
कुछ जज्बात जंगली से!
चलिए आज आपको सच का सामना कराते हैं झूठ की स्टाइल में. मैं आज आप से एक शर्त लगाता हूं. आपने अब तक कम से कम एक हजार बार झूठ जरूर बोला होगा, छोटा या बड़ा और आपकी लाइफ में हजार बातें ऐसी होंगी जिसे आप आजीवन किसी से शेयर नही करेंगे, अपने डियरेस्ट और नियरेस्ट से भी नहीं. ये झूठ-सच किसी पाप या अपराध की श्रेणी में नहीं आते. इनको शेयर ना करने से किसी का भी नुकसान नहीं. ये हमारी लाइफ के ऐसे छिपे ट्रेजर हैं जो हमें डिप्रेशन और लोनलीनेस से बचाते हैं. ये कभी खुशनुमा एहसास हैं, कभी मुस्कान हैं, कभी मीठी चुभन हैं, कभी अधूरे अरमान हैं और कभी बस ऐसी यादे हैं जो हमें एनर्जी से भर देती हैं और एहसास कराती हैं कि जिंदगी का सफर अभी जारी है.
ढेर सारे सच और उन्हें छिपाने के लिए बोला गया झूठ हमारे जीवन की ऐसी हिडेन फाइल्स हैं जो सामने आ जाएं तो हो सकता है हंगामा खड़ा हो जाए और ये भी हो सकता है कि बेस्ट सेलर बन जाएं. आप ही बताएं बेस्ट सेलर क्या होता है? कुछ ऐसा जो हर पढऩे वाले को अपना लगे. उसे लगे कि अरे...ये तो मेरी कहानी है, ऐसा तो मैंने भी किया है, ऐसा तो मेरे साथ भी हुआ है. किसी भी किताब के ऑथर को किताब लिखते समय क्या पता होता है कि वो धमाल मचा देगी. कभी कोई कांट्रोवर्शियल बात, कोई रहस्योद्घाटन, कोई सच या कोई फैंटसी किसी बायोग्राफी, नॉवेल या बुक को बेस्टसेलर बना देती है.

हमेशा कहा जाता कि सच का सामना करो, सच बोलो लेकिन अप्रिय सच मत बोलो. तो क्या झूठ बोलो, प्रिय झूठ बोला? थोड़ा दार्शनिक अंदाज में कहें तो सच का वजूद ही झूठ पर टिका है जैसे अंधेरे के बिना प्रकाश का वजूद नहीं है. गम है तभी खुशियों का मतलब है.
शरारत के बिना शराफत को एक्स्प्लेन नहीं किया जा सकता. बचपन में ही क्यों इंसान तो जिंदगी भर शरारत करता रहता है, बचपन में खुलेआम तो बड़े होने पर चोरी छिपे या शराफत से. जरा याद कीजिए, आप अब भी ऐसे छोटे-मोटे झूठ जरूर बोलते होंगे, बेवजह. उससे ना उससे आपको कोई फायदा हुआ ना दूसरे को कोई नुकसान. लेकिन कई ऐसे मौके भी आए होंगे जब आप सच बोलते तो आपको या किसी दूसरे को नुकसान हो जाता. सो ऐसा झूठ बोलने में मेरे हिसाब से कोई हर्ज नहीं है जो प्रिय है और उससे किसी का नुकसान नहीं होता. याद कीजिए किसी डिसट्रेस्ड की काउंसिलिंग के समय या किसी परेशान को ढ़ाढस बंधाते समय हम कई बार ऐसे झूठ का सहारा लेते हैं, कभी किसी को ट्रॉमा से उबारने के लिए झूठा दिलासा देते हैं. और तो और हम कभी कभी अपनेआप से झूठ बोलते हैं. ऐसा करते समय हम अक्सर फैंटसी की दुनिया में चले जाते हैं उन सपनों को पूरा करने जो रीयल लाइफ में पूरे होते नहीं लगते. कुछ ऐसे सवाल होते हैं जिसका जवाब इमैजिनेटिव वल्र्ड में ही पाया जा सकता है. तो आइए इस संडे थोड़ी शरारत हो जाए लेकिन शराफत से.
