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बत्ती बना लो ...!
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काशी में बौराए से गिरिजेश !
8/4/13
हमहूं सलमान
3/16/13
इस रात की सुबह नहीं...
बात इसी सर्दी के दिनों की है जब रात का पारा जीरो के नीचे चला गया था. रजाई भी उस रात बहुत कारगर नहीं था. ठंड ने कई बार जगाया. सिहरन भरी रात उसकी याद बार-बार डरा रही थी. उस फेरी वाले की काया आंखों के सामने घूम गई.. क्या वो मर जाएगा, क्या इस ठंड का झेल पाएगा? वो रोज ही तो मिलता था प्राइमरी स्कूल की दीवार के सहारे फुटपाथ पर कूबड़ निकाले बैठा हुआ. मैला पजामा, फटा कोट और उस पर हिलता हुआ उसका सिर. दीवार से टिकी लाठी, पेप्सी की बोतल में पानी और बगल में रखी चप्पल. पर फटपाथ पर दुकान बड़े करीने से लगाता था वो. अखबार बिछा उस पर संभाल कर रखता था पान मसाला की चार-पांच लडिय़ां. सुबह करीब दस बजे से शाम चार बजे तक वो वहीं बैठता था. कभी कभार मसाला खरीदता कोई ग्राहक भी दिख जाता था वहां. कभी-कभी उसकी दुकान नहीं दिखती. कभी दुकान तो दिखती लेकिन वो नहीं दिखता. लेकिन नजर दौड़ाने पर दिख भी जाता, कभी थोड़ी दूर पर पेशाब करते या चाय पीते हुए.
...तो जीरो डिग्री वाली रात की अगली सुबह वो नहीं था उस जगह. लगा कि ठंड में हो गया उसका काम तमाम. इधर-उधर नजर दौड़ाई तो रोड की दूसरी साइड बैठा मिल गया. वहां धूप पहले आती थी शायद इस लिए वहां बैठा था. उसकी दुकान के सामने उस दिन मेरे कदम ठिठक गए थे. मैंने दस का नोट बढ़ाया...वो पूछ रहा था...कौन सा दें बाबूजी.. मैं मसाला नही खाता..उसके हिलते चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी.. रोज कितना कमा लेते हो?.. दो-चार पैसे मिल जाते हैं...लो चाय पी लेना..उसने नोट लेकर सिर पर लगाया और उसी तरह सिर झुका कर बैठ गया. चेहरे पर कोई खुशी न गम. मैं भी आगे बढ़ गया. मैंने उसे दस रुपए दिए थे लेकिन वो तो रोज मुझे कुछ ना कुछ देता था...जूझते रहने, कभी लडऩे और कभी हार ना मानने की प्रेरणा. सुबह उसे देखते ही निराशा के सारे बादल छंट जाते थे. उसे जूझते देख ऑफिस में हर दिन एक नई शुरुआत होती थी. लेकिन अब मेरे ऑफिस का रास्ता बदल गया है इस लिए वो नहीं दिखता. शायद अब भी वो वहीं बैठा होगा हिलते हुए सिर को संभालने के लिए जूझता हुआ, पर न जाने क्यूं लगता है कि उसकी जिंदगी तो एक सिहरन भरी रात है जिसकी सुबह नहीं.
2/21/13
डाउन मार्केट, अपमार्केट...!
2/20/13
Ek chinta....
गंगा..तुम बहती हो क्यूं..!
चाहे चार करोड़ लोग गंगा में डुबकी लगाएं या दस करोड़, तब भी ढेर सारे पापी बचे रहेंगे क्योंकि वो डुबकी लगाएंगे तो भी उनके पाप नही धुलेंगे. हां, गंगा पहले से ज्यादा गंदी हो जाएंगी. इलाहाबाद स्टेशन पर जो भगदड़ मची उसके लिए जिम्मेदार लोगों के पाप तो कभी नही धुलेंगे भले ही जिंदगी भर गंगा में खड़े रहे. पानी फिर भी अभी समय है आप नहीं जाएंगे संगम में डुबकी लगाने? सारे पाप धुल जाएंगे! ऐसा हम आस्था की वजह से कह रहे हैं. इंडिया में तो नदियों को पूजा जाता है, उन्हें मां और देवी का दर्जा दिया गया है. कहा जाता है कि कुंभ के दौरान संगम में डुबकी लगाने से सारी बुराई धुल जाती है क्यों कि वो जल अमृत के समान होता है. वैसे गंगा हों या यमुना, उद्गम स्थल पर इनका निर्मल जल अमृत समान ही होता है. लेकिन सालों साल हमने इतनी गंदगी, मैल और पाप इन नदियों में धोए हैं कि अमृत तो दूर, नदियों का पानी पीने लायक भी नहीं रह गया. बुरा मत मानिएगा लेकिन आपको क्या लगता है साल भर जो पाप हम सब इन नदियों को गंदा करने में करते हैं वो क्या कुछ मिनट की डुबकी से धुल जाएगा?
आस्था को जाने दें, वैज्ञानिक आधार पर भी ये बात सिद्ध हो रही है कि देश भर की नदियों को गंदा करने में हमने कोई कसर बाकी नहीं रखी है. कहां तो नदियों को जीवनदायिनी कहा जाता लेकिन अब इन नदियों का पानी हमने पीने लायक छोड़ा है क्या? लेकिन गंगा फिर भी यूं ही बहती रहेगी, मां जो ठहरी.
