8/2/09

तन डोले मेरा मन डोले




सावन मतलब पवन करे शोर, सावन मतलब नागपंचमी, सावन मतलब सांप सपेरे मेले-ठेले. सावन जाने को है तो जाते जाते थोड़ा नागिन डांस की बात हो जाए. आज कल फिर बीन की धूम है. एक तो सावन का महीना और दूसरे लव आजकल में सैफ अली खान और दीपिका पाडुकोण का मस्त नागिन रीमिक्स डांस. कुछ दिन पहले नागपंचमी भी थी. सड़कों पर सांप-संपेरे और बीन की धुन कम सुनाई पड़ी लेकिन टीवी चैनलों ने कसर पूरी कर दी. एक चैनल ने बीन बजाई तो देखादेखी दूसरे चैनल भी नागिन डांस करने लगे. फिल्म नागिन में ...तन डोले मेरा मन डोले... ये कौन बजाए बांसुरिया.. गाने में जो बीन बजी वो आधी सदी बाद आज भी हिट है. उसकी धुन पर आज भी लोग झूम रहे हैं. अब ना तो उतने सांप रहे ना ही सपेरे लेकिन बीन की धुन का नशा बरकरार है. बीन की धुन पर नागिन डांस हिट होने की गॉरंटी है. इसी लिए तो मधुमती फिल्म के गाने... दैया रे दैया चढ़ गयो पापी बिछुआ... में बिच्छू के डसने पर भी बीन की धुन ही बजी. और अब लव आजकल में फिर इसी धुन की धूम है. लोक कथाओं में इच्छाधारी सांपों के बारे में पढ़ा था जो किसी का भी रूप धारण कर सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं. सांपों पर बनी फिल्मों में कभी जितेन्दर, कभी रीना राय तो कभी श्रीदेवी इच्छाधारी नाग और नागिन का किरदार निभा चुके हैं. लव आजकल फिल्म सांप-सपेरों पर नहीं है लेकिन जब इसके म्यूजिक डायरेक्टर इच्छाधारी हो सकते हैं यानी बीन की धुन बजा सकते हैं तो मैं 'इच्छाधारी' क्यों नहीं बन सकता?
पता नहीं क्यों छुट्टी के दिन मैं 'इच्छाधारी' बन जाता हूं. कुछ भी सोचने सोचते कहीं भी पहुंच जाता हूं. छोटी-छोटी बातें और यादें मन को उसी तरह हल्का कर देती हैं जैसा कि ध्यान या योगा के बाद महसूस होता है. ये बचपन की यादें भी हो सकती हैं और एक दिन या हफ्ते पहले घटी कोई घटना भी. जैसे बात सावन के पहले की है. एक दोस्त के रिश्तेदार की बारात में गया था. बारात दरवाजे पर पहुंचते ही नागिन धुन बजने लगी. अचानक देखा कि चमकीली पगड़ी और शेरवानी पहने दूल्हे राजा भी दोनों हाथ ऊपर किए मगन हो नागिन डांस कर रहे हैं. पहली बार दूल्हे को लड़की वालों के दराजे पर डांस करते देखा तो पक्का विश्वास हो गया कि बीन की धुन में कोई जादू है.
समय के साथ भागते और बदलते रहने की जद्दोजहद के बीच पुरानी रेल, कारें, कोठियां, दरख्त, फिल्म, म्यूजिक, गाने और यादों के झोंके रोमांच और रूमानियत से भर देते हैं. कुछ लोग मार्डन कहलाने के चक्कर में पुराने की तारीफ करने में पता नहीं क्यों हिचकिचाते हैं. वे भूल जाते हें कि पुराने की नींव पर ही मार्डनिटी की इमारत खड़ी होती है. आज जो बेहतरीन है वो पुराना होने पर क्लासिकल बन जाती है. क्लासिकल और मार्डनिटी में एक फ्यूजन है जिसे अलग नहीं किया जा सकता. इस फ्यूजन में एक खास तरह का नशा है. इसी लिए तो पुराने गानों और थीम को बार बार नई फिल्मों में लिया जाता है और लोग उसे बड़े चाव से देखते -सुनते हैं. मैं अक्सर रात को पुराने फिल्मी गाने सुन कर सोता हूं. ये मन को सुकून देते हैं. कुछ लोग छुट्टी में पूरे हफ्ते का पेंडिंग घरेलू काम निपटाते हैं, कहीं आउटिंग पर जाते हैं, कुछ बढिय़ा खाते हैं और कुछ चादर तानकर सोते हैं. छुट्टी का असली मजा लेना हो तो आप इच्छाधारी बन अपने तन और मन को बिल्कुल छुट्टा छोड़ दें, बिंदास. तन डोलाने का मन ना हो तो मन डोलाएं फिर देखिए अगले दिन कैसे रिचार्ज होते हैं.

3 comments:

  1. बढिया आलेख है बधाई।

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  2. फोटो कहाँ से ढूढ के ले आए महोदय?
    ये तो प्रोग्राम में था ही नहीं!

    अब हम भी अतवार को पोस्ट नहीं लिखेंगे। बस बैठ कर फिल्म देखेंगे।

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  3. इस नारी के बारे में कहीं पढ़ा था कि शंखिणी है। वास्तव में सुन्दर होगी।

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