पहले आपकी हिडेन फाइल्स से झेड़छाड़ करते हैं. आपको पता है कि उन फाइलों को हैक करना सबसे आसान है जो आपने अपने मन की हार्ड डिस्क में छिपा कर या सहेज कर रखी हैं. वैसे इनका पासवर्ड एक की होता है-कुछ कुछ होता है. एडॉलिसेंस, टीन एज, ग्रोनअप एज और उसके बाद की उम्र में भी हमें कुछ-कुछ होता रहता है और हम सब कुछ ना कुछ करते हैं. ये सब गुड ब्वॉय और गल्र्स ने भी किया है और बैड गॉइज और रोडीज तो करते ही हैं. स्कूल, कालेज, यूनिवर्सिटी कैंपस और फिर वर्किंग प्लेस हर जगह लोग बड़े चाव से अपने या अपने किसी साथी के बारे में बताते फिरते हैं कि कितने अफेयर्स थे, मैंने कितनों के साथ फ्लर्ट किया है, कितनों के साथ स्टडी डेज में 'गोइंग स्टडी' चला है. पिक्चर हॉल में क्या हुआ जब आपको किसी प्रिटीगर्ल के बगल में सीट मिल गई थी, क्या निहायत शरीफ बने बैठे आप के मन में शरारत नहीं सूझ रही थी.
घर में अकेले हों और कोई आ जाए. शालीन, पोलाइट और आइडियल होस्ट बने आपके मन में अचानक वाइल्ड थॉट नहीं आए थे क्या? भले ही आप उस समय उसे दबा ले गए हों और ये भी हो सकता है कि फैंटसी की दुनिया में आपने वो सब किया हो जो उस समय नहीं कर पाए थे. आप लाख ना कहें इसका उत्तर हमें पता है कल्पना लोक में आप जो भी करते हैं, उससे हमें संतुष्टिï मिलती है लेकिन दूसरों को कोई फर्क नहीं पड़ता. अगर ऐसा ना हो तो अराजकता फैल जाए. फैंटसी, समाज को बहुत बड़े संकट से बचाए हुए है. अच्छा पिंकी, प्रियंका, नेहा, प्रिया या सुप्रिया, या आप जो भी हों बताएं, आपको 'वो' अच्छा लगता था ना, 'उसके' बारे में आप ये सब ... सोचतीं हैं ना. आपका भी मन करता है ना शरारत करने को...कभी-कभी फ्लर्ट करने को...एटलीस्ट फैटसी की दुनिया में. अच्छा आपको टाइट जींस और ब्लैक टाप पहनना अच्छा लगता है, क्यों? टीन एज का वो वाकया आप या हम कैसे भूल सकते हैं जब में पड़ोस की ... को देख कुछ हो जाता था. आप कल्पना की दुनिया में क्यों चले जाते थे. उपमन्यु चटर्जी की एक किताब पढ़ी थी - 'इंग्लिश अगस्त, ऐन इंडियन स्टोरी'. किताब के पन्ने पलटते हुए लग रहा था कि ऐसा ही कुछ तो हम भी सोचते हैं और हमारे साथ भी होता है. फिर आपके साथ क्यों नहीं होता होगा.
अगर आप हेल्दी हैं, एनर्जेटिक हैं, आपकी हारमोनल ग्रोथ ठीक है तो अपोजिट सेक्स के प्रति अट्रैक्शन नेचुरल है. याद रखिए इमैजिनेशन, क्रिएशन की नींव है, वाइल्ड इमैजिनेशन भी. अगर ऐसा नहीं होता है तो कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. आपके घर के पास वो शोख लड़की रहती थी ना जिसे आप चुपके से निहारते थे. आपके दोस्तों के बीच रोज उसकी चर्चा भी होती थी ना. आखिर उसमें ऐसा क्या था कि रोज एक से एक मसालेदार किस्से... मोहल्ले की उस 'बब्ली' की चर्चा में वो 'बंटी' भी शामिल थे जिनकी छवि पढऩे वाले राजा बेटा वाली थी. और 'बब्लीÓ भी कभी-कभी मुस्करा देती थी. बाकी काम तो आपके वाइल्ड थॉट्स करते थे. अगर ऐसा ना हो तो सब बावले हो जाएं. सो नो टेंशन सच-झूठ के इस खेल में कितनी ही बातें, कितने ही फसाने हैं, इस शहर में तुम जैसे हजारों हैं.
