैसा ही एक्साइटमेंट होता है जैसा क्रिकेट में छक्का पडऩे पर होता है. इसमें शुरुआत होती है मिस यूनविर्स ब्यूटी कांटेस्ट से. सुष्मिता सेन से कई साल पहले मधु सप्रे भी टॉप थ्री में पहुंची थीं. उनसे पूछा गया था कि अगर आपको एक दिन के लिए देश का मुखिया बना दिया जाए तो वो क्या करेंगी. उनका जवाब था, वो पूरे देश में खेल के अच्छे मैदान बनवा देंगी. मधु सप्रे मुंबई की थी और उस समय उनका ये उत्तर सुन कर गु्रस्सा आया था. लेकिन सुनील गावसकर की किताब ‘सनी डेज’ में उनके पंसंदीदा शॉट स्ट्रेट ड्राइव का राज जिस तरह से खोला गया है उससे लगता है कि मधु का उत्तर बिल्कुल रेलेवेंट था. एक और पोस्ट है ‘साथी ब्लागर्स के साथ गूजरे कुछ खुशनुमा पल’. ब्लॉगर्स जब फेस टू फेस मिलते हैं तब क्या होता है, उसका जिक्र है इस पोस्ट में वैसे तीन महिला ब्लॉगर्स के बीच सैंडविच हुआ एक पुरुष ब्लॉगर कैसा लगता है, ये देखना है तो क्लिक करें rashmiravija.blogspot.com और शामिल हो जाएं चकर-चकर में.
4/17/11
Donkey calling Murga

आज कल मोबाइल के बिना काम नहीं चलता. थोड़ी देर के लिए नेटवर्क गायब हुआ नहीं कि सब बेचैन हो जाते हैं. किसी की जरूरत है तो किसी को नशा है बात करने का. बात करनी है तो करनी है. नेटवर्क बिजी है या कनेक्टिविटी प्रॉब्लम, या कोई कॉल लेने की पोजीशन में नहीं है तब भी गधों की तरह कॉल किए जाएंगे...आर यू देयर ..आर यू देयर..?.. और दूसरे को मुर्गा बनने पर मजबूर करेंगे. ये रोल रिवर्स भी हो सकता है जो कभी मुर्गा बनता है वो मौका पडऩे पर गधा बन कर हिसाब चुकता कर देता है. इस फोटो को देखिए..इसे कहते हैं डॉन्की कॉलिंग मुर्गा.
3/9/11
Hats Off


3/4/11
लॉयलटी टेस्ट
एक-दूसरे के प्रति इमोशनल कम्पैटबिलटी या अटैचमेंट ना होते ही भी संबंधों को ढोना इमोशनल अत्याचार की कटैगिरी में आता है. किसी भी रिलेशनशिप की शुरुआत अक्सर फिजिकल अट्रैक्शन से होती है. लेकिन कोई रिश्ता तभी परवान चढ़ता है जब पार्टनर्स इमोशनली कम्पैटबल हों. क्योंकि समय बीतने के साथ धीरे-धीरे फिजिकल अट्रैक्शन की जगह इमोशनल अटैचमेंट लेने लगता है. इसमें फेल होने के बावजूद रिश्तों को निभाते जाना ही इमोशनल अत्याचार है. पार्टनर के प्रति मन में शक पैदा हो गया तो समझिए हो गई इस अत्याचार की शुरुआत. फिर लॉयलटी टेस्ट में पास-फेल का कोई मतलब नहीं रह जाता.
आजकल एक टीवी शो में ये टेस्ट बड़ा पॉपुलर है. इस टेस्ट में लड़के हों या लड़कियां, 99 परसेंट लोग फेल हो जाते हैं. सिविल सर्विसेज एग्जाम क्वालिफाई करना आसान है लेकिन लॉयलिटी टेस्ट...तौबा-तौबा. ऐसा इम्तहान जिसमें पास ना करने वाला तो पछताता है ही लेकिन पास होने वाले पर भी सवाल खड़े हो ही जाते हैं कि अरे, यंग एज में साधुओं जैसा व्यवहार, सब ठीक ठाक तो है? ये लॉयलटी टेस्ट एक सेट फारमेट और कंडीशन में किए जाते हैं. यू कहिए कि एक खास तरह की सिचुएशन क्रिएट की जाती है और उसमें 'सब्जेक्ट' को परखा जाता है. 'सब्जेक्ट' यंग होते हैं. अंडरकवर ऐजेंट के रूप में कोई अट्रैक्टिव गर्ल रंभा बन कर 'सब्जेक्ट' को रिझाती है या हैंडसम ब्वॉय 'कामदेव' बन कर सामने खड़ा जाता है. ऐसे में पास होने का संभावना न के बराबर रहती है. क्योंकि इस तरह के लायलटी टेस्ट में भी फिजिक्स और केमिस्ट्र के ही फर्मूले लागू होते हैं. यंगस्टर्स जिनमें हारमोनल चेंजेज उफान पर हों वो भला अपोजिट सेक्स के प्रति क्यों नहीं अट्रैकट होगा, खास कर फेवरेबल कंडीशंस में. ये कंडीशंस नेचुरल हों या क्रिएट की हुई, रिजलट तो सेम होगा. जैसे एच2एसओ4 यानी सल्फ्यूरिक एसिड के दरिया में कूद कर शीतल सरोवर का एहसास कैसे संभव है. इसी तरह अगर कोई टीनएजर इस टेस्ट में साधुओं जैसा व्यवहार करे तो लोग कहेंगे कि यार उसमें केमिल लोचा है. क्योंकि नार्मल केमिस्ट्री तो आपको अपोजिट सेक्स के प्रति अटै्रक्ट करेती है. पहली नजर में जो जैसा होता है अक्सर वो वैसा होता नहीं. इसके लिए कुछ महीने या साल नहीं कुछ दिन में ही असलियत सामने आ जाती है.
