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2/19/10

...और फैल गया रायता




ये रायता क्यों फैला है भाई. बारात तो विदा हो गई लेकिन शादी के पंडाल के किनारे ये गाय, कौवे और कुत्ते किस ढेर पर मुंह मार रहे हैं. अच्छा-अच्छा कल रात में यहां भोज था. भुक्खड़ लोग जिस तरह भोजन पर टूट पड़े थे उसे देख कर रात में ये कुत्ते शरमा कर भाग खड़े हुए. अब फैले रायते का आराम से आनंद ले रहे हैं. अभी भी इन सबका पेट भ्रने के लिए यहां बहुत कुछ है. पुलाव, कचौडिय़ां, मटर पनीर, रायता और भी बहुत कुछ, सब गड्ड-मड्ड .
इस तरह का रायता फैलाने वाले लगता है अखबार नही पढ़ते. हाल ही में एक खबर थी कि लोग शादी-समारोहों में खाना बहुत बर्बाद करते हैं. भोज के बाद ढेर सारा खाना फेंका जाता है. यहां बचे हुए खाने की बात नहीं हो रही. वह तो 'प्रजा' में खप ही जाता है . यहां मामला प्लेट में छोड़ दिए गए खाने का है . 'कुक्कुरभोज' के बाद इस खाने को कुक्कुर ही खाते है. अखबार के उसी पेज पर एक और खबर थी जिसमें ग्राफ के जरिए बताया गया था कि गन्ना, चीनी, दाल, गेहूं और तिलहन के प्रोडक्शन में कमी आई है लेकिन मशीनों के प्रोडक्शन में इजाफा हुआ है . फिर भी लोग खाना बर्बाद करते हैं. मैंने कुक्कुर भोज में 'पार्टिसिपेट' करने वालों को ऑब्जर्व किया और पाया कि -
१. भोजन के पहले लोग चाउमीन, चाट-पकौड़े इतना भर लेते है कि 'मुख्य भोजन' के लिए पेट में जगह ही नही रह जाती फिर मन है कि मानता नहीं की तर्ज पर लोग थोड़ा-थोड़ा हर व्यंजन प्लेट में रखते जाते है. अब प्लेट भर जाने पर रायता तो फैलेगा ही.
२.सामूहिक भोज में लोगों को लगता है कि कहीं कोई आइटम खतम ना हो जाए सो दोबारा लेने के बजाय एक बार में ही प्लेट में पहाड़ बना लेते हैं. तभी तो लगता है जैसे प्रीतिभेज में लेाग हाथ में गोवर्धन पहाड़ उठाए घूम रहे हों.
३.भीड़ की रेलम पेल में कुछ लोग जोखिम ना उठाते हुए एक ही बार में सारा कुछ प्लेट में डाल लेते हैं. फिर आधा खा कर बाकी डस्टबिन के हवाले.
काश लोग थोड़ा कम खाते, गम खाते, कुक्कुरों पर नहीं खुद पर तरस खाते. लेकिन जब तक 'बीपी अंकल' और 'डायबिटीज आंटी' से इन्हें डर नहीं लगेगा तब तक इसी तरह रायता फैलता रहेगा.

2/13/10

ब्लॉगर बाबाओं की जय हो



इस समय मौसम सेंटियाना हो चला है यानी बाबाओं का बोलबाला है. कल शिवरात्रि पर भोले बाबा की धूम थी, हरिद्वार महाकुंभ में शाही स्नान के समय हरि की पैड़ी बाबामय हो गई थी. ज्यादातर न्यूज चैनल्स में बाबा विराजमान थे. अब तो ढाबाओं की तरह हर तरफ बाबा ही बाबा दिख रहे हैं. अब संडेे को वैलेंटाइन बाबा का बोलबाला. तो इस बार ब्लॉग्स में बाबाओं के बारें में बात करते हैं. वैसे ब्लॉगर भी किसी बाबा से कम नही होते. जो जी में आया कहा और किसी ने कुछ पलट कर कुछ सुनाया तो सुन लिया. प्रशंसा और आलोचना को समभाव से लेते हैं. अपने कहे को ज्ञानीवाणी और दूसरों की बात को नादानी कहना इनका शगल है. पॉपुलैरिटी के लिहाज से इंडिया के टॉप बाबाओं की तरह ब्लॉगर भी अपनी ऑरा से मुग्ध रहता है. इनमें में ज्यादातर समय के साथ चलने वाले मार्डन किस्म के बाबा हैं. जो टेक्नालॉजी सैवी हैं, शास्त्रीय बातों को नए तरीके से प्रेजेंट करना जानते हैं, उनका पीआर वर्क शानदार है. यही वजह है कि इसमें से तो कई सेलेब्रिटी स्टेटस को प्राप्त कर चुके हैं. पॉपुलैरिटी के मद में अक्सर बाबा लोग पॉलिटिकल लीडर की तरह बतियाने लगते हैं. ऐसे किसी टीवी चैनल पर या प्रवचन के दौरान कहीं भी हो सकता है. अब किस योग गुरू ने हाल में क्या कहा ये सब तो आप देखते और पढ़ते रहते हैं. आइए ब्लॉगर बाबाओं पर नजर डालें.
भोले बाबा की नगरी काशी के ब्लॉगर बाबा अरविंद मिश्र ने http://mishraarvind.blogspot.com पर शिवरात्रि के बहाने से अपने भक्तों (रीडर्स) को बता दिया कि उन्हें शिव तांडव स्तोत्र कंठस्थ है और उन्होंने प्रसाद स्वरूप भक्तों के लिए अपने ब्लॉग में अपनी लेजर डिस्प्ले युक्त? ऑडियो क्लिपिंग लगा दी है. वैसे उनके ब्लॉग क्वचिदन्यतोअपि.. अपने आप में एक बड़ा टंगट्विस्टर है. इसका उच्चारण करते समय बड़े बड़े लर्नेड लटपटा जाते हैं.
एक और सम्मानित ब्लॉगर हैं सुरेश चिपलूनकर. उन्होंने तो महाशिवरात्रि पर अपने ब्लाग http://blog.sureshchiplunkar.com में भक्तों के लिए एक दानपात्र ही लगा दिया है. उनके इरादे नेक हैं और प्रयास सराहनीय. उनके इस प्रयास ने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए हैं कि चिपलूनकर भाई की तरह कभी मैं भी अपने ब्लॉग पर धर्मार्थ कार्य का कोई 'चिपÓ लगा सकता हूं.
अब थोड़ी बात बाबा वैलेंटाइन की भी. कैसी विडंबना है कि वैलेंटाइंस डे आते ही लोग दो खेमो में बंट जाते हैं. एक प्रो और एक एंटी. बाबा वेलेंटाइन किसी भी देश के रहे हों, उनका निस्वार्थ और निश्छल प्रेम संदेश तो पूरी दुनिया के लिए था इसमें धर्म और संस्कृति कहां से आ गए. वेलेंटाइंस डे पर थॉट प्रवोकिंग पोस्ट लिखी है वीरेंद्र कुमार जैन ने http://rachanakar.blogspot.com/ पर. और भी ढेर सारे ब्लॉगर बाबाओं ने भोले बाबा का प्रसाद परोसा है अपनी पोस्ट के बहाने. सो ग्रहण करने के लिए लाइन से आएं.
-राजीव ओझा ने जैसा आइ नेक्स्ट में ब्लॉग-श्लॉग कॉलम में लिखा

2/6/10

इब्ने बतूता राहुल का जूता..उठाओ तो बोले चुर्र...


इब्ने बतूता राहुल का जूता..ता..उठाओ तो बोले चुर्र... आज कल हर जगह जूतों की जयकार है. भला हो इब्ने बतूता, सर्वेेश्वर दयाल सक्सेना और गुलजार का कि जूता राग लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है. शुक्रवार को राहुल मुंबई में थे. कभी यहां कभी वहां. अम्बेडकर प्रतिमा पर फूल चढ़ाने भी पहुंचे. जूता (या चप्पल) रास्ते में उतारी. एक मंत्री जी ने हाथ से उठा कर किनारे कर दिया. उठाने में जूता बोला चुर्र, शिवसेना ने किया गुर्र्र. बोली, देखा कांग्रेस में हैं चापलूसों की जमात, राहुल की क्या करें बात. सुना है राहुल ने लाइन लगा कर लिया रेल टिकट . फिर एटीएम से पैसे निकाले फटाफट. मान लीजिए राहुल को एटीएम से पैसा निकालते देख कोई कांग्रेसी उन्हें दे देता उधार तो मचता एक नया बवाल. शिवसेना कहती ये रोड शो है फेक, कांग्रेसी कहते पार्टी खुश है मराठियों का राहुल प्रेम देख. इब्ने बतूता किसका जूता..उठाने पर बोले चुर्र..असली मुद्दा हो गया फुर्र..

