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8/7/09

इंटेलिजेंट कलुआ



इधर कई दिनों से खबरें आ रहीं है कि शहर में आवारा कुत्तों ने गदर काटा हुआ है. जिसे देखो उसे काट खाते है. इसी संदर्भ में कलुआ और उसके बाऊ के बारे में बताता चलूं. कलुआ का बाऊ हमारे मोहल्ले का कुत्ता था. दिन में दुम हिलाता रात में गुर्राता. कलुआ का बाऊ गुजर गया. अब उसके स्थान पर बेटा कलुआ है. उसे आवारा इस लिए नहीं कहेंगे क्योंकि वह मेरे ब्लॉक के आसपास ही रहता है. मेरी कालोनी में और भी ढेर सारे डॉगी रहते हैं. कुछ सो काल्ड विदेशी ब्रीड के और कुछ क्रास ब्रीड के हैं. इनमें ज्यादातर एसी में रहने के आदी हैं. कुछ फस्र्ट फ्लोर और कुछ सेकेंड फ्लोर पर रहते हैं. समय समय पर कार से घोड़ा अस्पताल इंजेक्शन लगवाने जाते हैं. इधर उधर मुंह नहीं मारते. उन्हें साहब या उनका चपरासी सुबह शाम फारिग कराने के लिए कालोनी में टहलाते हैं. मिसेज खोसला कह रहीं थी कि उनका जर्मन शेफर्ड तो बहुत इंटेलिजेंट है उसे घर के ट्वायलेट को यूज करना आ गया है. वैसे कलुआ भी इनसे कम इंटेलिजेंट नहीं है. उसने फिलहाल मोहल्ले के किसी बाशिंदे को नहीं काटा है. ज्यादा शोर भी नहीं मचाता. कालोनी के अप मार्केट डागी से पंगा भी नहीं लेता. सुना है कि पामेरियन और इसी तरह के दूसरे डागी को ट्र्रेंड करने के लिए लोग बड़ी मेहनत करते हैं, ट्रेनर भी रखते हैं. लेकिन कलुआ तो सेल्फ ट्रेंड है. आपके मन की बात जान लेता है. जुगाड़ू भी नंबर वन. तेज धूप में पेड़ की छांव उसे उतना सुकून नहीं देती जितना मेरे ब्लॉक की सीढिय़ों की ठंडी फर्श. लेकिन कलुआ को पता है कि सीढ़ी पर लेटा वो मुझे फूटी आंख नहीं सुहाता. सो उसने जुगाड़ खोज लिया है. मेरे आफिस जाने के बाद ही वो सीढ़ी पर अड्डा जमाता है. मेरे स्कूटर की आवाज पहचानता है. स्कूटर की आवाज सुनते ही सीढ़ी से उतर कर बाहर खड़ा हो जाता है. मेरे घर के दरवाजे की आवाज भी पहचानता है और कुंडी खड़कते ही मेरे आगे आगे धीरे धीरे सीढ़ी उतरने लगता है और मेरे जाते ही फिर सीढ़ी पर विराजमान. ब्लॉक में और किसी का लिहाज नहीं करता. एक-आध बार उसने मुझसे भी लिबर्टी लेते हुए ढिठाई दिखाने की कोशिश की और दुम हिलाता हुआ वहीं लेटा रहा लेकिन एक भरपूर लात खाने के बाद अब मेरी इज्जत करता है और सम्मान में बाहर आ कर खड़ा हो जाता है. कई बार डाग कैचिंग स्क्वाड वाले आ चुके हैं. कलुआ उनके हाथ कभी नहीं लगा. उनको देखते ही सट से सेकेंड फ्लोर की सीढ़ी पर दुबक गया. डेस्परेट डाग कैचर्स बाहर फारिग होने निकले एक पट्टे वाले पालतू डागी को ही उठा ले गए. बड़ा हंगामा मचा. अब आप ही बताइए इन टफ कंडीशंस में कलुआ अगर सर्वाइव कर रहा है तो वो इंटेलिजेंट तो होगा ही.

8/2/09

तन डोले मेरा मन डोले




सावन मतलब पवन करे शोर, सावन मतलब नागपंचमी, सावन मतलब सांप सपेरे मेले-ठेले. सावन जाने को है तो जाते जाते थोड़ा नागिन डांस की बात हो जाए. आज कल फिर बीन की धूम है. एक तो सावन का महीना और दूसरे लव आजकल में सैफ अली खान और दीपिका पाडुकोण का मस्त नागिन रीमिक्स डांस. कुछ दिन पहले नागपंचमी भी थी. सड़कों पर सांप-संपेरे और बीन की धुन कम सुनाई पड़ी लेकिन टीवी चैनलों ने कसर पूरी कर दी. एक चैनल ने बीन बजाई तो देखादेखी दूसरे चैनल भी नागिन डांस करने लगे. फिल्म नागिन में ...तन डोले मेरा मन डोले... ये कौन बजाए बांसुरिया.. गाने में जो बीन बजी वो आधी सदी बाद आज भी हिट है. उसकी धुन पर आज भी लोग झूम रहे हैं. अब ना तो उतने सांप रहे ना ही सपेरे लेकिन बीन की धुन का नशा बरकरार है. बीन की धुन पर नागिन डांस हिट होने की गॉरंटी है. इसी लिए तो मधुमती फिल्म के गाने... दैया रे दैया चढ़ गयो पापी बिछुआ... में बिच्छू के डसने पर भी बीन की धुन ही बजी. और अब लव आजकल में फिर इसी धुन की धूम है. लोक कथाओं में इच्छाधारी सांपों के बारे में पढ़ा था जो किसी का भी रूप धारण कर सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं. सांपों पर बनी फिल्मों में कभी जितेन्दर, कभी रीना राय तो कभी श्रीदेवी इच्छाधारी नाग और नागिन का किरदार निभा चुके हैं. लव आजकल फिल्म सांप-सपेरों पर नहीं है लेकिन जब इसके म्यूजिक डायरेक्टर इच्छाधारी हो सकते हैं यानी बीन की धुन बजा सकते हैं तो मैं 'इच्छाधारी' क्यों नहीं बन सकता?
पता नहीं क्यों छुट्टी के दिन मैं 'इच्छाधारी' बन जाता हूं. कुछ भी सोचने सोचते कहीं भी पहुंच जाता हूं. छोटी-छोटी बातें और यादें मन को उसी तरह हल्का कर देती हैं जैसा कि ध्यान या योगा के बाद महसूस होता है. ये बचपन की यादें भी हो सकती हैं और एक दिन या हफ्ते पहले घटी कोई घटना भी. जैसे बात सावन के पहले की है. एक दोस्त के रिश्तेदार की बारात में गया था. बारात दरवाजे पर पहुंचते ही नागिन धुन बजने लगी. अचानक देखा कि चमकीली पगड़ी और शेरवानी पहने दूल्हे राजा भी दोनों हाथ ऊपर किए मगन हो नागिन डांस कर रहे हैं. पहली बार दूल्हे को लड़की वालों के दराजे पर डांस करते देखा तो पक्का विश्वास हो गया कि बीन की धुन में कोई जादू है.
समय के साथ भागते और बदलते रहने की जद्दोजहद के बीच पुरानी रेल, कारें, कोठियां, दरख्त, फिल्म, म्यूजिक, गाने और यादों के झोंके रोमांच और रूमानियत से भर देते हैं. कुछ लोग मार्डन कहलाने के चक्कर में पुराने की तारीफ करने में पता नहीं क्यों हिचकिचाते हैं. वे भूल जाते हें कि पुराने की नींव पर ही मार्डनिटी की इमारत खड़ी होती है. आज जो बेहतरीन है वो पुराना होने पर क्लासिकल बन जाती है. क्लासिकल और मार्डनिटी में एक फ्यूजन है जिसे अलग नहीं किया जा सकता. इस फ्यूजन में एक खास तरह का नशा है. इसी लिए तो पुराने गानों और थीम को बार बार नई फिल्मों में लिया जाता है और लोग उसे बड़े चाव से देखते -सुनते हैं. मैं अक्सर रात को पुराने फिल्मी गाने सुन कर सोता हूं. ये मन को सुकून देते हैं. कुछ लोग छुट्टी में पूरे हफ्ते का पेंडिंग घरेलू काम निपटाते हैं, कहीं आउटिंग पर जाते हैं, कुछ बढिय़ा खाते हैं और कुछ चादर तानकर सोते हैं. छुट्टी का असली मजा लेना हो तो आप इच्छाधारी बन अपने तन और मन को बिल्कुल छुट्टा छोड़ दें, बिंदास. तन डोलाने का मन ना हो तो मन डोलाएं फिर देखिए अगले दिन कैसे रिचार्ज होते हैं.

