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2/3/14

कच्छी पुराण!


सल्लू की फिल्म जय हो देखी । बड़ा हल्ला मचा रखा था। बिजनेस चाहे जैसा करे लेकिन फिल्म ने भेजा फ्राई कर दिया । रजनीकांत सर जब थोड़ा और बूढ़ा होने पर येड़ा हो जाएंगे तो वो जैसे रोल करेंगे वैसा सल्लू ने इस फिल्म में किया है। सीमेंट वालों को अपने विज्ञापन में हाथी की जगह सलमान को रख लेना चाहिए। अपनी खोपड़ी से कुछ फोड़ पाएं या ना फोड़ पाएं लेकिन खोपड़ी सलामत रहेगी।
      फिल्म देख्र कर लगा कि साला सेंसर बोर्ड वाला भी सटक गया है। लगता है वहां भी जेन-एक्स वालों का बोलबाला है। ये लोग सेक्स और सब्जी में कोई फर्क नहीं करते। तभी तो छोटे चूहे वाला लौंडा पूरी फिल्म में मम्मी जैसी लडक़ी की कच्छी का रंग बताता घूम रहा है। यहां फिल्म समीक्षा नहीं हो रही, मुद्दा कच्छी का है। चूहे वाले लौंडे की उम्र को हमने पटरे वाली जांघिया पहन कर बिताया । ढीली ढाली और इतनी हवादार कि कभी कभी भीतर कुछ ना पहनने का अहसास होता था। पता ही नहीं चला कब पटरे वाली जांघिया विंटेज कारों की तरह धरोहर बन गई। उसकी जगह स्लीक, स्मार्ट कच्छियों ने ले ली। सच बताऊं शुरू में छोटी वाली कच्छी पहनने में शर्म महसूस होती थी। लगता था कि इसे तो लड़कियां पहनती हेंैं। किसी ने बताया, अबे ये तो फ्रेंची हैै, लड़कियां जो पहनती उसे पैंटी कहते हैं। लगता है छोटी चड्ढी सबसे पहले फ्रेंच लोग पहनते होंगे तभी इसका नाम फ्रेंची पड़ा। अब से मैं फ्रेंच भाइयों को छोटे चूहे वाला कहूंगा।

11/23/13

हेल्लो, अपमार्केट....!


हेल्लो, अपमार्केट ! पता है ये क्या बला है? अपमार्केट का मतलब अमीर और डाउनमार्केट का मतलब गरीब नहीं होता. कहने भर से ही थोड़े हो जाता हैअप और डाउन. सब दिमागी कीड़ा है बॉस. ये तो स्टेट ऑफ माइंड है. जिसे देखो वही कद्दू जैसी तोंद और भिंडी जैसी टांगों पर बरमुडा टांगे घूम रहा है अपमार्केट बना. तो चलिए आपको मार्केट की थोड़ी सैर करा दूं - नोएडा टू लखनऊ वाया दिल्ली. वैसे हर जगह मार्केट एक जैसा ही है- थोड़ा अपथोड़ा डाउन.

  आप नोएडा के किसी सेक्टर में हैं और मेट्रो स्टेशन के लिए के ऑटो हायर करते हैं तो आप अपमार्केट और अगर शेयरिंग वाले डग्गेमार ओवरलोडेड टेम्पो पर बैठते हैं तो डाउन मार्केट. लेकिन मेट्रो में बैठते ही अप-डाउन का भेद मिट जाता है. पूरी ट्रेन एसी और वहां थूकने-गंदगी फैलाने की बहुत गुंजायश नहीं. इसके बाद आ जाता है नई दिल्ली रेलवे स्टेशन. अप और डाउन मार्केट को समझने के लिए भारतीय रेल से बेहतर कुछ नहीं. जब एसी कोच नही थे तब ट्रेन में फर्स्टसेकेंड और थर्ड क्लास हुआ करते थे. फर्स्ट और सेकेंड अपमार्केट और थर्ड क्लास डाउन मार्केट था. फिर सेकेंड और थर्ड क्लास खत्म कर एसी स्लीपर और जनरल कम्पार्टमेंट शुरू किए गए. तब जनरल कम्पार्टमेंट डाउनमार्केट और एसी और सेकेंड क्लास स्लीपर अपमार्केट था. धीरे-धीरे सेकेंड क्लास स्लीपर भी डाउनमार्केट हो गया और जनरल कम्पार्टमेंट तो वेजीटेबल क्लास हो गया माने यहाँ यात्री बोरियों में साग-सब्जी की तरह ठुंसे रहते हैं.

  तो चलते हैं दिल्ली से लखनऊ. सेकेंड क्लास स्लीपर या साधरण दर्जे की चेयरकार अप-डाउन मार्केट का मिक्स मसाला है. सामने बैठा बंदा ‘एक्स’ फैक्टर वाला परपफ्यूम लगाए अपनी सूखी टांगों में घुटन्ना फंसाए समार्ट फोन से चैट कर रहा हो तो वो अपमार्केट है लेकिन जैसे ही एक रूपये छाप सस्ता गुटखा पाउच फाड़ कर फांके और पिच्च करे तो डाउन मार्केट है. ईयर फोन लगा ढिंचैक म्यूजिक का मजा लेने वाली जींस क्लैड लेडी अपमार्केट लेकिन अगर वो बैग से तीखे लहसुन की गंध वाली रसेदार-मसालेदार सब्जी और चावल सीट पर फैला कर खाने-खिलाने  लगे तो सीट पर रायता और कम्पार्टमेंट में जो बॉस फैलेगी वो डाउनामर्केट है....अरे बात करते करते लीजिए लखनऊ आ गया...चमकता चारबाग स्टेशन.
रिक्शा.. गंज चलोगे ? जी बाबूजी, एक और सवारी बैठा लें ? नहीं... एक और सवारी बैठा ली तो दोनों डाउनामर्केट.   उफ्फ...अचानक अपनी सोच डाउनमार्केट लगने लगी थी. क्या बिगड़ जाता अगर उसको एक सवारी बैठा लेने देता. लेकिन कभी-कभी हम इन जरा सी बातों पर अपने बड़े से ईगो के कारण कितने छोटे हो जाते हैं. अपमार्केट और डाउनमार्केट तो सोच होती है, व्यक्ति नहीं. तभी हजरतगंज आ गया. गंज में फुटपाथ पर दुकान सजाए चाट, चनाजोर और मूंगफली वाले सब अपमार्केट हैं. एसयूवी से सफेद जूतों और सफारी में उतरे बाबूसाहब अपमार्केट हैं लेकिन वो जैसे ही फुटपाथ की स्टायलिश बेंच पर बैठ कनमैलिए से कान साफ करने लगते हैं तो डाउनमार्केट हो जाते हैं. किसी शोरूम के सामने बोरा बिछाए कंधों खिलौने सजाये कोई विकलांग डाउन मार्केट कैसे हो सकता है क्यूंकि उसके कस्टमर्स अपमार्केट हैं... अब घूरिये मत, घूरने वाले भी डाउन मार्किट केटेगरी में आते हैं .


10/17/13

बत्ती बना लो ...!


