
स्टार बनना किसे अच्छा नहीं लगता. यंगस्टर्स का सपना होता है सेलिब्रिटी बनने का. पैरेंट्स भी तो चाहते हैं उनके बच्चे नाम रौशन करें पूरी दुनिया में. सपनों को साकार होते देखना अच्छा लगता. टीवी-फिल्म एक्टर, राइटर, डाइरेक्टर, स्कॉलर, क्रिकेटर, दूसरे प्लेयर, छोटे-बड़े सबको सेलिब्रिटी स्टेटस लुभाता है. रियलिटी शो की अफशां-धैर्य, सिंगिंग का लिटिल सरप्राइज हेमंत, कॉमेडी की बच्ची सलोनी या फिर विजकिड युगरत्ना ऑफ यूएन फेम. इन सब की चमक देख याद आने लगती है राइम-ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार हाउ आई वंडर व्हॉट यू आर...
लेकिन फिर 'स्टारडम' की डुगडुगी इस तरह बजते देख डर लगता है. जिसे देखो वही डुगडुगी लेकर इस खेल में भागीदार बनना चाहता है. इस खेल में पिंकी (स्माइल पिंकी फेम) कभी इस शहर में स्माइल करती है, कभी उस शहर में, कभी यहां सम्मान, कभी वहां एडमिशन. और अचानक स्माइलिंग पिंकी सहमी-सहमी लगने लगती है. सुना है वो एक महीने से स्कूल नहीं जा रही. पिंकी अपने गांव में विकास कार्यों की सिफारिश लेकर विंध्याचल मंडलायुक्त कार्यालय के चक्कर लगा रही है. इसी तरह सारेगामापा के टॉप फाइव के राउंड में तो लखनऊ की प्रतीक्षा जम कर गाती है लेकिन मीडिया के लौट कर मीडिया के सामने रोने लगती है. इन लिटिल वंडर्स पर इतना दबाव कौन डाल रहा है. वे खुद कतई दोषी नहीं हैं. युगरत्ना की विजडम और इंटेलिजेंस पर उसके पैरेंट्स और स्कूल को ही नहीं पूरे देश को गर्व है. धन्य हैं ये बच्चे लेकिन इनके स्टारडम को कहीं हम ओवर यूज तो नहीं कर रहे. कहीं इनकी एनर्जी समय से पहले तो निचोड़ नहीं नहीं ले रहे. ये स्टार्स किसी भी शहर के हों, इनके शेड्यूल पर नजर डालिए. आज इस फंक्शन में तो कल दूसरे फंक्शन में. आज यहां उद्घाटन तो कल वहां दीप जलाना. शहर के बडे प्रोग्राम या गैदरिंग में इन स्टार्स का पार्टिसिपेशन जरूरी समझा जाता है. इनकार कर नहीं सकते क्योंकि ऑनर में दिए जा रहे इनविटेशन को ठुकराने पर 'स्नॉब' समझे जाने का खतरा है. लेकिन इन्हें बार-बार किसी मंच पर खड़ा होने को मजबूर कर, क्या हम इनका सही मायने में सम्मान कर रहे हैं? जो समय पढ़ाई का होना चाहिए, उस समय को सेमिनार और भाषण में खर्च कर हम इनके विकास के सहज मार्ग में बाधएं तो नहीं खड़ी कर रहे?
स्टारडम की चाह और प्रसिद्दि की चमक दमक बच्चों से उनकी नैसर्गिक जीवन्तता छीन रही है ...!!
