6/19/09

चित्रकूट के घाट पर 'केवट' से मुठभेड़


मेरे पापा सबसे बहादुर: घायल इंस्पेक्टर के साथ उनकी बेटी (फोटो: साभार आई नेक्स्ट)
...............आपने देखा होगा १६/६ यानी चित्रकूट में ५० घंटे तक चला लाइव एन्काउंटर. २६/११ से भी ज्यादा देर तक चली मुठभेड़. २६/११ में विदेशी आतंकी थे, १६/६ में था एक देसी डाकू. खबरिया चैनल्स और अखबारों में तीन दिन यह मुठभेड़ सुर्खियों में रही. सब यूपी पुलिस को पानी पी-पी कर गरिया रहे थे. हमेशा यही होता है. क्योंकि एसी कमरे में बैठ कोल्ड ड्रिंक के साथ किसी खबर या कवरेज पर टिप्पणी करना, गल्तियां निकालना बहुत आसान है लेकिन जमीनी हकीकत में बहुत फर्क होता है. ४३ डिग्री की गर्मी में बीहड़ में बिना दाना-पानी पांच घंटे बैठने में बड़ों बड़ों को गश आ जाता है. पुलिस वाले तो ५० घंटे तक डटे रहे. पुलिस की रणनीति में, संसाधनों में लाख कमी हो लेकिन उसके मनोबल और बहादुरी पर सवाल उठाना, मारे गए पुलिस कर्मियों और उनके परिवार वालों का अपमान है. १६/६ की मुठभेड़ में डाकू घनश्याम के मारे जाने के कुछ ही पहले शहीद होने वाले कांस्टेबल वीर सिंह को कमरे में छिपे डाकू ने प्वाइंट ब्लैंक रेंज से गोली मारी. डाकू के पास कोई विकल्प नहीं था. अगर डाकू निकल कर गोली नहीं चलता तो वहीं मारा जाता लेकिन वीर सिंह के पास तो विकल्प था. वह अन्य साथियों की तरह पेड़ या दीवार की आड़ में पोजीशन लिए बैठ सकता था लेकिन उसने तो मिशन पूरा करने के लिए आगे बढ़ कर सांप के बिल में हाथ डाल दिया. वीर सिंह की बहादुरी को सलाम. माना कि पुलिस फोर्स में ढेर सारे लोग तोंदियल और लेथार्जिक हैं लेकिन चुस्त दुरुस्त जवानों की भी कमी नहीं है. अगर ये ना होते तो ५० घंटे में भी डाकू का काम तमाम ना होता.
दूसरी सबसे आसान चीज है सिस्टम को भ्रष्ट कह देना. हम भी तो उस सिस्टम का हिस्सा हैं और हम भ्रष्ट हैं तभी तो सिस्टम भ्रष्ट है. नौकरी के कुछ सालों बाद ही हम तोंदियल, आलसी और आरामतलब हो जाते हैं. जाहिर है हम अपना काम ठीक से नहीं कर रहे या संसाधनों का मिसयूज कर रहे हैं. क्या ये सब भ्रष्टाचार नहीं है? घनश्याम केवट एक निहायत धूर्त और दुर्दांत अपराधी था. जब वह मकान से निकल कर भागा तो लोग उसकी फुर्ती देख कर दंग रह गए. यह उसका फिट और छरहरा शरीर ही था जिसके बल पर वह पचास घंटे तक टिका रहा. यह देख कर मुझे लखनऊ चिडिय़ा घर का वो आदमखोर बाघ याद आ गया जो आधा दर्जन लोगो ंकी जान लेने के बाद पकड़ा गया था. उसने मजबूत पिंजरे में अलग रखा गया था. मझोले कद का एक दुबला पतला यह नरभक्षी कोने में बैठा गुर्रा रहा था. मुझे जू के आलसी और स्थूलकाय बाघ देखने की आदत थी जो कितना भी छेडऩे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते थे. मैंने अनायास ही उसकी ओर हाथ उठा दिया. अचानक वह इतनी जोर से दहाड़ा कि रूह कांप गई. लगा कि पिंजरा तोड़ मुझे कच्चा चबा जाएगा. जू का गार्ड मुस्कराया, साहब यही फर्क है पिंजरे में बंद और जंगली जानवरों में. घनश्याम एक ऐसा ही छरहरा हिंसक जंगली डाकू था. लेकिन आपरेशन घनश्याम केवट पर उंगली उठाने वाले लोग भी मुझे जानवरों जैसे ही लगे जो कमरों में बैठे बैठे आलसी, आरामतलब और स्थूलकाय हो गए हैं

5 comments:

  1. सही कहा है आपने
    पुलिस वाले अगर तोंदियल हैं तो क्या हुआ
    पुलिस वाले अगर भ्रष्टाचारी हैं तो क्या हुआ
    पर कुछ तो हैं जो जांबाज हैं
    कुछ तो हैं जिनकी वीरता का कायल हमें होना ही चाहिये।

    आजकल पुलिस में सब केवल इसलिये जाते हैं कि कमाई अच्छी है देशप्रेम का जज्बा कहीं खो गया है।

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  2. मैं आपकी बात से सहमत बिल्‍कुल सही कहा आपने

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  3. मेरे ब्लॉग पर इन वीर जवानों के लिए श्रद्धांजलि का पोस्ट है।
    सभी लोग ऐसे नहीं है।

    पुलिस वालों की वीरता प्रशंसनीय है। उन्हें नमन।

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  4. बात तो सही है... तस्वीर बहुत कुछ कह गयी.

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  5. mai girijesh jee kee baat se nilkul sahamat hoon paanchon unglian baraabar naheeM hotee isliye hame acche logon ke prayas ko sarahna chaahiye unhen nirutsahit nahee karanaa chahiye un police valon ko meraa naman

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