...हमरी न मानो रंगरेजवा से पूछो ... जिसने गुलाबी रंग दीना दुपट्टा मेरा..जी हाँ जब फिल्म पाकीज़ा बनी थी तो रंगरेज दुपट्टे गुलाबी कर दिया करते थे, तब गाल और चेहरे भी शर्म से लाल हो जाया करते थे लेकिन आजकल रंगरेज नहीं रंगबाजों का जमाना है . जो जहाँ, जब, जिसकी चाहें उसकी लाल कर दें. लॉ एंड आर्डर की भी लाल करने में वो परहेज नहीं करते क्यूंकि वो लालबत्ती वालों के लाल हैं. अब आप पूछेंगे ये लालबत्ती वाले कौन हैं? ये लालबत्ती वाले वो लोग हैं जो डिजर्व नहीं करते फिर भी लाल बत्ती लगा कर घूमते हैं और लॉ की बात करने पर क्रोध से लाल हो जाते हैं और नियम-कानून की बात करने वालों की लाल कर कर देते हैं. वैसे ये लॉ एंड आर्डर के लूज होते करेक्टर की ही अवैध संताने हैं. ये हैं अवैध रूप से लालबत्ती लगाकर सडकों पर घूमने वाले रंगबाज. लालबत्ती के फ़्लैश के साथ इनकी गाड़ियों में हूटर भी बजता रहता है जो चीख चीख कर निरीह आम जनता को आगाह करता रहता है – लाल बत्ती लगा लो, लॉ एंड आर्डर की बत्ती बना लो.
   कितना क्यूट सा शब्द है ‘बत्ती’ लेकिन इसकी मारक क्षमता बहुत घातक है. आप किसी से कह कर तो देखिये ‘बत्ती’ बना लो. वो इसे भीतर तक महसूस करेगा, तिलमिला जाएगा. शर्त लगा लीजिये, वो पलट के जवाब जरूर देगा. वैसे ‘बत्ती’ शब्द बहुत पुराना है. स्कूलों में बच्चे स्लेट-बत्ती लेकर ए बी सी डी सीखते थे. हमारी कोशिश होती थी की स्लेट पर बत्ती टूटे ना. दिमाग में भी बत्ती होती है जो कभी जल जाती है और कभी गुल हो जाती है. पहले पंसारी के यहाँ स्लेट वाली बत्ती के आलावा एक ‘बत्ती’ और मिलती थी. मुझे लगता है आजकल ‘बत्ती बना लो’ का जो जुमला लोकप्रिय है उसका ओरिजिन वही ‘बत्ती’ है. उस ‘बत्ती’ का इस्तेमाल एक जगह और होता था. ये बत्ती भी पंसारी के यहाँ बड़े सस्ते में मिलती थी और बच्चों को कांस्टेपेशन की समस्या होने पर यदाकदा इसका प्रयोग किया जादा था. लेकिन आजकल ये बच्चों की चीज नहीं रह गयी. बड़े लोग बात बात पर ‘बत्ती’ बना रहे हैं. इसका प्रयोग मास स्केल पर किया जा रहा है. लेकिन ध्यान रहे, आप दूसरों की क्षमता आक कर ही उसे ‘बत्ती’ बनाने को कहें नहीं तो अपनी ‘बत्ती’ का प्रयोग खुद ही करना पड सकता है. सो प्लीज हैंडल योर ‘बत्ती’ विथ केयर. 
  लेकिन अब उन बत्तियों से ज्यादा जलवा लाल बत्ती का है. चौराहे पर लाल बत्ती ? नो टेंशन , अपनी गाडी में लाल बत्ती लगा लो और ट्रैफिक सिपाही से कहो- अपने सिग्नल की ‘बत्ती’ बना लो.  और कहीं इन लाला बत्ती वाले  रंगबाजों की गाडी रोक कर ट्राफिक पुलिस ने चालान की पर्ची काटने की कोशिश की तो वो तमंचे की स्टाइल में अपना मोबाइल निकाल कर कॉल दागेगा - लो बात करो...बात करने के बाद सिपाही बोलेगा जी सर...और लाल बत्ती वाला रंगबाज टेढ़ा होकर गाड़ी स्टार्ट करेगा, सिपाही की चालान बुक को कुछ इस अंदाज़ में घूरेगा जैसे कह रहा हो...इसकी बत्ती बना लो...

8/16/13

काशी में बौराए से गिरिजेश !

आपने कभी किसी जवान बछड़े या गाय को सड़क पर पूंछ उठा के दौड़ते देखा है अगर नहीं तो किसी बछड़े के सामने अपना छाता भक से खोलिए फिर देखिए तमाशा...बछड़ा दुम उठा कर कड-बड, कड-बड दौड़ेगा. गली या सड़क पर पर ये दृय देख बड़ा मजा आता है.  मेरे एक मित्र हैं गिरिजेश राव, अरे लुंगी लगा कर रसम और इडली सांभर सुड़कने वाले राव गारू नहीं, अपने पर्वांचल के बाबू सा हैं. गलती से आजकल बनारस की गलियों में पहुंच गए हैं. उनकी स्थिति उसी बछड़े की तरह हो गई है जिसे हर बनारसी छाता खोल कर भड़का रहा है. और गिरिजेश थूंथन फुफकारते हुए बनारसियों को रपटा रहे है ऐसा फेसबुक पर उनकी टिप्पणियों से जाहिर हो रहा है. गए तो लखनऊ से हैं और रहने वाले कुशीनगर के हैं लेकिन बनारस पहुंच कर उनकी हालत बूटी वाले बाबा की तरह हो गई है. निहायत शरीफ और सेंसिटिव किस्म के इंसान का भोले बाबा भला करें.

8/4/13

हमहूं सलमान


हमहूं सलमान....

मेरे घर के पास एक डेवलप्ड झोपड़पट्टी है नाम है रमैयाजीपुरम. जब रमैयाजीपुरम से गुजरता हूं तो अक्सर रमैया वस्तावैया की ये लाइंस सुनाई पड़ती हैं...जीने लगा हूं...पहले से ज्यादा तुम पर मरने लगा हूं.. रमैयाजीपुरम में रमैया वस्तावैया का गाना, –क्या बात है. मुझे मुंबई की डेवलप्ड झोपड़पट्टी धारावी याद आने लगती है. रमैयाजीपुरम.. नाम कैसे पड़ा ये तो पात नहीं लेकिन रमैयाजी कोई दलित महानुभाव थे या दक्षिण भारतीय नेता, इसकी कोई जानकारी मेरे पास नही है. वैसे तो ये बेतरतीब पक्के मकानों की ऐसी बस्ती है जहां लोग अपने घर के सामने ही कूड़ा फेंकते हैं, मुर्गी और बकरी भी पालते हैं+ और उनके सामने ही बच्चों को शौच भी कराते हैं. पॉश कालोनी के पहलू में पली-बढ़ी इस गली पट्टी और कॉलोनी वासियों में कूड़ा फेंकने को लेकर हमेशा सीमा विवाद रहा है. यहां के हर तीसरे घर में सल्लूभाई बनने का सपना पाले कोई ना कोई मिल जाएगा. 
  रमैयाजीपुरम में बाई, नाई और चारपाई के बीच में एक जिम भी है नाम है अर्नाल्ड जिम. अरे वही अपने अर्नाल्ड शवाजनेगर. दरवाजे पर बंधी बकरियों और दाना चुगती मुर्गियों को देख कर नहीं लगता कि अंदर कोई जिम भी है. यह जिम ऐसावैसा नहीं, मोहल्ले के सल्लुओं और गोविंदाओं और किंग खानों से लबरेज है. इस जिम की मशीने  सेकेंड हैंड हैं, हर मशीन  के सामने  शीशा  लगा हुआ है और बैकग्राउंड म्यूजिक भी बजता रहता है. बस एसी नहीं है. अब पसीना बहाना है तो एसी का क्या काम.
    निठल्लई में डोले-शोले बनाना सबसे बढ़िया टाइमपास है. सो लाल और काली गंजी वाले मोहल्ले के रोमियो सुबह-शाम यहां बैकग्राउंड म्यूजिक ...जीने लगा हूं...के साथ धका-पेल पुशअप्स करते हैं नजर आते हैं. कभी कभी-कभी पारा गरम छाप भोजपुरी फिल्मों के गाने भी सनाई पड़ते हैं लेकिन गाने चाहे जितने इशकिया  और छिछोरेपन वाले बजे, जिम के अंदर का माहौल बिलकुल सीरियस होता है, कोई हंसी-मजाक नहीं.. डम्बल उठाओ, डंड पेलो और पुशअप्स करो, वो भी लगातार शीशा में देखते हुए. लखनउ में वैसे तो ढेर सारे हाई-फाई जिम है लेकिन जितनी भीड़ इस जिम में दिखती है उतनी कहीं और नहीं. यहां कर हर मेम्बर  डोले-शोले बना कर जरूर सोचता होगाकि ...हमहूं सलामन. इस जिम के मालिक का नाम नहीं पता है क्योंकि खाली मोबाइल नंबर लिखा है, कभी फोन रक के बोलूंगा जरूर...रमैया वस्तावैया, जिम से निकलेगे सल्लू भैया... 