7/15/09

ब्लैकबेरी



वो जमाने लद गए जब मोबाइल रखना प्रेस्टिजियस माना जाता था. हां, महंगे मोबाइल अब भी शान समझे जाते हैं जैसे ब्लैकबेरी. हमारा एक साथी रिपोर्टर अचानक कहीं से एक ब्लैकबेरी ले आया है. उसके हाथ में ब्लैकबेरी किसी ब्रेकिंग न्यूज से कम नहीं. ले आया इस लिए कि इस पर विवाद है कि ये फोन उसे कहां से मिला. आप कुछ और समझें इसके पहले बताता चलूं कि वह अल्लाह से डरने वाला एक मेहनतकश रिपोर्टर है. जहां ना पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि की स्टाइल में काम करता है. आइडियाज इतने इनोवेटिव कि बाकी रिपोर्टर दांतों तले उंगली दबा लें लेकिन कभी कभी इनोवेशन के चक्कर में सीनियर्स की डांट भी खा जाता है. फिलहाल उसके ब्लैकबेरी को लेकर जितने मुहं उतनी बातें. किसी ने कहा, अबे किसी ने गिफ्ट किया होगा, उस जैसा सूम और इतना महंगा मोबाइल. दूसरा बोला, महंगा मोबाइल लेने से चिरकुटई थोड़े ही कम हो जाएगी, अभी भी ब्लैकबेरी से मिसकॉल मारता है. तीसरा बोला, सेकेंडहैंड लिया होगा. चौथे ने ध्यान से उसेे उलटा पलटा, ये तो डुप्लीकेट है-चाइनीज. और बेचारा ब्लैकबेरी, अपनी किस्मत को कोस रहा है कि कहां फंस गया डाउन मार्केट लोगों के बीच. तीन दिनों में उसे इतने हाथों ने नचाया कि उसकी हालत वैसी हो गई जैसे रजिया फंस गई हो गुंडों में. कोई उसके फीचर्स परख रहा है कोई नेट सर्फिंग और एसएमएस भेजने के जुगाड़ देख रहा है. और रिपोर्टर साहब हैं कि कमर में ब्लैकबेरी रिवाल्वर की तरह खोंसे टेढ़े टेढ़े घूम रहे हैं. जेब में नही रखते. पूरी कोशिश है कि ये फोन ज्यादा से ज्यादा लोगों की नजरों में आए. किसी बड़े अधिकारी से मिलने जाता है तो बहाने से सेलफोन सामने टेबुल पर जरूर रख देता है. हद तो तब हो गई जब खादी आश्रम में 75 साल के वृद्ध भैया जी के सामने भी उसने तीन बार ब्लैकबेरी घुमाया. भैया जी को देख कर नहीं लग रहा था कि उन्होंने कभी साधारण मोबाइल भी प्रयोग किया होगा. रिपोर्टर साथियों में चर्चा है कि ब्लैकबेरी पाकर वो बौरा गया है. कॉल आती है तो हैलो भी स्टाइल से बोलता है. किसी ने बता दिया है कि इस फोन में आवाज छन छन कर आती है. सो बात करने वाले से पूछना नहीं भूलता कि बताओ मेरी आवाज कैसी आ रही है, बिल्कुल साफ छन कर आ रही है कि नहीं? दरअसल मैं ब्लैकबेरी से बात कर रहा हूं. आपके पास उसका फोन आए तो कुछ पूछने से पहले ही कह दीजिए कि यार तुम्हारी आवाज छन छन कर आ रही है. उसका नंबर है 09450874346.

7/12/09

व्हाट ऐन आइडिया सर जी!



पॉपुलेशन कंट्रोल के लिए बिजली जरूरी है. बिल्कुल सही बात है. बिजली मतलब विकास, विकास मतलब बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य यानी बेहतर जीवन स्तर और बेहतर जीवन स्तर से आबादी अपने आप काबू में आने लगती है. ये तथ्य प्रमाणित है. लेकिन गांव-देहात में आबादी पर काबू पाने के लिए बिजली की एक और भूमिका पर तो ध्यान ही नहीं गया था. गांवों में बिजली होगी तो लोग टीवी ज्यादा देखेंगे. इतना ज्यादा देखेंगे कि उनको रतिक्रीड़ा का समय ही नही मिलेगा. मिलेगा भी तो टीवी देख देख कर इतना थक चुके होंगे कि कमरे की बत्ती बुता कर चुपचाप सो जाएंगे. यानी नो मोर बच्चा. बिजली और टीवी का प्रयोग कंट्रासेप्टिव के रूप में ? क्या आइडिया है सर जी!
सर जी का एक आइडिया और है कि शादी ३० तीस साल के बाद की जाए. शहरों में तो लोग अब वैसे ही कैरियर बनाते ३० के हो जाते हैं. शादियां ३० के बाद ही होती हैं. लेकिन गांव में ३० साल के लोग पुरायठ माने जाते हैं यानी शादी की एक्सपायरी डेट पार कर चुके. काश, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद जैसा सोचते हैं वैसा ही होता लेकिन व्यावहारिक रूप में स्थिति तो ठीक उलट है. सर जी ने ये कैसे मान लिया कि रात को जितने लोग टीवी देखते हैं वो प्रवचन, भजन कीर्तन और अन्य बड़े सात्विक टाइप के कार्यक्रम ही देखते होंगे और फिर पत्नी से कहते होंगे कि हे प्रिये जब मैं टीवी देख कर इतना थक जाता हूं तो तुम तो और थक जाती होगी क्योंकि तुम्हें तो घर के बाकी काम भी करने पड़ते हैं लिहाजा शुभरात्रि. लेकिन माफ कीजिएगा शालीनता से परे जाकर कर बात कर रहा हूं. रात में टीवी पर पारा गरम जैसे देसी ठुमके वाले मसालेदार सेक्सी कार्यक्रम, एमटीवी और एएक्सएन पर हॉट रियलिटी शोज और एडल्ट मूवी की भरमार होती है. ऐसे कार्यक्रम देख थकाहारा व्यक्ति भी जोश में आ जाता है और अपने पतिधर्म को तत्काल पूरा करना पुनीत कर्तव्य समझता है भले ही उसकी घराली किसी भी स्थिति में हो. नतीजा- पॉपुलेशन में कुछ और वूद्धि. तो सर जी, आपके कश्मीर क्या किसी भी राज्य में ये आइडिया कारगर होगा इसमें संदेह है.

7/1/09

किसिम किसिम के एटीएम






छोटा एटीएम, मोटा एटीएम, खोटा एटीएम, सोता एटीएम, रोता एटीएम. एक साल में हर तरह के एटीएम से मेरा पाला पड़ चुका है. ना तो मैं कोई धन्नासेठ हूं ना जालसाज और ना ही चिरकुट लुटेरा. मैं बंधी पगार वाला एक आम नागरिक जो महीने में एटीएम का तीन-चार चक्कर जरूर लगाता है. दरअसल एटीएमीकरण से जो समाजवाद आया, उसी का नतीजा है ये. अब तो सब धान बाइस पसेरी. कोई कार्ड किसी में ढुकाइए (ठेलिए) पैसा बराबर मिलेगा. आपके पास किसी सिटी बैंक का कार्ड हो या घाटे वाले नेशनलाइज्ड बैंक का अब तो सब कार्ड सब में चलता है. जहां तक याद पड़ता है मेरे शहर में टाइम और आईडीबीआई बैंक ने एटीएमए कार्ड सबसे पहले शुरू किए लेकिन इसकी लिए खाते में मिनिमम दस हजार बैलेंस की शर्त थी. लोग एटीएमए कार्ड उसी तरह शान से चमकाते फिरते थे जैसे शुरू में मोबाइल. मैंने भी उस समय हिम्मत कर एक कार्ड बनवाया था. पैसा निकालने से ज्यादा ध्यान इस पर रहता था कि बैलेंस दस हजार से कम न हो जाए. अब तो समाजवाद है. पूरा खंगाल लो, जीरो बैलेंस नो प्राब्लम. जहां मैं रहता हूं वहां दो किलोमीटर के दायरे कम से कम दस एटीएम तो होंगे ही. सब की नब्ज टटोल चुका हूं.
सबसे पहले एक बड़े बैंक के छोटे एटीएम बात करें. मजाल है कभी उसने पूरा पैसा दिया हो. मांगो दस हजार देता है पांच. थोड़ी दूर पर है एक मोटा एटीएमए. केबिन में एक नहीं तीन मशीनें. मस्त एसी. शीशा भी लगा है सूरत देखने के लिए (सुना है शीशे के पीछे खुफिया कैमरा लगा होता है). लेकिन तीनों मशीनें तीन तरह की. एक में टच स्क्रीन, जिसको कई बार अपना पैसा टच कराने में उंगली दुखने लगती है. दूसरे में कार्ड स्वैपिंग सिस्टम है. अक्सर कई बार स्वैप करने पर ही रिसपांस देता है. और तीसरी मशीन तो पूरा कार्ड गड़प कर जाती है. पैसा देने के बाद ही कार्ड उगलती है. कभी कभी ना पैसा देती है ना कार्ड उगलती है. जब नया कस्टमर कार्ड ठेलता है तब जाकर पुराना कार्ड उगलती है. बगल में ही एक खोटा एटीएम है जिसमें कभी पैसा नहीं होता कभी स्टेटमेंट स्लिप. एसी तो शायद ही कभी चलता हो. पास में एक सोता एटीएम भी है. पांच में चार बार आउट आफ आर्डर. कभी चालू मिलेगा तो गारंटी नहीं कि कब बीच में ही ठेंगा दिखा दे, कार्ड बैरंग लौटा दे. और एक है रोता एटीएमए. मैं उस पर अधिक भरोसा करता हूं क्योंकि वो जैसा भी है, दगाबाज नहीं है. उस एटीएमए मशीन की चेचिस तो ठीक है लेकिन भले ही सौ रुपए निकाले, आवाज इजना करता है कि किसी पुरानी एंबेसडर का इंजन अंदर लगा दिया गया हो. बड़ी देर तक खड़ खड़ खड़-घर्र घर्र घर्र जैसे सौ रुपया देने से पहले गुस्से में मशीन बार बार पैसा गिन रही हो और कह रही हो पता नहीं कहां से चले आते हैं कंगाल. कभी लगता है आपनी पूरी थैली खाली कर देगी या नाराजगी में आपका पूरा बैलेंस ही मुहं पर दे मारेगी. लेकिन गनीमत है इन मशीनों ने कभी पैसा कम नहीं गिना और फर्जी नोट नहीं दिए. पड़ोस में एक और नया एटीएम खुल रहा है जल्द ही उस पर भी कार्ड फेरूंगा, देखें किस कैटेगरी में आता है.