2/12/13
1/25/13
'मिस्ड टॉपअप'
निर्मल बाबा की तरह और लोग भी किरपा बरसाते हैं कभी कभी. ये किरपा डावर्ट हो कर आपके फोन में घुस जाती है, कभी मिस्ड काल के रूप में तो कभी 'मिस्ड टॉपअप' के रूप में. एक बार एक ब्वायफ्रेंड ने अपनी गर्ल फ्रेंड के नंबर पर टॉपअप कराया. पता नहीं कैसे नंबर के घालमेल से टॉपअप मेरे सेल पर आ गया. तुरन्त बाद ही उस जीएफ का फोन आ गया कि गल्ती से आप के सेल मे चला गया, प्लीज किसी पीसीओ से मेरे नंबर पर वो आमउंट डाल दीजिए. पहले मैं तैयार हो गया फिर डर गया कि ये लड़की फंसा ना दे कि मेरे पीछे पड़ा है कि फोन पे बात करो, बिना कहे मेरे सेल में पैसा डाल दिया. सो मैंने कहा, देवी जी आप अपने बीएफ को मेरे ऑफिस भेज दीजिए, कैश दे दूंगा. फिर बीएफ का फोन आया कि अच्छा मेरे सेल में डाल दीजिए. मैंने मना कर दिया कि कैश ही मिलेगा. फिर न फोन आया ना वो आए. मैं इंतजार में हूं कि निर्मल बाबा की किरपा से मिस्ड कॉल आए ना आए लेकिन एक बार फिर 'मिस्ड टॉपअप' हो जाए...कोटि कोटि परनाम..
12/11/12
ओ..त्तेरी की...
तुम भी बड़े वाले हो...माइंड ब्लोइंग, ओ...त्तेरी की...लग गई वॉट...इट इज हॉट...
चक्कर क्या है? जिसे देखो वही इन शब्दों को दाग रहा है और इनको रचने वाले कॉमनमैन ही हैं. वैसे भी आजकल कॉमनमैन इन-फैशन है. जैसे पहले फिल्मों की 'इमोशनल ' कर देने वाली कहानी उनके हिट होने की गॉरन्टी हुआ करती थी और उसमें मुख्य किरदार अक्सर कॉमनमैन ही निभाता था. हीरो होकर भी वो निरीह कॉमनमैन था. ये अलग बात है कि वो अक्सर अपना दिल हवेली में रहने वाली हीरोइन से लगा लेता था. अगर हीरो अमीर तो हीरोइन आपके मोहल्ले की कॉमन गल्र्स की तरह होती थी. इसके बाद तो आंसुओं का जो दरिया बहता उसमें आम दर्शक तीन घंटे डूबता-उतराता और फिक्चर हाल के बाहर वो 'पैसा वसूल ' वाले अहसास के साथ निकलता. इसके बाद कुछ दिनों उस दर्शक रूपी कॉमनमैन में हीरो-हीराइन समाए रहते और फिल्म हिट. आजकल भी यही हो रहा. कोई मुद्दा हो, प्राब्लम हो, उसे कॉनमैन से जोड़ दो. बस मामला हिट. लेकिन कौन कहता है कि कॉमनमैन बेचारा होता है. कॉमनमैन अब सयाना हो गया है. वो जितना बेचारा दिखता है उतना है नहीं. जिस तरह शब्द, समय के साथ चोला बदलते रहते हैं उसी तरह ये 'कॉमनमैन ' का चोला बदलता रहता है. कॉमनमैन के शब्द भी बदलते रहते हैं, अर्थ बदलते रहते हैं या यूं कहिए वो नए-नए शब्द गढ़ते रहते हैं. एक जमाना था जब 'गुरु ' शब्द की बड़ी रिस्पेक्ट थी. अब तो कहा जाता है.. अरे वो बड़ी 'गुरू ' चीज है. गुरु, गुरूघंटाल हो गया. 'उस्ताद ' का भी यही हाल है. पहले उस्ताद की बड़ी रिस्पेक्ट थी अब किसी से कहिए कि उस्तादी दिखा रहे तो वो बुरा मान जाता है. इसी तरह आजकल 'कॉमनमैन ' का एक बड़ा हिस्सा भी गुरू या उस्ताद हो गया है. समझ गए ना वही ', 'बड़े वाले '. और कॉमनमैन का माइंड तो डिफेक्टिव कुकर की सीटी का तरह जब-तब ब्लो करता रहता है. बात-बात पर 'माइंड ब्लोइंग '. पहले जो धत् तेरी की था वो अब 'ओ त्तेरी की ' हो गया है. जब कुछ ऐसा हो जाए जिसमें एम्बैरेसमेंट के साथ मजा भी आए तो समझिए हो गया 'ओ त्तेरी की '. जैसे गर्लफ्रेंड के साथ आप फिल्में देखने गए और इंटरवल में पता चले कि अगली रो में आपका बॉस अपनी फ्रेंड के साथ बैठा है तो इसमें मुंह से निकलेगा.. ओ त्तेरी की. पहले जहां खाट खड़ी होती थी अब वॉट लगती है. क्योंकि अब खाट का चलन कम हो गया है. और हां, जिसे देखो वही हॉट है इंडक्शन चूल्हे की तरह, जो टच करने से गर्म नहीं लगता लेकिन सम्पर्क में आते ही स्टीम बनने लगती है. इंजन और मौसम को गरम होते सुना था. कभी-कभी मिजाज भी गरम हो जाता है लेकिन अब जिसे देखो वही 'हॉट ' है. 'हॉट 'होना काम्प्लीमेंट है.