3/16/13

इस रात की सुबह नहीं...



बात इसी सर्दी के दिनों की है जब रात का पारा जीरो के नीचे चला गया था. रजाई भी उस रात बहुत कारगर नहीं था. ठंड ने कई बार जगाया. सिहरन भरी रात उसकी याद बार-बार डरा रही थी. उस फेरी वाले की काया आंखों के सामने घूम गई.. क्या वो मर जाएगा, क्या इस ठंड का झेल पाएगा? वो रोज ही तो मिलता था प्राइमरी स्कूल की दीवार के सहारे फुटपाथ पर कूबड़ निकाले बैठा हुआ. मैला पजामा, फटा कोट और उस पर हिलता हुआ उसका सिर. दीवार से टिकी लाठी, पेप्सी की बोतल में पानी और बगल में रखी चप्पल. पर फटपाथ पर दुकान बड़े करीने से लगाता था वो. अखबार बिछा उस पर संभाल कर रखता था पान मसाला की चार-पांच लडिय़ां. सुबह करीब दस बजे से शाम चार बजे तक वो वहीं बैठता था. कभी कभार मसाला खरीदता कोई ग्राहक भी दिख जाता था वहां. कभी-कभी उसकी दुकान नहीं दिखती. कभी दुकान तो दिखती लेकिन वो नहीं दिखता. लेकिन नजर दौड़ाने पर दिख भी जाता, कभी थोड़ी दूर पर पेशाब करते या चाय पीते हुए.
    ...तो जीरो डिग्री वाली रात की अगली सुबह वो नहीं था उस जगह. लगा कि ठंड में हो गया उसका काम तमाम. इधर-उधर नजर दौड़ाई तो रोड की दूसरी साइड बैठा मिल गया. वहां धूप पहले आती थी शायद इस लिए वहां बैठा था. उसकी दुकान के सामने उस दिन मेरे कदम ठिठक गए थे. मैंने दस का नोट बढ़ाया...वो पूछ रहा था...कौन सा दें बाबूजी.. मैं मसाला नही खाता..उसके हिलते चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी.. रोज कितना कमा लेते हो?.. दो-चार पैसे मिल जाते हैं...लो चाय पी लेना..उसने नोट लेकर सिर पर लगाया और उसी तरह सिर झुका कर बैठ गया. चेहरे पर कोई खुशी न गम. मैं भी आगे बढ़ गया. मैंने उसे दस रुपए दिए थे लेकिन वो तो रोज मुझे कुछ ना कुछ देता था...जूझते रहने, कभी लडऩे और कभी हार ना मानने की प्रेरणा. सुबह उसे देखते ही निराशा के सारे बादल छंट जाते थे. उसे जूझते देख ऑफिस में हर दिन एक नई शुरुआत होती थी. लेकिन अब मेरे ऑफिस का रास्ता बदल गया है इस लिए वो नहीं दिखता. शायद अब भी वो वहीं बैठा होगा हिलते हुए सिर को संभालने के लिए जूझता हुआ, पर न जाने क्यूं लगता है कि उसकी जिंदगी तो एक सिहरन भरी रात है जिसकी सुबह नहीं.

2/21/13

डाउन मार्केट, अपमार्केट...!



ये कहानी कानपुर शहर की है. स्टेशन से ऑफिस तक रिक्शेवाले के साथ एक छोटा सा सफर...
ओ रिक्शा.. खाली है? जी बाबूजी. चलो.. एक सवारी और बैठा लें बाबू? क्यों, पैसा तो पूरा दे रहे हैं, सीधे चलो, लेट हो जाऊंगा. बाबू, पांच रुपया और कमा लेते..! नहीं.. ठीक बाबू, जैसा कहें... और रिक्शा वाला बढ़ चला कभी 'साम्बा' कभी 'हिप-हॉप' करते. पता नहीं क्यों ज्यादातर रिक्शे वाले सीट होते हुए भी उसी तरह 'हिप-हॉप' स्टाइल में रिक्शा चलाते हैं. जी हां, इसे 'हिप-हॉप' ही कहूंगा. वो ऐसे ही चलाते हैं. एक बार हिप्स उछाल के दाएं साइड, फिर उछाल के बाएं, भले ही सवारी हो ना हो. ये बात मुझे हमेशा परेशान करती है कि रिक्शे वाले अपनी सीट पर बैठ कर क्यों नहीं चलाते.
तभी 'हिप-हॉप' करते उस रिक्शे वाले का मोबाइल बजा. वो रिक्शा चलाते बतियाने लगा. एक हाथ में मोबाइल दूसरे में हैंडल...अरे यार ड्राइव करते समय मोबाइल पर बात नहीं करते...रिक्शा पल्टाओगे क्या? उस पर कोई असर नहीं पड़ा था. 
वो कुछ परेशान सा फोन पर बाते कर रहा था...मम्मी जी अब और नहीं कर सकता, घर छोड़ आया हूं. मेरा ध्यान उसके हुलिए पर गया. पैंट-शर्ट, साधारण सा जूता और स्वेटर. मुझे लगा ये स्कूली बच्चों को ले जाता होगा, कुछ तकरार हो गई होगी, शायद उसी बारे में किसी मेमसाहब से बातें कर रहा है. ..ये मम्मी जी कौन हैं? जी, मेरी सास हैं...कितना पढ़े हो?..ग्रेजुएट हूं..नाम? फलाने शुक्ला..सास क्या करती हैं? ..ग्राम प्रधान हैं.
अचानक मुझे लगा कि परेशान सा यंग ग्रेजुएट, जिसके हाथ में मोबाइल था और जो अपनी ग्राम प्रधान सास को मम्मीजी बोल रहा था, वो भला डाउन मार्केट कैसे हो सकता था. भले ही वो चला रिक्शा रहा था. 
  अब सास थी तो वाइफ भी होगी, सो मैंने पूछ ही लिया.. कितने दिन पहले शादी हुई है?...15 जनवरी को. अरे वाह..फिर क्या प्रॉब्लम है? बाबूजी वही तो प्राब्लम कर रही है. क्यों..? ठीक से नहीं रखते क्या, लव मैरेज की थी? बहुत ज्यादा दहेज तो नही मांग लिया, सताते तो नहीं..? सवालों की बौछार से वो थोड़ा नाराज हो गया... अरे बाबू जी, पांच भाइयों के बीच छह एकड़ खेत है. क्यों सताऊंगा, ससुराल वालों ने अच्छा दहेज दिया है, पल्सर बाइक भी दी है. उसका बहुत ध्यान रखता हूं. आज उसका व्र्रत था, आधा किलो अंगूर और सेब रख कर आया हूं. किसी चीज की कमी नहीं है फिर भी पता नही क्यों नाराज रहती है...अच्छा तुमने वाइफ को बताया है कि रिक्शा चलाते हो? नहीं.. 
रोज रिक्शे से कितना कमा लेते हो? ...जब तक चार सौ नहीं कमा लेता घर नहीं जाता. रोज वाइफ को चालीस रुपए देता हूं,जबकि सारा राशन-पानी घर से आता है...
उफ्फ...अचानक, मुझे अपनी सोच डाउन मार्केट लगने लगी थी. क्या बिगड़ जाता अगर उसको एक सवारी बैठा लेने देता, दस रुपया और कमा लेता. लेकिन कभी-कभी हम इन जरा सी बातों पर अपने बड़े से ईगो के कारण कितने छोटे हो जाते हैं. रिक्शा चला रहे उस ग्रेजुएट की सोच तो किसी भी अपर या अपर मिडिल क्लास यंगस्टर्स जैसी ही थी, जिसमें सेल्फ रिस्पेक्ट था. तभी तो वो घर से पैसा नहीं लेना चाहता था. अपने बूते आगे बढऩा चाहता था, वाइफ साथ नहीं दे रही थी फिर भी हार मानने को तैयार नहीं था.
क्या ये मेड सर्वेंट, चौकीदार, चायवलों और रिक्शेवालों जैसे सो-कॉल्ड डाउन मार्केट लोग सपने नहीं देख सकते? सो-कॉल्ड अपमार्केट सोसायटी का काम क्या इन सो कॉल्ड डाउन मार्केट मेड सर्वेंट, माली, गार्ड, ड्राइवर और रिक्शेवालों के बिना चल पाएगा? दरअसल अपमार्केट और डाउनमार्केट तो सोच होती है, व्यक्ति नहीं. पता नही क्यूं रिक्शेवाले ने वाइफ को नहीं बताया कि वो रिक्शा चलाता है? ये उसका ईगो था या सेल्फ रिस्पेक्ट, पता नहीं. पर ये सवाल मुझे परेशान कर रहा था और रिक्शे वाला मेरी इस उधेड़-बुन से बेखबर बढ़ा जा रहा था अपनी मंजिल की ओर- हिप-हॉप, हिप-हॉप..हिप-हॉप, हिप-हॉप..