हाल ही में एक ऐसे साथी के साथ हफ्ते भर होटल रूम शेयर किया जिससे पहले कभी नहीं मिला था. उसको पहले दिन जैसा समझा था वो सातवें दिन तक कुछ और निकला. पहली मुलाकात में लगा कि वाह, ये तो ब्राडेंड चीजों को पसंद करने वाला एक स्मार्ट स्टायलिश युवा है. वो एक दो-दिन थोड़ा संकोच में था. फिर धीरे धीरे खुला. रात में वो रोज एमटीवी पर रोडीज जरूर देखता. मोटा नहीं था फिर भी रुक-रुक कर खर्राटे लगाता. मेरी नींद खुल जाती तो उसकी नाक में तकिए का कोना डालना पड़ता. पांच मिनट के लिए खर्राटे बे्रक होते तब तक मैं सो जाता. हालांकि उसने भी मेरे ऊपर खर्राटे का इल्जाम लगाया. ये इल्जाम और भी लोग लगा चुके हैं. मेरी नींद कुत्तों की तरह कच्ची है तभी तो कभी-कभी अपने ही खर्राटे से ही खुल जाती है.
बनारसी गंगा स्नान के शौकीन होते हैं लेकिन 7 दिन में उसे नहाने का उपक्रम करते नहीं देखा. वो काम तो बढिय़ा करता था लेकिन थकता जल्दी था. जब तक रूम पर रहता तो वो टीवी देखने में थक जाता और थोड़ी देर आराम करता. फिर नाश्ता करने में थकता और आराम करता, खाना खाने में थकता और आराम करता, थोड़ा आराम करने के बाद थक जाता तो फिर आराम करने लगता. ..उसे देख कर पहले दिन ऐसा नहीं लगा था.
सो इस लॉयलटी टेस्ट-वेस्ट से कुछ पता नहीं चलता. बस अपने पर भरोसा रखिए और इन लाइनों को याद रखें..
...साथ सफर में इतना ही सही,
मिल ही जाएंगे फिर हमसफर
तुम ना मिले कोई और सही.
(जैसा आई नेक्स्ट में लिखा )
2/16/11
‘आओ फिर से खेलें ..’

बहकी-बहकी बातों का मजा लें। इन नए ब्लॉगरों में अच्छी बात होती है कि ये अपनी बात बिना किसी लाग-लपेट के कहते हैं. इनकी पोस्ट कैम्पस की शरारतों का अहसास कराती हैं तो कभी चंद लाइनों में इतने गहरे अर्थ छिपे होते हैं कि विश्वास ही नहीं होता कि ये लोग जिंदगी और रिश्तों के बारे में इतनी संजीदगी से भी सोचते हैं. इनके ब्लॉग का नाम है नीम चढ़ा. करैला वाला नीम चढ़ा नहीं. जो ब्लॉगर ने अपना नाम बताने में नखरा करें उसे उन्हें नकचढ़ा ही तो कहेंगे. जनाब ने ब्लॉग में अपना नाम लिखा है एच2एसओ4. वैसे इनका असली नाम है गौरव आसरी और भाई साहब कुछ दिन पहले तक आरजे थे अब फिर से स्टूडेंट बन गए हैं. ब्लॉगरी में ये अभी नए हैं, चंद पोस्ट ही हैं इनके शो-रूम में. लेकिन हर पोस्ट का अलग ही फ्लेवर. एच2एसओ4 की कई पोस्ट तो सिर्फ चार लाइन की हैं लेकिन वो दूसरों की चालीस लाइनों पर भारी हैं.
ऐसी ही एक पोस्ट है ‘हॉर्न ओके टाटा प्लीज’. इसमें एक
फोटो और चार लाइन की फाइंडिग्स ने बड़े-बड़े सर्वे की वॉट
लगा दी है. कुछ यूं हैं ये लाइंस...‘एक हजार लड़कियों पर रिसर्च
करने के बाद मेरी आखें इस निष्कर्ष पर पहुंची हैं कि 90 प्रतिशत
लड़कियां सिर्फ पीछे से अच्छी लगती हैं. और उन 90 प्रतिशत में से भी
केवल 30 प्रतिशत ही उम्मीदों पर खरी उतरती हैं, यानी आगे से
अच्छी निकलती हैं...’