वैसे इन शब्दों को कॉमनमैन मुंह में मसाले की तरह भरे घूमता रहता है. और जहां मौका मिला..पिच्च. वो फिफ्टीज-सिक्स्टीज की फिल्मों के कॉमनमैन की तरह निरीह नहीं, थोड़ा चालू किस्म का है, थोड़ा-थोड़ा करप्ट भी है और अक्सर नियम-कानून भी तोड़ता है. सिस्टम को कोसता है लेकिन अकसर दफ्तर लेट पहुंचता है. कहीं भी कूड़ा फेंक देता है, कहीं भी मसाला खाकर थूक देता, फिर गंदगी के लिए नगर निगम को कोसता है. नो पार्किंग पर बाइक खड़ी करता है फिर ट्रैफिक जाम के लिए पुलिस को भला-बुरा कहता है. अपने वाहन के पेपर्स दुरुस्त नहीं रखता फिर वसूली का आरोप लगाता है. अपने घर के कूड़े की पॉलिथीन पड़ोसी के दरवाजे के सामने फेंक कर सिविक सेंस पर लेक्चर पिलाता है. पॉवर कट पर बिजली वालों को पानी पी-पी कर बुरा-भला कहता है लेकिन मीटर खराब करवा कर या कटिया मार एसी चलाता है. रेलवे से तो उसका सास- बहू वाला रिश्ता है, मजाल है कभी रेलवे की तारीफ कर दे लेकिन मौका मिलने पर 'डब्लू टी ' सैर का मजा लूट आता है लेकिन फिर भी वो 'निरीह ' कॉमनमैन कहलाता है. लेकिन मार्डनिटी और ट्रेडिशन तो साथ-साथ चलते हैं सो अभी भी ढेर सारे 'कॉमनमैन ' पुराने वाले फॉरमैट में जी रहे हैं जो कानून को मानते है, नियमों का पालन करते हैं और उनको ऐसा करते देख सयाना कॉमनमैन बोलता है..ओ त्तेरी की...
10/26/12
आज बात करते हैं यूथ सिंड्रोम की. यानी यूथ के नाम पर आप जो करते हैं,
खाते, पीते, पहनते और बोलते हैं, वही सही है. जो
जरूरत से ज्यादा टेक्नो सैवी है, गैजेट के चक्कर में क्रेजी-वेजी है वही
यूथ है. वही यूथ है जिनका बिहेवियर हॉस्टल रूम और पब्लिक प्लेस पर एक
जैसा होता है, स्लैंग और एब्यूसिव लैंग्वेज जिनकी जुबान पर और दुनिया
ठेंगे पर होती है. जो टीन एज में तोरई, लौकी और कद्दू से 'हेट' करता है,
दूध से दूर भागता है पर
कोल्ड ड्रिंक का वेट करता है. वो अक्सर पैटीज से पेट भरता है. बर्गर,
बिरयानी और पास्ता से है उसका वास्ता.
माना कि इंडिया में आधी आबादी युवा है लेकिन जिसको देखो वही
'यूथ' को डिफाइन करने पर तुला है. जब खास किस्म का 'स्टेट ऑफ माइंड'
बुद्धि और विवेक पर डॉमिनेट करने लगता है तो वो 'सिंड्रोम' बन जाता है.
यूथ सिंड्रोम से ग्रस्त बंदा हमेशा अपने को युवा और दूसरों को अंकल या
आंटी समझता है भले ही वो उससे
पांच-छह साल ही बड़े हों. ये सिंड्रोम बड़ा इंफेक्शियस होता है. वैसे तो
अंकल-आंटी बड़ा सम्मान सूचक शब्द है लेकिन आजकल जिस तरह से इस बाण का
प्रयोग हो रहा, उससे तो अच्छे खासे यूथफुल लोगों के प्राण भी बॉडी से
निकलने को आते हैं. अगर नहीं निकले तो वो ना चाहते हुए भी 'अंकल-आंटी
सिंड्रोम' से ग्रस्त हो जाते हैं. सब्जीवाला, दूधवाला, कबाड़ीवाला,
परचूनिया उम्र
में बराबर या बड़ा होने पर भी आपको आंटी बोले तो चलता है लेकिन कोई
हमउम्र यंग सेल्समैन, बैंक एग्जीक्यूटिव या कोई हैंडसम 'गाय' या गर्ल
आपको अंकिल बोले तो..?
बची खुची कसर टीवी पर तरह-तरह के ऐड ने पूरी कर दी है. जैसे ग्रे हेयर
वाले को एक लड़की अंकल बोलती है तो वो डिप्रेशन में आ जाता है और अगले
दिन हेयर डाई लाकर उसी लड़की को रिझाता है. इसी तरह स्मार्ट फोन वाली
लड़की, पुराना फोन यूज कर रहे एक
सज्जन को 'अंकल' कह कर चिढ़ाती है. जब रिस्पेक्ट वाली 'आंटी' युवाओं के
लिए चिढ़ाने वाली 'आंटी' बन जाए तो इसे सिंड्रोम ही कहेंगे. यूथ जब
उम्रदराज हो जाता है तो यूथफुल जाता है. इसकी वजह से 'यूथ' और 'यूथफुल'
में एक तरह का पर्सनालिटी क्लैश शुरू
हो गया है. यूथ, यूथफुल लोगों को युवा मानने को तैयार नहीं और यूथफुल
अपने को बजुर्ग मानने को तैयार नहीं. इसी क्लैश का नतीजा है 'डीके बोस'
और अब 'तेरी मां की यूथ'.
क्या जिसकी जुबान पर बात बात पर गॉली या डबल मीनिंग वाले वड्र्स हों वही
यूथ है? और जवाब में सफेद बालों के बावजूद अपनी हेयर स्टाइल और टैटू
जडि़त शरीर के कारण यूथफुल दिखने वाली सपना
भवनानी जब सलमान खान को 'तेरी मां की यूथ लिखा' टी-शर्ट भेंट करती है
तो इसे क्या माना जाए? वो यूथ को क्या मैसेज देना चाहती हैं?