2/20/13

Ek chinta....


गंगा..तुम बहती हो क्यूं..!
चाहे चार करोड़ लोग गंगा में डुबकी लगाएं या दस करोड़, तब भी ढेर सारे पापी बचे रहेंगे क्योंकि वो डुबकी लगाएंगे तो भी उनके पाप नही धुलेंगे. हां, गंगा पहले से ज्यादा गंदी हो जाएंगी. इलाहाबाद स्टेशन पर जो भगदड़ मची उसके लिए जिम्मेदार लोगों के पाप तो कभी नही धुलेंगे भले ही जिंदगी भर गंगा में खड़े रहे.  पानी फिर भी अभी समय है आप नहीं जाएंगे संगम में डुबकी लगाने? सारे पाप धुल जाएंगे! ऐसा हम आस्था की वजह से कह रहे हैं. इंडिया में तो नदियों को पूजा जाता है, उन्हें मां और देवी का दर्जा दिया गया है. कहा जाता है कि कुंभ के दौरान संगम में डुबकी लगाने से सारी बुराई धुल जाती है क्यों कि वो जल अमृत के समान होता है. वैसे गंगा हों या यमुना, उद्गम स्थल पर इनका निर्मल जल अमृत समान ही होता है. लेकिन सालों साल हमने इतनी गंदगी, मैल और पाप इन नदियों में धोए हैं कि अमृत तो दूर, नदियों का पानी पीने लायक भी नहीं रह गया. बुरा मत मानिएगा लेकिन आपको क्या लगता है साल भर जो पाप हम सब इन नदियों को गंदा करने में करते हैं वो क्या कुछ मिनट की डुबकी से धुल जाएगा?
आस्था को जाने दें, वैज्ञानिक आधार पर भी ये बात सिद्ध हो रही है कि देश भर की नदियों को गंदा करने में हमने कोई कसर बाकी नहीं रखी है. कहां तो नदियों को जीवनदायिनी कहा जाता लेकिन अब इन नदियों का पानी हमने पीने लायक छोड़ा है क्या? लेकिन गंगा फिर भी यूं ही बहती रहेगी, मां जो ठहरी.

1/25/13


'मिस्ड टॉपअप'
निर्मल बाबा की तरह और लोग भी किरपा बरसाते हैं कभी कभी. ये किरपा डावर्ट  हो कर आपके फोन  में घुस जाती है, कभी मिस्ड काल के रूप में तो कभी 'मिस्ड टॉपअप' के रूप में. एक बार एक ब्वायफ्रेंड ने अपनी गर्ल फ्रेंड के नंबर पर टॉपअप कराया. पता नहीं कैसे नंबर के घालमेल से टॉपअप मेरे सेल पर आ गया. तुरन्त बाद ही उस जीएफ का फोन आ गया कि गल्ती से आप के सेल मे चला गया, प्लीज किसी पीसीओ से मेरे नंबर पर वो आमउंट डाल दीजिए. पहले मैं तैयार हो गया फिर डर गया कि ये लड़की फंसा ना दे कि मेरे पीछे पड़ा है कि फोन पे बात करो, बिना कहे मेरे सेल में पैसा डाल दिया. सो मैंने कहा, देवी जी आप अपने बीएफ को मेरे ऑफिस भेज दीजिए, कैश दे दूंगा. फिर बीएफ का फोन आया कि अच्छा मेरे सेल में डाल दीजिए. मैंने मना कर दिया कि कैश ही मिलेगा. फिर न फोन आया ना वो आए. मैं इंतजार में हूं कि निर्मल बाबा की किरपा से मिस्ड कॉल आए ना आए लेकिन एक बार  फिर 'मिस्ड टॉपअप' हो जाए...कोटि कोटि परनाम..

12/11/12

ओ..त्तेरी की...

ओ..त्तेरी की...

तुम भी बड़े वाले हो...माइंड ब्लोइंग, ओ...त्तेरी की...लग गई वॉट...इट इज हॉट...
चक्कर क्या है? जिसे देखो वही इन शब्दों को दाग रहा है और इनको रचने वाले कॉमनमैन ही हैं. वैसे भी आजकल कॉमनमैन इन-फैशन है. जैसे पहले फिल्मों की 'इमोशनल '  कर देने वाली कहानी उनके हिट होने की गॉरन्टी हुआ करती थी और उसमें मुख्य किरदार अक्सर कॉमनमैन ही निभाता था. हीरो होकर भी वो निरीह कॉमनमैन था. ये अलग बात है कि वो अक्सर अपना दिल हवेली में रहने वाली हीरोइन से लगा लेता था. अगर हीरो अमीर तो हीरोइन आपके मोहल्ले की कॉमन गल्र्स की तरह होती थी. इसके बाद तो आंसुओं का जो दरिया बहता उसमें आम दर्शक तीन घंटे डूबता-उतराता और फिक्चर हाल के बाहर वो 'पैसा वसूल ' वाले अहसास के साथ निकलता. इसके बाद कुछ दिनों उस दर्शक रूपी कॉमनमैन में हीरो-हीराइन समाए रहते और फिल्म हिट. आजकल भी यही हो रहा. कोई मुद्दा हो, प्राब्लम हो, उसे कॉनमैन से जोड़ दो. बस मामला हिट. लेकिन कौन कहता है कि कॉमनमैन बेचारा होता है. कॉमनमैन अब सयाना हो गया है. वो जितना बेचारा दिखता है उतना है नहीं. जिस तरह शब्द, समय के साथ चोला बदलते रहते हैं उसी तरह ये 'कॉमनमैन ' का चोला बदलता रहता है. कॉमनमैन के शब्द भी बदलते रहते हैं, अर्थ बदलते रहते हैं या यूं कहिए वो नए-नए शब्द गढ़ते रहते हैं. एक जमाना था जब 'गुरु ' शब्द की बड़ी रिस्पेक्ट थी. अब तो कहा जाता है.. अरे वो बड़ी 'गुरू ' चीज है. गुरु, गुरूघंटाल हो गया. 'उस्ताद ' का भी यही हाल है. पहले उस्ताद की बड़ी रिस्पेक्ट थी अब किसी से कहिए कि उस्तादी दिखा रहे तो वो बुरा मान जाता है. इसी तरह आजकल 'कॉमनमैन ' का एक बड़ा हिस्सा भी गुरू या उस्ताद हो गया है. समझ गए ना वही ', 'बड़े वाले '. और कॉमनमैन का माइंड तो डिफेक्टिव कुकर की सीटी का तरह जब-तब ब्लो करता रहता है. बात-बात पर 'माइंड ब्लोइंग '. पहले जो धत् तेरी की था वो अब 'ओ त्तेरी की ' हो गया है. जब कुछ ऐसा हो जाए जिसमें एम्बैरेसमेंट के साथ मजा भी आए तो समझिए हो गया 'ओ त्तेरी की '. जैसे गर्लफ्रेंड के साथ आप फिल्में देखने गए और इंटरवल में पता चले कि अगली रो में आपका बॉस अपनी फ्रेंड के साथ बैठा है तो इसमें मुंह से निकलेगा.. ओ त्तेरी की. पहले जहां खाट खड़ी होती थी अब वॉट लगती है. क्योंकि अब खाट का चलन कम हो गया है. और हां, जिसे देखो वही हॉट है इंडक्शन चूल्हे की तरह, जो टच करने से गर्म नहीं लगता लेकिन सम्पर्क में आते ही स्टीम बनने लगती है. इंजन और मौसम को गरम होते सुना था. कभी-कभी मिजाज भी गरम हो जाता है लेकिन अब जिसे देखो वही 'हॉट ' है. 'हॉट 'होना काम्प्लीमेंट है.
वैसे इन शब्दों को कॉमनमैन मुंह में मसाले की तरह भरे घूमता रहता है. और जहां मौका मिला..पिच्च. वो फिफ्टीज-सिक्स्टीज की फिल्मों के कॉमनमैन की तरह निरीह नहीं, थोड़ा चालू किस्म का है, थोड़ा-थोड़ा करप्ट भी है और अक्सर नियम-कानून भी तोड़ता है. सिस्टम को कोसता है लेकिन अकसर दफ्तर लेट पहुंचता है. कहीं भी कूड़ा फेंक देता है, कहीं भी मसाला खाकर थूक देता, फिर गंदगी के लिए नगर निगम को कोसता है. नो पार्किंग पर बाइक खड़ी करता है फिर ट्रैफिक जाम के लिए पुलिस को भला-बुरा कहता है. अपने वाहन के पेपर्स दुरुस्त नहीं रखता फिर वसूली का आरोप लगाता है. अपने घर के कूड़े की पॉलिथीन पड़ोसी के दरवाजे के सामने फेंक कर सिविक सेंस पर लेक्चर पिलाता है. पॉवर कट पर बिजली वालों को पानी पी-पी कर बुरा-भला कहता है लेकिन मीटर खराब करवा कर या कटिया मार एसी चलाता है. रेलवे से तो उसका सास- बहू वाला रिश्ता है, मजाल है कभी रेलवे की तारीफ कर दे लेकिन मौका मिलने पर 'डब्लू टी ' सैर का मजा लूट आता है लेकिन फिर भी वो 'निरीह ' कॉमनमैन कहलाता है. लेकिन मार्डनिटी और ट्रेडिशन तो साथ-साथ चलते हैं सो अभी भी ढेर सारे 'कॉमनमैन ' पुराने वाले फॉरमैट में जी रहे हैं जो कानून को मानते है, नियमों का पालन करते हैं और उनको ऐसा करते देख सयाना कॉमनमैन बोलता है..ओ त्तेरी की...