असके ठीक उलट एक पोस्ट है ‘आओ फिर से खेलें ’. छोटी सी इस पोस्ट में समुन्दर सी गहराई
है. कहानी अंग्रेज के साथ खेलते एक कुत्ते से शुरू होती है...‘ये मेरे इंस्टीट्यूट में पढ़ता है. नहीं कुत्ता नहीं, ये अंग्रेज. ये पालतू नहीं है. नहीं अंग्रेज नहीं कुत्ता. पर ये बड़ा मस्त कुत्ता है. इस फोटो में ये अंग्रेज के खेल रहा है. शायद इस लिए कि इसे बात करने के लिए भाषा की जरूरत नहीं पड़ती. अंग्रेज एक लकड़ी फेंक रहा था, कुत्ता उसे मुंह में उठा कर ला रहा था...इस कुत्ते के सामने आप जो भी फेंको ये तुरन्त उसे मुंह में उठा कर ले आता है. और आपके पास आकर जिद करेगा कि फिर से फेंको. ये आपके साथ खेलते रहना चाहता है. अगर आपका मूड नही है खेलने का तो ये बुरा नहीं मानता. चुपचाप चला जाता है. अगले दिन फिर ये आपसे उसी तरह प्यार से मिलेगा. ये आपकी नाराजगी या डांट याद नहीं रखता, प्यार याद रखता है। हम ऐसा नहीं कर पाते. किसी के मुंह से एक बार कुछ निकल जाए, तो उसे कभी नहीं भूलते ...उदास रहते हैं, दुखी भी रहते हैं, कभी उस से फिर से जाकर नहीं कह पाते, ‘आओ फिर से खेलें..’ कुछ समझ आया, नहीं? तो क्लिक करें neemchadha.blogspot.कॉम
1/10/11
ठंड में हुए छुहारा
हफ्ते दस दिन ठंड और रहेगी, झेल लीजिए. बिना वजह हल्ला मचा रखा है. हर साल ये होता है. चैनल वाले चीखे जा रहे हैं बर्फ दिखा-दिखा कर. कोई पांच साल, कोई 15 साल तो कोई 25 साल का हाड़तोड़ ठंड का रिकार्ड तोड़े डाल रहा है. ठंड में सब छुहारा हुए जा रहे हैं. क्रिसमस तक जब खास ठंड नही पड़ी तो लोग अधीर हुए जा रहे थे ठंड के बिना और जब ठंड पड़ रही है तो मरे जा रहे हैं पारा नापते-नापते. तुम्हारे यहां कितना, हमारे यहां इतना. ये देखो हमारा शहर शिमला से भी ठंडा और देखो पत्तों पर बर्फ जमी है. नहीं दिखी अरे छू के देखो. अरे चिल्लाने से ठंड कम तो होगी नहीं सो मजा लीजिए ठंडी का. गर्मियों में कितना भी अच्छा एसी हो, वैसी नींद नहीं आती जो छोटी सी कोठरी में अपनी रजाई में दुबक कर आती है. और एक-आध दिन नहाने से कल्टी मार जाने पर भी कोई पकड़ नहीं पाता कि पांडे जी ने आज कउआ स्नान नहीं किया है. बड़े बाबू तो कुर्ता-पजामा के ऊपर ही पैंट और जैकेट चढ़ा के आफिस चले आते हैं माजल है कोई भांप ले. ऐसी फेसेलिटी गर्मी या बरसात में मिलती है भला?
हाड़ कंपाने वाली पूस की रात कोई पहली बार तो आई नहीं है. पहले चैनल-वैनल तो थे नहीं और ना ही मौसम विभाग हर घंटे पारे का हिसाब रखता था. ब्लोअर और हीटर के बिना पूस की रातों में मड़ई या ओसारे में कौड़ा (आग) तापते लोग लंठों की तरह ठंड पर चर्चा जरूर करते थे लेकिन हल्ला नहीं मचाते थे. पूस की रात में दूर कहीं जब कानी कुकुरिया भूंकती तो हाड़ कंपाती सर्दी में मास्टर जी को मुंशी प्रेम चंद याद आने लगते और ओसारे में पड़ा बुधिया कौड़ा को पलका (भडक़ा) कर फिर गठरी बन जाता. ..और आप हैं कि जरा सी ठंड में छुहारे की इज्जत उतारने पर तुले हैं.