6/28/09

लखनऊ का 'बंद' रायबरेली का 'पापा'



चाय के साथ पावरोटी खाने में जो मजा है वो पिज्जा, बर्गर और हॉटडाग में कहां. तभी तो ममता दीदी ने रेल मंत्री बनने के बाद आफिस जाकर सबसे पहले डबलरोटी और चाय का नाश्ता किया. पावरोटी के कई चचेरे भाई हैं रस्क, बंद और जीरा, ये ब्रेड ना मिलने पर वैकल्पिक संतुष्टि के लिए उपलब्ध रहते हैं. बंद के साथ खास बात है कि मक्खन ना हो तो भी चलेगा. इसी तरह रस्क और जीरा भी सेल्फसफिशियेंट हैं. जीरा समझ गए ना सूखी लकड़ी या चैला या नमकीन खाजा टाइप की चीज जिसे चाय में डुबो कर खाया जाता है. यह चाय की आधी कीमत पर मिलता है लेकिन अगर आपने इसे कप में दो बार डुबो दिया तो पूरी चाय सोख लेगा. इसका नाम जीरा शायद इस लिए पड़ा कि इसके मुंह में चाय जीरा समान ही होती है. और इसी तरह बंद भी दो डुबकी में पूरी चाय सुड़क जाता है. अक्सर आधा बंद हाथ में ही रहता है और चाय का पूरा कप खाली. इस लिए बंद खाएं तो एक लोटा चाय लेकर बैठें. पता चला है कि रायबरेली में जीरा का एक फुफेरा भाई 'पापा' भी आ गया है. इस के बारे में लोग अभी कम ही जानते हैं. पता चला है कि बंद जब पुराना होने लगता है तो उसे आंच में सुखा कर 'पापा' बनाया जाता है. चाय सुड़कने में यह बंद और जीरा से भी बड़ा उस्ताद है.

6/21/09

कलुआ का बाऊ


रात के डेढ़ बजने को हैं और फिर मन में धुक-धुकी लगी है कि साला कलुआ फिर बैठा होगा अपने गैंग के साथ मेरी ताक में. पहले कलुआ के बाऊ (बाबू) से त्रस्त था अब उसके बेटे से त्रस्त हूं. बाप भी काला बेटा भी काला, तन से भी और मन से भी. ऐसे डबल कैरेक्टर वाला जीव आज तक नहीं देखा. दिन में इतना शरीफ और निरीह जैसे रात में कुछ हुआ ही नहीं. कई बार बंद और डबलरोटी खिलाई लेकिन कोई असर नहीं. डाटो तो भी भीगी बिल्ली बना रहता है और उसके साथी भी बड़े दोस्ताना अंदाज में मिलते हैं और रात को दुश्मन बन जाते हैं. पुलिस वाले भी मदद नहीं करते, कहते हैं मेरे महकमे का मामला नहीं है. क्षेत्र के दबंग कारपोरेटर से भी मदद की गुहार लगाई, उसने भी हाथ खड़े कर दिए. कहा शाम छह बजे के बाद संबंधित विभाग कार्रवाई नहीं कर सकता, संसाधनों की कमी है. मेरे घर के रास्ते में कलुआ का इलाका पड़ता था. कमबख्त मेरी स्कूटर की आवाज पहचानता था. हेड लाइट देखते ही पूरा गैंग एलर्ट हो जाता था. मैं स्कूटर आराम से चलाने का आदी हूं सो जब बहुत करीब आ जाता तभी अचानक पूरा गैंग झपट पड़ता. दहशत में एक-दो बार गिरते-गिरते बचा. उसका हमला होते ही अनायास एक्सीलेटर बढ़ा देता. कलुआ के साथी पीछे छूट जाते लेकिन कलुआ गली के छोर तक खदेड़ता था. दूसरी रणनीति आजमाई कि जब कलुआ का गैंग झपटे तो खड़े हो जाओ लेकिन इसमें जोखिम ज्यादा नजर आया. लगा कि न जाने कलुआ के मन में क्या हो. सो गति में ही ज्यादा सुरक्षा महसूस हुई. कलुआ का इलाका करीब आते ही स्कूटर की गति बढ़ा देता था कि देखें कितनी तेज भागता है स्प्रिंटर की औलाद. रणनीति कारगर लग रही थी. कुछ दूर दौडऩे में उसकी हफनी छूट जाती थी और मैं विजयी भाव से फिनिश लाइन पार कर जाता था. लेकिन ये ज्यादा दिन नहीं चला. कलुआ ने भी इसकी काट निकाल ली. स्कूटर की आवाज सुनते ही कलुआ पहले से ही स्कूटर वाली दिशा में आगे-आगे दौडऩे लगता, उसी तरह जैसे रिले रेस में पीछे से आ रहे साथी का बैटन लेने से पहले ही टीम मेंबर स्टार्ट ले लेते हैं. और स्कूटर करीब आते-आते कलुआ अच्छी स्पीड में होता. मुझे स्वभाव के विपरीत स्कूटर और तेज गति से भगानी पड़ती. एक-एक रात मुश्किल से कट रही थी. लेकिन एक रात कलुआ ने नहीं दौड़ाया, उसके साथी भी नहीं दिखे. सुखद एहसास, आतंक का खत्मा. तो क्या कलुआ युग का अंत हो गया? सुबह आफिस जाते समय नजर इधर उधर कलुआ को खोज रही थीं तभी सड़क किनारे कलुआ लेटा दिखा. पास गया, कोई हरकत नहीं. कलुआ की सांसे नहीं चल रहीं थीं. किसी वाहन ने उसे टक्कर मार दी थी. उसका मुंह खुला हुआ था. लग रहा था वह हंस रहा है और मुझसे कह रहा, क्यों बच्चा खा गए ना गच्चा. कुछ महीने सब शंाति से चला लेकिन फिर एक नया कलुआ पैदा हो गया और आजकल फिर मुझे दौड़ा रहा है.
अब आप समझदार हैं जान ही गए होंगे कलुआ कौन था और कौन है. फोटो से भी नहीं समझ आया तो इंतजार करिए.. कलुआ के बेटे की कहानी.. का