पहले इस तरह के द्विअर्थी शब्द गली मोहल्ले में सुनाई पड़ते थे. लोग
उन्हे इग्नोर कर जाते थे. लेकिन अब ये अपमार्केट और ग्लोबल हो गए हैं. अब
इग्नोर नहीं कर सकते. सुन कर हूट या ट्वीट नहीं किया तो आउट फैशन्ड और
स्टीरियो टाइप माने जाएंगे. ये स्टीरियो भी अजब बला है स्टीरियोफोनिक हुए
तो मार्डन और स्टीरियो टाइप हुए तो बोरिंग. सब बजाने और सुनने का फर्क
है. सिचुएशन बड़ी का प्लेक्स्ड है और इसमें नुकसान सबका हो रहा
है. कभी सोचा है कि जिन्हें हम 'यूथ' कह कर डिफाइन कर रहे हैं वो रूरल और
सेमी अर्बन को जाने दें, खालिस अर्बन यूथ के एक चौथाई हिस्से को भी
रिप्रेजेंट नहीं करते. क्या शहरों में रहने वाले बाकी तीन चौथाई युवा,
यूथ नहीं हैं. जो शालीन, संजीदा और करियर को लेकर कांशस हैं. वो भी
मार्डन है और आगे बढऩे की सोचते हैं. जो सोचते हैं अपने देश और सिस्टम के
बारे में, करप्शन उन्हें परेशान करता है. लेकिन वो 'यो-यो'
टाइप नहीं या बियर कैन लेकर पब्लिक प्लेस पर हुल्लड़ नहीं मचाते,
लड़कियों को नहीं छेड़ते, तोडफ़ोड़ नहीं करते. वो भी नेट सैवी हैं, नए
गैजेट-शैजेट पसंद करते हैं, पार्टी में जमकर इंज्वाय करते हैं लेकिन
दूसरों की कीमत पर नहीं. ढिंडोरा पीटने, स्लोगन लिखने या चीखने से कोई
युवा या यूथफुल नहीं हो जाता. ये भी एक स्टेट ऑफ माइंड है. इस 'यूथ
सिंड्रोम' के शोर में आपके शहर का दो तिहाई यूथ क्या चाहता है इसकी फिक्र
किसी को नहीं.
8/2/12
आज कुछ तूफानी करते हैं

4/8/12
कोटि कोटि परनाम चल गयी दूकान

इन दिनों काफी एनर्जाइस्ड महसूस कर रहा हूं. अरे बसंत-वसंत का चक्कर या
व्रत का कमाल नहीं है. लेकिन बात कुछ खास है कि रात बारह बजे के आसपास
अचानक मूड फ्रेश हो जाता है, सारी थकान दूर हो जाती है और पूरे शरीर में
करेंट सा दौडऩे लगता है. ये सब होता है बिल्कुल फ्री. न, न आप बिल्कुल
गलत समझ रहे हैं. ना मैं किसी मसाज पॉर्लर में जाता हूं ना ही बॉर में.
सामने टीवी और हाथ में रिमोट. दिन में खबरों का लेकर चीखने वाले कुछ
खबरिया चैनल रात होते ही तरह-तरह की ऊर्जा वाले 'प्राश' बेचने लगते हैं.
'प्राश' समझ गए होंगे, अरे वही च्यवनप्राश का कजिन. हमने तो बचपन में
बहुत च्यवनप्राश खाया है. लेकिन अब तो नए पैकेज वाले एनर्जी पैक्ड
'प्राश' आ गए हैं. किसी में सोना, किसी में चांदी का भस्म. अब समझ में
आया कि सोना- चांदी के दाम क्यूं बढ़ रहे हैं. मिडनाइट बाजार के इन
प्रॉडक्ट्स में एक और खास बात होती है कि हमेशा अपने एक्चुअल प्राइस से
काफी कम दामों में उपलब्ध रहते हैं. इन 'प्रॉश' का प्रजेंटेशन इतना
शानदार होता है कि नजरें प्रॉडक्ट से शिफ्ट होकर प्रेजेंटर के
'पावरप्वाइंट' पर जा टिकतीं हैं. इनमें ह्यूमर भी होता है. बस आपको
थोड़ा एमैजिनेटिव होना पड़ेगा.
रात होते ही टीवी शो एकदम पावर पैक्ड हो जाते हैं. जड़ी-बूटी का कमाल तो
देखिए कि लाठी टेक कर चलने वाले लोग टेनिस खेलने का दावा करने लगते हैं.
चाहे 'प्रॉश' हो या बूटी, सबका प्रजेंटेशन एक जैसा- आगे की लाइन में बैठे
जाने-पहचाने स्टार और सेलेब्रिटी टाइप पेशेंट. सब के पास चमात्कारिक
क्योर की कहानी. वैसे रात के पैकेज में और भी बहुत कुछ है- रहस्य-रोमांच,
रुहानी ताकतों से रूबरू कराने वाले ताबीज, शैतानी शक्तियों से बचाने वाले
कवच, तरह तरह के यंत्र और मंत्र.