12/20/10
चिरकिन और विकिलीक्स

सब विकिलीक्स-विकिलीक्स चिल्ला रहे हैं. कुछ समय पहले तक इसका नाम भी नहीं सुना था. पूरी दुनिया विकिलीक्स की लीक ’ से दहली हुई है. इसके करता-धरता असांजे तो रातों रात सुपर स्टार बन गए हैं. ये भी कोई लीक है. लीक तो इंडिया के चिरकू किया करते हैं।असांजे इनफारमेशन हैक करके लीक करता है लेकिन विकीलीक्स के इंडियन वर्जन, जनता के पैसे को हैक कर डकार जाते हैं. नीरा राडिया, राजा बैजल, लाली और भी ना जाने कितने इंडियन वर्जन हैं विकीलीक्स के यानी चिरकू. पैसा डकारने के बाद इन चिरकुओं को कब्जियत हो जाती है उसको दूर करने के लिए सीबीआई एनीमा लगाती है. लेकिन हम भारतीय तो अपनी चीजों की कीमत ही नहीं समझते. असांजे हैं क्या? एक इंटरनेशनल चिरकू भर. अपने देश में तो ऐसे चिरकू की भरमार है. यहां के चिरकिन शायर तो विकिलीक्स के बाप थे. जैसे विकिलीक्स का खुलासा सब पर भरी पड़ रहा है उसी तरह शायर चिरकिन का शेर सब शायरों पर बीस पड़ता था। तभी तो उनके लिए कहा जाता था ‘चिरकिन ने चिरक दिया गुलाब के फूल पर, बाकी सब शायर उनके ठेंगे पर.’
चिरकिन का एक शेर अर्ज है:-
चिलकन -ए-महफिल में
इस कदर आना हुआ
पहले थोड़ी ऐंठन हुई
फिर जम के पखाना हुआ’
समझ गए ना, चिरकू कहते हैं चिरकने वाले को . अब ये मत पूछिएगा चिरकना क्या होता है. कोई भी इलाहाबादी इसके अलग अलग मायने विस्तार से समझा सकता है. वैसे जब साफ सुथरी जगह कोई गंदगी कर दे तो समझिए किसीने चिरक दिया है. जैसे साफ दीवार पर पीक करने वाले भी एक तरह से चिरकते ही हैं, बस ‘आउटलेट’ का फर्क होता है. चिरकना एक ऐसी कला है जो गॉड गिफ्टेड होती है जिसको चिरकू कंट्रोल करने की लाख कोशिशों के बाद भी कट्रोल नहीं कर पता. चिरकू यानी एक ऐसा शख्स, जो हमेशा अगड़म-बगड़म खाता रहता है और इस वजह से ज्यादातार उसका मेदा आउटऑफ कंट्रोल रहता है. उसमें हमेशा मरोड़ होता रहता है. उसे पता ही नहीं चलता कि कब कब्जियत दस्त में बदल जाती है और वो जहां-तहां चिरक देता है.
इलाहाबाद जीआईसी में छात्रों की एक चिरकू जमात भी थी जो चिरकू के रूप में आडेंटीफाइड थे. खर्च करने के मामले में भी उनको कब्ज रहता था. पत्रकारों में भी चिरकुओं की कमी नहीं. कोई खबर ठीक से लिखने को कहो तो संक्षिप्त में चिरक देते हैं और जब संक्षिप्त कहो तो पसेरी भर गोबर भांट देते हैं. अब बटोरिए देर तक.
वैसे चिरकुट और चिरकू दो अलग तरह के प्राणी हैं. जरूरी नहीं कि चिरकुट , चिरकू भी हो लेकिन हर चिरकू चिरकुट होता है. चिरकने पर अच्छा खासा शोर मचता है चिरकने वाले को कोई फर्क · नहीं पड़ता.
अब असांजे को ही लीजिए, उन्होंने भी भरतीय चिरकुओं से प्रेरणा लेकर ही चिरकने वाले संगठन का नाम विकिलीक्स रखा है. वो किस देश और व्यक्ति पर चिरक दे, कहा नहीं जा सकता. अभी भी उसका चिरकना जारी है. उनकी ताजी चिरक के लपेटे में आए हैं अपने राहुल भाई. आगे देखिए किसकी बारी है.