2/2/10

रूम नं. 317


हे रेल देवता ट्रेन थोड़ी लेट कर देना, बड़ी कृपा होगी. आमीन! जा बच्चा ऐसा ही होगा. और उसके बाद हुआ वो जिंदगी भर नहीं भूलूंगा. इसी लिए कसम खाई है कि विश सोच समझ करूंगा, पता नहीं कब सही हो जाए. पिछले दिन अपने आर्गेनाइजेशन के वार्षिक जलसे में आगरा जा रहा था. जलसा आगरा के मशहूर फाइव स्टार होटल मुगल में था. वहां तीन दिन रुकने की उत्तम व्यवस्था थी. पहले दिन दोपहर बारह बजे रिपोर्ट करना था. ट्रेन के आगरा पहुंचने का टाइम सुबह सात बजे ही था. सोच रहा था कि पांच घंटे कहां बिताउंगा सो काश, ट्रेन दो तीन घंटे लेट हो जाए. लेकिन इसके बाद जो हुआ तो कान पकड़ लिए कि रेल देवता से कभी विश नही करूंगा.
ट्रेन सात बजे के बजाय दो बजे आगरा पहुंची. जलसा एक बजे ही शुरू हो चुका था. हांफते हुए होटल में चेक-इन की फार्मेलिटी पूरी की. बताया गया अपको रूम नं. 317 में रुकना है. उसमें मेरे पार्टनर मनोरंजन सिंह थे. उनकी ट्रेन टाइम से थी सो वो सूट-बूट पहन और टाई- टीका लगा, लंच-वंच कर कांफ्रेंस में जा डटे थे. रिसेप्शन पर एअरहोस्टेस जैसी कई 'मुगल बलाएं' मुस्कराते खड़ी थीं मे आई हेल्प यू स्टाइल में. मैंने कहा मास्टर की से मेरा रूम खोल दीजिए, पहले ही लेट हो चुका हूं. एक मलिका ए मुगल ने कहा फालो मी सर. मैंने कहा फास्ट! उसने दौड़ लगा दी. पीछे-पीछे मैं बैग लिए दौड़ रहा था उसी तरह जैसे हीरोइन के पीछे विलेन दौड़ता है. रूम नं. 317 में घुसते ही 'ट्रिपल एस' (शिट, शेव,शॉवर) को दस मिनट में पूरा करने में जुट गया.
बस यही गड़बड़ हो गई. पहले दो काम तो कुशलतापूर्वक निपट गए लेकिन शॉवर लेते समय शामत आई. बाथरूम में एक तरफ बाथ टब होता है, दूसरी तरफ बेसिन और शीशा वगैरह और दोनो के बीच में कमोड. पूरे फर्श पर टॉवेल बिछी होती है. अब टब में नहाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता, उसी में बैठ कर या खड़े होकर नहाना पड़ता है. लोग फिसलें ना इसके लिए टब के अंदर एक रबर की मैटिंग भी बिछी होती है. मेरे टब में मैटिंग बाहर रखी हुई थी. मैं स्लीपर पहने टब में खड़े होकर शॉवर से नहाने लगा लेकिन जैसे ही साबुन का पानी टब की फर्श पर पड़ा कि मैं सटाक से चारों खाने चित. संभलने का मौका ही नहीं मिला. टब के स्लोप के कारण ज्यादा चोट नही लगी लेकिन 'पिछाड़ीÓ के बल गिरने से दर्द तो महसूस हो ही रहा था. तुरंत खड़े हो देखा कि कूल्हे वगैरह सलामत हैं कि नही. दर्द पर ध्यान ना देकर जल्दी से तैयारहो कांफ्रेंस हाल में पहुंचा. लोग हसेंगे इस लिए किसी से गिरने की बात बताई नहीं.
रात को पार्टी-शार्टी हुई. करीब बारह बजे रूम पर पहुंचा. साथी मनोरंजन से थोड़ी गप मारी और लाइट बुझा कर सो गया. सुबह पहले मैं ही उठा. सो रहे मनोरंजन पर नजर पड़ी तो चौंक गया. उनकी नाक पर कट लगा हुआ था और एक आंख के नीचे काला पड़ गया था. जगा कर पूछा ये क्या हुआ. दरअसल सारी लाइट बुझा दी थी इस लिए मनोरंजन रात को अंधेरे में बाथरूम में जाते हुए दरवाजे या किसी और चीज से जा भिड़े थे. रूम नंबर 317 के बाथरूम में एक और बड़ा हादसा टल गया था. मैंने कहा मुझे जगाया क्यों नहीं? बोले आप नींद में थे इस लिए डिस्टर्ब नहीं किया. अब मैं भी खुला कि गुरू इस बाथरूम में दोपहर में तो मैं भी गिरा था. पिछाड़ी में उसकी टीस अभी भी है. एक जोरदार ठहाका और मैंने तीन कसमें खाईं- 1.अब कोई विश नहीं करूंगा 2.टब में स्लीपर पहन कर नहीं नहाउंगा 3. टब में रबर की मैट है कि नही ये पहले चेक करूंगा.

1/29/10

राजू बिन्दास!: ...और फोन पर आई भूत की आवाज

राजू बिन्दास!: ...और फोन पर आई भूत की आवाज

त्रिवेदी की फोल्डिंग और भटनागर की रजाई



अफवाह उड़ी कि डा. प्रदीप भटनागर उदयपुर जा रहे हैं. खबर कितनी सही है ये तो पता नहीं लेकिन इसी बहाने चंडीगढ़ में उनकी रजाई की याद आ गई, जो पराए की लुगाई की तरह पता नहीं कहां गुम हो गई है. अनिल त्रिवेदी अभी भी चंडीगढ़ में ही हैं और मेरी फोल्डिंग फिर उनके पास पहुंच गई है. जिंदगी की कुछ छोटी-छोटी बातें ऐसी होती हैं जो बार-बार याद आती हैं.
बात बनारस की है. कैरियर शुरू ही किया था. मेरे साथ नगवा में मेरा एक दोस्त रहता था. वो इलाहाबाद बैंक में पीओ था. तीन कमरे के एक शानदार किराए के मकान में हम दोनो रहते थे. एक कमरे में मेरी फोल्डिंग लगी रहती थी, दूसरे में उस दोस्त की और तीसरे कमरे में हम दोनों साइकिल खड़ी करते थे जिससे घर भरा-भरा लगे. एक बड़ा सा किचेन और उससे लगा आंगन भी था. अलग-अलग कमरों में इस लिए सोते थे कि मैं देर रात लौटता था और दोस्त को सुबह जल्दी गंगा पार बैंक जाना होता था. मेरा ऑफिस लहरतारा में था. वही लहरतारा जहां कबीरदास जन्मे थे. मेरा जीवन भी फक्कड़ों जैसा ही था. एक फोल्डिंग, रजाई-गद्दा हवा की तकिया, साइकिल और एक अटैची. मेरा दोस्त राजा बेटा था, मैं सोता ही रहता और वो सुबह नहा धो कर पूरे घर में पोंछा लगा कर स्टोव पर दो कप चाय बनाता था और मुझे डरते-डरते उठाता था. मैं भी ऐसे चाय पीता जैसे बड़ा अहसान किया हो. उसके जाने के बाद फिर रजाई तान कर सो जाता. मेरा दिन 12 बजे शुरू होता. एक बार फिर से चाय बनाता. मस्ती में दिन कट रहे थे.
उस समय हमारे संस्थान में अनिल त्रिवेदी और प्रदीप भटनागर भी थे. दोनों से मेरी खूब छनती थी. एक साल बाद लखनऊ लौटने की घड़ी आ गई. फोल्डिंग बनारस में ही अपने मित्र अनिल त्रिवेदी को दे दी. साइकिल, होल्डाल, अटैची उठा कर चला आया लखनऊ. कैरियर की ज़द्दो-जहद में दो दशक कैसे बीत गए पता ही नहीं चला. इस बीच त्रिवेदी जी कलकत्ता होते हुए चंडीगढ़ पहुंच गए थे. इत्तफाक से प्रदीप भटनागर भी वहीं थे. संयोग से दो दशक बाद मैं भी वहां पहुंच गया. अनिल और मैं एक संस्थान में और प्रदीप दूसरे में. हम तीनों घर-परिवार वाले हो चुके थे लेकिन मैं और प्रदीप बच्चों के कैरियर के चलते परिवार वहां नहीं ले गए थे. हां, त्रिवेदी जी के साथ उनका परिवार था. मैं चंडीगढ़ वासियों के बीच यूपी के पइये (भैये) और छड़े (फोस्र्ड बैचलर) का लेबल लगाए बछड़ों की तरह उछल कूद मचाता था. यहां भी मेरे साथ एक बैग और कंबल ही था. त्रिवेदी जी बगल में ही रहते थे. एक गद्दा खरीद कर जमीन पर डाल दिया था. त्रिवेदी जी ने यह देखा तो बोले यार फोल्डिंग पड़ी है ले लो. अरे वही वाली जो बीस साल पहले दे गए थे. बीस साल बाद उसी फोल्डिंग पर लेट कर सेंटीमेंटल होने की अब मेरी बारी थी.
चंडीगढ़ में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. कंबल अच्छा था इस लिए उसके नीचे एक ऊनी शाल लगा कर ओढऩे से मेरा काम चल जाता था. इसी बीच प्रदीप भटनागर का तबादला भोपाल हो गया. एक दिन मेरे एक और साथी पीयूष मेरे कमरे में आए और सिर्फ कंबल देख कर परेशान हो गए कि अरे आपको तो ठंड लगती होगी. बोले, प्रदीप जी की रजाई मेरे पास रखी है, ले आता हूं. लाख कहने पर कि मुझे कोई दिक्कत नहीं, पीयूष मुझे प्रदीप की रजाई दे गए. मेरी सर्दी और आराम से कटने लगी. कुछ महीनों बाद घर लौटने का संयोग बन गया. मैंने रजाई पीयूष को थमाई, फोल्डिंग फिर धन्यवाद के साथ त्रिवेदी जी को दे दी और गद्दा एक और साथी को पकड़ा दिया. बैग उठाया और चला आया. कुछ दिन बाद पीयूष भी दूसरे शहर चले गए. त्रिवेदी जी अभी भी चंडीगढ़ में ही डटे हैं. कुछ दिन पहले दो खबरें मिली, एक- डा. प्रदीप भटनागर उदयपुर में संपादक बन कर जाने वाले हैं. दूसरी- पीयूष फिर चंडीगढ़ लौट रहे हैं. सो त्रिवेदी जी की चारपाई (फोल्डिंग) और प्रदीप जी की रजाई और अपनी तनहाई (फोरस्र्ड बैचलरशिप) याद आने लगी. पीयूष से पूछा कि वो रजाई कहां हैं लेकिन उन्हें ठीक से याद नही. फिलहाल प्रदीप जी हिसार में ही हैं और उनकी रजाई की खोज की जा रही है.