आधी रात को अलग अलग चैनल्स पर अलग डॉक्टर अपनी-अपनी माइक्रसकोप लिए आपकी
'पावर' को परखते मिल जाएंगे. तम्बाकू से काले पड़ गए दांत लिए जबरन
अंग्रेजी बोलने की कोशिश करने वाले ये डाक्टर पहले आपको किसी 'सब्जबाग'
में घुमाएंगे और बताएंगे कि कैसे आपकी 'पावर' बढ़ाने वाली जड़ी-बूटियों
को उनकी देखरेख में निजी बगीचे में उगाया जाता है. वो बार-बार माइक्रसकोप
से क्या देखते हैं पता नहीं. लेकिन ऐसा हर डाक्टर अपने ग्राहकों से
बार-बार ये तस्दीक जरूर करता है कि असली डाक्टर वही हैं बाकी सब नकली
हैं. वो ये भी बताते हैं कि 24 घंटे उनकी एम्बुलेंस स्टेशन के बाहर खड़ी
रहती है ग्राहकों, सॉरी पेशेंट्स की ताक में. अब सोचिए कीजिए जरा. स्टेशन
से निकल रहे किसी अजनबी को एम्बुलेंस वाले कैसे पहचानते होंगे कि गुरू,
बस यही है यौन रोगी, दगोच लो. और अचानक नीलीबत्ती चमकाते, सायरन बजाते
एम्बुलेंस उसके सामने आ रुकेगी, स्ट्रेचर लिए दो लोग उसमें से कूदेंगे और
उस अजनबी को हाथ-टांग पकड़़ स्ट्रेचर पर लिटाया जाएगा और सर्र से
एम्बुलेंस दौड़ पड़ेगी क्लीनिक की ओर जहां एक डाक्टर माइक्रसकोप लिए उसके
इंतजार में बैठा होगा. वो उसकी बेल्ट खुलवाएगा, कुछ टटोलेगा और फिर गंभीर
होकर माइक्रसकोप में कुछ देखने लगेगा.
इसी तरह आपको याद होगा कि कुछ महीनें पहले तक सर्वे कंपनियों की भरमार
थी. जिसे देखो सर्वे भर रहा था और साथियों को बता रहा था कि तुम भी भरो,
हमने तो इतना कमाया. लोगों ने बिना सोचे-समझे गाढ़ी कमाई लगा दी और अचानक
सब कंपनियां फरार. टीवी चैनल्स पर आजकल ऐसे ही कुछ प्रोग्राम्स चल रहे
हैं. दिन-रात और शाम के प्राइम टाइम में भी. खचाखच भरा बड़ा सा हाल,
सिंहासन पर विराजमान बाबा. भक्त बीच-बीच में खड़े होकर अपनी समस्या बताते
हैं. कुछ फिर ये भी बताते हैं कि बाबा की कृपा से वो मालामाल हो गए. बाबा
बीच-बीच में प्रवचन औश्र आशीर्वाद देते रहते हैं. शो के दौरान टीवी
स्क्रीन पर मैसेज आता है कि आप किस खाते में पैसा जमा कर इस जमात में
शामिल होने के लिए अपनी बुकिंग करा सकते हैं. साथ में ये भी मैसेज चलता
है कि चार महीने तक बुकिंग फुल है और आप अगर टीवी पर भी बाबा का
प्रोग्राम देखेंगे तो भी कल्याण होगा. ये है पैसे के साथ टीआरपी का भी
जुगाड़. भविष्य में बाबा के प्रोग्राम में कमर्शियल ब्रेक भी आने लगे तो
आश्चर्य नहीं. इस मिडनाइट बाजार से आपको पावर, प्लेजर या इंटरटेनमेंट में
से क्या मिलता है, ये इस बात पर डिपेंड करता है कि आप विवेक का इस्तेमाल
कितना करते हैं. ..तो समझने वाले समझ गए हांगे, जो ना समझे वो अनाड़ी है.
--
1/9/12
चिकनी चमेली वाला पौव्वा
पार्टीज में बहकता तो मैं भी नहीं क्योंकि मैं ड्रिंक नहीं करता लेकिन हॉस्टल लाइफ में कोई भी ऐसी प्रीमियम ब्रांड नहीं बची थी जिसे टेस्ट नहीं ·किया हो. लोग ·हते हैं हर ब्रांड किक अलग होती है लेकिन रम से लेकर स्कॉच तक तक सब ने मुझे एक जैसी ही किक लगाई. इसी टेस्ट के चक्कर में एक बार तो मेरे ·कान में जिन घुस गया था. बात कई साल पहले है, वो भी ऐसे ही 31 दिसंबर की रात थी. न्यू इयर ईव पर हॉस्टल में साथियों ने व्यवस्था की साथी कहीं से जिन ले आया था. बोला थोड़ा ले लो जुकाम ठीक हो जाएगा. लाओ देखें जरा.. स्टाइल में मैंने भी थोड़ी जिन ले ली. पता नहीं क्या हुआ कि गले 15 दिन तक मेरा सीना जकड गया, सूंघने और सुनने की क्षमता जाती रही, लोग कुछ बोलते थे तो मैं कान के पास हाथ ले जाकर आंय-आंय करता था. जब दोस्तों को पता चला कि ये जिन का नतीजा है तो सब ने खूब मजा लिया. बात पूरे हॉस्टल में फैल गई कि ·अबे.. ओझवा के कान में जिन्न घुस गया है. उसे सुनाई नही पड़ रहा है. बाद में यह जिन एंटीबायटि· लेने से ही भागा. उस दिन से कान पकड़ा .तो दोस्तों पार्टी होती ही मस्ती के लिए. पार्टी ऐसी हो जो बार-बार याद आए. जम कर मस्ती करिए लेकिन इतना टल्ली ना हो जाएं कि घर ना पहुंचने पर आप· अपने घबराएं. बार-बार फोन आएं और अगले दिन लोगग खिल्ली उड़ाएं.
12/6/11
दोस्त-वोस्त...यार-व्यार...!

