
अफवाह उड़ी कि डा. प्रदीप भटनागर उदयपुर जा रहे हैं. खबर कितनी सही है ये तो पता नहीं लेकिन इसी बहाने चंडीगढ़ में उनकी रजाई की याद आ गई, जो पराए की लुगाई की तरह पता नहीं कहां गुम हो गई है. अनिल त्रिवेदी अभी भी चंडीगढ़ में ही हैं और मेरी फोल्डिंग फिर उनके पास पहुंच गई है. जिंदगी की कुछ छोटी-छोटी बातें ऐसी होती हैं जो बार-बार याद आती हैं.
बात बनारस की है. कैरियर शुरू ही किया था. मेरे साथ नगवा में मेरा एक दोस्त रहता था. वो इलाहाबाद बैंक में पीओ था. तीन कमरे के एक शानदार किराए के मकान में हम दोनो रहते थे. एक कमरे में मेरी फोल्डिंग लगी रहती थी, दूसरे में उस दोस्त की और तीसरे कमरे में हम दोनों साइकिल खड़ी करते थे जिससे घर भरा-भरा लगे. एक बड़ा सा किचेन और उससे लगा आंगन भी था. अलग-अलग कमरों में इस लिए सोते थे कि मैं देर रात लौटता था और दोस्त को सुबह जल्दी गंगा पार बैंक जाना होता था. मेरा ऑफिस लहरतारा में था. वही लहरतारा जहां कबीरदास जन्मे थे. मेरा जीवन भी फक्कड़ों जैसा ही था. एक फोल्डिंग, रजाई-गद्दा हवा की तकिया, साइकिल और एक अटैची. मेरा दोस्त राजा बेटा था, मैं सोता ही रहता और वो सुबह नहा धो कर पूरे घर में पोंछा लगा कर स्टोव पर दो कप चाय बनाता था और मुझे डरते-डरते उठाता था. मैं भी ऐसे चाय पीता जैसे बड़ा अहसान किया हो. उसके जाने के बाद फिर रजाई तान कर सो जाता. मेरा दिन 12 बजे शुरू होता. एक बार फिर से चाय बनाता. मस्ती में दिन कट रहे थे.
उस समय हमारे संस्थान में अनिल त्रिवेदी और प्रदीप भटनागर भी थे. दोनों से मेरी खूब छनती थी. एक साल बाद लखनऊ लौटने की घड़ी आ गई. फोल्डिंग बनारस में ही अपने मित्र अनिल त्रिवेदी को दे दी. साइकिल, होल्डाल, अटैची उठा कर चला आया लखनऊ. कैरियर की ज़द्दो-जहद में दो दशक कैसे बीत गए पता ही नहीं चला. इस बीच त्रिवेदी जी कलकत्ता होते हुए चंडीगढ़ पहुंच गए थे. इत्तफाक से प्रदीप भटनागर भी वहीं थे. संयोग से दो दशक बाद मैं भी वहां पहुंच गया. अनिल और मैं एक संस्थान में और प्रदीप दूसरे में. हम तीनों घर-परिवार वाले हो चुके थे लेकिन मैं और प्रदीप बच्चों के कैरियर के चलते परिवार वहां नहीं ले गए थे. हां, त्रिवेदी जी के साथ उनका परिवार था. मैं चंडीगढ़ वासियों के बीच यूपी के पइये (भैये) और छड़े (फोस्र्ड बैचलर) का लेबल लगाए बछड़ों की तरह उछल कूद मचाता था. यहां भी मेरे साथ एक बैग और कंबल ही था. त्रिवेदी जी बगल में ही रहते थे. एक गद्दा खरीद कर जमीन पर डाल दिया था. त्रिवेदी जी ने यह देखा तो बोले यार फोल्डिंग पड़ी है ले लो. अरे वही वाली जो बीस साल पहले दे गए थे. बीस साल बाद उसी फोल्डिंग पर लेट कर सेंटीमेंटल होने की अब मेरी बारी थी.
चंडीगढ़ में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. कंबल अच्छा था इस लिए उसके नीचे एक ऊनी शाल लगा कर ओढऩे से मेरा काम चल जाता था. इसी बीच प्रदीप भटनागर का तबादला भोपाल हो गया. एक दिन मेरे एक और साथी पीयूष मेरे कमरे में आए और सिर्फ कंबल देख कर परेशान हो गए कि अरे आपको तो ठंड लगती होगी. बोले, प्रदीप जी की रजाई मेरे पास रखी है, ले आता हूं. लाख कहने पर कि मुझे कोई दिक्कत नहीं, पीयूष मुझे प्रदीप की रजाई दे गए. मेरी सर्दी और आराम से कटने लगी. कुछ महीनों बाद घर लौटने का संयोग बन गया. मैंने रजाई पीयूष को थमाई, फोल्डिंग फिर धन्यवाद के साथ त्रिवेदी जी को दे दी और गद्दा एक और साथी को पकड़ा दिया. बैग उठाया और चला आया. कुछ दिन बाद पीयूष भी दूसरे शहर चले गए. त्रिवेदी जी अभी भी चंडीगढ़ में ही डटे हैं. कुछ दिन पहले दो खबरें मिली, एक- डा. प्रदीप भटनागर उदयपुर में संपादक बन कर जाने वाले हैं. दूसरी- पीयूष फिर चंडीगढ़ लौट रहे हैं. सो त्रिवेदी जी की चारपाई (फोल्डिंग) और प्रदीप जी की रजाई और अपनी तनहाई (फोरस्र्ड बैचलरशिप) याद आने लगी. पीयूष से पूछा कि वो रजाई कहां हैं लेकिन उन्हें ठीक से याद नही. फिलहाल प्रदीप जी हिसार में ही हैं और उनकी रजाई की खोज की जा रही है.
maza aa gaya
ReplyDeleteharmilap nagar ki un thandi raato me maza aata tha...aur sir today wn u call me i was returning from kasauli...u remember jab hum aap aur pawan kasauli k monkey point pe black black cloud ke beeh me so gaye the...jab jaage the to pata chala ki der ho gayi hai evevning me office bhi join karna tha...