ReplyDeleteपहले भाषा - संस्कृत तत्सम शब्दावली युक्त बहुत कम लोग बोलते हैं। वैसे ही उपर जैसा भी बहुत कम लोग बोलते हैं। बोलने और लिखने में अंतर होता है क्यों को बोलना कहीं अधिक अंतरंग और अनौपचारिक होता है। लिखा हुआ पत्थर की लीक - इसलिए उसके विमर्श कहीं अलग हो जाते हैं। ... उपर जैसा लिखा गया है वह आजकल कॉलेज विश्वविद्यालय में पढ़ते युवा की भाषा का नमूना नहीं, कहीं उसे ठीक उसी प्रवाह में और आगे ले जाने की तड़प या चाह को दिखाता है लेकिन कुछ शब्द अखरते हैं और उनसे भाषा सहज नहीं रह गई है। .... अंग्रेजी स्थापित है लेकिन हिन्दी अब पीछे से सरपट आ रही है और हमारी ड्यूटी(कर्तव्य नहीं :)) बनती है कि लिखे में हम हिन्दी के सरल शब्दों को स्थान दें। नई पीढ़ी की जुबान(डायलेक्ट नहीं ;)) को संस्कार दें.... लेक्चर दे दिया। सीना चौड़ा हो रहा है ;)
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मैं स्कूलिंग तक हमेशा टॉप नं 1 रहा। वहाँ बने रहने का बोझ मन मस्तिष्क पर इतना रहा कि कॉलेज जाने पर प्रतिक्रियावश हमेशा ऐसे रहा कि नं 1 की दौड़ में न रहूँ। आज भी अपने उस अनजाने निर्णय को सराहता हूँ।
पिंकी की क्या उपलब्धि है? ग्लैमराइजेशन। इस अवस्था में क्या उसे 'उपलब्धि' की आवश्यकता है? विंध्याचल मंडलायुक्त के कार्यालय के चक्कर लगाने को क्या उस क्षेत्र में बस वही बची है? हम ऐसी पिंकियों को आगे कर अपनी काहिली और कायरता पर पड़े पर्दे को और मोटा कर रहे होते हैं। कौतुक और तमाशेबाजी की प्रवृत्ति को पुख्ता कर रहे होते हैं। मीडियाबाजी के असुरों के लिए सामान का जुगाड़ करती ऐसी जाने कितनी पिंकियाँ खो चुकी हैं, कोई उनका हाल भी नहीं लेता... आप ने इस मुद्दे को उठा कर एक पुण्यकर्म (इसकी अंग्रेजी क्या होगी - गुड वर्क? छोड़िए इसमें वह पंच नहीं है।) किया है। आभार।
एक बात कहना भूल गया - पिंकी स्मार्ट और कॉंफीडेंट लग रही है। यह इस युग की उपलब्धि (एचीवमेंट नहीं) है।
ReplyDelete@गिरिजेश राव: 'Good work' to police karti hai.Aap 'Well done' kah sakte hain :)
ReplyDeleteपिन्की की क्या बात करें, भारत की सारी प्रतिभा अंतत: ब्यूरोक्रेसी की बाबूगिरी में जा कर दफन होती है। :-)
ReplyDeleteबाज़ार सब कुछ एंकैश करवा सकता है यह सिलसिला भी कुछ दिन चलेगा
ReplyDeleteबाजार है यहाँ तो ऐसे ही होता रहेगा.
ReplyDeleteबच्चों पर ज्यादा प्रेसर ठीक नहीं, जिससे वे अपनी पढाई भी न कर पायें. हम देखते हैं कि अधिकतर बडे होकर खो जाते हैं.
ReplyDeleteसही बात तो ये है कि इन सब मामलों में स्माइल पिंकियां नहीं करती, करते हैं उनके प्रायोजक ( भले ही वे अपने आप को उत्प्रेरक कहते हैं ). पिंकिया तो बस माध्यम हैं, असल में जो लोग इन्हें आगे लाते हैं,बैंक तो वे ही जाते हैं. इन बच्चों को तो क्षणिक सेलीब्रिटी का लोभ देकर प्रयोग किया जाता है और जैसे ही इनकी यूटीलिटी खत्म, इनका सेलीब्रेशन भी खत्म.
ReplyDeleteParents bhi kam nahi hote ojha ji......pinki ki baat chod digiye....t.v serials mein jo bachche acting karte hai....... 8-10 hrs shooting karte hai.....yahi wajah hai ki umr se pahle hi bade ho jate hai...aur bachpana gayab
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