10/26/12

ना.. लो ‘यूथ’ के प्राण रे....
आज बात करते हैं यूथ सिंड्रोम की. यानी यूथ के नाम पर आप जो करते हैं,
खाते, पीते, पहनते और बोलते हैं, वही सही है. जो
जरूरत से ज्यादा टेक्नो सैवी है, गैजेट के चक्कर में क्रेजी-वेजी है वही
यूथ है. वही यूथ है जिनका  बिहेवियर हॉस्टल रूम और पब्लिक प्लेस पर एक
जैसा होता है, स्लैंग और एब्यूसिव लैंग्वेज जिनकी जुबान पर और दुनिया
ठेंगे पर होती है. जो टीन एज में तोरई, लौकी और कद्दू से 'हेट' करता है,
दूध से दूर  भागता है पर
कोल्ड ड्रिंक का वेट करता है. वो अक्सर पैटीज से पेट  भरता है. बर्गर,
बिरयानी और पास्ता से है उसका वास्ता.
      माना कि इंडिया में आधी आबादी युवा है लेकिन जिसको देखो वही
'यूथ' को डिफाइन करने पर तुला है. जब  खास किस्म का 'स्टेट ऑफ माइंड'
बुद्धि और विवेक पर डॉमिनेट करने लगता है तो वो 'सिंड्रोम' बन जाता है.
यूथ सिंड्रोम से ग्रस्त बंदा हमेशा अपने को युवा और दूसरों को अंकल या
आंटी समझता है  भले ही वो उससे
पांच-छह साल ही बड़े हों. ये सिंड्रोम बड़ा इंफेक्शियस होता है. वैसे तो
अंकल-आंटी बड़ा सम्मान सूचक शब्द है लेकिन आजकल जिस तरह से इस बाण का
प्रयोग हो रहा, उससे तो अच्छे  खासे यूथफुल लोगों के प्राण  भी बॉडी से
निकलने को आते हैं. अगर नहीं निकले तो वो ना चाहते हुए  भी 'अंकल-आंटी
सिंड्रोम' से ग्रस्त हो जाते हैं. सब्जीवाला, दूधवाला, कबाड़ीवाला,
परचूनिया उम्र
में बराबर या बड़ा होने पर  भी आपको आंटी बोले तो चलता है लेकिन कोई
हमउम्र यंग सेल्समैन, बैंक एग्जीक्यूटिव या कोई हैंडसम 'गाय' या गर्ल
आपको अंकिल बोले तो..?
बची खुची कसर टीवी पर तरह-तरह के ऐड ने पूरी कर दी है. जैसे ग्रे हेयर
वाले को एक लड़की अंकल बोलती है तो वो डिप्रेशन में आ जाता है और अगले
दिन हेयर डाई लाकर उसी लड़की को रिझाता है. इसी तरह स्मार्ट फोन वाली
लड़की, पुराना फोन यूज कर रहे एक
सज्जन को 'अंकल' कह कर चिढ़ाती है. जब रिस्पेक्ट वाली 'आंटी' युवाओं के
लिए चिढ़ाने वाली 'आंटी' बन जाए तो इसे सिंड्रोम ही कहेंगे. यूथ जब
उम्रदराज हो जाता है तो यूथफुल जाता है. इसकी वजह से 'यूथ' और 'यूथफुल'
में एक तरह का पर्सनालिटी क्लैश शुरू
हो गया है. यूथ, यूथफुल लोगों को युवा मानने को तैयार नहीं और यूथफुल
अपने को बजुर्ग मानने को तैयार नहीं. इसी क्लैश का नतीजा है 'डीके बोस'
और अब 'तेरी मां की यूथ'.
क्या जिसकी जुबान पर बात बात पर गॉली या डबल मीनिंग वाले वड्र्स हों वही
यूथ है? और जवाब में सफेद बालों के बावजूद अपनी हेयर स्टाइल और टैटू
जडि़त शरीर के कारण यूथफुल दिखने वाली सपना
 भवनानी जब सलमान  खान को 'तेरी मां की यूथ लिखा' टी-शर्ट  भेंट करती है
तो इसे क्या माना जाए? वो यूथ को क्या मैसेज देना चाहती हैं?
पहले इस तरह के द्विअर्थी शब्द गली मोहल्ले में सुनाई पड़ते थे. लोग
उन्हे इग्नोर कर जाते थे. लेकिन अब ये अपमार्केट और ग्लोबल हो गए हैं. अब
इग्नोर नहीं कर सकते. सुन कर हूट या ट्वीट नहीं किया तो आउट फैशन्ड और
स्टीरियो टाइप माने जाएंगे. ये स्टीरियो भी अजब बला है स्टीरियोफोनिक हुए
तो मार्डन और स्टीरियो टाइप हुए तो बोरिंग. सब बजाने और सुनने का फर्क
है. सिचुएशन बड़ी का प्लेक्स्ड है और इसमें नुकसान सबका हो रहा
है. कभी सोचा है कि जिन्हें हम 'यूथ' कह कर डिफाइन कर रहे हैं वो रूरल और
सेमी अर्बन को जाने दें, खालिस अर्बन यूथ के एक चौथाई हिस्से को  भी
रिप्रेजेंट नहीं करते. क्या शहरों में रहने वाले बाकी तीन चौथाई युवा,
यूथ नहीं हैं. जो शालीन, संजीदा और करियर को लेकर कांशस हैं. वो भी
मार्डन है और आगे बढऩे की सोचते हैं. जो सोचते हैं अपने देश और सिस्टम के
बारे में, करप्शन उन्हें परेशान करता है. लेकिन वो 'यो-यो'
टाइप नहीं या बियर कैन लेकर पब्लिक प्लेस पर हुल्लड़ नहीं मचाते,
लड़कियों को नहीं छेड़ते, तोडफ़ोड़ नहीं करते. वो  भी नेट सैवी हैं, नए
गैजेट-शैजेट पसंद करते हैं, पार्टी में जमकर इंज्वाय करते हैं लेकिन
दूसरों की कीमत पर नहीं. ढिंडोरा पीटने, स्लोगन लिखने या चीखने से कोई
युवा या यूथफुल नहीं हो जाता. ये भी एक स्टेट ऑफ माइंड है. इस 'यूथ
सिंड्रोम' के शोर में आपके शहर का दो तिहाई यूथ क्या चाहता है इसकी फिक्र
किसी को नहीं.