12/18/10
मार्निग वॉकिंग

आजकल वॉक का मौसम है. क्रॉनिक वॉकर्स यानी बारहमासी वॉकर्स तो आलू की तरह कहीं भी मिल जाएंगे लेकिन मौसमी वॉकर्स दिसंबर में ज्यादा पाए जाते हैं. सुबह-शाम धुंध के बीच घूमने का मजा ही कुछ और है. वॉक करते समय दूसरे वॉकर्स को वॉच करने में घूमने का मजा बढ़ जाता है. इस बार एक बनारसी अड़ीबाज के ब्लॉग की चर्चा करेंगे. ब्लॉग का नाम है बेचैन आत्मा. रचयिता देवेंद्र पांडे बनारस में रहते हैं. किसी बडे़ शहर के मॉर्निग वॉकर्स और छोटे शहर के वॉकर्स में काफी फर्क होता है. बड़े शहर के वॉकर्स ब्रैंडेड स्पोर्ट्स शूज और ट्रैक सूट में नजर आते हैं, तो छोटे शहरों में पीटी शू, धोती, पजामा, चप्पल कुछ भी पहने नजर आ सकते हैं. तोंदियल वाकर्स दोनों जगह पाए जाते हैं. जो वॉक के बाद अक्सर दही-जलेबी उड़ाते हैं. देवेंद्र की नई पोस्ट मेरी पहली मार्निग वॉकिंग.. में बात हो रही है एक छोटे शहर बस्ती की. देवेंद्र लिखते हैं.छोटे शहरों की एक विशेषता होती है कि आपको कुछ ही दिनों में सभी पहचानने लगते हैं. इस शहर में नौकरीपेशा लोगों के लिए जीवन जीना बड़ा सरल है. 4-5 किमी लम्बी एक ही सड़क में दफ्तर, बच्चों का स्कूल, अस्पताल, सब्जी मार्केट, डाकखाना, बैंक, खेल का मैदान सभी है. एक पत्नी और दो बच्चे हों और घर में टीवी न हो तो कम कमाई में भी जीवन आसानी से कट जाता है. एक दिन कद्दू जैसे पेट वाले वरिष्ठ शर्मा जी मेरे घर पधारे और मॉर्निग वॉक के असंख्य लाभ एक ही सांस में गिनाकर बोले, पांडे जी आप भी मार्निग वॉक किया कीजिए आपका पेट भी सीने के ऊपर फैल रहा है. घबराकर पूछा,सीने के ऊपर फैल रहा है, क्या मतलब? शर्मा जी ने समझाया, सीने के ऊपर पेट निकल जाए तो समझना चाहिए कि आपके शरीर में कई रोगों का स्थाई वास हो चुका है. हार्ट अटैक , शुगर, किडनी फेल होने आदि की प्रबल संभाना हो चुकी है. डरते-डरते पूछा, कब चलना है? शर्मा जी ने कप्तान की तरह हुक्म दिया, कल सुबह ठीक चार बजे हम आपके घर आ जाएंगे.तैयार रहिएगा. आगे क्या हुआ, इसके लिए क्लिक करिए http://devendra-bechainaatma.blogspot.com
12/11/10
एल्युमनी मीट सी कुछ रातें

इस बात को दो दशक से ज्यादा हो गए लेकिन अभी भी किसी मीठी नींद वाली रातों में क्यूं दिखाई देता है कांफ्रेंस रूम में मेजर का वो चेहरा, कांफिडेंस से भरा जिंदगी में हार ना मानने की नसीहत देता हुआ. सामने चेस्ट नंबर वाले वो चेहरे धडक़ते दिल से अपनी बारी के इंतजार में- सेलेक्शन होगा, नहीं होगा, होगा, नहीं होगा..अब भी क्यूं दिखते हैं कुछ चेहरे, याद आने लगतीं हैं कुछ पुरानी बातें. यादे हैं तो सपने हैं और सपने तो आएंगे ही. माना कि सपने टूटते हैं लेकिन तभी तो हम सपने बुनते हैं. ना जाने क्यूं एल्युमनाई मीट सी लगती है कुछ रातें.
चलिए हो जाए एल्युमनाई मीट जरा हट के. क्यों होती है एल्युमनाई मीट? पुरानी यादों को रिफ्रेश करने के लिए, पुराने दोस्तों को खोज निकालने के लिए, उनसे मिलने और साथ ठहाके लगाने के लिए, नोस्टेल्जिक होने के लिए. एल्युमनाई मीट में ऐसा लगता है कि ढेर सारी विंटेज कारें जमा हों और उनके इंजन शोर मचा रहे हों, इतरा रहे हों. आप भी शामिल हुए होंगे ऐसी किसी किसी मीट में. पता चलता है कि फलां तो बड़ा नेता बन गया, अरे वही चिरकुट दोस्त जो दीवाली के एक हफ्ते पहले से हॉस्टल में जुआ खेलने लगता था. खेल-खेल में एक बार उसका दूसरे हॉस्टल के एक लडक़े से झगड़ा हो गया था और उसने हाथ में काटने की कोशिश की तो उसके सामने के सारे दांत हिल गए थे और सब उसे लेकर भागे तो चीनी डाक्टर के पास. तब पता चला कि ये चीनी डाक्टर दांत पर भी प्लास्टर चढ़ा देते हैं. दो दशक बाद टीवी पर एक चेहरा दिखा मीडिया से मुखातिब. नाम जाना पहचाना, ध्यान से देखा तो याद आ गया...अरे ये तो एंडी राबट्र्स है. पहले तो इसके खूब घुंघराले बाल थे अब तो मैदान साफ है. जीआईसी में साथ पढ़ता था. उसके कैरेबियंस की तरह घुंघराले बाल थे बिल्कुल एंडी राबट्र्स की तरह. कॉलेज के बाद कभी मुलाकात नहीं हुई लेकिन टीवी पर देख सबकुछ याद आ गया. किसी ने बताया कि आर्मी में चला गया था फिर आर्मी छोड़ इंडियन पुलिस सर्विस में आ गया.