साहित्य समाज का आइना होता है लेकिन लगता है आजकल समाज का आइना सोशल नेटवर्किंग साइट्स भी हैं. सो आज उन लोगों की बात जो किसी ना किसी की फ्रेंड लिस्ट में हैं. हर फ्रेंड जरूरी होता है चाहे वो फेक, फ्रस्ट्रेटेड, फ्लर्ट, फाल्तू, फ्रैंक, फुरसत में या फेंकने वाले ही क्यों ना हों. कुछ दिन पहले किसी फेसबुकिया ने कमेंट किया था, गुरू... तुम्हारी फ्रेंड लिस्ट में गल्र्स की लम्बी लाइन है. उसे बताना पड़ा कि दोस्त ये गल्र्स की नहीं फ्रेंड्स की लिस्ट है और इसमें 13 साल के बच्चों से लेकर 73 साल की बुजुर्ग भी हैं. ये लिस्ट इससे कई गुना लम्बी होती, लेकिन वीड्स की छंटनी और सूखे ठूंठनुमा लोगों को हटाते रहने से ये मैनेजेबल है. कौन फ्रेंड हैं और कौन फ्रॉड, ये तो कुछ दिन साथ-साथ चलने पर पता लगता है. दोस्त के कमेंट के बाद सोचा चलो इन चेहरों के पीछे के चेहरे को पहचानने की कोशिश करते हैं. उनको रुक्रैच करने पर एक अलग ही दुनिया सामने आई. फीमेल मेंबर्स से पूछा कि अगर आप मेरी फ्रेंड लिस्ट में हो तो मेरी क्या हुई? सब ने कहा.. फ्रेंड. फिर पूछा, अगर फ्रेंड फीमेल हैं तो गर्लफ्रेंड हुई ना...? कुछ ने टप कहा ...बिल्कुल नो प्रॉब्लम- ये था फ्रैंक चेहरा. लेकिन कुछ लड़कियां तुरन्त हॉय, हाऊ आर यू, आई एम फाइन वाला फॉरमैट बदल कर बाय... कैच यू लेटर वाले मोड में आ गईं और आगे कुछ पूछ पाता, इसके पहले ही ऑफ लाइन. कुछ दिन तक वो ‘देखते ही निकल लो’ वाले मोड में रहीं और फिर कंट्रोल डिलीट एंड- ये था फाल्तू चेहरा.
लिस्ट में एक पेयर भी था. लडक़ा-लडक़ी बचपन से एक दूसरे को जानते थे और पढ़ाई के बाद शादी करने का पक्का इरादा था. अचानक लडक़ी का ब्वॉयफ्रेंड मेरी लिस्ट से गायब हो गया. लडक़ी से पूछा सब ठीक-ठाक तो? एक सपाट सा जवाब था, फॉरगेट दैट. अरे... क्या हो गया. कुछ नहीं... मुझे क्या करना है, कौन सा कैरियर चुनना है, ये मैं तय करूंगी. कोई जरूरत से ज्यादा पजेसिव हो ये भी बर्दाश्त नहीं. मुझे लगा वो मेरा फ्रेंड कभी था ही नहीं- ये था कांफिडेंट चेहरा.
अब बारी थी फ्रेंडलिस्ट की एक ऐसी फीमेल की जिसकी इंगेजमेंट हो चुकी थी और वो अपने को इंडिपेंडेंट कहती थी. उसके करियर अभी शुरुआती दौर में था. उससे भी यही सवाल किया. जवाब ऑन लाइन नहीं आया बल्कि आधा दर्जन एसएमएस आ गिरे एक के बाद एक. पढऩे के बाद लगा कि मैसेज उसके मंगेतर के पास जाने थे लेकिन हड़बड़ी या गड़बड़ी से मेरे नंबर पर दे मारे. पहले मैसेज में परमीशन मांगी गई थी कि ..फलां पूछ रहे हैं, क्या आंसर दूं. दूसरे में लिखा था...मतलब? मैं तुम्हें बता रही हूं ना.. जो लगा वो पूछा, इसमें गलत क्या है? फिर तीसरा मैसेज... उन लोगों ने मुझे टच भी नही किया...फलां बहुत सीधे हैं. ओके और हम..मैं तुम्हें बता क्या रही हूं और तुम क्या समझ रहे हो? बीवी हूं तुम्हारी. उसको जब चेताया कि ये क्या दनादन भेजे जा रही हो. इसके बाद सफाई देते हुए 4-5 मैसेज कि वो गलती से आपको चला गया. असल में हमारे रिलेशन पर बात हो रही थी. क्यूंकि हमारे परिचित का पांच साल बाद ब्रेकअप हो गया है तो हम डिस्कस कर रहे थे. फिर कहाकि मेरी तो इंगेजमेंट हो चुकी है ब्वाय फ्रेंड का क्या करूंगी. फिर कहा, ब्वाय फ्रेंड और गर्लफ्रेंड वही नहीं होते जिनसे हम शादी करें. वैसे मैं पर्सनली मानती हूं कि जो ब्वायफ्रेंड हो वही हसबैंड भी. अब तक दिमाग का दही जम चुका था और सवाल वहीं का वहीं था- ये था कन्फ्यूज्ड चेहरा.