1/22/10

...और फोन पर आई भूत की आवाज


अचानक मेरे एक साथी का फोन आया नए वर्ष की बधाई देने के लिए लेकिन मुझे भूत-पिशाच याद आने लगे. मेरे नाम के आगे ओझा जरूर लगा है लेकिन भूत से कोई वास्ता नहीं पड़ा है अभी तक. पता नहीं क्यों मेरे साथी अमित गुप्ता का फोन आते ही भूत याद आने लगते हैं. अमित अम्बाला के रहने वाले हैं. अभी पानीपत में एक बड़े अखबार में बड़े पद पर हैं. बात उन दिनों की है जब मैं चंडीगढ़ में था और अमित अम्बाला में हमारे अखबार के करेस्पांडेंट थे. एक दिन परेशान से अमित ने फोन किया कि सर तबियत ठीक नहीं है. पूछा, वायरल हो गया या कोई और परेशानी है? अमित ने जो कारण बताया तो परेशान होने की बारी मेरी थी. अमित ने फोन पर एक भूत से बात कर ली थी और तब से परेशान थे. अमित गंभीर किस्म के संजीदा इंसान हैं और उनसे किसी मस्खरेपन की उम्मीद नहीं की जा सकती. लेकिन उनके साथ जो कुछ हुआ, उसका कारण अमित को नहीं समझ आ रहा था.
हुआ ये कि अमित के एक साथी ने राजस्थान से लौटने पर उसे बताया कि आज कल वहां के कुछ शहरों में एक भूत का फोन चर्चा में है. उसने अमित को एक नंबर दिया और कहा कि ये भूत का नंबर है और कई लोगों ने उससे बात की है. अमित ने नंबर तो ले लिया लेकिन मजाक समझ कर इस पर ध्यान नहीं दिया. फिर शाम को अचानक उसने अपने मोबाइल से वह नंबर डॉयल किया. उधर से कोई रिस्पांस नहीं मिला.
अगले दिन सुबह करीब नौ बजे अमित ने यूं ही सोचा कि चलो पीसीओ से ट्राई करते हैं. उसने पीसीओ से नंबर घुमाया तो उधर से किसी ने कहा हैलो. अमित को लगा कि शायद रांग नंबर लग गया. 'आप कौन?' उधर से आवाज आई , यार अमित परेशान क्यों कर रहे हो. अमित के रोंगटे खड़े हो गए. उसने हिम्मत करके फिर पूछा, आप मुझे कैसे जानते हैं, अपना नाम बताइए. उधर से किसी महिला के सिसकने और बच्चे के रोने की हल्की आवाज बीच बीच में सुनाई पड़ रही थी. उधर से फिर आवाज आई कि नाम जानने से क्या होगा, तुम हमारी मदद तो कर नही सकते. अमित बोला नहीं, मैं जर्नलिस्ट हूं. तुम्हारी मदद कर सकता हूं. उसने कहा, तो मैं आ जाऊं? हां, आओ, अमित के इतना कहते ही उसे करेंट के तेज शॉक जैसा लगा और रिसीवर हाथ से छूट गया. अमित का दिल तेजी से धड़क रहा था. उसने फिर हिम्मत कर नंबर घुमाया लेकिन उधर से, दिस नंबर डज नाट एग्जिस्ट की रिकार्डेड टोन सुनाई पड़ी. उलझन और बढ़ गई जब पीसीओ वाले ने बताया कि आप की बात तो हुई है लेकिन मीटर जीरो काल बता रहा है, कोई बिलिंग नही हुई. दिन में अमित ने कई बार कोशिश की लेकिन उस नंबर से यही जवाब मिलता रहा कि दिस नंबर डज नाट एग्जिस्ट. अमित ने अगले दिन एक्चेंज से संपर्क किया तो पता चला कि ये नंबर जयपुर साइड का है पीसीओ के नबर पर कॉल का रिकार्ड नहीं है. . अमित के साथी ने जयपुर एक्चेंज से जानकारी मांगी तो बताया गया कि ये नंबर जिनका था उनकी पूरी फैमिली की एक साल पहले रोड एक्सीडेंट में डेथ हो चुकी है. अब तो अमित को बुखार चढ़ गया. दो तीन दिन बाद नार्मल होने पर अमित ने ऑफिस आकर ये दास्तान सुनाई.
फिर क्या था वो नंबर पूरे ऑफिस में बट गया. हम लोंगों ने खबर भी छापी. सब ने नंबर लगाया लेकिन रिसपांस नही मिला. मैंने तो कई बार अकेले अपने रूम में अंधेरा कर रात दो बजे फोन लगाया कि शायद भूत से बात हो जाए लेकिन नो रिसपांस.
जब भी अमित का फोन आता है तो ये घटना याद आ जाती है. सुना है ठंडी स्याह रातों में सुनसान रास्तों पर भूतों का डेरा होता. रोज रात को करीब एक बजे अकेले की लौटता हूं. रास्ते में मिलता है 200 साल पुराना एक बरगद का पेड़, ठिठुरता हुआ चौकीदार, दुकान के शेड में रिक्शे के ओट में लेटा जाड़े को कोसता रिक्शेवाला, उसके फटे कम्बल में दुबका एक पिल्ला. और एटीएम केबिन में ऊंघता गार्ड. मुझे तो नही मिले आपको भूत या चुड़ैल तो कभी मिले हों तो बताइएगा.

1/3/10

सुना है उस चौखट पर अब शाम रहा करती है ...




मुझे पता नही क्यों एक गाना याद आ रहा है- चुन-चुन करती आई चिडिय़ा, दाल का दाना लाई चिडिय़ा, मोर भी आया कौआ भी आया...ये गाना तो बहुत पुराना है. लेकिन ऐसा ही गाना तो आजकल भी गाया जा रहा है. हां, सुर और स्वर थोड़ा बदले हुए हैं. आजकल चुन-चुन करनेवाली चिडिय़ा से कही ज्यादा पॉपुलर है ट्वीट-ट्वीट करने वाली चिडिय़ा और इसका नाम है ट्विटर. बात चाहे खास की हो या आम की, ट्विटर बोलती जरूर है. कभी कभी तो ट्वीट-ट्वीट के बाद कांव-कांव शुरू हो जाती है. शशि थरूर, चेतन भगत, आमिर खान, अमिताभ बच्चन और ऐसे ही दूसरे सेलेब्रिटी की ट्वीट्स, स्क्रैप्स और ब्लॉग्स पर बीच-बीच में हंगामा खड़ा हो जाता है. लेकिन सोशल कम्युनिटी साइट्स पर इन सब के अलावा भी ढेेर सारे ऐसे लोग भी हैं जो सेलेब्रिटी तो नहीं हैं लेकिन आपके अपने हैं, अजीज हैं. कोई आपकी सामने वाली लेन या कालोनी रहता है, कोई दूसरे शहर में, कोई विदेश में और कोई पता नहीं कहां रहता है लेकिन है आपका दोस्त.
कुछ ऐसे दोस्त या जाने-पहचाने चेहरे होते हैं जिनको रोज हैलो कहने, देखकर मुस्कराने और यूं ही गपियाने की आदत पड़ चुकी होती है. इसमें होता है आपका पुराना क्लासफेलो जो दूसरे शहर में रहता है, अपका कोई कलीग जो अब दूसरे आर्गेनाइजेशन में काम करता है या कोई पुराना साथी जो कई वर्षों बाद अचानक आपको खोज निकालता है. ऑरकुट और फेसबुक पर अचानक उसका चेहरा प्रकट हो जाता है और ट्विटर पर उसकी ट्वीट सुनाई पडऩे लगती है. अपको रोज कुछ ना कुछ भेजता है. कम्प्यूटर खोलते ही आपके काम के बीच अचानक आ टपकता है. चैटिंग करता है कभी शरारत तो कभी संजीदगी से कि यार मेरा ब्लॉग देखो, मेरा प्यार देखो, ये देखो वो देखो, कुछ याद आया. कभी कोई प्यारा सा कमेंट तो कभी मैसेज यूं ही आ टपकता है. चैटिंग और ब्लॉगिंग करते हुए हमें उनकी आदत पड़ चुकी होती है. कब वो हमारी जिंदगी के एक जरूरी हिस्सा बन जाते हैं, हमें पता ही नहीं चलता.
लेकिन कभी सोचा है कि ब्लॉग्स, ऑरकुट, ट्विटर, फेसबुक जैसे तानेबाने से अचानक कोई चला जाए तो कैसा लगता है. हम, आप, कोई भी हो सकता है. तब उनके ब्लॉग्स को कौन आगे बढ़ाएगा, कौन ट्वीट करेगा.
सोशल कम्युनिटीज में कितने लोग हैं जो अपना पासवर्ड शेयर करते हैं? यहां तक कि उनके अपनों को भी नहीं पता होता. नेट पर तो हम बहुत सोशलाइज्ड दिखते हैं लेकिन पासवर्ड के मामले में बहुत पजेसिव.
सब कुछ ठीक चलता रहता है. तभी अचानक किसी के ब्लॉग पर नई पोस्ट् आना बंद हो जाती हैं, ऑरकुट पर स्क्रैप रुक जाते हैं, मिलने की प्रॉमिस धरी रह जाती है, बहस बंद हो जाती हैं, लोग उसके ब्लॉग पर बार-बार आते हैं, बार-बार मायूस होते हैं. नो चैटिंग, नो ब्लॉगिंग, नो हैलो...ट्विटर फुर्र से उड़ जाती है. क्लिक्स धीरे-धीरे कम होते होते खत्म हो जाते हैं. पता चलता है कि नेट का कोई नॉटी अब नहीं रहा या कोई हादसा किसी ब्लॉगर को ले गया. तब याद आने लगती हैं ये लाइनें...छोड़ आए हम वो गलियां... जहां तेरी एड़ी से धूप उड़ा करती थी सुना है उस चौखट पर अब शाम रहा करती है ...
उसके ब्लॉग और बातें कुछ दिन तक याद आते हैं फिर धीरे धीरे सब भूल जाते हैं. जैसे साथ चलते चलते कोई यूं ही खो जाए. सुबह दोपहर शाम, रात चौबीस घंटे जिससे बात होती हो वो अचानक चुप हो जाए, बिना किसी गिले शिकवे, किसी अपेक्षा के चुपके से निकल जाए. उस गली में, उस रास्ते पर दोस्तों का जाना धीरे-धीरे कम हो जाए और फिर वो रास्ता ही गुम हो जाए. कैसे जीवंत सा लगने वाला वाला स्क्रैप बोर्ड अचानक इतिहास का एक दस्तावेज बन जाता है और आर्काइव्ज में रह जातीं कुछ यादें कुछ बातें, कुछ सवाल अनसुलझे, अनुत्तरित.
हाल ही में कुछ ऐसे ही जाने पहचाने चेहरे और नाम अचानक गुम हो गए तो नॉस्टेल्जिक हो गया. इस बारे में तो सोचा ही नहीं था. लेकिन वो सच था तो ये भी सच है कि जब हम सोशल कम्युनिटीज पर हैपी मोमेंट्स शेयर कर सकते हैं तो पासवर्ड भी शेयर करें, कम से कम उससे जो आपके सबसे करीब हो, सबसे अजीज हो. ताकि उस चौखट पर शाम को कोई चिराग टिमटिता रहे कोई बार-बार याद आता रहे.