आर्मी से याद आया कि एसएसबी एल्युमनाई तो मैं भी हूं. एसएसबी समझ गए ना, डिफेंस सर्विसेज के अफसर बनाने वाला सर्विस सेलेक्शन बोर्ड. मुझे भी झक सवार हुई थी फौजी अफसर बनने की. रिटेन तो हर बार क्वालिफाई कर जाता लेकिन एसएसबी में गाड़ी अटक जाती थी. लेकिन पॉजिटिव सोच और जोश इतना कि ताबड़तोड़ फेस कर डाले कई एसएसबी बोर्ड. इलाहाबाद, बनारस, देहरदून, भोपाल, बेंगलुरू सब. आर्मी, एअरफोर्स, नेवी, कोई भी ब्रांच नहीं छोड़ी. इस दौरान ढेर सारे दोस्त बने. पता नही क्यों अब भी सपनों में कभी दिख जाता है सर्विस सेलेक्शन बोर्ड. याद आ जाते हैं एक मजेदार लमहे और शुरू हो जाती है एल्युमनाई मीट.
एसएसबी के लिए कॉल किए जाने वाले कुछ कैंडीडेट स्मार्ट होते और कुछ नमूने. ऐसा ही एक नमूना भोपाल के एसएसबी बोर्ड में था. चेस्ट नंबर और बेड एलॉट होन के बाद एक चुटई वाले साथी ने अपना बैग खोला तो उसमें एक छोटा प्रेशर कुकर और बड़ी सी कैंडल भी थी. ..अबे खाना तो यहां मिलेगा फिर कुकर क्यों ले आए, और ये कैंडल? ...कॉल लेटर देखो साफ लिखा है ट्रवेल बिद लाइट लगेज. सो लाइट के लिए कैंडल और राशन? आर्मी वाले तो राशन देते हैं सो पकाने के लिए कुकर. अगले दिन ग्रुप टॉस्क में जब उसकी कमांडर बनने की बारी आई तो वो एक कोने में खड़ा हो अपने ग्रुप को भाषण देने लगा ..साथियों मुझे लैंड माइंस से भरी इस खाई पार करने की टास्क दी गई, मैं तुम्हारा कमांडर हूं, इस खाई को पार करने का आर्डर देता हूं, कैसे? ये तुम्हारा काम है. कुछ साथी अवाक थे और कुछ लोटपोट हुए जा रहे थे.
एसएसबी बोर्ड बैंगलुरु. जज एडवोकेट जनरल ब्रांच के लिए हम सब वहां थे. मेरे स्कूल दिनों का एस साथी मेरे बैच में था. सब को किसी टॉपिक पर तीन मिनट का एक्सटेम्पोर लेक्चर देना होता था इंग्लिश में. हम सब हिन्दी मीडियम. यस को ‘या’ बोलने वाले को अंग्रेजीदां समझते थे. उसकी बारी आई तो पता नहीं क्यों वो हर सेंटेंस के बाद बोलता था-या.. जेंटिलमैन ..आज भी जब कोई येस को ‘या’ कहता है तो वो दोस्त याद आने लगता है. पास्ट जैसा भी हो अच्छा लगता सो सेलेक्शन भले ही ना हुआ हो लेकिन एसएसबी बोर्ड जब कभी सपनों में दिखता है तो मैं भी नॉस्टेल्जिक हो जाता हूं एल्युमनाई मीट के साथियों की तरह.
12/6/10
जीयो जी भर के!

जिंदगी है तो ख्वाहिशें हैं और ख्वाहिशें होती हैं हजार. कुछ होती है पूरी और कुछ रह जाते हैं ख्वाब. काश ये होता, काश वो होता. काश, ऐसा हमारे जमाने में होता. जिंदगी के उजाले में जीने के बाद कौन देखना चाहता है अंधेरी रात. लंबी उम्र की तमन्ना किसमें नही होती. सब चाहते हैं कि वक्त गुजरता रहे लेकिन उम्र थम सी जाए. उम्र के हर पड़ाव पर दिल धडक़ता रहे, मचलता रहे, बहकता रहे, कभी बच्चों की तरह कभी युवाओं की तरह. साइंस ने हमारी कितनी ही ख्वाहिशें पूरी की हैं. इसकी बदौलत हम चांद-सितारों तक पहुंचने में कामयाब हुए. तो फिक्र मत कीजिए, साइंस अब हम सब को चिंरजीवी बनाने में जुटा है. आज इसी पर थोड़ी गम-शप हो जाए.