लिस्ट में हाल में शामिल एक मेंबर ने तीसरे ही कनवर्सेशन में इतना खुल गया कि दिमाग की लाल बत्ती जल गई. जब कहा कि तुम्हारी फीमेल आडेंटिटी पर डाउट है तो ‘डीके बोस’ वाली लिंगो पर आ गया- ये था फेक चेहरा. थर्टी प्लस की ओर बढ़ रही मेंबर को जब ‘जीएफ’ का ऑफर दिया तो लगा वो धन्य हो गई. ...अच्छी फमिली से हो, जॉब है, शक्ल-सूरत भी खराब नहीं तो शादी क्यूं नही कर लेती. बस फिर क्या था उसके दिल का दर्द सामने आ गया. बोली जीने का दिल नहीं करता इस दुनिया से मन ऊब गया है- ये था फ्रस्ट्रेटेड चेहरा।
लेकिन ढेर सारे ऐसे लोग भी थे जो शुरू में हिचके लेकिन बाद में अच्छे दोस्त साबित हुए. इतने सारे लोगों से बात करने के बाद फ्रेंड लिस्ट फिर लम्बी लगने लगी थी. लेकिन कंट्र्रोल डिलीट एंड की पर बढ़ती उंगलियां ये सोच कर रुक गईं कि जब सोसायटी में विश्वास का संकट बढ़ रहा रहा है तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स इससे अलग कैसे हो सकती है. यहां भी तो विश्वास का संकट है. जरा रुकिए...एक और फ्रेंड रिक्वेस्ट आ गई...हेलो.. ग्लैड टू मीट यू.. आई एम राजीव..!
7/31/11
फ्रेंच किस!

7/25/11
मिल गए डीके बोस..!

6/4/11
ये डीके बोस कौन हैं

ये डीके बोस कौन हैं, क्यों भाग रहे हैं, उन्होंने कौन सा क्राइम किया है. भागना डीके बोस की मजबूरी है. नहीं भागेंगे तो ‘पप्पू साला’ बन जाएंगे जो डांस नही कर सकता. पीछे ना छूट जाए, इसके लिए वक्त के साथ भागते रहना डीके बोस की मजबूरी है. करीब दो दशक पहले एक फिल्म आई थी ‘कयामत से कयामत तक’. हीरो के तौर पर ये आमिर खान की पहली फिल्म थी. उसमें एक गाना बहुत हिट हुआ था..पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा, बेटा हमारा ऐसा काम करेगा..दो दशक बाद आमिर खान की एक और फिल्म आ रही है ‘डेल्ही बेली’. ये फिल्म आमिर खान की है लेकिन इसमें हीरो उनका भांजा इमरान है. दो डिकेड्स में यंगस्टर्स कितना बदल गए हैं. उनके एटीट्यू में कितना फर्क आ गया है- ‘पापा कहते हैं’ से ‘डैडी मुझे से बोला.. तू गल्ती है मेरी, तुझ पे जिंदगानी गिल्टी है मेरी, साबुन के शकल में बेटा तू तो निकला केवल झाग...भाग-भाग...डीके बोस-डीके बोस भाग..
वाह, क्या फाड़ू गाना है. ‘डीके बॉस’ अब ‘डीके बोस’ बन कर लौटे हैं. स्टाइल बदल गई लेकिन माने नहीं बदले हैं. नहीं सोचा था कि हॉस्टल के दिनों के डीके बॉस दो दशक बाद किसी हिन्दी फिल्म में डीके बोस बन कर धमाल मचा देंगे. ये डीके बोस और कोई नहीं आज के युवा हैं जो स्लैंग पर सवार हो फर्राटे भर रहे हैं. इनकी लिटरल मीनिंग पर मत जाइए, बस इसे बोलचाल की भाषा का स्पाइस समझ कर इंज्वाय कीजिए. अपने डीके बॉस यानी दुर्गेश कुमार ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके नाम का एब्रीविएशन एक दिन गदर काटेगा. समझ गए ना बॉस.
स्लैंग का जमाना है इसीलिए नाम जरा सोच समझ कर रखना चाहिए. याद है ना वो ऐड जिसमें हरी साडू जैसे फाड़ू बॉस के नाम का ऐसा एब्रीविएशन बताया गया कि उनकी हाथ में आ गई और वो भी हरीसाड़ू से ‘डीके बोस’ की कैटेगरी में आ गए. अब लिटरल मीनिंग मत पूछिए कि हाथ में क्या आती है. एम टीवी के रोडीज हों या उनके टकले बॉस रघु और राजीव, सब ऐसा स्लैंग यूज करते हैं कि सबकी बीप.. बीप.. करने लगती है. रिएलिटी शो में तो जज से लेकर कंटेस्टेंट तक सब एक-दूसरे की बजाते रहते हैं. वैसे आजकल इस बैंड, बाजा, बारात का ही शोर है. इसमें कोई रोडी है तो कोई डीके बॉस.
तो क्या नई जेनरेशन सटक या भटक गई है जो बेतहाशा भागी जा रही है? इस जेनरेशन को पता है कि अगर वो नहीं बजाएंगे तो उनकी बजा दी जाएगी. ‘डेल्ही बेली’ के गाने को देखने से भी लगता है. फिल्मों में, टीवी पर, सडक़ों पर आजकल यंगस्टर्स का यही लिंगो है और इस भाषा को बोलने वाले ये बच्चे बिगड़ैल नहीं हैं. ये है जेनरेशन नेक्स्ट, वेरी इंटेलीजेंट, प्रोफेशनल, फोकस्ड एंड दे मीन बिजनेस. उन्हें पता है कि कि टाइम टफ और करम्पटीशन कड़ा है. जमाने के साथ चलना है तो जमाने के नियम से चलो और उसी की भाषा बोलो. नैतिक-अनैतिक के पैरामीटर्स वक्त के साथ बदलते रहते हैं और अगर हम अपडेट नहीं हुए तो कोई भी पोपट बना कर आगे निकल जाएगा. लड़कियों को ही लीजिए. वो ‘बहन जी’ टाइप इमेज से बाहर आ चुकी हैं. ये टीन गल्र्स ज्यादा कांफिडेंट और प्रैक्टिकल हैं. आपसे से कुछ भी, किसी भी टॉपिक पर बिंदास बातें कर सकती हैं लेकिन आप उनको बेवकूफ नहीं बना सकते. जो बेवकूफ बनती हैं वो ही एमएमएस स्कैंडल या कि सी दूसरे इमोशनल अत्याचार का शिकार हो जाती हैं लेकिन लेकिन उनका परसेंटेज काफी कम है. यंग जेनरेशन होशियार है और उसमें एक डीके बोस भी बसता जो अपना काम निकालने के लिए किसी की भी वॉट लगा सकता है. अब तो गल्र्स भी इस मामले में लडक़ों से पीछे नहीं हैं. स्लैंग्स पर ब्वॉयज की मोनोपली नहीं रह गई है. गल्र्स भी अब ऐसी लैंग्वेज यूज करती हैं कि बड़ों-बड़ों की बीप..बीप..हो जाए. उनका फंडा बिल्कुल क्लियर है. बाईचांस एक दिन दो टींस के कनवरसेशन को इंटरसेप्ट किया... उनकी लिंगो कुछ ऐसी थी..