6/19/09

चित्रकूट के घाट पर 'केवट' से मुठभेड़


मेरे पापा सबसे बहादुर: घायल इंस्पेक्टर के साथ उनकी बेटी (फोटो: साभार आई नेक्स्ट)
...............आपने देखा होगा १६/६ यानी चित्रकूट में ५० घंटे तक चला लाइव एन्काउंटर. २६/११ से भी ज्यादा देर तक चली मुठभेड़. २६/११ में विदेशी आतंकी थे, १६/६ में था एक देसी डाकू. खबरिया चैनल्स और अखबारों में तीन दिन यह मुठभेड़ सुर्खियों में रही. सब यूपी पुलिस को पानी पी-पी कर गरिया रहे थे. हमेशा यही होता है. क्योंकि एसी कमरे में बैठ कोल्ड ड्रिंक के साथ किसी खबर या कवरेज पर टिप्पणी करना, गल्तियां निकालना बहुत आसान है लेकिन जमीनी हकीकत में बहुत फर्क होता है. ४३ डिग्री की गर्मी में बीहड़ में बिना दाना-पानी पांच घंटे बैठने में बड़ों बड़ों को गश आ जाता है. पुलिस वाले तो ५० घंटे तक डटे रहे. पुलिस की रणनीति में, संसाधनों में लाख कमी हो लेकिन उसके मनोबल और बहादुरी पर सवाल उठाना, मारे गए पुलिस कर्मियों और उनके परिवार वालों का अपमान है. १६/६ की मुठभेड़ में डाकू घनश्याम के मारे जाने के कुछ ही पहले शहीद होने वाले कांस्टेबल वीर सिंह को कमरे में छिपे डाकू ने प्वाइंट ब्लैंक रेंज से गोली मारी. डाकू के पास कोई विकल्प नहीं था. अगर डाकू निकल कर गोली नहीं चलता तो वहीं मारा जाता लेकिन वीर सिंह के पास तो विकल्प था. वह अन्य साथियों की तरह पेड़ या दीवार की आड़ में पोजीशन लिए बैठ सकता था लेकिन उसने तो मिशन पूरा करने के लिए आगे बढ़ कर सांप के बिल में हाथ डाल दिया. वीर सिंह की बहादुरी को सलाम. माना कि पुलिस फोर्स में ढेर सारे लोग तोंदियल और लेथार्जिक हैं लेकिन चुस्त दुरुस्त जवानों की भी कमी नहीं है. अगर ये ना होते तो ५० घंटे में भी डाकू का काम तमाम ना होता.
दूसरी सबसे आसान चीज है सिस्टम को भ्रष्ट कह देना. हम भी तो उस सिस्टम का हिस्सा हैं और हम भ्रष्ट हैं तभी तो सिस्टम भ्रष्ट है. नौकरी के कुछ सालों बाद ही हम तोंदियल, आलसी और आरामतलब हो जाते हैं. जाहिर है हम अपना काम ठीक से नहीं कर रहे या संसाधनों का मिसयूज कर रहे हैं. क्या ये सब भ्रष्टाचार नहीं है? घनश्याम केवट एक निहायत धूर्त और दुर्दांत अपराधी था. जब वह मकान से निकल कर भागा तो लोग उसकी फुर्ती देख कर दंग रह गए. यह उसका फिट और छरहरा शरीर ही था जिसके बल पर वह पचास घंटे तक टिका रहा. यह देख कर मुझे लखनऊ चिडिय़ा घर का वो आदमखोर बाघ याद आ गया जो आधा दर्जन लोगो ंकी जान लेने के बाद पकड़ा गया था. उसने मजबूत पिंजरे में अलग रखा गया था. मझोले कद का एक दुबला पतला यह नरभक्षी कोने में बैठा गुर्रा रहा था. मुझे जू के आलसी और स्थूलकाय बाघ देखने की आदत थी जो कितना भी छेडऩे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते थे. मैंने अनायास ही उसकी ओर हाथ उठा दिया. अचानक वह इतनी जोर से दहाड़ा कि रूह कांप गई. लगा कि पिंजरा तोड़ मुझे कच्चा चबा जाएगा. जू का गार्ड मुस्कराया, साहब यही फर्क है पिंजरे में बंद और जंगली जानवरों में. घनश्याम एक ऐसा ही छरहरा हिंसक जंगली डाकू था. लेकिन आपरेशन घनश्याम केवट पर उंगली उठाने वाले लोग भी मुझे जानवरों जैसे ही लगे जो कमरों में बैठे बैठे आलसी, आरामतलब और स्थूलकाय हो गए हैं

6/15/09

झूठ बोले कुत्ता काटे.



न तो मैं नगर निगम की डॉग कैचर स्क्वाड में हूं न पशु प्रेमी और ना ही पशुओं के प्रति हिंसा का भाव रखता हूं. आवारा कुत्ते हों या किसी घर के दुलारे स्वान, उनके प्रति तटस्थता का भाव ही रहता है. मैं एक आम आदमी हूं जिसे कभी पैदल, कभी साइकिल से तो कभी स्कूटर से सड़कों पर रोज ही गुजरना पड़ता है और जो किसी कुत्ते या उनके झुंड को आसपास देखते ही एक अनजाने भय और रोमांच से घिर जाता है. क्योंकि अलग अलग परिस्थितियों में कुत्तों को पुचकारने और दुत्कारने के फारमूले आजमा चुका हूं लेकिन दोनों का इफेक्ट सेम होता है यानी कुत्तों को जो करना हैं करेंगे. कई बार कुत्ते काटते काटते रह गए और दो बार डॉग बाइट झेल चुका हूं. दोनों ही बार मुझे 'लूसी' ने ही काटा. 'लूसी' मेरे एक अजीज मित्र की दुलारी .....? थी. कुत्तों की वाइफ को क्या कहते हैं, आप जानते ही होंगे लेकिन मित्र उस शब्द का प्रयोग करने पर नाराज हो जाते थे सो 'लूसी' ही ठीक है. मित्र के घर जाने पर इंश्योर करवाता था कि 'लूसी' आसपास ना हो लेकिन फिर भी उस कम्बख्त ने दो बार काटा. पिछले जनम की कोई खुन्नस रही होगी. मैंने दोनों बार सिंगल डोज के महंगे एंटी रैबिक इंजेक्शन ठोंकवाए. ऐसे ही एक दिन मित्र के यहां पहुचा. कॉलबेल बजाने पर 'लूसी' के भूंकने की आवाज नहीं आई. लगा कि आज जरूर उसी सोफे के नीचे दुबक कर बैठी होगी जहां से निकल कर दो बार मुझे काट चुकी है. मित्र मुहं लटकाए निकले, मैं सहमा सा ड्राइंगरूम की तरफ यह कहते हुए बढ़ा कि 'लूसी' को बांध दो. तभी भाभी जी की उदास आज आई, भाइया 'लूसी' कहीं चली गई है. चली गई मतलब? कोई उसे उठा ले गया. अरे अड़ोस पड़ोस के कुत्तों के साथ होगी, आ जाएगी. नहीं भइया सुबह से है गायब है. इन्होंने तो तब से एक निवाला मुंह में नहीं डाला है.
शाम के सात बज रहे थे. मित्र का परिवार बिना खाए पीए बैठा था लेकिन मुझे लगा रहा था कि अचानक किसी ने मेरे मुहं में गुलाब जामुन डाल दिया हो, खुशखबरी सुना दी हो. लेकिन खुशी को भरसक दबाते हुए मैंने भी सहानुभूति जताई कि कैसे पूरे घर को गुलजार रखती थी. अब कितना सूना लग रहा है. लेकिन उम्मीद मत छोड़ो रातबिरात शायद लौट आए. अगले दिन सुबह ही मित्र को फोन कर पता किया कि लूसी लौटी कि नहीं. लूसी अब तक नही लौटी थी. जिसने भी लूसी को गायब किया था उसके प्रति मन श्रद्धा से भर गया. मित्र के प्रति भी सहानुभूति थी लेकिन ये भी पता था कि कुछ दिन में वो दूसरा स्वान ले ही आएंगे. इसके बाद मैं निर्भय होकर मित्र के घर लाने लगा. जैसा फील किया सच सच बता दिया. झूठ बोलूं तो कुत्ता काटे. ये तो है पहली कड़ी. अगली कड़ी में कलुआ की कहानी.