12/29/09

मार देब चोट्टा सारे...


मेरे पड़ोस में एक अधिकारी रहते थे. आजमगढ़ के रहने वाले थे. छुट्टियों में कभी-कभी उनका एक भतीजा आता था नाम था बंटी. उम्र यही कोई आठ-नौ साल. खाने पीने में थोड़ा पिनपिनहा. मैं और अधिकारी का बेटा अक्सर बंटी को छेड़ते थे, कुछ यूं- बंटी, दूध पी..ब ? नाहीं.. बंटी, बिस्कुट खइब..? ना...हीं... बंटी, चाह पी ब... ना..आं... दू घूंट मार ल...मार देब चोट्टïा सारे. इतना कह बंटी पिनपिनाता हुआ उठ कर चला जाता था. कुछ दिन पहले एक वाक्या बंटी की याद दिला गया.
मैंने सोचा कुछ ब्लॉगर्स जो अच्छा लिखते हैं, उनकी काबिलियत का फायदा अपने पेपर के लिए उठाया जाए. दो-तीन लोग शार्ट लिस्ट हुए. इत्तफाक से सभी हाईफाई प्रोफाइल, हाई सैलरी वाले थे. ब्लॉग में पूरा पुराण लिख मारते हैं तो एक पेज पेपर के लिए लिख ही देंगे. ब्लॉग से शायद ही पैसा मिलता हो लेकिन इन लोगों से अनुरोध कर लिखवा रहा था इस लिए शिष्टाचार में जो टोकन पारिश्रमिक दिया जाता है वो भेजने के लिए उनका पता मांगा गया. कुछ पारिश्रमिक भेज रहे हैं, यह कहने पर एक ने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया- इट डज़न्ट मैटर, दूसरे ने चुपचाप रख लिया और दो अच्छे लेख और भेज दिए. लेकिन तीसरा, ब्लॉगरों में 'बंटी' निकला. बड़े मनुहार के बाद लिखा. लेकिन जब पैसे का चेक पहुंचा तो दिन में दो बार फोन किया. पहले कहा कि इसमें से सौ रुपया तो टैक्स कट जाएगा. मैंने कहा ज्यादा सैलरी वालों का तो कटता ही है. शाम को फिर फोन आया. अब गोलबंद प्रवक्ता की तरह, इतना तो मिस्त्री-प्लंबर की एक दिन की पगार है.
अब 'बंटी'नहीं खिसियाने की बारी मेरी थी. कहा, अरे पान में चूना समझ कर चबा जाइए. तो ही ही करने लगे जनाब, अरे मैं तो मजाक कर रहा था. दिन में दो दो बार फोन कर कोई पिपिनाए और फिर कह दे मैं तो मजाक कर रहा था. ऐसे में 'बंटी' तो याद आएगा ही.

12/25/09

डा. कलाम और अनुष्का



आज आपको अनुष्का के बारे में बताते हैं. अनुष्का लखनऊ के लामार्टिनियर गल्र्स स्कूल में पढऩेवाली एक बच्ची है. आम बच्चों की तरह वो भी उन लोगों से मिलना चाहती है, उनके आटोग्राफ लेना चाहती है जो उनके रोलमॉडल हैं. पिछले कुछ दिनों से बीमार होने की वजह से अनुष्का स्कूल नहीं आ रही थी. उसे पता चला कि पूर्व राष्ट्रपति डा. कलाम मंगलवार को लामार्टिनियर आ रहे हैं बच्चों से मिलने. तो बीमार होने के बावजूद वह भी ड्रेस पहन कर पहुंच गई स्कूल उनसे मिलने. हाथ में एक छोटा सा बुके और खुद बनाया गया ग्रीटिंग कार्ड. लेकिन मिलने वाले बच्चों की लिस्ट में उसका नाम नहीं था और सुरक्षा कारणों से उसे डा. कलाम से मिलने की इजाजत नहीं मिली. मायूस अनुष्का स्कूल केबाहर ही अपनी मां के साथ खड़ी हो गई कि डा. कलाम जब बाहर निकलेंगे तो शायद हाथ मिलाने का मौका मिल जाए. लेकिन पुलिस वालों ने वहां भी ज्यादा देर नहीं खड़े होने दिया. मायूस मां-बेटी काफी दूर मोड़ पर अकेले खड़ी थीं. हमारा प्रेस फोटोग्राफर विकास बाबू ठिठका सूनसान रोड पर एक बच्ची को बुके लिए खड़े देख. अनुष्का और उसकी मां के आंखों में अपने रोल मॉडल से ना मिल पाने के कारण आंसू थे. उसने सलाह दी कि अब डा. कलाम गवर्नर हाउस जाएंगे. वहां कोशिश कर लीजिए. फोटोग्राफर भी राजभवन पहुंचा तो वहां भी मां-बेटी बुके लिए खड़ी मिली. राजभवन के गेट पर सेक्योरिटी वाले ने साफ मना कर दिया कि अप्वाइंटमेंट नही है तो नहीं मिल सकते. अनुष्का ने कहा प्लीज मरो कार्ड और बुके ही पहुंचा दीजिए अंदर. सब ने हाथ खड़े कर दिए. अनुष्का गेट पर खड़ी फिर रोने लगी. बच्ची को देख फोटोग्राफर भी परेशान था. इसके पहले डा. कलाम यूपीटीयू कैम्पस में थे और फाटोग्राफर विकास वहां भी था. उसने डा. कलाम के देर तक फोटो खीचे थे. लेकिन यहां वह कुछ मदद नहीं कर नही पा रहा था. तभी वीवीआईपी सिक्योरिटी में लगा एक सीनियर अफसर विकास को देख कर रुक गया. अरे, आप तो यूपीटीयू में भी थे. आपको अभी और फोटो चाहिए. विकास ने उनसे अनुष्का का बात बताई. अधिकारी ने कहा कि डा. कलाम अभी लंच कर रहे हैं फिर दिल्ली लौट जाएंगे. मुश्किल है मिल पाना. फिर भी कोशिश करते हैं. मायूस अनुष्का लौटने जा रही थी. तभी अंदर से मैसेज आया, मां-बेटी को अंदर भेजिए. डा. कलाम ने प्यार से अनुष्का को पास बैठाया, आटोग्राफ दिए, उसकी पढ़ाई के बारे पूछा, फोटो खिंचवाई. डा. कलाम ने अपने सेक्रेटरी की हिदायत दी कि ये फोटो अनुष्का को जरूर भिजवा दें. अनुष्का खुशी- खुशी बाहर आई. उसका चेहरा फूलों की तरह खिला हुआ था. तो ऐसे डा. कलाम और ऐसे हैं आजकल के बच्चे. इस जज्बे को सलाम.

12/24/09

हम सब में है एक मंजुनाथ



खबर आई है कि मंजुनाथ पर फिल्म बनेगी. आजकल के यंगस्टर्स मंजुनाथ की तरह ही हैं. हंसमुख, फिल्मी गाना गुनगुनाते अपने में ही मगन. मंजुनाथ जब आईआईएम लखनऊ में थे तो उन्होंने अपना एक रॉकबैंड ग्रुप बनाया था नाम था 3.4 केएम. क्योंकि मेन रोड से आईआईएम की दूरी इतनी ही थी. यही पैशन अब युवाओं के सर चढ़ बोल रहा है.
दो दिन पहले एक सर्वे आया था. यह दख कर सुखद आश्चर्य हुआ कि चीन की तुलना में भारत कहीं ज्यादा यंग है. इंडिया का यूथ ड्रीमिंग, डेयरिंग, क्रिएटिव और कांशियस है. यंगस्टर्स का नजरिया अपने भविष्य को लेकर साफ है. आज का यूथ केवल सपना ही नही देखता है, उसे पूरा करने के लिए जोखिम उठाने को भी तैयार है. उसे पता है कि यंग होने का मतलब कम उम्र का होना ही नहीं, नया सोचना भी है. तभी तो उसने आपने रोल मॉडल्स में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अमिताभ बच्चन से ऊपर रखा है. डॉ. कलाम यूं ही नहीं 2020 तक एक बेहतर भारत का सपना देखते हैं. संयोग से हाल ही में डॉ. कलाम लखनऊ में थे. उनका जोर यंगस्टर्स को सही दिशा देने पर था. उन्होंने एक बार फिर युवाओं को उनकी ताकत का एहसास कराया. चार महीने पहले भी उन्होंने यही बात कही थी कि हम अपनी ताकत को समझें, अपनी पहचान बनाएं. हम क्या ऐसा नया करें जिससे लोग हमें याद करें. इसी विजन ने डॉ. कलाम को बुलंदियों पर पहुंचाया और मिसाइलमैन की पारखी नजर अगर यंगसटर्स में 2020 के वल्र्ड चैम्पियन्स देख रही है तो इसमें गलत क्या है.
एक और बात. मंजुनाथ षणमुगम पर फीचर फिल्म बनाई जाएगी. सवाल उठता है मंजुनाथ ही क्यों? दरअसल आज हर संजीदा यंगस्टर में एक मंजुनाथ सांस लेता है. देखने में सीधासाधा, जॉली और बात-बात पर फिल्मी गाना गुनगुनाने वाला लेकिन करप्शन और अन्याय के खिलाफ लड़ाई में जान की बाजी तक लगा देने वाला. डॉ. कलाम ने युवाओं की आखों में यही तूफान देखा है. तभी तो वो कहते हैं 2020 हमारा है.
अगली कड़ी में डा. कलाम और अनुष्का.