आपको मिलवाते हैं एक खास तरह के ‘एडिक्ट’ से. इनका नाम है प्रवीण साह. जैसे कोई अल्कोहलिक होता और कोई वर्कोहलिक, उसी तरह प्रवीण ‘सा’ साइंसकोहलिक हैं. यानी जो सांइटिफिकली प्रूव किया जा सके वो सच, बाकी सब झूठ. जो तर्कसंगत है वही सच है. इनके ब्लॉग का नाम है ‘सुनिए मेरी भी’. प्रवीण कहते भी हैं कि सुनिए सब की लेकिन विश्वास उसी पर करएि जो साइंस कहे. अपनी ताजा पोस्ट ‘ फिकर नॉट! अब आप रहेंगे ‘जवान’ हमेशा-हमेशा...पर, बच के रहना इस बंदूक से... प्रवीण लिखते हैं- मेरे चिर-यौवन-आकांक्षी मित्रों, एक बड़ी अच्छी खबर है. संभावना व्यक्त की गई है कि अगले दस सालों में ऐसी दवा खोजी जा सकती है जो एजिंग को रोक ही नहीं बल्कि रिवर्स भी कर सके. अब देखिए कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है विज्ञान...क्लोनिंग, स्टेम सेल रिसर्च से खुलती अपार सं भावनाएं, अॅार्गन हारर्वेस्टिंग, टिशू कल्चर, एंटी एजिंग रिसर्च, जीन मैपिंग, जेनेटिक इंजीनियरिंग एक तरफ, दूसरी तरफ यह सभावना भी कि शीघ्र ही मानव मस्तिष्क की सारी इंफारमेशन (एक्सपीरिएंस, रिफ्लेक्सेस, लर्निंग एंड बिहेवियर पैटर्न को) नैनो चिप्स में स्टोर व ट्रांसफर किया जा सकेगा...यानी साफ साफ संकेत हैं कि अमरत्व अब दूर नहीं. आंखें बंद कर सोचिए कि किस तरह का होगा मानव समाज आज से डेढ़-दो सौ साल बाद का.
अब इसी समय एक खबर.. यह भी है..एक्सएम 25 राइफल या यों कहें कि वेपन सिस्टम के बारे में. किसी भी युद्ध में होता क्या है कि योद्धा दीवार, मिट्टïी का टीले या सैंड बैग के पीछे ‘कवर’ लेता है, थोड़ी सी देर के लिए अपना सिर उठाता हैऔर विरोधी पर फायर करता है. यह राइफल सामान्य लड़ाई में कवर लेने को एकदम बेमानी कर देगी..इसको चलाने वाला अपने विरोधी को हर आड़ के पीछे मार सकता है. यानी अब हो गई अफगानिस्तान में तालिबानियों की छुट्टïी. मैं तो आज दिन भर यही सोचूंगा कि मानव जाति पहले क्या पाएगी, कहां पहुंचेगी? अमरत्व या महाविनाश. praveenshah.blogspot.com/2010/12/blog-post_03.html पर क्लिक कर आप भी सोचिए न...
11/2/10
जा बढ़ा के...

मुंबई से आया मेरा दोस्त, उड़ गए उसके होश. सामान उतरना था लखनऊ लेकिन पहुंच गया पटना, अब दोस्त घूमे पहने घुटन्ना. पिछली बार गो एअर दिल्ली जाने वालों को पटना ले गई थी. इस सोमवार को इंडीगो लखनऊ में उतरे 32 यात्रियों का सारा सामान लेकर पटना उड़ गई. मुबई से आए इन यात्रियों ने एअरपोर्ट पर खूब हंगामा किया. पता चला मुंबई से आई इंडीगो की फ्लाइट लखनऊ कुछ लेट पहुंची थी. लखनऊ में उसने जल्दी में 32 यात्रियों को तो एअरपोर्ट पर गेर दिया लेकिन उनका बोरिया बिस्तर उतारे बिना पटना उड़ गई. काफी देर तक यात्री अपने सामान का इंतजार किया. फिर हंगामा शुरू हो गया. पहले तो पता ही नहीं चल रहा था कि 32 यात्रियों का सामान आखिर गया कहां. कहा गया कि उनका सामान मुंबई में ही रह गया है. लेकिन मुंबई से संदेशा आया कि नहीं यहां किसी ‘भैया’ की गठरी नही छूटी है फिर कहा गया कि गलती से लखनऊ के यात्रियों का सारा सामान पटना चला गया है. एक-दो दिन में लखनऊ वापस पहुंच जाएगा. यात्रियों का समझ नहीं आ रहा कि वो क्या करें. किसी को गोरखपुर इंटरव्यू देने जाना था तो कोई दीवाली पर छुट्टियां मनाने आया, कोई अपनों के लिए त्योहार में गिफ्ट लेकर आया था. लेकिन सबका सामान इंडीगो ले गई पटना... जा बढ़ा के...
10/24/10
चांदा चमके चम-चम...

आधा है चंद्रमा रात आधी..रह ना जाए बात आधी..मुलाकात आधी.. ये गाना तो सुना होगा. आज भी ये गाना रोमांटिक लगता है. और जब बात शरद पूर्णिमा की हो तो चांद दीवाना बना देता है. सो आज आधे चंद्रमा की नहीं पूरे चांद यानी शरद पूर्णिमा की बात. इसके अमृत का नशा तो पूरी शरद रितु में छाया रहेगा. और ब्लॉगर्स तो पक्के नशेड़ी होते हैं. किसी को व्यंग्य लिखने का नशा होता है किसी को राजनीति में मजा आता है. कुछ तो छुट्टे सांड़ की तरह नथुने फुलाए सींग उठाए ब्लॉगर हाट में इधर-उघर मुंह मारते फिरते हैं. कुछ बिल्कुल गऊछाप हैं, जो कुछ मिला प्यार से जुगाली करते हजम कर जाते हैं. और कुछ रोमांटिक ब्लॉगर हैं जिन्हें फैंटसी की दुनिया में घूमने का नशा होता हैं. तो आज शरद रितु की ओपनिंग सेरेमनी का जाम फुलमून के नाम.