6/11/09

जरा बचके जरा हट के...ये है इंडिया मेरी जान



ये है जिब्राल्टर का एअरपोर्ट. भौगोलिक स्थिति ऐसी कि हाई-वे और एअरपोर्ट रन-वे एक दूसरे को क्रास करते हैं. अब से रेलवे की लेवल क्रासिंग तो है नहीं कि सब-वे या ओवरब्रिज से काम चल जाएगा सो वर्केबल सॉल्यूशन यही निकाला गया कि जब प्लेन टेकऑफ या लैंड कर रहा हो तो हाई-वे बंद कर दिया जाए और जब रोड चालू हो तो रन-वे बंद. वहां ये व्यवस्था अभी तक तो ठीक से काम कर रही है और कोई हादसा नही हुआ. अब जरा उस स्थिति की कल्पना कीजिए कि अगर ये व्यवस्था भारत के किसी शहर में होती खास कर यूपी और बिहार में तो नजारा कुछ ऐसा होता...
सीन एक... प्लेन टेकऑफ करने वाला है, रोड का बैरियर गिरा हुआ है. वहां तैनात गार्ड या सिपाही लघुशंका करने या पान मसाला लाने गया हुआ है. कुछ मोटर साइकिल और स्कूटर वालों ने अपने वाहनों को तिरछा कर या लिटा कर बैरियर के नीचे से निकलने में सफलता पा ली है और चक्कर में हैं कि प्लेन निकलने से पहले रन-वे के उस पार पहुंच जाएं. तीन-चार लोग निकल भी चुके हैं और एक दूधिया जिसकी मोटर साइकिल पर दूध के कैन बंधे हैं, रनवे के बिल्कुल पास रुक कर प्लेन के निकलने का इंतजार हर रहा है.
सीन दो...
रोड के बैरियर गिरे हुए हैं. रन-वे पर प्लेन टेकऑफ के लिए दौडऩे लगा है कि अचानक प्लेन के आगे-आगे एक गाय और उसके पीछे - पीछे दो सांड़ दौड़ते दिखते हैं
सीन तीन...
फ्लाइट का टाइम हो गया है लेकिन रन-वे क्लीयर नहीं है. ठीक रन-वे को क्रास करने वाली रोड पर वसूली को लेकर ट्रैफिक पुलिस कांस्टेबल का ट्रक और टेम्पो वालों से झगड़ा हो गया है. और उन्होंने अपने वाहन अड़ा कर जाम लगा दिया है और वाहनों की कई मील लंबी कतार लग गई है.
ऊपर वाले का शुक्र है कि भारत में इस तरह की क्रासिंग नहीं है. अगर होती तो रन-वे पर टेम्पो दौड़ते और बोइंग ७४७ क्रासिंग पर डग्गामार बसों की तरह रुक कर सवारी भरते नजर आते.

6/8/09

ट्रेनों में गूंजता संगीत...


समर वेकेशंस, झुलसाती गर्मी और उसमें रेलयात्रा. सोचकर ही पसीना छूटने लगता है. लेकिन कभी आपने महसूस किया है कि रेल और इसकी भीड़ के रेले में भी एक रिद्म है. तो आइए आज आपको इस रिद्म से निकलते संगीत को सुनाएं. बोगियों के भीतर गूंजता संगीत, प्लेटफार्म पर सरकता संगीत. अब ये आप पर है कि आपका 'सेंसर' इस रेडियो की कौन सी फ्रीक्वेंसी पकड़ता है.
आपको मिलवाते हैं रेलवे के रोडीज, जॉकी और रॉकी से. ये सब हैं डेली पैसेजर्स यानी रोज मिलने वाले वे चेहरे जिन्हें देख कर सामान्य यात्री टेंशन में आ जाते हैं पर इन कम्यूटर्स के माथे पर शिकन तक नहीं. भागती-धक्का खाती कभी गुर्राती, कभी मुस्कराती इस कम्युनिटी के पास होता है एमएसटी. एमएसटी बोले तो 'मैनेजमेंट का सीजन टिकट'. क्योंकि ये टिकट उन्हें सिखाता है टाइम मैनेजमेंट, सोशल नेटवर्किंग और उन्हें बचाता है मोनोटोनस लाइफ की ऊब से.
एक बार मैंने भी अपने में एक एमएसटीहोल्डर मित्र के साथ यात्रा की उन्हीं के अंदाज में. यात्रा क्या पूरे दो घंटे की फिल्म थी. एमएसटीहोल्डर्स के रूप में इसमें कई किरदार मिले. कहीं राजू श्रीवास्तव, कहीं जसपाल भट्टी, कहीं मोहम्मद रफी, कहीं बशीर बद्र तो कहीं मुकेश.
फिल्म की शुरुआत हुई मोबाइल कॉल से. नवल भाई, किस ट्रेन से जाते हो? इंटरसिटी से... आज मैं भी चलूंगा तुुहारे साथ.. वेलकम सरजी.. स्टेशन पहुंच कर काल करते हैं.. 8.10 पर ट्रेन है. मैं आधा घंटे पहले स्टेशन पहुंच गया. इंक्वायरी बोर्ड पर कुछ नहीं लिखा था, कुली ने बताया इंटरसिटी छह नंबर से जाती है. 8.05 पर नवल भाई का फोन आया, कहां हैं? छह नंबर पर खड़ा हूं. अरे.. ट्रेन तो आ गई..तीन नंबर पर आइए, ट्रेन में हूं. ये कैसी व्यवस्था है, कोई एनाउंसमेंट नहीं, ऐसे तो ट्रेन छूट जाती. मैं प्लेटफार्म नंबर तीन की ओर भागा. ट्रेन खड़ी थी. गजब की भीड़. फिर फोन किया, नवल कहां हो. इंजन की तरफ आइए, कोच 4463. मैं फोन कान में लगाए बढऩे लगा. आप दिख गए सरजी...बस सामने वाले डिब्बे में चढ़ जाइए. मैं हकबकाया सा सामने वाली कोच में चढ़ गया. भीतर पैर रखने की जगह नहीं. अंदर की तरफ आइए.. मैं यात्रियों ठेलता हुआ धीरे धीरे बढऩे लगा. तभी आवाज आई..मिल गए. मुस्कराते नवल भाई अपनी कम्युनिटी के साथ बैठे थे. बर्थ पर पहले से ही छह लोग थे. सब के सब थोड़ा हिले और मेरे लिए भी जगह बन गई. सबसे इंट्रोडक्शन हुआ..ये हैं ज़हीर भाई. उम्र 55 लेकिन जज्बात टीनएजर्स जैसे, चंदन का इत्र लगाए नफासत की मिसाल. बगल में बैठे थे रवींदर सिंह. पसीने से बचने के लिए कालर में रुमाल लगाए, कम्यूटर्स कम्युनिटी के परमानेंट मेंबर लेकिन पता चला कि साल में छह महीने बिना एमएसटी के डब्लूटी चलते हैं. उनके बगल में ईयरफोन लगाए बैठे थे रियाज भाई. पहले विंडो के पास बैठना पसंद करते थे, लेकिन अब नहीं. कुछ दिन पहले रियाज ईयरफोन लगा आंख बंद किए संगीत का लुत्फ ले रहे थे, मोबाइल उनके पेट पर रखा था ट्रेन स्पीड पकड़ती इसके पहले उचक्का उनका मोबाइल ले उड़ा. तब से विंडो से तौबा कर ली. तभी नवल का फोन बज उठा, कोई और साथी लोकेशन ले रहा था. ट्रेन सरकने लगी थी. कोच नंबर बताने का वक्त नहीं था. एक साथी ने झट से रुमाल निकाली और विंडो पर बैठे अजनबी को थमाते हुए बोला भाई साहब हाथ निकाल कर रुमाल हिलाते रहिए और लाकेशन लेने वाले से बोला सफेद रुमाल दिखे उसी कोच में चढ़ जाओ. अब ट्रेन स्पीड पकड़ चुकी थी. तभी उन्हें अपने मिसिंग साथी की याद आई. अरे, धीरू नहीं आया? फोन लगाओ. जाने दो... आजकल उनके..? साथ बैठता है दूसरे कोच में. फिर शुरू हुआ लतीफों का सिलसिला. बीच में जहीर भाई मोहम्मद रफी के अंदाज में सुरीली तान छेड़ देते थे. साथ में एक लेडी कलीग थीं सो लतीफे संभाल कर दागे जा रहे थे. एमएसटी मंडली कुछ देर के लिए गभीर भी हुई जब पता लगा कि एक साथी के फादर बहुत बीमार हैं.
तभी किसी ने कहा अच्छा सिगरेट निकालो. क्या बात कर रहे हो भाई.. ३१ मई यानी नो टोबैको डे को ही छोड़ दी, एक हफ्ता हो गया छोड़े.. किसी ने टिप्पणी की... भाई ने तीसरी बार छोड़ा है. अब ट्रेन फुल स्पीड में थी. उमस थोड़ी कम हो गई थी. लोग एडजस्ट हो चुके थे. जहीर भाई ने फिर मूड में थे.. मैं पल दो पल का शायर हूं.. पल दो पल मेरी जवानी है.. और जिंदगी अपनी रफ्तार में थी.