क्या गुदगुदी यादें हैं.......................
ReplyDeleteआपके पास भी गजब कहानियां रहती हैं सर. ऑब्जर्वेशन गज़ब है...आप भी सेंटी हैं काफी...हाहा
ReplyDeleteहम तो अभी भी ऐसे ही रहते हैं और यकीं मानिए फ़्लैट पर १२ गद्दे जमा हो गए हैं जो पुणे छोड़ के जाता है मेरे यहाँ पटक जाता है. टीवी, गैस, अलमारी पता नहीं क्या-क्या फ़ोकट का मिला हुआ है :)
ReplyDelete@Abhishek: Seconds goods ki Dukan khol lijiye
ReplyDelete:-)
भ्रमणशील तो रहा लेकिन हमेशा परिवार के साथ, इसलिए इस तरह के अनुभव नहीं हुए। शायद भविष्य में कभी 'छड़े' बनना पड़े तो पता चले। वैसे लगता है आप बहुत पहले से शहंशाही तबियत के रहे हैं - बेड टी पार्टनर बना कर देता था :)
ReplyDeleteआप का ई मेल आइ डी भी लगता है किसी और ने बनाया है।
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रजाई के नीचे से तीन सेट अंगुलियाँ झाँक रही हैं। एक इंसान के तो दो ही सेट होते हैं। रजाई के उपर की रेखाएँ भी कुछ और भी बता रही हैं। स्पष्टीकरण दें।
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हल्के अन्दाज में भी साथ साथ चलती संवेदना भिगा गई।और किसने इस तरह फोल्डिंग और रजाई पर लिखा होगा !
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ReplyDelete@Girijesh: photoshop me ye fingers saaf hone se rah gai. Nahi pata tha ki aap jaise razai per soochm nazar dalne wale bhi milenge
ReplyDeleteयादें ....:):)
ReplyDeleteMazaa aa gaya Sir...
ReplyDeleteरजाई की कहानी पहले कभी इतनी दिलचस्प नहीं लगी
ReplyDeleteउम्मीद करता हूँ इस घटना के सारे पात्र काल्पनिक होंगे
दिलचस्प किस्सा गोई
जय हो
Kya Mukul ji aap to master hain. Kissagoi aur asliyat ko pachaniye. Dono patra real hain. Ek chandigarh me hai doosra Hisar me . cell no. de skta hun :)
ReplyDeletepanchkula k puraney din taza ho gae. aap itna jiwant likhte hain ki pad kar maza aa jata hai.
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ReplyDeleteये कमेंट साथी प्रदीप भटनागर ने मेल किया है----
ReplyDeleteयार राजीव, तुमने रजाई और फोल्डिंग खाट की बातें करके तमाम पुराने दोस्तों की याद ताजा कर दी। बीवी बच्चों से दूर रहने की लाचारी ने हर शहर में सेजिया दान कराया है। चंडीगढ़ ही नहींं, लखनऊ, आगरा, भोपाल सभी जगह सेजिया दान के बाद ही आत्मा तृप्त हुई और भूतों से पीछा छूटा। आगरा अमर उजाला के दिनों में आनंद अग्निहोत्री मेरे मित्र थे। मैं पिछले लगभग 2 वर्ष से कहीं सेटल नहीं हो पा रहा था। नौकरी करते हुए भी मैं तनाव में था। इसी बीच दैनिक भास्कर के लिए प्रयास किया और चंडीगढ़ पहुंच गया। आगरा से चलने लगा तो आनंद से मैंने कहा कि पंडित जी जीते जी मेरा सेजिया दान लो और मेरी आत्मा को मुक्त कराओ। दुआ के नाम पर बस इतना मांगो कि मैं अब जम जाऊं। यायावरी से मेरा पिंड छुड़ाओ। आनंद मुस्काए और बोले अगर पैर में शनिश्चर है और मन बिना एडिटर बने चैन नहीं पा रहा है तो भटकना तो पड़ेगा। तुम जमों चाहे न जमो, लेकिन तुम्हारी खाट, रजाई और गद्दे पर मैं जरूर जमूंगा।
यार राजीव, तुम्हारा आर्टिकल पढक़र मुझे लगता है कि आगरा का सेजिया दान मुझे फल गया। आनंद की दुआ कुबूल हुई और मैं दैनिक भास्कर में देखते ही देखते डिप्टी न्यूज एडिटर से न्यूज एडिटर और एक्जीक्यूटिव एडिटर बन गया। यही नहीं दैनिक भास्कर में मैं 6 साल चंडीगढ़ में रहा और पिछले 3 साल से हिसार में हूं। यानी स्थायित्व भी मिल गया।
तुम्हें बहुत-बहुत धन्यवाद। तमाम पुराने दिन याद दिलाने के लिए।
- प्रदीप भटनागर --