1/18/09

बुढ़ऊ खेलें कम्प्यूटर

बुढ़ऊ खेलें कम्प्यूटर।
कभी करें मेल
कभी मैसेज फेल
कोई मियामिट्ठू
कोई बजरबट्ट
कंमेंट करे दीदी और भैया
पढ़ पढ़ मगन होएं बुढ़ऊ
धाय धाय लें बलैया
क्या लिख दिया हाय दैया.
सो सीखने की कोई उम्र नहीं होती और न सीखने के दस बहाने होते हैं. अब कमप्यूटर को ही लें. ये अब हमारी लाइफ स्टाइल का हिस्सा बन चुके हैं. अब ये हमारी जरूरत हैं. घर में और बाहर भी. न्यू जेनरेशन कम्प्यूटर एज में ही पल बढ़ रही है. उसके लिए कम्प्यूटर खिलवाड़ है लेकिन ओल्डर जेनरेश में एक बड़े चंक के लिए किसी खलनायक से कम नहीं. उनके पास रेडीमेड बहाना है- अरे अब इस एज में अब कहां कम्प्यूटर सीखें. लेकिन डे टु डे लाइफ में बार-बार ऐसा कुछ होता है कि उनके लिए सिजुएशन थोड़ी एंबेरेसिंग हो जाती है. किसी ऑफि़स में जाते हैं, कोई फार्म भरते हैं, कोई लेटर लिखते हैं तो उनसे कहा जाता है अपना ई-मेल एड्रेस बताइए. साहब बगले झांकने लगते हैं. फिर ऐसे लोग कम्प्यूटर सीख आपरेट करना सीख जाते हैं. अपनी ई-मेल आईडी शान से विजिटिंग कार्ड पर छवाते हैं. दोस्तों से कहते फिरते हैं फलां चीज नेट पर दखी? नहीं देखी तो मैं मेल कर दूंगा. अब उन्हें ए-थ्री, ए-फोर, पेन ड्राइव, जीबी-एमबी, रैम का मतलब पता है. वे हैकिंग की बात करते हैं, क प्यूटर वायरस की बात करते हैं. कुछ लोग कह सकते हैं कि क प्यूटर सैवी कहलाना फैशन है जैसे स्टाइलिश मोबाइल सेट, आईपॉड और दूसरे गैजेट्स लिए गजनी स्टाइल में सिर घुटाकर घूमते यंगस्टर्स माल्स से लेकर मोहल्लों तक में मिल जाएंगे. लेकिन नहीं, कम्प्यूटर अब जरूरत है. इसीलिए तो ढेर सारे लोग हैं जिन्होंने ओल्डर जेनरेशन का होते हुए भी कम्प्युटराइजेशन की गति से तालमेल बैठा लिया है. इसी लिए तो मेट्रोज से शुरू हुआ कम्प्यूटराइजेशन अब छोटे टाउन्स के गली-मोहल्लों तक पहुंच चुका है, मल्टी नेशनल कंपनीज से चला कम्प्यूटर अब यूनिसपैलिटी के दफ्तरों तक में घुस चुका है. भले ही बिजली दफ्तर या नगर पालिका का इम्प्लाई अभी कंप्यूटर पर फर्राटे से काम नहीं कर पा रहा है लेकिन वो काम कर रहा है, बहाना नहीं बना रहा, यह क्या कम है?कम्प्यूटर की बात चले और ब्लॉगिंग पर बात न हो, ये भला कैसे हो सकता है. ब्लागिंग का बुखार भी धीरे-धीरे चढ़ा. शुरू में ब्लॉंिगंग बेकार का शगल माना जाता था. जिन लोगों को इसके बारे में अधिक नहीं पता था या जिन्हें ब्लॉग लिखना नहीं आता था, वे इसे 'टाइमपासÓ या 'टाइम वेस्टÓ मानते थे. लेकिन जब अमिताभ बच्चन, आमिर खान जैसे सेलेब्रिटी और कई जानेमाने इंटेलैक्चुअल्स ने ब्लागिंग के बवंडर में अपने रथ दौड़ा दिए तब से लोग इसे सीरियसली लेने लगे. यह ऐसा ई-लिटरेचर है जिसमें हम अपने समय और समाज का रिफ्लेक्शन देख सकते हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं और जो ओपीनियन जेनरेट करते हैं. जिस तरह तरह लोग मनपसंद किताबे पढ़तें हैं उसी तरह किस ब्लॉग को हम पढऩा या उसपर कमेंट करना चाहते हैं, ये हमारी च्वाइस है. ये देखना सुखद है कि इस ई-प्लेटफार्म पर बड़े बड़े खुर्राट और नौसिखिए, सब हाथ आजमा रहे हैं. अब ये आप पर है कि चाहे इसका लुत्फ लीजिए या कोई बहाना खोजिए.

3 comments:

  1. मुझे लगता है कि ब्लॉगरी करने वाले बेवजह बौद्धिकता, गाम्भीर्य और पांडित्य का लबादा ओढ़ कर बैठ जाते हैं. किसी ब्लॉग पर टिप्पणी तभी सार्थक है जब वह ईमानदारी से की गई हो. कुछ लोग ही ऐसा कर पाते हैं. केवल वाह-वाह , बहुत अच्छे जैसी टिप्पणी तो औपचारिकता ही लगती हंै. मुझे लगता हे कि ईमानदारी और सहजता से की गई टिप्पणी ज्यादा असरकारी होती है. बनावट में माटी की सोधी महक कहां?

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  2. गणतंत्र दिवस पर आपको भी ढेर सारी शुभकामनाएं.
    कंप्यूटर तो आज की पहचान बनगया है .आपने सही लिखा है "छोटे टाउन्स के गली-मोहल्लों तक पहुंच चुका है,"
    जब से लैपटॉप आया है जब से तो ........... अच्छी बात है हम कम्प्यूटराइजेशन की तरफ तेजी से बढ रहे है. अच्छाई के साथ बुराई भी है. ये भी हमें ध्यान रखना है.

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  3. सही कहा, मैंने सबसे अच्छा उदाहरण आपके शहर इलाहाबाद के शम्सुर्रहमान फारुकी का देखा है, कुछ बरस पहले जब मैं उनके घर गया तो देखा कि सर्दियों के दिनों में वे लैपटॉप लिए अपने बिस्तर पर दुबके उर्दू के फांट से मशक्कत कर रहे हैं। उस वक्त तक उन्हें रिटायर हुए पांच-छह साल तो हो ही चुके होंगे। उन्होंने कहा अब मैं लंबे समय तक एक जगह बैठ नहीं पाता तो सोचा लैपटाप पर काम शुरु करूं इसे मैं बिस्तर पर भी बैठकर कर सकता हूं। कई साल पहले उन्होंने शबखून को पहल की तरह ससम्मान विदाई दे दी, मेरी जानकारी के मुताबिक आजकल शायद वर्जीनिया यूनीवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं।

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