6/1/09

नो टोबैको डे और 'भूत'



आपने कभी सुना है कि भूत भी छुट्टी पर रहता है और भूतों में भी 'भइया' होते हैं. आपके जमाने में नहीं होता होगा लेकिन मार्डन भूत कैजुअल लीव पर रहते हैं और वीकली ऑफ भी मनाते हैं. ऐसे ही भूत से मेरा पाला पड़ा ३१ मई को. इस दिन यानी संडे को नो टोबैको डे था. मेरा आर्गनाइजेशन सामाजिक सरोकारों से जुड़े अभियानो में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेता है. सो नो टोबैको डे पर हमने भी रैली निकाली. शहर की कई संस्थाओं ने इसमें उत्साह के साथ हिस्सा लिया. एक और आर्गेनाइजेशन जो इस अभियान में हमारे साथ आया उसका नाम था 'हॉन्टेड हाउस' यानी भूत की हवेली. हर शहर-गांव में एक दो ऐसी कोठियां या खंडहर जरूर होते हैं जो भूतिया या अभिशप्त कहलाते हैं. लखनऊ के पॉश मार्केट हजरतगंज में भी एक 'हॉन्टेड हाउस' है. अब इसमें भूत तो होंगे ही. लेकिन ये भूत नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि लोगों का मनोरंजन करते हैं. सो नो टोबैको डे पर 'हॉन्टेड हाउस' भी हमारे साथ आया और रैली में भाग लेने के लिए दो भूत देने की इच्छा जताई. सिगरेट-पान मसाला के नतीजे खौफनाक होते हैं सो इस मैसेज को देने के लिए भूत से बेहतर कौन हो सकता है. हम तैयार हो गए. रैली शुरू होने वाली थी और भूत नदारद. अब ये असली भूत तो थे नहीं कि अचानक कहीं भी प्रकट हो जाएं. एक रिपोर्टर को दौड़ाया गया कि जाकर देखो भूत कहां रह गए. रिपोर्टर थोड़ी देर बाद लौटा लेकिन एक भूत के साथ. मैंने भूत से पूछा, दूसरा कहां है? भइया आज उसकी छुट्टी है. यार पहले बताना था. खैर, तुम्हारा नाम क्या है? भइया. असली नाम? सब मुझे भइया ही कहते हैं. ठीक है तैयार हो जाओ. इसके बाद भइया भूत ने सड़क पर 'नो टोबैको' की तख्ती लेकर जो पिशाच डांस किया वो देखने लायक था. मुझे लगा भूत एक हो या दो, इम्पैक्ट समान होता है.

5/12/09

फुफ्फा फिर रिसिया गए




कहते हैं शराब जितनी पुरानी होती है उतना ही मजा देती. लोग कहते हैं स्कॉच जितनी पुरानी होती जाती है उसका महत्व उतना ही बढ़ता जाता है. शराब में जो दर्जा पुरानी स्कॉच का है, रिश्तेदारों में वही दर्जा जीजा का है. फर्क बस इतना है कि जीजा जब पुराने हो जाते हैं तो फुफ्फा (फूफा) बन जाते हैं. लेकिन इम्पार्टेंस की इंटेसिटी वैसी ही रहती है. यह जरा सी भी कम होती दिखती है तो फुफ्फा रिसिया कर (नाराज हो कर) उसे जता देते हैं. जैसे स्कॉच का सुरूर धीरे धीरे चढ़ता है वैसे ही फुफ्फा की नाराजगी भी हौले-हौले बनी रहती है लेकिन उतनी नहीं की वो बेकाबू हो जाए. शादी-बारात और घर का कोई भी बड़ा आयोजन जीजा या फूफा के बिना अधूरा होता है. और जिसमें फुफ्फा रिसियाएं ना वो शादी कैसी. जैसे अदरक जब पुरानी या सूख जाती है तो सोंठ कहलाती है. उसी तरह दामाद जब पुराना हो जाता है तो फूफा कहलाता है. फूफा यानी घर का पुराना दामाद. वैसे शादी-ब्याह में अब समाजवाद आ गया है. शादी में घराती और बाराती में बहुत अंतर नहीं रह गया है. वधू पक्ष के रिश्तेदार अब अपने को वर पक्ष के रिश्तेदारों से किसी माने में नीचा नहीं समझते. शहर की शादियों में बारात आने में जरा देर हुई नहीं कि लड़की पक्ष के गेस्ट भोजन पर टूट पड़ते हैं. बाद में दूल्हे के यार दोस्त दरवाजे पर कितना ही नागिन डांस करें और जयमाल में नखरे दिखाएं , उन्हें देखने के लिए मुïी भर लोग ही बचते हैं. बाकी सब भोजन भट्ट बुफे फील्ड में नजर आते. ऐसे में गले में गेंदा फूल की माला डाले जीजा और फूफा घूमा करें, कोई उन्हें नहीं सेटता. घराती उन्हें ठेल-ठेल कर आगे से कचौड़ी और पूड़ी उचक ले जाते हैं. बस फूफा नाराज. जीजा-फूफा घराती हों या बाराती, अगर किसी ने पानी नहीं पूछा तो नाराज, उनके ठहरने का अलग से प्रबंध नहीं किया तो नाराज, उनका ठीक से इंट्रोडक्शन नहीं कराया तो नाराज, ठीक से विदाई नहीं दी तो नाराज. और तो और फूफा खा म खा बिना बात के नाराज. कई पुरायठ फुफ्फा तो रंग में भंग के लिए पहचाने जाते हैं. शादियों में एक से एक लजीज पकवान बने हों लेकिन फूफा की हांड़ी अलग से चढ़ती है और जरा सी लापरवाही हुई नहीं कि फूफा का चूल्हा अशुद्ध. इसके लिए अलग से एक आदमी तैनात किया जाता है कि घर के लड़के-गदेले उधर ना जाएं जिधर फूफा की हांड़ी चढ़ी होती है. वह आदमी चिल्ला-चिल्ला कर आगाह करता रहता है कि उधर नहीं जाओ फुफा खाना पका रहे हैं. गलती से गुजरे नहीं कि फूफा रिसियाए. फूफा अक्सर रिसियाए हुए ही विदा होते हैं. यह नाराजगी अगले किसी शुभ आयोजन में ही मान-मौव्वल के बाद दूर हो पाती है. लेकिन उस नए आयोजन में फुफ्फा फिर से रिसिया जाते हैं. अरे.. अरे.. उधर कहां, फुफ्फा रिसिया जाएंगे?

5/11/09

लाइफ इज ब्यूटीफुल




एक छोटी सी बच्ची. उम्र करीब चार साल. सैलून में अपने बाल कटवा रही थी. साथ में शायद उसके दादा या नाना थे. जैसा कि बच्चों के साथ होता है वह बाल कटाते हुए कम्फर्टेबल नहीं थी. सिर झुकाए कस कर आंख बंद किए हुए. बीच बीच में दबी सी आवाज...अब बस हो गया, डर लग रहा है. मम्मी के पास जाना है. नाना उसे बीच-बीच में डपट रहे थे ...किस चीज से डर लग रहा है. चुपचाप बैठो नहीं तो यहीं छोड़ दूंगा. मैंने उसके डर को डायवर्ट करना चाहा.. अरे ये तो बहादुर बच्ची है. कितना स्टायलिश बाल कट रहे हैं. शीशे में देखना कितनी स्मार्ट दिख रही हो. उसके नाना जी बोल पड़े.. अंकल को नमस्ते करो और बताओ कि दिल्ली के किस स्कूल में पढ़ती हो. उसने आंख बंद किए किए नन्हे हाथों से नमस्ते किया .. थोड़ी तोतली आवाज में बोली... आरकेपुरम ब्लाइंड स्कूल फार चिल्ड्रेन. ..अच्छा बताओ बिल्ली कैसे बोलती है? ..मियाऊं.. और बच्ची धीरे से मुस्करा दी. मैंने ध्यान से उस बच्ची को देखा. उसकी आंखें बंद थीं. लेकिन उसकी मन की आंखों तो दूसरे बच्चों की तरह ही थीं. उनमें डर और संवेदना थी तो सपने भी थे, खुशियां थीं, उम्मीदें थीं. जिंदगी वहां भी मुस्करा रही थी, किसी दूसरे बच्चों की तरह. जाने के बाद बार्बर ने बताया कि इस बच्ची को बाबू जी ने अनाथालय से गोद लिया है और उसे दिल्ली के बोर्डिंग स्कूल में रख कर पढ़ा रहे हैं. उस छोटी सी बच्ची ने मेरे मन की आंखें खोल दी थीं. मन के आकाश पर छाई धुंध कुछ कम हो गई थी. मैं राजा-तुम रंक, मैं बड़ा-तुम छोटे, मैं ज्ञानी, तुम मूरख, मेरा-तेरा और भी न जाने कितनी मृग मारीचिकाओं में फंसे हम जिंदगी के छोटे-छोटे लेकिन खूबसूरत लमहों को क्यों नहीं देख पाते, नहीं महसूस कर पाते?