12/20/09

याद आएंगे रामलाल


अखबार में काम करता हूं. हत्या, हादसा और भी तमाम बुरी खबरें आती रहती हैं. हम बिना विचलित हुए अपना काम करते रहते हैं. लेकिन कभी कभी कोई खबर दुखी कर जाती है. संडे रात खबर आई कि पुलिस हेड कांस्टबल की कार्बाइन छीन कर उसकी हत्या कर दी गई. मरने वाले का नाम था रामलाल.
सुन कर जैसे झटका लगा. वही राम लाल तो नहीं जिससे हर दूसरे -तीसरे दिन स्कूल के गेट पर मुलाकात हो जाती थी. वही रामलाल जिसने दो दिन पहले ठेले से अमरूद छाटने में मेरी मदद की थी, वही रामलाल जो सोने के दाम बढऩे परेशान था. उसे अपने छोटे बेटे की शादी करनी थी और गहने के लिए पैसे कम पड़ रहे थे. वही रामलाल जिसे देख कर लगता था कि इतना सज्जन व्यक्ति पुलिस में क्यों है. वही रामलाल जो मुख्यमंत्री के ओएसडी की सुरक्षा में तैनात था, वही रामलाल जो ेहमेशा कार्बाइन अपने साथ रखता था. वही राम लाल जो स्कूल के माली की हार्टअटैक से मौत पर दुखी था कि उसकी उम्र तो ज्यादा नही थी.
नहीं पता था कि वीवीआईपी की सुरक्षा में तैनात रामलाल खुद इतना असुरक्षित था. दूसरों के प्रोटेक्शन के लिए जिस कार्बाइन को वो हमेशा अपने साथ रखता था वही उसकी मौत का कारण बन गई. रामलाल से बस थोड़ी दिनों की इतनी सी जान पहचान थी. मेरी ओर से उसे छोटी सी श्रद्धांजलि.

12/13/09

मेरा पहला प्यार!




पिछले हफ्ते की ही तो बात है, अपनी प्रिया की सर्विर्सिंग कराई थी. उसका टायर बदलावाया था. नया सीट कवर लगवाया था. कितनी फ्रेश फ्रेश लग रही थी अपनी प्रिया. कुछ यंग सी, कुछ इठलाती सी. एक बार फिर फिर फिदा हो गया था उस पर. मैकेनिक से पूछा आयल-वायल तो चेक कर लिया है ना, कारबोरेटर साफ किया कि नहीं. अरे साहब गाड़ी बिल्कुल मक्खन है. फिर ना जाने क्या सूझा कि उससे पूछ बैठा, अच्छा बताओ कितने में बिकेगी. अरे साहब, बेचने की बात मत कीजिए, बेचना ही होगा तो मुझे दे दीजिएगा. अब ऐसी गाड़ी बनती कहां है. अरे हां, प्रिया का बनना तो कई साल पहले ही बंद हो चुका है. अब खबर आई है कि बजाज कंपनी मार्च के बाद स्कूटर बनाना बंद कर देगी. वेस्पा, लैम्ब्रेटा, प्रिया, बजाज 150, सुपर, चेतक, और इलेक्ट्रानिक, सब बंद हुईं बारी-बारी. अब बजाज कंपनी स्कूटर ही बनाना बंद कर देगी. सुन कर कुछ अच्छा नहीं लगा. इस लिए नहीं कि बाइचांस मेरे पास शुरू से प्रिया ही रही है, बल्कि इस लिए कि वेहिक्ल्स की भीड़ में एक जाना पहचाना चेहरा अब दिखना बंद हो जाएगा. वैसे भी धीरे-धीरे सड़कों पर स्कूटर दिखने कम हो गए हैं. प्रिया और बजाज तो वैसे भी बहुत कम दिखती हैं. लेकिन उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी उसे अलविदा कहने का समय आ जाएगा. अचानक मुझे प्रिया पहले से ज्यादा प्रिय, क्यूट और इनोसेंट लगने लगी. याद नही पड़ता कि इसने कभी निराश किया हो. प्रचंड गर्मी, आंधी-पानी, तूफान या वाटर लागिंग, कहीं भी कभी धोखा नहीं दिया, शिकायत नहीं की, कोई डिमांड नहीं की.

मेरे लिए तो खबर बहुत बड़ी थी. पूरा एक जमाना आंखों के सामने घूम गया. स्कूटर से जुड़ी कितनी खट्टïी-मीठी बातें याद आने लगी. कैसा संयोग है कि स्कूटर चलाना मैंने लैम्ब्रेटा से सीखा लेकिन दिल दे बैठा प्रिया को. लैम्ब्रेटी भी लाजवाब थी लेकिन उस समय भी मुझे प्रिया अधिक स्लिम, शोख, चुलबुली और स्मार्ट लगती थी. क्या गजब का पिकअब था. कालेज डेज में दोस्त की बजाज पर ट्रिपलिंग करना तो जैसे आम बात थी. कभी कभी तो शरारत में चार लोग भी लद जाते थे. लेकिन कोई फर्क नही पड़ता था. किसी भी शहर में बजाज स्कूटर पर पूरी फैमिली दिखना आम बात थी. अभी भी याद है कि एक दिन बगल में रहने वाले अंकल कुछ परेशान से आए. उनके बेटे का एग्जाम था और मोटरसाइकिल स्टार्ट नहीं हो रही थी. मैंने कहा था, बस दो मिनट अंकल अभी छोड़ता हूं. ठीक से दो किक भी तो नहीं मारनी पड़ी थी अपनी प्रिया में और गड्डी चल दी थी छलांगा मार दी. इस स्कूटर ने हर परीक्षा की घड़ी को पास किया. कितने ही मौके आए जब वह सिर्फ सवारी नहीं सहारा भी बन कर खड़ी थी. बेटी को स्कूल छोडऩे जा रहा था. रास्ते में पिछला पहिया पंक्चर हो गया. बेटी के चेहरे पर परेशानी के भाव थे. मैंने एक ईंट उठाई, गियरबाक्स के नीचे लगाई स्कूटर टेढ़ी की, बेटी से कहा, बस जरा सा सहारा दिए रहो. सिर्फ दो मिनट लगे थे पहिया बदलने में. अगले पल दौड़ रही थी प्रिया फर्राटे से. बेटी के चेहरे पर मुस्कान थी. ऐसे लम्हे तो कई हैं जब हम कभी प्रिया पर इतराए, कभी मुस्कराए तो कभी शरमाए. बात कुछ साल पहले की है. स्कूटर की डेंटिंग-पेंटिंग और ओवरहालिंग कराई थी. बिल्कुल नई नवेली दुल्हन की तरह लग रही थी. स्कूल में बच्चों की छुट्टी होने वाली थी. गेट के पास ही मेरी स्कूटर के पास आर्मी ट्रक भी खड़ा था. बच्चों के साथ लौटा तो फौजी ड्रेस में चार-पांच सरदारजी उसे घेरे खड़े था. मैंने संभल कर पूछा, क्या हुआ? उनमें से एक बोला, सर जी आपकी स्कूटर तो गजब की मेंटेन्ड है, इसके आगे मेरे सीओ साहब की स्कूटर भी फेल है.
एक बार स्कूटर से जा रहा था. पीछे से हार्न बजाते एक्टिवा पर सवार एक 'स्मार्टी' अचानक बगल में आकर बोली, अंकल साइड क्यों नहीं देते? इसके बाद वो ये गई-वो गई. क्रासिंग और मोड़ पर तो ऐसा तो अकसर होता है कि बड़ी सी बड़ी चेकिंग में भी पुलिस वाला प्रिया और बजाज की तरफ देखता तक नहीं. मैं मुस्कराता हुआ धीरे से निकल जाता हूं. कहते हैं अब बजाज स्कूटर की सेल बहुत घट गई है इसी लिए इसके प्रोडक्शन को बंद करने का फैसला लेना पड़ा. यंगस्टर्स को तो अब एक्टिवा, काइनेटिक या स्कूटी पंसद है. फ्यूल इफिशिएंसी को जाने दें तो लो मेंटिनेंस प्रिया और बजाज की खासियत इसकी सिम्प्लीसिटी ही थी. लेकिन इस सिम्प्लीसिटी की काम्प्लेक्सिटी को समझना आसान नहीं. फिलहाल इस पोर्टिको के कोने में धूल खाती स्कूटर को चमकाइए और निकल जाइए ज्वायराइड पर.