मैं इस लेख को लिखता तो ऐसे ही लिखता। एकाध ऐसे लेख मेरे नाम से लिख दिया कीजिए ;) शिकायत नाहीं करेंगे।
ReplyDelete(जानते हैं ऐसे कह कर हम अपनी छवि बनाते हैं कि हम बड़े बिद्वान, चिंतक वगैरह टाइप के प्रतिभाशाली ब्यक्ति हैं । इतने बड़े हैं कि दूसरे हमसे अलग और हमसे बढ़िया सोच और लिख नहीं सकते ! धन्य हम)
पढ़ाकू छवि का फायदा - बबली की मुस्कान और फिर बहकती कल्पनाएँ (wild thought की तुलना में बेहतर अभिव्यक्ति :)-
ये तो पढ़ाकू रहे हर लड़के का दर्द है। इसको नए जमाने के एक बाउ ने ऐसे कहा था ,"ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई बाँका जवान तन कर खड़ा हो और उसकी ओर चाहत भरी नज़रें न लगी हों!"
..पढ़ाई की तेजी भी तान देती है।
बाकी वो घर में अकेले होने पर उसका आ जाना .... वगैरह वगैरह और फिर शरीफाना व्यवहार के साथ पैरलल वाइल्ड थॉट ! यह सब एक लंठ ही लिख सकता है।
राजीव भाई
ReplyDeleteजरा पैराग्राफ बना दिया करिये-पढ़ने में सरलता रहती है.
तो इस रविवार आपकी हिडन फाईल्स खुलने वली हैं ...एक दो फाईल्स का विवरण लिख ही दीजिये ....!!
ReplyDeleteबेहद पसंद आई।
ReplyDeleteवाह जी अंदाज ही बिंदास है आपका ..और हमें मजा भी खूब आया ..
ReplyDeleteअजय कुमार झा
bahut khub likha bade bhai, magar ak baat kehna chahunga ki agli baar lekh likhte samay pehra bana dijiyega, isse padne me aasani rehi hai.
ReplyDeleteये मुस्कुराता हुआ फोटोग्रॉफ हमारी टिप्पणी के बाद लगाया गया।
ReplyDeleteअधूरा पढ़वाने के लिए इस टिप्पणी के माध्यम से हम औपचारिक विरोध प्रदर्शित करते हैं।
हाँ !! हम भी झूठ बोलते हैं.
ReplyDeleteभगवान यही वरदान दें कि जो कुछ शेयरेबल न हो, उसे जल्दी भूल जायें हम!
ReplyDeletesahi kaha aapne, har aadmi jhooth bolta hai. yahan kuchh line yaad aa gayee....main kisse ko haqikat mein, badal baitha to hangama......very nice. baandhe rakha aapne...
ReplyDeleteराजीव जी, गजब। कहाँ से ले जाते हैं और कहाँ तक घुमा लाते हैं। आपकी लेखनी की रवानी ने मंत्रमुग्ध सा कर दिया।
ReplyDeleteआरा हीले बलिया हीले छ्परा हिलेला sss
ReplyDeleteoo गवनई सुनि के जो खुशी होती है वो ही आप की टिप्पे से हुई. पहली टिप्प और पहले phaलोवर jee धन्यवाद. शुकिरिया आदा ___
जे लेख हम पहिले पढ़ चुके हैं. आपो पुरबिए हैं ? सही है.