पता नहीं आपने फील किया है या नहीं.जब बारिश और उमस खत्म हो जाती है, दूब और फूलों में लिपटी ओस धीरे से सहलाती है, चंादनी रात में हरसिंगार की भीनी महक कुछ याद दिलाती. लगता है कही दूर कोई गा रहा है ..आधा है चंद्रमा रात आधी..रह ना जाए तेरी-मेरी बात आधी.. मुलाकात आधी.. मन करता है चलो थोड़ा रूमानी हो जाएं. शरद- शिशिर, ये तो उमंग और उत्सव की रितु हैं. ये उमंग ब्लॉग्स में भी रिफ्लेक्ट होती हैं. पहले शरद पूर्णिमा की रात खुले आकाश के नीचे खीर की कटोरी रखने की परम्परा थी. कहते हैं शरद पूर्णिमा के दिन आसमान से अमृत बरसता है. अमृत का तो पता नही लेकिन अब भी ओस का शीतल अहसास सुकून देता है. शायद यही अमृत है.
शरद पूर्णिमा की शाम कई ब्लॉगर्स ओस रूपी इस अमृत में सराबोर मिले. ‘सहज समाचार’ में अखिलेश उपाध्याय की पोस्ट ‘आज आसमान से पूरी रात बरसेगा अमृत’ में शरद पूर्णिमा के पौराणिक महत्व का बखान है. इसमें बड़ी सहज भाषा में यह बताने की कोशिश की गई है कि यह एक मात्र ऐसा उत्सव है जो सचमुच प्रकृति का अनुपम तोहफा है. जो उत्सव हमें पॉजिटिवटी से भर दे, जो आनंद की प्रेरणा दे और भाईचारे का संदेश लेकर आए, उसे तो अमृत बरसना ही कहा जाएगा. यह कृष्ण की रासलीला का भी उत्सव है. उत्सव का आनंद लेने के लिए http://sahajsamachar.blogspot.com/2010/10/blog-post_3185.html क्लिक करें.
चांद में है कुछ बात ऐसी जो हमें कल्पना लोक में खीच लाती है. चांद ही क्यों, मन की और भी बातें दिल खोल कर लिखने के साथ ही सुनने का भी मन करे तो आपको ले चलते हैं पॉडकास्टिंग या कह सकते हैं ऑडियो ब्लॉग की दुनिया ‘ष्टत्रस्वर’ में. दीवाना बना देने वाले चांद के मस्त गाने सुनने हों तो क्लिक करें http://cgswar.blogspot.com/2010/10/blog-post_21.html
10/22/10
जाना था जापान पहुंच गए चीन

जाना था जापान पहुंच गए चीन वाह भई वाह... साला ये जहाज ना हुआ टेम्पो हो गया. अभी तक ये तो देखा और सुना था कि गलत ट्रेन में बैठ कर कोलकात्ता के बजाय मुंबई पहुंच गए. बनारस में था तो एक दोस्त लाला को लखनऊ के लिए वरुणा पकडऩी थी. लाला चार बजे उनीदा सा उठा. उसे किसी तरह रिक्शा करवाया और मैं सो गया. एक घंटे बाद दरवाजा खटका तो देखा लाला लुंगी लपेटे अटैची लिए खड़ा है. क्या बे लाला, ट्रेन छूट गई क्या? नहीं यार नीद मैं वरुणा के बजाय बक्सर वाली पैसेंजर में बैठ गया था. मुगलसराय से आ रहा हूं्. गलत बस भी लोग पकड़ लेते हैं और टेम्पो सवारियां तो रोज ही रूट को लेकर झिक झिक करती हैं. बस या रेल से आप रास्ते में उतर सकते हैं लेकिन हवाई लहाज से कैसे कूदेंगे. शुक्रवार को तो लखनऊ के अमौसी एअरपोर्ट पर गजबै हो गया. गो एअर के जहाज में पटना के बजाय दिल्ली के यात्रियों को बैठा दिया गया. जब पटना में लैडिंग हुई तो यात्री चकराए कि गुरू ये तो दिल्ली नहीं है. फिर शुरू हुआ हंगामा. सडक़ और रेल पर होते तो स्टेशन और कस्बा पहचान का हल्ला मचाते. अब हवा में कैसे पहचाने के ये पटना वाला रूट है या दिल्ली वाला. और अगर पता भी लग गया कि गलत बैठ गए हैं तो पायलट से भी नहीं कह सकते कि ..अबे उधर कहां ले जा रहा है. और जबरिया रास्ते में उतर भी तो नहीं सकते. धन्य है गो एअर और धन्य हैं यात्री.