8/2/12

आज कुछ तूफानी करते हैं



'वेरी सिम्पल '  कितना सरल है कहना और कितना कठिन है करना. जिसे देखो जुटा है कुछ तूफानी करने में. आखिर ये तूफानी कहां से आया? सिम्पल..ये तो ऐड का स्लोगन है. ऐसे ही कुछ दूसरे स्लोगन भी याद हैं...ठंडा मतलब... डर के आगे जीत है... दाग अच्छे हैं..और भी पता नहीं क्या-क्या. आखिर इनमें ऐसा क्या खास है कि हजारों स्लोगंस के बीच कुछ खास लाइंस हमारी जुबां से चिपक जाती हैं. इनमें एक बात कॉमन है वो है सिम्प्लीसिटी. लेकिन सिम्पल उतना सिम्पल होता नहीं. एक सज्जन से पूछा, यार ये तूफानी करना क्या होता है? उन्होंने झट से मोबाइल स्क्रीन सामने कर दिया और संता-बंता के कई तूफानी जोक सामने आ गए. समझ गए ना, उन्हें सबके सामने शेयर किया तो तूफान खड़ा हो जाएगा.
        कुछ लोग सेलफोन और नेट पर तूफानी करना ज्यादा पसंद करते हैं. जैसे नोमान नाम के एक जनाब अपना मोबाइल सेट जितनी तेजी से बदलते हैं उससे कही तेज गति से उनकी रिंग और कॉलर टयून बदलती है. उनको तूफानी कॉलर ट्यून लगाने का बड़ा शौक है. एक  से एक इनोवेटिव और नॉटी. स्टूडेंट्स और टीन्स में तो ये चलता है लेकिन अगर आप किसी कॉरपोरेट ऑफिस में काम करते हैं तो तूफानी करने में थोड़ा सावधानी बरतनी चाहिए वरना बॉस तूफानी मोड में आ जाते हैं. हुआ ये कि उन्होंने एक कॉलर ट्यून लगाई जिसमें कॉल करने पर उधर से लड़की की आवाज कुछ यूं आती थी...अरे पहले मुझसे बात करो ना..पॉज के बाद वो फिर कहती..अरे मुझसे बात करो ना प्लीज, मेरा मन कर रहा है तुमसे बात करने का, बहुत सताते हो. उनके कई दोस्त इस ट्यून के झांसे में आ गए और कुछ सेकेंड्स तक खीसें निपोर कर बातें भी की. लेकिन दो दिन भी नहीं बीते थे कि उनके बॉस का फोन आ गया. पहले शांति से ट्यून को सुना फिर उन्होंने नोमानी के साथ जो तूफनी किया, उसके बाद से तो नोमानी के फोन पर कुछ दि जय अंबे.. जगदंबे मां.. वाली कॉलर टयून ही सुनाई पड़ी. 
     वैसे 'चलो आज कुछ तूफानी करते हैं ' ..यह स्लोगन कोल्ड ड्रिंक लेने वालों से ज्यादा दूसरे ड्रिंक्स लेने वालों को हिट करता है. झाग वाला कोई भी ड्रिंक हो, पहले वो जिगर में झाग और आग पैदा करता है फिर बाहर आता है तूफान बन कर फिर लोग सड़कों पर तूफानी करने लगते हैं. अगर सन्नाटे में कोई कार डिवाइडर तोड़ कर दूसरी साइड चारों टांगे ऊपर कर पलटी मिले तो समझ लेना चाहिए कि ड्राइवर ने झाग वाला ड्रिंक लेकर तूफानी किया है. कभी-कभी दो झाग वाले जब आमने-सामने होते हैं तो वहां उठे तूफानी में गरजने और कड़कने की आवाजें भी आती हैं. उस कड़क से किसी की कार का शीशा टूटता है और किसी का सिर फूटता है. इसके बाद पुलिस वालों को तूफानी करने का मौका मिल जाता है. ऐसे ही कुछ लोग ड्रिंक्स लेने के बाद गटर या नाली के पानी के साथ तूफानी अवतार में नजर आते हैं. 
 सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर तो तूफानियों की भरमार है. वो साधारण सी फोटो या घटना में अपनी क्रिएटिविटी डाल कर उसे तूफानी बना देते हैं. कुछ दिन पहले फेसबुक वॉल पर एक छोटे बच्चे की तस्वीर देखी. गली की नाली में गिरने से ऊपर से नीचे तक कीचड़ में सना हुआ. वैसे तो वो रो रहा था. लेकिन वो ऐसे पोज में खड़ा था और उसके फोटो पर किसी ने स्लोगन लिख दिया था 'आज कुछ तूफानी करते हैं ' , इनसब से उस फोटो को देखने का नजरिया ही बदल गया था. एक साधारण सी फोटो तूफानी फोटो बन गई थी. तूफानी करने में महिलाओं को भी उतनी ही महारत हासिल है. जैसे कई महिलाएं मई में तूफानी होने इंतजार करती थी कि एक-दो तूफाननुमा अंाधी के दौर हो जाएं तो कच्चे आम सस्ते हों और तूफानी गति से अचार बनने में जुटें. लेकिन जून भी खत्म होने को है, तूफान की जाने दें ठीक से आंधी भी नहीं आई इस बार. कच्चे के बजाय पके आमों से पट गए हैं बाजार. जो चलिए पके आमों से ही कुछ तूफासनी करते हैं.