12/9/09

ब्लॉगर्स नैनो मीट



आज कल ब्लॉगर्स मीट का फैशन सा चल पड़ा है. तीन-चार ब्लॉगर्स एकजगह जमा हुए और हो गई मीट. कॉफीहाउस, होटल किसी के घर की बैठक, चौपाल, खटाल, कहीं भी हो सकती है ब्लागर्स मीट. पिछले हफ्ते ऐसी ही एक मीट हमारे यहां भी हुई. सुना है कि छह-सात लोगों की दो-तीन घंटे चकल्लस को संक्षिप्त मीट कहते हैं तो तीन लोगों की एक घंटे की गप को अति संक्षिप्त मीट. एक नैनो मीट का भागीदार पिछले संडे को मैं भी बना.
सोचा नहीं था कि ब्लॉग पर बतकही करने वाले घर पर भी आ धमकेंगे. पहले कभी न देखा ना मिला, लेकिन सुबह सुबह पहुंच गए. नेट पर एक हैट लगाए रहता है और दूसरा बहुरूपिया है. अपनी तस्वीर की जगह कभी गोभी तो कभी कनैल का पेड़ टांग देता है. हैट वाला तो सातै बजे आने को तैयार था. टिका तो फाइव स्टार होटल में था लेकिन कास्ट कटिंग के चक्कर में बिना चाय पिए चला आया. दूसरका भी छुच्छै चला आया था. उसने बिना चाह पानी किए आने के कई कारण बिना पूछे ही बता दिए. हैट वाले को मैंने ही सजेस्ट किया था कि शहर में नए हो आटो वाले ठग लेंगे इस लिए कनैल वाले के साथ आओ. उसके पास कार है इसका पता एक दिन पहले ही चला था जब फ्री के चक्कर में ओस में बैठ कर सूफी संगीत सुनने लखनऊ विश्वविद्याल कैंपस चले आए थे महराज. तब उनसे पहली बार मुलाकात हुई थी. लंठ इतने बड़े कि पूरा यूपी घूम लिया है लेकिन लखनऊ विश्वविद्यालय का रास्ता नहीं जानते. हैट वाला अपनी टोपी पुणे में छोड़ कानपुर आईआईटी गया था स्टूडेंट को टोपी पहनाने. लौटते समय मिलने का मौका मिल गया.
संडे को मेरी छुट्टी नहीं होती है सो किसी तरह सुबह एक घंटा मैनेज किया. आठ बजे के बाद मेरे घर में मिलना तय हुआ. सवा आठ के करीब फोन की घंटी बजी और नीचे ट्रैक्टर जैसी आवाज सुनाई दी. नीचे एक कार आगे-पीछे हो रही थी. लंठाधिराज को एक बार फिर फोन पर घर का पता बताया. हम तीनों गर्म जोशी से मिले. जैसा कि तय था चाय बनने लगी. पत्नी को न जाने क्या सूझा , गोभी के पकौड़े भी बना दिए. कुछ अमरूद भी बचे थे सो काट कर रख दिए गए. बात चल निकली, वही सब जो ब्लॉगर्स बतियाते हैं. पकौड़ी की पहली खेप ठीक ठाक मात्रा में थी और गर्म थी, सो सब चट कर गए. आदतन मैंने कहा और लाओ. लेकिन किचेन में तो मैदान साफ. अंदर जा कर मैं फुसफुसाया क्या करती हो, बेज्जती कराओगी.
लौट कर मैने उन्हें बातों में ऐसा उलझाया कि पकौड़े का ध्यान ही नहीं रहा. आधा घंटा बीत चुका था. अब तक पत्नी ने फटा फट सिंघड़े काट कर तल दिए थे. मैंने पूछा काफी चलेगी? दोनों पहली बार में ही तैयार हो गए. मैंने विजयी भाव से कहा सिंघाड़े खाते हैं, दोनों ने दांत दिखा दिए. सो सिंघाड़े भी आ गए. फिर पता ही नही चला एक घंटा कैसे बीत गया. हैट वाले के दोस्त का फोन आ रहा था और मेरे आफिस का भी वक्त हो चला था. मुझे लगा कि हम पहली बार नहीं मिल रहे. जैसे समझा था दोनो वैसे ही निकले शरीफ, सरल बहुत कुछ आम भारतीयों जैसे. एक का नाम था अभिषेक ओझा और दूसरे का नाम गिरिजेश राव. तो ये थी ब्लागर्स की नैनो मीट.

11/27/09

कुछ जज्बात जंगली से!


कुछ जज्बात जंगली से!
चलिए आज आपको सच का सामना कराते हैं झूठ की स्टाइल में. मैं आज आप से एक शर्त लगाता हूं. आपने अब तक कम से कम एक हजार बार झूठ जरूर बोला होगा, छोटा या बड़ा और आपकी लाइफ में हजार बातें ऐसी होंगी जिसे आप आजीवन किसी से शेयर नही करेंगे, अपने डियरेस्ट और नियरेस्ट से भी नहीं. ये झूठ-सच किसी पाप या अपराध की श्रेणी में नहीं आते. इनको शेयर ना करने से किसी का भी नुकसान नहीं. ये हमारी लाइफ के ऐसे छिपे ट्रेजर हैं जो हमें डिप्रेशन और लोनलीनेस से बचाते हैं. ये कभी खुशनुमा एहसास हैं, कभी मुस्कान हैं, कभी मीठी चुभन हैं, कभी अधूरे अरमान हैं और कभी बस ऐसी यादे हैं जो हमें एनर्जी से भर देती हैं और एहसास कराती हैं कि जिंदगी का सफर अभी जारी है.

ढेर सारे सच और उन्हें छिपाने के लिए बोला गया झूठ हमारे जीवन की ऐसी हिडेन फाइल्स हैं जो सामने आ जाएं तो हो सकता है हंगामा खड़ा हो जाए और ये भी हो सकता है कि बेस्ट सेलर बन जाएं. आप ही बताएं बेस्ट सेलर क्या होता है? कुछ ऐसा जो हर पढऩे वाले को अपना लगे. उसे लगे कि अरे...ये तो मेरी कहानी है, ऐसा तो मैंने भी किया है, ऐसा तो मेरे साथ भी हुआ है. किसी भी किताब के ऑथर को किताब लिखते समय क्या पता होता है कि वो धमाल मचा देगी. कभी कोई कांट्रोवर्शियल बात, कोई रहस्योद्घाटन, कोई सच या कोई फैंटसी किसी बायोग्राफी, नॉवेल या बुक को बेस्टसेलर बना देती है.


हमेशा कहा जाता कि सच का सामना करो, सच बोलो लेकिन अप्रिय सच मत बोलो. तो क्या झूठ बोलो, प्रिय झूठ बोला? थोड़ा दार्शनिक अंदाज में कहें तो सच का वजूद ही झूठ पर टिका है जैसे अंधेरे के बिना प्रकाश का वजूद नहीं है. गम है तभी खुशियों का मतलब है.
शरारत के बिना शराफत को एक्स्प्लेन नहीं किया जा सकता. बचपन में ही क्यों इंसान तो जिंदगी भर शरारत करता रहता है, बचपन में खुलेआम तो बड़े होने पर चोरी छिपे या शराफत से. जरा याद कीजिए, आप अब भी ऐसे छोटे-मोटे झूठ जरूर बोलते होंगे, बेवजह. उससे ना उससे आपको कोई फायदा हुआ ना दूसरे को कोई नुकसान. लेकिन कई ऐसे मौके भी आए होंगे जब आप सच बोलते तो आपको या किसी दूसरे को नुकसान हो जाता. सो ऐसा झूठ बोलने में मेरे हिसाब से कोई हर्ज नहीं है जो प्रिय है और उससे किसी का नुकसान नहीं होता. याद कीजिए किसी डिसट्रेस्ड की काउंसिलिंग के समय या किसी परेशान को ढ़ाढस बंधाते समय हम कई बार ऐसे झूठ का सहारा लेते हैं, कभी किसी को ट्रॉमा से उबारने के लिए झूठा दिलासा देते हैं. और तो और हम कभी कभी अपनेआप से झूठ बोलते हैं. ऐसा करते समय हम अक्सर फैंटसी की दुनिया में चले जाते हैं उन सपनों को पूरा करने जो रीयल लाइफ में पूरे होते नहीं लगते. कुछ ऐसे सवाल होते हैं जिसका जवाब इमैजिनेटिव वल्र्ड में ही पाया जा सकता है. तो आइए इस संडे थोड़ी शरारत हो जाए लेकिन शराफत से.


पहले आपकी हिडेन फाइल्स से झेड़छाड़ करते हैं. आपको पता है कि उन फाइलों को हैक करना सबसे आसान है जो आपने अपने मन की हार्ड डिस्क में छिपा कर या सहेज कर रखी हैं. वैसे इनका पासवर्ड एक की होता है-कुछ कुछ होता है. एडॉलिसेंस, टीन एज, ग्रोनअप एज और उसके बाद की उम्र में भी हमें कुछ-कुछ होता रहता है और हम सब कुछ ना कुछ करते हैं. ये सब गुड ब्वॉय और गल्र्स ने भी किया है और बैड गॉइज और रोडीज तो करते ही हैं. स्कूल, कालेज, यूनिवर्सिटी कैंपस और फिर वर्किंग प्लेस हर जगह लोग बड़े चाव से अपने या अपने किसी साथी के बारे में बताते फिरते हैं कि कितने अफेयर्स थे, मैंने कितनों के साथ फ्लर्ट किया है, कितनों के साथ स्टडी डेज में 'गोइंग स्टडी' चला है. पिक्चर हॉल में क्या हुआ जब आपको किसी प्रिटीगर्ल के बगल में सीट मिल गई थी, क्या निहायत शरीफ बने बैठे आप के मन में शरारत नहीं सूझ रही थी.
घर में अकेले हों और कोई आ जाए. शालीन, पोलाइट और आइडियल होस्ट बने आपके मन में अचानक वाइल्ड थॉट नहीं आए थे क्या? भले ही आप उस समय उसे दबा ले गए हों और ये भी हो सकता है कि फैंटसी की दुनिया में आपने वो सब किया हो जो उस समय नहीं कर पाए थे. आप लाख ना कहें इसका उत्तर हमें पता है कल्पना लोक में आप जो भी करते हैं, उससे हमें संतुष्टिï मिलती है लेकिन दूसरों को कोई फर्क नहीं पड़ता. अगर ऐसा ना हो तो अराजकता फैल जाए. फैंटसी, समाज को बहुत बड़े संकट से बचाए हुए है. अच्छा पिंकी, प्रियंका, नेहा, प्रिया या सुप्रिया, या आप जो भी हों बताएं, आपको 'वो' अच्छा लगता था ना, 'उसके' बारे में आप ये सब ... सोचतीं हैं ना. आपका भी मन करता है ना शरारत करने को...कभी-कभी फ्लर्ट करने को...एटलीस्ट फैटसी की दुनिया में. अच्छा आपको टाइट जींस और ब्लैक टाप पहनना अच्छा लगता है, क्यों? टीन एज का वो वाकया आप या हम कैसे भूल सकते हैं जब में पड़ोस की ... को देख कुछ हो जाता था. आप कल्पना की दुनिया में क्यों चले जाते थे. उपमन्यु चटर्जी की एक किताब पढ़ी थी - 'इंग्लिश अगस्त, ऐन इंडियन स्टोरी'. किताब के पन्ने पलटते हुए लग रहा था कि ऐसा ही कुछ तो हम भी सोचते हैं और हमारे साथ भी होता है. फिर आपके साथ क्यों नहीं होता होगा.