5/7/09

तिनका-तिनका, ज़रा-ज़रा






चिडिय़ा, गौरैया, परिंदे, फाख्ता, घोसले, इनकी कहानियां ब्लॉग्स में भरी पड़ीं हैं. ज्यादातर ब्लागरों के परिंदे कल्पना और संवेदना की उड़ान भरते दिखते हैं. आज आपको सुनाता हूं आंखों देखी एक सच्ची कहानी. पहली मंजिल पर मेरे कमरे की खिड़की से सटा हुआ एक आम का पेड़ है. खिड़की और पेड़ की शाखाओं में बस दो हाथ का फासला. उस पर ढेर सारे परिंदे रोज आते हैं. छोटी ललमुनिया, बुलबुल से लेकर बाज, कौवे और उल्लू तक. बात एक साल पहले की है. पेड़ुकी (फाख्ता) के एक जोड़े ने न जाने क्या सोच कर मेरी खिड़की से लगी डाल पर एक घोसला बनाया था एक-एक तिनका जोड़ कर बड़ी मेहनत से. उस डाल पर बैठ फाख्ता घंटों टेर लगाते रहते थे. लगता थे कि आपस में बातें कर रहे हों. उन्हें निहारने को रोज कुछ मिनट निकाल ही लेता था.
खिड़की में जाली थी इस लिए शायद फाख्ता को मुझसे डर नहीं लगता था. फिर एक दिन उसमें दो अंडे दिखे. मेरी रुचि थोड़ी बढ़ गई. फाख्ता बारी बारी से उस पर बैठते थे. फिर एक दिन घोसले से चीं-चीं की आवाज से पता लगा कि अंडों से बच्चे निकल आए हैं. दोनों फाख्ता बारी-बारी से बच्चों को चुगाते थे. बच्चे तेजी से बढऩे लगे और उनके साथ मेरी रुचि भी. अब उनके पंख निकल रहे थे. इस हैप्पी फेमिली को देख कर सारी थकान दूर हो जाती थी. रात को एक फाख्ता जो शायद उनकी मां थी, घोसले में जरूर रहती थी. एक दिन रात दस बजे के करीब कमरे में बैठा टीवी देख रहा था कि पत्तों की तेज खड़खड़ाहट और पंखों की फडफ़डा़हट ने चौंका दिया. कुछ अनिष्ट की आशंका से खिड़की के बाहर देखा तो अंधेरे में कुछ नजर नहीं आया. घोसले पर टार्च डाली तो दोनों बच्चे सहमें से दुबके थे लेकिन फाख्ता गायब थी. सुबह भी सिर्फ बच्चों को दख कर चिंता बढ़ गई. थोड़ी देर में फाख्ता दिखी लेकिन शायद वह बच्चों की मां नहीं पिता था. कुछ देर घोसले में बैठने के बाद उड़ गया. अगली रात भी घोसले में सिर्फ बच्चे ही दिखे. शायद किसी बाज या उल्लू ने उनकी मां को निवाला बना लिया था. अगली सुबह घोसले में सिर्फ एक बच्चा था और कोई फाख्ता नहीं. दो दिन बाद वह भी नहीं दिखा. घोसला सूना हो गया था. बचे थे सिर्फ तिनके. धीरे-धीरे कर कौवे और कबूतर उन तिनकों को ले गए अपना घोसला बनाने. इस तरह एक घोसला उजड़ता देख मन भारी हो गया. कुछ दिनों बाद एक सुबह उसी दरख्त की किसी डाल पर फाख्ता के एक जोड़े की टेर सुनाई दी. कहीं कोई परिन्दा फिर से घोसला बना रहा था. पास ही फोन के खंभे में लगे जंक्शन बाक्स में गौरैया दाना लेकर आ- जा रही थी अंदर उसके बच्चे शोर मचा रहे थे. वो सहर मुझे कुछ खास लगी, रात के बाद उम्मीदों की सुबह फिर अंगड़ाई ले रही थी.

5/5/09

सुअर सकते में, मुर्गे मस्त!


मुर्गे मस्त हैं. बटेर, बत्तख, टर्की और पूरे पक्षी समाज में हर्ष की लहर है. मुर्गा एसोसिएशन ने डिस्काउंट ऑफर तक दे दिया है. मुर्गों ने मुर्गियों से और ज्यादा अंडे प्रोड्यूस करने का अपील की है. दो अंडे के साथ एक अंडा फ्री देने का भी प्रस्ताव है. मुर्गे खुश हैं कि इस बार बर्ड फ्लू के कारण बेमतलब मुर्गा संहार नहीं होगा. लेकिन सुअर समाज सकते में है. साउथ ईस्ट एशिया में रेड एलर्ट जारी कर दिया गया है. ठंडे देश के स्वाइन से मेलजोल कम रखने की सलाह दी गई है. पूरी दुनिया इस समय अल कायदा और तालिबान से उतनी दहशत में नहीं है जितनी स्वाइन फ्लू से. बर्ड फ्लू तो पुरानी बात हो गई, लोग अब इससे चिंतित नहीं होते. हां मुर्गे-मुर्गियां जरूर टेंशन में आ जाते थे. मुर्गे की जान जाती और लोगों को खाने में मजा भी नहीं आता. लेकिन 1918 के बाद अब आया है नया फ्लू. मामला स्वाइन फ्लू का है. कुछ लोगों को नहीं पता था कि यह स्वाइन क्या बला है. उन्हें लगता था कि यह स्वाइन कोई बहुत डरावना जीव होता होगा लेकिन जब पता चला कि गली - मोहल्ले में टहलने वाले सुअर को ही स्वाइन कहते हैं तो टेंशन थोड़ा कम हुआ. लेकिन स्वाइन शब्द से सुअरों को कम, कुछ पशु प्रेमियों को ऑब्जेक्शन ज्यादा है. सो सुअर फ्लू की जगह एच1एन1 वायरस ही चलेगा. डब्लूएचओ ने स्वाइन लू को लेकर लेवल-5 के खतरे का साइरन बजा दिया है. इसके बाद तो महामारी का ही ऐलान होगा. जहां तक इंडियन स्वाइन की बात है वे सकते में हैं. स्वाइन समाज ने लोगों से सलामी और सॉसेजेज से परहेज करने की अपील की है. स्वाइन फैमिलीज ने गर्मियों में हिल स्टेशन जाने का इरादा टाल दिया है. बताया गया है कि ठंडे क्षेत्र में एच1एन1 वायरस आसानी से फैलता है. हांलाकि अभी तक कहीं से स्वाइन समाज के सामूहिक संहार की खबर नही आई है. लेकिन अगर स्थिति काबू में नहीं आई तो बड़ी संख्या में सुअरों को भी शहीद होना पड़ सकता है. इंडियन सुअर यूनियन यूरोपीय, मैक्सिकन और अमेरिकी सुअर भइयों के लिए प्रार्थना सभाएं आयोजित कर रही है क्योंकि उनकी सुरक्षा में ही इनकी सुरक्षा है. जान है तो जहान है.

4/30/09

लू का संगीत


लू में है लय, लू में है संगीत, लू में है एक अजीब सी रूमानियत. लू में खिलते हैं चटख गुलमोहर और अमलताश. जब छोटा था तो लू पूरे महीने चला करती थी. अब मुश्किल से 15 दिन भी नहीं चलती. पहले गर्मी की छ़ुट्टियों का मतलब होता महीने भर लू में मस्ती. लू भरी दोपहरी हमेशा से लुभाती थी. लू में बर्फ के गोले, कुल्फी और नारंगी आइस्क्रीम वाले की आवाज कोयल की कूक सी लगा करती थी. जब लू चले तो हम चलते थे सुनसान दोपहरी में किसी की बगिया से अमिया तोडऩे. क्या एक्साइटमेंट और थ्रिल था. नमक के साथ टिकोरा (अमिया, केरियां) खाने में जो मजा था वो दशहरी, लंगड़ा और मलदहिया में भी नही मिलता. लू कभी कभी लप्पड़ भी मारती थी. सीजन में कए दो-बार लू जरूर लगा करती थी. डाट पड़ती थी कि बहेल्ला (आवारा ) की तरह दोपहर भर घूमता रहता है लू तो लगेगी ही. फिर उपचार के लिए आम का पना मिलता था. उसके आगे दुनिया की हर कोल्ड ड्रिंक फेल. इसके बाद दो-तीन दिन में सब सामान्य. फिर निकल पड़ते थे लू में. बड़े कहा करते थे कि लू की दुपहरिया में सुनसान बगिया में न जाया करो चुड़ैल या प्रेत भी होते हैं वहां. उसके कई किस्से सुनाए जाते थे कि फलनवां को गूलर के पेड़ पर झूलती मिली थी चुड़ैल. मुझे आजतक न पे्रत मिले न चुड़ैल. नाम के आगे ओझा जुड़ा है शायद इस लिए. हॉस्टल में था तो भी लू रोमांटिक फिल्म का सीन लगा करती थी. ऊपरी मंजिल पर टेन बाई टेन का कमरा खूब तपा करता था. मेरा रूम पार्टनर चाय बनाकर कहा करता था- इसे पीयो लू नहीं लगेगी. लू और भी कई कारणों से अच्छी लगती है. लू में मच्छर कम हो जाते हैं, लू में पसीना नहीं होता, घमौरियां नहीं होती, राते ठंडी होती हैं. लू में मटके के पानी की सोंधी महक अमृत का एहसास कराती है. लू में खरबूजा और तरबूज बहुत मीठा होता है. लू में कोहड़े (कद्दू) की सब्जी, कच्चे आम और पुदीने के चटनी के आगे सब आइटम पानी भरते हैं. पर अब न जाने क्यूं लू कम चला करती है. अब सड़ी गर्मी ज्यादा पड़ा करती है. सुना है लू रूठ कर चली गई है राजस्थान की ओर. लेकिन यदा कदा अब भी कुछ दिनों के लिए आती है. बीते दिनों की याद दिलाती है