4/8/12

कोटि कोटि परनाम चल गयी दूकान


इन दिनों काफी एनर्जाइस्ड महसूस कर रहा हूं. अरे बसंत-वसंत का चक्कर या
व्रत का कमाल नहीं है. लेकिन बात कुछ खास है कि रात बारह बजे के आसपास
अचानक मूड फ्रेश हो जाता है, सारी थकान दूर हो जाती है और पूरे शरीर में
करेंट सा दौडऩे लगता है. ये सब होता है बिल्कुल फ्री. न, न आप बिल्कुल
गलत समझ रहे हैं. ना मैं किसी मसाज पॉर्लर में जाता हूं ना ही बॉर में.
सामने टीवी और हाथ में रिमोट. दिन में खबरों का लेकर चीखने वाले कुछ
खबरिया चैनल रात होते ही तरह-तरह की ऊर्जा वाले 'प्राश' बेचने लगते हैं.
'प्राश' समझ गए होंगे, अरे वही च्यवनप्राश का कजिन. हमने तो बचपन में
बहुत च्यवनप्राश खाया है. लेकिन अब तो नए पैकेज वाले एनर्जी पैक्ड
'प्राश' आ गए हैं. किसी में सोना, किसी में चांदी का भस्म. अब समझ में
आया कि सोना- चांदी के दाम क्यूं बढ़ रहे हैं. मिडनाइट बाजार के इन
प्रॉडक्ट्स में एक और खास बात होती है कि हमेशा अपने एक्चुअल प्राइस से
काफी कम दामों में उपलब्ध रहते हैं. इन 'प्रॉश' का प्रजेंटेशन इतना
शानदार होता है कि नजरें प्रॉडक्ट से शिफ्ट होकर प्रेजेंटर के
'पावरप्वाइंट' पर जा टिकतीं हैं. इनमें ह्यूमर भी होता है. बस आपको
थोड़ा एमैजिनेटिव होना पड़ेगा.
रात होते ही टीवी शो एकदम पावर पैक्ड हो जाते हैं. जड़ी-बूटी का कमाल तो
देखिए कि लाठी टेक कर चलने वाले लोग टेनिस खेलने का दावा करने लगते हैं.
चाहे 'प्रॉश' हो या बूटी, सबका प्रजेंटेशन एक जैसा- आगे की लाइन में बैठे
जाने-पहचाने स्टार और सेलेब्रिटी टाइप पेशेंट. सब के पास चमात्कारिक
क्योर की कहानी. वैसे रात के पैकेज में और भी बहुत कुछ है- रहस्य-रोमांच,
रुहानी ताकतों से रूबरू कराने वाले ताबीज, शैतानी शक्तियों से बचाने वाले
कवच, तरह तरह के यंत्र और मंत्र.
आधी रात को अलग अलग चैनल्स पर अलग डॉक्टर अपनी-अपनी माइक्रसकोप लिए आपकी
'पावर' को परखते मिल जाएंगे. तम्बाकू से काले पड़ गए दांत लिए जबरन
अंग्रेजी बोलने की कोशिश करने वाले ये डाक्टर पहले आपको किसी 'सब्जबाग'
में घुमाएंगे और बताएंगे कि कैसे आपकी 'पावर' बढ़ाने वाली जड़ी-बूटियों
को उनकी देखरेख में निजी बगीचे में उगाया जाता है. वो बार-बार माइक्रसकोप
से क्या देखते हैं पता नहीं. लेकिन ऐसा हर डाक्टर अपने ग्राहकों से
बार-बार ये तस्दीक जरूर करता है कि असली डाक्टर वही हैं बाकी सब नकली
हैं. वो ये भी बताते हैं कि 24 घंटे उनकी एम्बुलेंस स्टेशन के बाहर खड़ी
रहती है ग्राहकों, सॉरी पेशेंट्स की ताक में. अब सोचिए कीजिए जरा. स्टेशन
से निकल रहे किसी अजनबी को एम्बुलेंस वाले कैसे पहचानते होंगे कि गुरू,
बस यही है यौन रोगी, दगोच लो. और अचानक नीलीबत्ती चमकाते, सायरन बजाते
एम्बुलेंस उसके सामने आ रुकेगी, स्ट्रेचर लिए दो लोग उसमें से कूदेंगे और
उस अजनबी को हाथ-टांग पकड़़ स्ट्रेचर पर लिटाया जाएगा और सर्र से
एम्बुलेंस दौड़ पड़ेगी क्लीनिक की ओर जहां एक डाक्टर माइक्रसकोप लिए उसके
इंतजार में बैठा होगा. वो उसकी बेल्ट खुलवाएगा, कुछ टटोलेगा और फिर गंभीर
होकर माइक्रसकोप में कुछ देखने लगेगा.
इसी तरह आपको याद होगा कि कुछ महीनें पहले तक सर्वे कंपनियों की भरमार
थी. जिसे देखो सर्वे भर रहा था और साथियों को बता रहा था कि तुम भी भरो,
हमने तो इतना कमाया. लोगों ने बिना सोचे-समझे गाढ़ी कमाई लगा दी और अचानक
सब कंपनियां फरार. टीवी चैनल्स पर आजकल ऐसे ही कुछ प्रोग्राम्स चल रहे
हैं. दिन-रात और शाम के प्राइम टाइम में भी. खचाखच भरा बड़ा सा हाल,
सिंहासन पर विराजमान बाबा. भक्त बीच-बीच में खड़े होकर अपनी समस्या बताते
हैं. कुछ फिर ये भी बताते हैं कि बाबा की कृपा से वो मालामाल हो गए. बाबा
बीच-बीच में प्रवचन औश्र आशीर्वाद देते रहते हैं. शो के दौरान टीवी
स्क्रीन पर मैसेज आता है कि आप किस खाते में पैसा जमा कर इस जमात में
शामिल होने के लिए अपनी बुकिंग करा सकते हैं. साथ में ये भी मैसेज चलता
है कि चार महीने तक बुकिंग फुल है और आप अगर टीवी पर भी बाबा का
प्रोग्राम देखेंगे तो भी कल्याण होगा. ये है पैसे के साथ टीआरपी का भी
जुगाड़. भविष्य में बाबा के प्रोग्राम में कमर्शियल ब्रेक भी आने लगे तो
आश्चर्य नहीं. इस मिडनाइट बाजार से आपको पावर, प्लेजर या इंटरटेनमेंट में
से क्या मिलता है, ये इस बात पर डिपेंड करता है कि आप विवेक का इस्तेमाल
कितना करते हैं. ..तो समझने वाले समझ गए हांगे, जो ना समझे वो अनाड़ी है.


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1/9/12

चिकनी चमेली वाला पौव्वा


वाह क्या बात है फिर 31 दिसंबर. कुछ मीठा तो एक जनवरी बहुत हुआ चलो गुरू बात करते हैं 31 दिसंबर को क्या हुआ. आज थोड़ा चिकनी चमेली वाला पौव्वा, सॉरीक्वार्टरहो जाए. बहुत लोग 31 दिसंबर को इसी के जुगाड़ में थे . पौव्वा तो थोड़ा डाउन मार्केट है, यहां बातक्लास’ ·की हो रही है. हर अच्छी ब्रांड ·का अलग केमिकल लोचा होता है पर लगता है एक ही ब्रांड का अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग असर होता है. आपने भी पार्टी-शार्टी में देखा होगा, लोग कैसे चीयर्स करते हैं. कुछ साथी पूरी बाटली के बाद भी एकदम सिगरेट सुलगा थिंकर -फिलॉस्फर की तरह बिलकुल धीर-गंभीर और कुछ दो पेग में बाद ही केश्टो मुकर्जी.. आंख की दोनो पुतलियां बीच में और चावल-सब्जी सूट पर दाएं-बाएं. कुछ पार्टी एनिमल तो बिल्कुल खुली किताब होते हैं कि वो क्या ·रेंगे..·कुछ तीन पेग के बाद गाना गाने की जिद करेंगे और ·कुछ दो पेग के बाद ही अपनेहरी साडुओंडीके बोसकी उपाधि से नवाजने लगेंगे. लेकिन असर खत्म होते ही वो बन जाते हैं एकदम भीगी बिल्ली... याद ही नहीं रहता. ऐसे टल्ली साथियों का भूत उतारने और उन्हें घर तक पहुंचाने ·का जिम्मा अक्सर मेरा होता है. एक जनाब पार्टी में हाई होने ·के बाद उल्टी जरूर करते हैं. एक दोस्त ऐसे हैं जो इतना पी लेते हैं कि अगले दिन ऑफिस आने कि हालत में नहीं रहते, कभी हैंगओवर से कभी ठोकाई की वजह से. पार्टीज में ऐसे वेटरन बूजर्स भी होंते हैं जिनकी सोशल रिस्पासिंबिलीटज भी होती हैं. जैसे साथयों ·की पसंद माफि· पेग बनाना, किसे ऑन रॉक्स चाहिए, किसे विद सोडा और कौन खालिस पानी से चाहता है. खास कर बॉटम्स अप वालों पर नजर रखनी होती है क्योंकि सबसे पहले ऐसे ही लोग आउट होते हैं. इनमें से ही कुछ पार्टी बिगाड़ू का भी रोल अदा करते हैं, हंगामा करने वाले लोगों को संभालना भी सोशल रिस्पांसिबिलिटी है. ऐसे ही एक वेटरन बूजर को जानता हूं जो हर पार्टी में चुपचाप ड्रिंक्स वाला कोना पकड़ कर उसी तरह बैठ जाते हैं जैसे किसी प्याऊ पर ·पर सोशल वर्कर . लेकिन लोगों कि प्यास बुझाने के साथ-साथ वो अपनी भी प्यास बुझाते चलते हैं पर क्या मजाल कि बहक जाएं.
पार्टीज में बहकता तो मैं भी नहीं क्योंकि मैं ड्रिंक नहीं करता लेकिन हॉस्टल लाइफ में कोई भी ऐसी प्रीमियम ब्रांड नहीं बची थी जिसे टेस्ट नहीं ·किया हो. लोग ·हते हैं हर ब्रांड किक अलग होती है लेकिन रम से लेकर स्कॉच तक तक सब ने मुझे एक जैसी ही किक लगाई. इसी टेस्ट के चक्कर में एक बार तो मेरे ·कान में जिन घुस गया था. बात कई साल पहले है, वो भी ऐसे ही 31 दिसंबर की रात थी. न्यू इयर ईव पर हॉस्टल में साथियों ने व्यवस्था की साथी कहीं से जिन ले आया था. बोला थोड़ा ले लो जुकाम ठीक हो जाएगा. लाओ देखें जरा.. स्टाइल में मैंने भी थोड़ी जिन ले ली. पता नहीं क्या हुआ कि गले 15 दिन तक मेरा सीना जकड गया, सूंघने और सुनने की क्षमता जाती रही, लोग कुछ बोलते थे तो मैं कान के पास हाथ ले जाकर आंय-आंय करता था. जब दोस्तों को पता चला कि ये जिन का नतीजा है तो सब ने खूब मजा लिया. बात पूरे हॉस्टल में फैल गई कि ·अबे.. ओझवा के कान में जिन्न घुस गया है. उसे सुनाई नही पड़ रहा है. बाद में यह जिन एंटीबायटि· लेने से ही भागा. उस दिन से कान पकड़ा .तो दोस्तों पार्टी होती ही मस्ती के लिए. पार्टी ऐसी हो जो बार-बार याद आए. जम कर मस्ती करिए लेकिन इतना टल्ली ना हो जाएं कि घर ना पहुंचने पर आप· अपने घबराएं. बार-बार फोन आएं और अगले दिन लोगग खिल्ली उड़ाएं.