-Arre Ye DK Bose type hai..usase bhi khatarnak ..lekin kisi se poochna mat
-ahahahahahah... ¬
go to ...facemoods•com
-jara meri bhi knowledge badhe?
-are kya bataun it is bellow dignity..
-are wat is below nd above dignity?? its v who think so...
-
-ahahahahahahah....
5/7/11
चकर-चकर

दिनभर चकर-चकर करना, दोस्तों के साथ किसी भी सब्जेक्ट पर गपियाना, किसी मसले पर बेवजह टांग अड़ाना और किसी मुद्दे पर गंभीर बतियाना, सबकुछ ब्लॉगिंग के दायरे में आता है. जैसे कोई किसी अनजान शहर की सडक़ों पर यूं ही घूमने निकल जाए और वहां मिले कोई नई दुनिया, कुछ नए लोग. फिर उसमें कुछ से दोस्ती हो जाए. कुछ ऐसी ही है ब्लॉग की दुनिया. कभी बात का बतंगड़, कभी बात से निकले जज्बात और कभी कोरी बकवास. तो चलिए इस बार की जाए अपनी, उनकी, सबकी बातें. और बात कर रहीं हैं रश्मि रवीजा. जब उनके ब्लॉग का नाम ही ‘अपनी उनकी सबकी बात’ है तो अंदाजा हो गया होगा कि अंदर किस तरह का मसाला होगा. याद आता है कि स्कूल डेज में हम लोग कोई भी फिल्म देखकर आते थे, उसकी पूरी कहानी दोस्तों को सुनाते थे और अपनी बुद्धि के हिसाब से उसकी समीक्षा भी करते थे. रश्मि ने भी अपनी पोस्ट में एक नई चर्चित फिल्म आईएम की कहानी सुना कर उसकी समीक्षा की है. रश्मि सिनेमा देखते देखते पहुंच गई हैं क्रिकेट मैदान में. वल्र्ड कप के बाद क्रिकेट की हरारत अभी भी मौजूद है आई पीएल के रूप में. सो उन्होंने क्रिकेट प्रेमियों की नब्ज पर एक सधे हुए हकीम की तरह टटोली है, नाम है ‘गावस्कर की स्टेट ड्राइव का राज’.
ब्लॉगर ने जिस कुशलता से ब्यूटी कांटेस्ट को को क्रिकेट से जोड़ा है कि वैसा ही एक्साइटमेंट होता है जैसा क्रिकेट में छक्का पडऩे पर होता है. इसमें शुरुआत होती है मिस यूनविर्स ब्यूटी कांटेस्ट से. सुष्मिता सेन से कई साल पहले मधु सप्रे भी टॉप थ्री में पहुंची थीं. उनसे पूछा गया था कि अगर आपको एक दिन के लिए देश का मुखिया बना दिया जाए तो वो क्या करेंगी. उनका जवाब था, वो पूरे देश में खेल के अच्छे मैदान बनवा देंगी. मधु सप्रे मुंबई की थी और उस समय उनका ये उत्तर सुन कर गु्रस्सा आया था. लेकिन सुनील गावसकर की किताब ‘सनी डेज’ में उनके पंसंदीदा शॉट स्ट्रेट ड्राइव का राज जिस तरह से खोला गया है उससे लगता है कि मधु का उत्तर बिल्कुल रेलेवेंट था. एक और पोस्ट है ‘साथी ब्लागर्स के साथ गूजरे कुछ खुशनुमा पल’. ब्लॉगर्स जब फेस टू फेस मिलते हैं तब क्या होता है, उसका जिक्र है इस पोस्ट में वैसे तीन महिला ब्लॉगर्स के बीच सैंडविच हुआ एक पुरुष ब्लॉगर कैसा लगता है, ये देखना है तो क्लिक करें rashmiravija.blogspot.com और शामिल हो जाएं चकर-चकर में.
4/17/11
Donkey calling Murga

आज कल मोबाइल के बिना काम नहीं चलता. थोड़ी देर के लिए नेटवर्क गायब हुआ नहीं कि सब बेचैन हो जाते हैं. किसी की जरूरत है तो किसी को नशा है बात करने का. बात करनी है तो करनी है. नेटवर्क बिजी है या कनेक्टिविटी प्रॉब्लम, या कोई कॉल लेने की पोजीशन में नहीं है तब भी गधों की तरह कॉल किए जाएंगे...आर यू देयर ..आर यू देयर..?.. और दूसरे को मुर्गा बनने पर मजबूर करेंगे. ये रोल रिवर्स भी हो सकता है जो कभी मुर्गा बनता है वो मौका पडऩे पर गधा बन कर हिसाब चुकता कर देता है. इस फोटो को देखिए..इसे कहते हैं डॉन्की कॉलिंग मुर्गा.
3/9/11
Hats Off