अगर आप हेल्दी हैं, एनर्जेटिक हैं, आपकी हारमोनल ग्रोथ ठीक है तो अपोजिट सेक्स के प्रति अट्रैक्शन नेचुरल है. याद रखिए इमैजिनेशन, क्रिएशन की नींव है, वाइल्ड इमैजिनेशन भी. अगर ऐसा नहीं होता है तो कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. आपके घर के पास वो शोख लड़की रहती थी ना जिसे आप चुपके से निहारते थे. आपके दोस्तों के बीच रोज उसकी चर्चा भी होती थी ना. आखिर उसमें ऐसा क्या था कि रोज एक से एक मसालेदार किस्से... मोहल्ले की उस 'बब्ली' की चर्चा में वो 'बंटी' भी शामिल थे जिनकी छवि पढऩे वाले राजा बेटा वाली थी. और 'बब्लीÓ भी कभी-कभी मुस्करा देती थी. बाकी काम तो आपके वाइल्ड थॉट्स करते थे. अगर ऐसा ना हो तो सब बावले हो जाएं. सो नो टेंशन सच-झूठ के इस खेल में कितनी ही बातें, कितने ही फसाने हैं, इस शहर में तुम जैसे हजारों हैं.

नाट्य रूपांतर 26/11



हम... हम... सिर्फ हम! सबसे पहले, सबसे बेहतर, सबसे तेज. तुम कौन? अच्छा तुम्हारा कोई अपना शहीद हो गया था 26/11 को. चच्च... अफसोस की बात है...लेकिन मैं बता दूं कि सबसे पहले ये खबर मेरे चैनल ने ब्रेक की थी कि ये आतंकी हमला है. एक साल हो गए 26/11 को. जख्म गहरे हैं. जिनके अपने मारे गए उनके लिए भी और जिन्होंने देखा और सुना उनके लिए भी. लेकिन कुछ लोग इस दिन भी नौटंकी से बाज नहीं आए. कुछ अलग, कुछ हटके नहीं दिखाया तो टीआरपी गई. टीआरपी गई तो नौकरी गई...भोंडा, हास्यास्पद, नाट्य रूपांतर कुछ भी दिखाओ. स्टेज पर रिपोर्टर बात कर रहे हैं...यार याद है ना उस दिन यहीं हम लोग मोर्चा लिए हुए थे तभी दो गोली कान के बगल से निकल गई और दीवार से टन्न से टकराई...अरे मैं तो और भी बाल बाल बचा... एक गोली मेरी टांगों के बीच से निकल कर डिवाइडर से टकराई..तब मुझे अहसास हुआ कि मेरी टांगों का डिवाइडर कितना साफ बचा है. ..एक मिनट आपको रोकना चाहूंगा...एक अहम खुलासा.. इस समय मैं जिस सड़क पर आगे बढ़ रहा हूं एक साल पहले कसाब और उसका साथी यहीं से गूजरे थे. ग्रेनेड और एम्युनिशन के अलावा कसाब के बैग में पिश्ता-बादाम और चिलगोजे भी थे. ये जानकारी सिर्फ हमारे चैनल के पास है...
तभी दूसरे चैनल में रनिंग कमेंट्री शुरू हो जाती है..एक कंट्रोल रूम में कंप्यूटर के सामने वाकी टाकी लेकर थर्ड अंपायर की मुद्रा में बैठे तीन चार दढिय़ल. जबरिया कश्मीरी, पंजाबी एक्सेंट में हुक्म देते हुए..बोलें जनाब... क्या कहा कमांडो...करें करें...क्या करें चचा...फायर करें...मेरे बच्चे अपने को बचाओ...जो भी सामने आए खतम कर दो...ग्रेनेड फेकें...अच्छा अच्छा.. मैंने सोचा ग्रनेड बचा के वापस लाने हैं...चिलगोजे और पिश्ते खाते रहें..ताकत बचा के रखनी है...लेकिन चचा उसके पहले गोली खा गए तो? ..तो जन्नत मिलेगी मेरे बच्चे...अब दो तरफ से फायर आ रहा है...ग्रेनेड से जवाब दें...जनाब मुश्किल आ रही है...एक ही बैग में ग्रेनेड और चिलगोजे नहीं रखवाने थे. ग्रेनेड की जगह पिश्ते आ रहे हैं, जनाब मैंने तो हड़बड़ी में दीवार पर मुट्ठी भर पिश्ता दे मारा..कोई बात नहीं मारें-मारें सब को मारें...तड़ तड़ तड़...!
अब और नहीं..एनफ इज एनफ...मैं...अमिताभ बच्चन...मैं रजा मुराद...और मैं एक आम आदमी...आइए वापस चलते हैं स्टूडियो. अगले साल फिर मिलेंगे इसी चैनल पर इसी समय..कही जाइएगा नहीं..
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11/20/09

शुष्क शौचालय!


मैं भारतीय हूं. मुझे भारतीय होने पर गर्व है. लेकिन मुझे उन ढेर सारे भारतीयों पर गर्व नहीं हैं जो अपनी संतुष्टि के लिए मुंह में शौचालय चला रहे हैं. शायद शुष्क शौचालय. पता नहीं आम भातीय इतना क्यों थूकता है. कहीं भी कभी भी. जो पान और पान मसाला खाते हैं वो भी और जो नहीं खाते वो भी. जैसे कुत्ता दीवार देख कर पेशाब किए बिना नही रह सकता वैसे ही कुछ लोग दीवार और कोना देख कर थूके बिना नहीं रहते. लिफ्ट तक को नही छोड़ते लोग. पहले मैला ढोने वाली भैंसा गाड़ी आगे जारही होती थी तो हम लोग रुक जाते थे या रास्ता बदल देते थे. लेकिन अब किस किस से बचेंगे. लोग तो मुंह में मैला लिए फिरते हैं. कौन कब आगे निकल कर पिच्च से कर देगा और उसकी फुहार आपके तन मन को पीकमय कर देगी, पता नहीं. और आप का भी मन करने लगेगा कि पीक से भरी बाल्टी और पिचकारी लेकर उसके पूरे खानदान के साथ फागुन खेल आएं. पान और मसाला जिसको खाना हो खाए लेकिन दूसरों का जीवन क्यों नर्क बना रहे हैं ये पीकबाज. अच्छे खासे मुंह को शौचालय बना रखा है. मुंह में मसाला डाला, जरा सी नमी आई तो पिच्च. फिर मुंह शुष्क. फिर मसाले का एक और पाउच, फिर नमी फिर पिच्च. अब ऐसे लोगों का मुंह शुष्क शौचालय नहीं हुआ तो और क्या हुआ. पान और मसाले खाने वालों से कोई नाराजगी नहीं, नाइत्तफाकी है तो बस उसके डिस्पोजल के तरीके से.

11/18/09

'बिंदास हिन्दी अच्छी'






ये हैं जार्जिआ ड्वेट. वैसे तो डच हैं लेकिन रहने वाली हैं बेल्जियम की. उनकी मातृभाषा डच है. फिर भी 'बिंदास' हिन्दी बोलती और लिखती हैं. बिंदास इस लिए कि जार्जिआ को उतनी हिन्दी आती है जितनी कि आम भारतीय को अंग्रेजी आती है. उन्होंने हिन्दी और संस्कृत की पढ़ाई बेल्जियम में की. बेल्जियम, जहां बहुत कम लोग हिन्दी जानते हैं. लेकिन इंडिया उन्हें एक इंटरेस्टिंग कंट्री लगता है. बेल्जियम गवर्नमेंट भारत से व्यापारिक रिश्ते बढ़ाना चाहती है. जार्जिआ, इंडिया एक मिशन पर आई हैं. घबराइए मत, हैडली जैसा मिशन नहीं. इनके इरादे नेक हैं. वो हिन्दी को भारत में घूम कर समझना चाहती हैं. चौंकने की बारी मेरी थी जब उन्होंने कहा कि इंडिया में खास कर उत्तर भारत में लोग जिस तरह की हिन्दी बोलते हैं वैसी तो उन्होंने नहीं पढ़ी. उन्होंने तो शुद्ध हिन्दी पढ़ी है. हां, उस तरह की हिन्दी उन्होंने सरकारी कार्यालयों में जरूर प्रयोग होते देखी है. मैंने कहा वो क्लिष्ट हिन्दी है और जो आम लोग बोलते हैं वो बोलचाल की हिन्दी है. आपको कौन सी हिन्दी अच्छी लगती है? जार्जिआ तपाक से बोली आपकी बोलचाल की हिन्दी क्योंकि इसमें अंग्रेजी उर्दू और संस्कृत भी है. कागज पर जार्जिआ हिन्दी लिख लेती हैं लेकिन कम्प्यूटर पर हिन्दी की-बोर्ड का ज्ञान उन्हें नहीं है. इसके लिए वो यूनीकोड टूल्स का इस्तेमाल करती हैं. यानी लैटिन से हिन्दी. बेल्जियम में हिन्दी के कारण उन्हें नौकरी आसानी से मिल गई. वहां हिन्दी दुभाषिये गिनेचुने हैं उसमें से जार्जिया भी एक हैं. है ना इंटरेस्टिंग.