12/6/11

दोस्त-वोस्त...यार-व्यार...!


साहित्य समाज का आइना होता है लेकिन लगता है आजकल समाज का आइना सोशल नेटवर्किंग साइट्स भी हैं. सो आज उन लोगों की बात जो किसी ना किसी की फ्रेंड लिस्ट में हैं. हर फ्रेंड जरूरी होता है चाहे वो फेक, फ्रस्ट्रेटेड, फ्लर्ट, फाल्तू, फ्रैंक, फुरसत में या फेंकने वाले ही क्यों ना हों. कुछ दिन पहले किसी फेसबुकिया ने कमेंट किया था, गुरू... तुम्हारी फ्रेंड लिस्ट में गल्र्स की लम्बी लाइन है. उसे बताना पड़ा कि दोस्त ये गल्र्स की नहीं फ्रेंड्स की लिस्ट है और इसमें 13 साल के बच्चों से लेकर 73 साल की बुजुर्ग भी हैं. ये लिस्ट इससे कई गुना लम्बी होती, लेकिन वीड्स की छंटनी और सूखे ठूंठनुमा लोगों को हटाते रहने से ये मैनेजेबल है. कौन फ्रेंड हैं और कौन फ्रॉड, ये तो कुछ दिन साथ-साथ चलने पर पता लगता है. दोस्त के कमेंट के बाद सोचा चलो इन चेहरों के पीछे के चेहरे को पहचानने की कोशिश करते हैं. उनको रुक्रैच करने पर एक अलग ही दुनिया सामने आई. फीमेल मेंबर्स से पूछा कि अगर आप मेरी फ्रेंड लिस्ट में हो तो मेरी क्या हुई? सब ने कहा.. फ्रेंड. फिर पूछा, अगर फ्रेंड फीमेल हैं तो गर्लफ्रेंड हुई ना...? कुछ ने टप कहा ...बिल्कुल नो प्रॉब्लम- ये था फ्रैंक चेहरा. लेकिन कुछ लड़कियां तुरन्त हॉय, हाऊ आर यू, आई एम फाइन वाला फॉरमैट बदल कर बाय... कैच यू लेटर वाले मोड में आ गईं और आगे कुछ पूछ पाता, इसके पहले ही ऑफ लाइन. कुछ दिन तक वो ‘देखते ही निकल लो’ वाले मोड में रहीं और फिर कंट्रोल डिलीट एंड- ये था फाल्तू चेहरा.
लिस्ट में एक पेयर भी था. लडक़ा-लडक़ी बचपन से एक दूसरे को जानते थे और पढ़ाई के बाद शादी करने का पक्का इरादा था. अचानक लडक़ी का ब्वॉयफ्रेंड मेरी लिस्ट से गायब हो गया. लडक़ी से पूछा सब ठीक-ठाक तो? एक सपाट सा जवाब था, फॉरगेट दैट. अरे... क्या हो गया. कुछ नहीं... मुझे क्या करना है, कौन सा कैरियर चुनना है, ये मैं तय करूंगी. कोई जरूरत से ज्यादा पजेसिव हो ये भी बर्दाश्त नहीं. मुझे लगा वो मेरा फ्रेंड कभी था ही नहीं- ये था कांफिडेंट चेहरा.

अब बारी थी फ्रेंडलिस्ट की एक ऐसी फीमेल की जिसकी इंगेजमेंट हो चुकी थी और वो अपने को इंडिपेंडेंट कहती थी. उसके करियर अभी शुरुआती दौर में था. उससे भी यही सवाल किया. जवाब ऑन लाइन नहीं आया बल्कि आधा दर्जन एसएमएस आ गिरे एक के बाद एक. पढऩे के बाद लगा कि मैसेज उसके मंगेतर के पास जाने थे लेकिन हड़बड़ी या गड़बड़ी से मेरे नंबर पर दे मारे. पहले मैसेज में परमीशन मांगी गई थी कि ..फलां पूछ रहे हैं, क्या आंसर दूं. दूसरे में लिखा था...मतलब? मैं तुम्हें बता रही हूं ना.. जो लगा वो पूछा, इसमें गलत क्या है? फिर तीसरा मैसेज... उन लोगों ने मुझे टच भी नही किया...फलां बहुत सीधे हैं. ओके और हम..मैं तुम्हें बता क्या रही हूं और तुम क्या समझ रहे हो? बीवी हूं तुम्हारी. उसको जब चेताया कि ये क्या दनादन भेजे जा रही हो. इसके बाद सफाई देते हुए 4-5 मैसेज कि वो गलती से आपको चला गया. असल में हमारे रिलेशन पर बात हो रही थी. क्यूंकि हमारे परिचित का पांच साल बाद ब्रेकअप हो गया है तो हम डिस्कस कर रहे थे. फिर कहाकि मेरी तो इंगेजमेंट हो चुकी है ब्वाय फ्रेंड का क्या करूंगी. फिर कहा, ब्वाय फ्रेंड और गर्लफ्रेंड वही नहीं होते जिनसे हम शादी करें. वैसे मैं पर्सनली मानती हूं कि जो ब्वायफ्रेंड हो वही हसबैंड भी. अब तक दिमाग का दही जम चुका था और सवाल वहीं का वहीं था- ये था कन्फ्यूज्ड चेहरा.

लिस्ट में हाल में शामिल एक मेंबर ने तीसरे ही कनवर्सेशन में इतना खुल गया कि दिमाग की लाल बत्ती जल गई. जब कहा कि तुम्हारी फीमेल आडेंटिटी पर डाउट है तो ‘डीके बोस’ वाली लिंगो पर आ गया- ये था फेक चेहरा. थर्टी प्लस की ओर बढ़ रही मेंबर को जब ‘जीएफ’ का ऑफर दिया तो लगा वो धन्य हो गई. ...अच्छी फमिली से हो, जॉब है, शक्ल-सूरत भी खराब नहीं तो शादी क्यूं नही कर लेती. बस फिर क्या था उसके दिल का दर्द सामने आ गया. बोली जीने का दिल नहीं करता इस दुनिया से मन ऊब गया है- ये था फ्रस्ट्रेटेड चेहरा।
लेकिन ढेर सारे ऐसे लोग भी थे जो शुरू में हिचके लेकिन बाद में अच्छे दोस्त साबित हुए. इतने सारे लोगों से बात करने के बाद फ्रेंड लिस्ट फिर लम्बी लगने लगी थी. लेकिन कंट्र्रोल डिलीट एंड की पर बढ़ती उंगलियां ये सोच कर रुक गईं कि जब सोसायटी में विश्वास का संकट बढ़ रहा रहा है तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स इससे अलग कैसे हो सकती है. यहां भी तो विश्वास का संकट है. जरा रुकिए...एक और फ्रेंड रिक्वेस्ट आ गई...हेलो.. ग्लैड टू मीट यू.. आई एम राजीव..!

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