4/24/09

ऐज़ डेडली ऐज़ ड्रोन




डंडा, लकड़ी, बांस, बत्ती, अंगुली और मिर्ची, इनका प्रयोग अचानक बढ़ क्यों गया है. हरकोई डंडा, बांस, लकड़ी और मिर्ची लिए घूम रहा है और जरा सी बात पर उसके सदुपयोग पर उतारू हो जाता. कोई डंडा कर रहा है, कोई बांस और किसी को तो लकड़ी करने में ही आनंद आ जाता है. और तो और लोग बात-बात में उंगली करते फिरते हैं. आम आदमी के पास आजकल ये कुछ ऐसे हथियार आ गए हैं जिनका निशाना ड्रोन की तरह अचूक है. एक बार छोड़ दिए गए तो निशाने पर लगते जरूर हैं. जैसे आजकल सबसे निरीह क्षेत्र स्वात वैली है, जिसको देखो वही घुसा जाता है. उसी तरह लोग डंडा, लकड़ी, बांस को शरीर के सबसे निरीह क्षेत्र पर टारगेट किए रहते हैं. फर्क बस इतना है कि स्टील्थ बॉम्बर की तरह यह दिखाई नहीं देता, बस इसका असर महसूस किया जा सकता है. यदाकदा निशाना चूक भी जाता हैं और डंडा करने वाले को जवाब मिलता है 'बत्ती बना लो'. इसका असर लैंड माइन्स की तरह होता है और 'बत्ती' इग्नाइट हो गई तो इम्पैक्ट झेलना ही होता है. इसी तरह मिरची भी मुझे अचानक बहुत खूबसूरत लगने लगी है. पहले सिर्फ खाने में प्रयोग होता था अब गाने और लगाने में भी होता है. इस नाम के एफएम चैनल भी है. आप भले ही मिर्ची ना खाते हो लेकिन मिर्ची लगती जरूर है न लगे तो लोग कह कर लगवा देते हैं और इसका रंग लाल होता है. लाल मिर्ची भी इतने किस्म की होती है यह अब पता चला. पहले कश्मीरी लाल मिर्च और पहाड़ी मिर्च ही सुनी थी, अब देग्गी मिर्च और तीखा लाल भी मैदान में है. इन मिर्चों का खरीदने की जरूरत नहीं है. आपकी जुबान ही काफी है. आप कह भर दीजिए कि मिर्ची क्यों लग रही है? बस दूसरे पर असर तय है. नहीं लग रही हो तो भी लग जाएगी. निश्चिंत रहिए. मेरे पास इस समय ना तो बांस है ना लकड़ी और ना ही मिर्ची. मैं तो बस यूं ही लोगों की बात कर रहा था. वैसे एक राज की बात बताऊं वैसे कोई बांस या लकड़ी का प्रयोग करे तो आप 'बत्ती' वाला अस्त्र चला दीजिए, बिल्कुल 'पैट्रियाट' मिसाइल की तरह हमलावर की मिसाइल पर असर करेगा.

4/23/09

बुरे फंसे दूल्हे राजा


चुनाव में बुरे फंसे दूल्हे राजा। ना कार ना बाजा। खबरें तो कुछ ऐसी ही आ रही हैं. चुनाव वाले जहां कार देख रहे हैं, झट से छीन कर चुनाव ड्यूटी में लगा दे रहे हैं. और अक्षय तृतीया के चलते बैंड बाजे वालों की एक एक दिन में तीन-तीन पारियां बुक हैं. बड़ी मारा मारी है. पॉलिटिकल कैंडीडेट के चक्कर में शादी के कैंडीहडेट्स की वॉट लगी जा रही है. साइत ना निकले इस लिए कुछ तो करना ही है. सो कुछ ने नगाड़ा और पिपिहरी वाले कड़कड़उआ बाजा पार्टी बुक करा ली है. इस क्राइसिस में मुझे एक रेस्क्यू ऑपरेशन याद आ रहा है. मेरे घर नई स्कूटर लैंब्रेटा आई थी. मेरे गांव उपरौड़ा में कजिऩ की शादी थी. मेरा गांव इलाहाबाद से 35 किलोमीटर ही दूर था. बस दाब दी लैंब्रेटा. बराती तैयार, बाजा वाला तैयार लेकिन टैक्सी वाला गच्चा दे गया. समय निकला जा रहा था. दूसरी कार का प्रबंध नहीं हो पा रहा था. किसी ने कहा टेम्पो करो. लेकिन उसमें टाइम लगता सो लोगों की नजर मेरे नए स्कूटर पर पड़ी. तय हुआ दूल्हा इसी पर जाएगा. फिर क्या था मौर (मुकुट) और जोरा-जामा (पादरियों के गाउन की तरह लगने वाला वस्त्र) पहने दूल्हे राजा पिछली सीट पर विराज गए. झोरा-झामा के कारण दूल्हा लड़कियों की तरह एक ही तरफ पैर कर के बैठा था. आगे-आगे कड़कड़उआ बैंड उसके पीछे मेरी मंद गति से रेंगती स्कूटर पर सवार दूल्हे राजा. क्या नजारा था. पट्टीदार इस जुगाड़ से थोड़ा चिढ़े हुïए थे लेकिन उस समय गर्व से मेरा सीना चौड़ा हुआ जा रहा था. अब होता तो ये गाना याद आता...बाराती गारी देवैं, देवरजी स्कूटर खेवैं ससुराल गेंदा फूल...ओए होएं॥ होएं॥ओए होएं..होएं..

3/26/09

स्लम डॉग ओसामा




पूरी दुनिया के लिए लादेन भले ही खतरा हो लेकिन मीडिया के लिए बड़े काम का है. टॉप रैंकिंग चैनल्स के पास जब कुछ नहीं होता तो उन्हें लादेन याद आता है. वही बलूचिस्तान की गुफाओं और अफगानिस्तान की पहाडिय़ों में लकड़ी लिए घूमता लादेन, ओबामा और कियानी को बीच बीच में लकड़ी करता लादेन. असली स्लम डॉग मिलिनेयर तो ओसामा बिन लादेन है. अरबपति होते हुए भी कुकुरों की तरह खोह में लुका हुआ है. वह रात में कभी कभी लुक्कारी खेलता है जैसा कि मेरे गांव उपरौड़ा और ससुराल शुकुलपुर में रात में भूत लोग आग से लुक्कारी खेलते हैं. चैनल वाले तो रोज ही रात को ओसामा को लेकर लुक्कारी खेलते हैं. वैसे ओसामा मीडिया फ्रेंडली है. कुछ भी दिखाओ बुरा नहीं मानता. बीच बीच में ई-मेल भेजता रहता है और कभी-कभी बाइट के साथ वीडियो फुटेज भी. उसे लेकर चैनल्स में सिर फुटौवल होती है कि सबसे पहले मेल उसे भेजा. सुना है इंडिया टीवी के रजत शर्मा के पास ओसामा का लेटेस्ट मेल आया है. रजत जी ने ओसामा के कहने पर अपना हेयर स्टाइल थोड़ा बदला है और रजत जी के कहने पर ओसामा ने अपनी लाइफ स्टाइल बदली है
मुझे लगता है लादेन किसी दिन रजत शर्मा की आपकी आदलत में बैठा मिलेगा और अदालत के जज होंगे नरेंद्र मोदी. वैसे लादेनवा मीडिया वालों के लिए बड़े काम की चीज है. जब कोई खबर न हो तेा चला दो लादेन को. कुछ भी दिखाओ बुरा नहीं मानता. ना ही कोई कंट्राडिक्शन भेजता है. सुना है लादेन ने अब रामदेव के योगा शिविर में ज्वाइन किया है. बाबा उसे गुफा में कपाल भाती और मुल्ला उमर को अनुलोम विलोम सिखा रहे हैं

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