11/1/09

इस धुंधली सुबह बसी है रात की खुशबू



थोड़ी खुशबू, थोड़ी खुनक, थोड़ी खुश्की और थोड़ी खामोशी. और कैसी होती है खुशनुमा सुबह. विंटर को वेलकम करने का इससे सुंदर तरीका और क्या हो सकता है. ऑटम तो आता ही है विंटर को वेलकम करने. उफ्, शरद ऋतु की ये शीतल चांदनी और मिस्टी मॉर्निंग दीवाना बना रही है. लोग वसंत को ऋतुराज कहते हैं लेकिन मुझे तो शरद से शानदार कुछ नही लगता. चांदनी में ओस की बूंदों में जैसे अमृत बरसता है. सुबह वो बूंदें पत्तों की हथेलियों और फूलों की पलकों पर ठहर कर जैसे आपका ही इंतजार करती रहती हैं. सुबह की धूप में इनकी चमक देख कर लगता है जैसे किसी स्कूल में ढेर सारे बच्चे मॉर्निंग एसेंबली में प्रेयर कर रहे हों या राइम गा रहे हैं. साल भर इंतजार कराने के बाद शेफाली (हरसिंगार) फिर महकने लगा है. इसके फूल शाम ढलते ही अपनी खुशबू से अहसास करा देते हैं कि अगले दिन मॉर्निंग वॉक में अपके रास्ते में वो पलक-पांवड़े बिछाए मिलेंगे. बचपन में ऋतुओं का ये राज समझ नहीं आता था. बस लगता था कुछ बदल गया है, कुछ नया सा है कुछ ठंडा सा है. सुबह थोड़ी-थोड़ी धुंध, बाक्स से निकाले गए गर्म कपड़ों और रजाई की खुशबू, किचेन में चाय के लिए कूटे जा रहे अदरक की खुट-खुट और रात में करारे चीनिया बादाम वाले की आवाज के साथ करीब आती ढिबरी की रोशनी बता देती थी कि ठंड आ गई है. फिर रात को रजाई में दुबक कर सोना..कितना सुखदाई है ये गुनगुना अहसास.
अब ये मत कहिएगा कि ये सब पुरानी बाते हैं, बक्त बदल गया है. वक्त तो होता ही है बदलने के लिए. छोटे शहर बड़े हो गए, बड़े शहर मेट्रो हो गए. बाग बगीचों वाले बंगले अपार्टमेंट्स में तब्दील हो गए. पार्क के कोने में आम का जो दरख्त था वहां अब एक मिल्कबूथ है. अब स्कूल जाते समय मफलर बांधे हाथ में दूध की डिब्बा और छड़ी लिए वो बुजुर्ग भी नहीं मिलते. हाथ में फूल का दोना लिए मंदिर जाती बूढ़ी काकी भी नहीं मिलतीं. शाम को स्कूल से लौटता-खिलखिलाता लड़कियों का झुंड भी नहीं मिलता. नुक्कड़ पर मोहन बागड़ की चाट का ठेला भी नहीं लगता. लेकिन शरद ऋतु तो अब भी आती है, हरसिंगार तो अब भी महकते है. आपकी छत या अपार्टमेंट की मुंडेर पर ग्लैडियस, कॉलियस या गुलाब के जो गमले रखे हैं उनकी पत्तियों पर अभी भी ओस की वैसी ही बूंदें किसी का इंतजार करती हैं. देखिए टेरेस में जो बॉगिनवीलिया आपने लगा रखा है उसमें आए लाल फूलों को देख ये छोटी से फिंच कितनी खुश है. घर के पास बरसाती पानी और और ऊबड़-खाबड़ गड्ढों से भरा जो मैदान था वहां कितना सुंदर पार्क है. गुलमोहर और अमलताश की कतार के बीच दूब में खेलते ये बच्चे कितनी एनर्जी से भरे लगते हैं. और झाडिय़ों की ओट में वो जोड़ा अपने में खोया हुआ भविष्य के ना जाने कितने सपने बुन रहा है, कसमें खा रहा है. पार्क किनारे बेंच पर बैठे वो चार बुजुर्ग कितनी निश्चिंतता से गपशप में मशगूल हैं. कोई मंकी कैप लगाए है कोई पेपर में छपी किसी खबर पर चर्चा कर रहा है. सब ठहाके लगा रहे हैं. क्या इन्होंने अपने जीवन के उतार-चढ़ाव और बदलाव नही झेले हैं. ये सब खुश हैं क्योंकि उन्हें पता है चेंज तो इनएविटेबल है, शाश्वत कुछ भी नहीं. शाश्वत है तो ये दिन-रात और नेचर. कल की उधेड़बुन में हम अपने आसपास बिखरी इन खुशियों को क्यों नही महसूस कर पाते. घर के पास ही पुरानी सी एक कोठी थी. उस पर एक नेमप्लेट लगी थी...मिसेज..चैटर्जी. ध्यान उधर चला ही जाता था क्योंकि वहां से गुजरने पर फूलों की खुशबू मन को वहां तक खींच लाती थी. वहां एक ओल्ड लेडी अक्सर खड़ी नजर आती थीं अकेली. शायद बच्चे बाहर रहते होंगे. फिर उनका दिखना बंद हो गया. बोर्ड भी हट गया. एक दिन देखा कोठी टूट रही है. पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लगा. अब वहां एक नर्सरी स्कूल है. फिर शरद की एक सुबह शेफाली की खुशबू स्कूल तक खीच लाई. देखा, एक कोने में फूलों से लदा हरसिंगार अभी भी वहां है. लगा मिसेज चैटर्जी वहां खड़ी मुस्करा रहीं हैं और कहीं से आवाज आ रही है...रहें ना रहें हम.. महका करेंगे बन के फिजा...
आप कह सकते कि ये सब रूमानी और काल्पनिक बाते हैं और ये शहर के पॉश इलाके की तस्वीर हैं. शहर में इतनी हरियाली अब कहां बची? जी नहीं, इसमें कुछ भी काल्पनिक नहीं हैं. जानते हैं पार्क की बेंच पर बैठे सत्तर साल के वो
बुजुर्ग पुराने शहर की एक गली से चार किलोमीटर का फासला तस कर रोज यहां आते हैं. एक दिन नर्सरी से गेंदे और बेला के पौधे ले जा रहे थे. किसी ने पूछा गली में कहां लगाएंगे. बोले टेन बाई टेन के टेरेस में मैंने क्या किया है कभी आइए, दिखाउंगा. ठीक है शहर बड़ा हो रहा है. जहां बड़े बड़े पेड़ थे वहां अब मल्टी-स्टोरीड अपार्टमेंट्स हैं. उसमें रहना लोगों की मजबूरी हो सकती है. लेकिन आसपास कहीं प्रकृति आपका वैसे ही इंजतार कर रही है. तो आइए शरद की इस धुंधली सुबह शेफाली की खुशबू के बीच थोड़ा टहल आएं.

10/30/09

अब कहां जाएगी पिंकी!!


स्टार बनना किसे अच्छा नहीं लगता. यंगस्टर्स का सपना होता है सेलिब्रिटी बनने का. पैरेंट्स भी तो चाहते हैं उनके बच्चे नाम रौशन करें पूरी दुनिया में. सपनों को साकार होते देखना अच्छा लगता. टीवी-फिल्म एक्टर, राइटर, डाइरेक्टर, स्कॉलर, क्रिकेटर, दूसरे प्लेयर, छोटे-बड़े सबको सेलिब्रिटी स्टेटस लुभाता है. रियलिटी शो की अफशां-धैर्य, सिंगिंग का लिटिल सरप्राइज हेमंत, कॉमेडी की बच्ची सलोनी या फिर विजकिड युगरत्ना ऑफ यूएन फेम. इन सब की चमक देख याद आने लगती है राइम-ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार हाउ आई वंडर व्हॉट यू आर...
लेकिन फिर 'स्टारडम' की डुगडुगी इस तरह बजते देख डर लगता है. जिसे देखो वही डुगडुगी लेकर इस खेल में भागीदार बनना चाहता है. इस खेल में पिंकी (स्माइल पिंकी फेम) कभी इस शहर में स्माइल करती है, कभी उस शहर में, कभी यहां सम्मान, कभी वहां एडमिशन. और अचानक स्माइलिंग पिंकी सहमी-सहमी लगने लगती है. सुना है वो एक महीने से स्कूल नहीं जा रही. पिंकी अपने गांव में विकास कार्यों की सिफारिश लेकर विंध्याचल मंडलायुक्त कार्यालय के चक्कर लगा रही है. इसी तरह सारेगामापा के टॉप फाइव के राउंड में तो लखनऊ की प्रतीक्षा जम कर गाती है लेकिन मीडिया के लौट कर मीडिया के सामने रोने लगती है. इन लिटिल वंडर्स पर इतना दबाव कौन डाल रहा है. वे खुद कतई दोषी नहीं हैं. युगरत्ना की विजडम और इंटेलिजेंस पर उसके पैरेंट्स और स्कूल को ही नहीं पूरे देश को गर्व है. धन्य हैं ये बच्चे लेकिन इनके स्टारडम को कहीं हम ओवर यूज तो नहीं कर रहे. कहीं इनकी एनर्जी समय से पहले तो निचोड़ नहीं नहीं ले रहे. ये स्टार्स किसी भी शहर के हों, इनके शेड्यूल पर नजर डालिए. आज इस फंक्शन में तो कल दूसरे फंक्शन में. आज यहां उद्घाटन तो कल वहां दीप जलाना. शहर के बडे प्रोग्राम या गैदरिंग में इन स्टार्स का पार्टिसिपेशन जरूरी समझा जाता है. इनकार कर नहीं सकते क्योंकि ऑनर में दिए जा रहे इनविटेशन को ठुकराने पर 'स्नॉब' समझे जाने का खतरा है. लेकिन इन्हें बार-बार किसी मंच पर खड़ा होने को मजबूर कर, क्या हम इनका सही मायने में सम्मान कर रहे हैं? जो समय पढ़ाई का होना चाहिए, उस समय को सेमिनार और भाषण में खर्च कर हम इनके विकास के सहज मार्ग में बाधएं तो नहीं खड़ी कर रहे?

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