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6/15/09

झूठ बोले कुत्ता काटे.



न तो मैं नगर निगम की डॉग कैचर स्क्वाड में हूं न पशु प्रेमी और ना ही पशुओं के प्रति हिंसा का भाव रखता हूं. आवारा कुत्ते हों या किसी घर के दुलारे स्वान, उनके प्रति तटस्थता का भाव ही रहता है. मैं एक आम आदमी हूं जिसे कभी पैदल, कभी साइकिल से तो कभी स्कूटर से सड़कों पर रोज ही गुजरना पड़ता है और जो किसी कुत्ते या उनके झुंड को आसपास देखते ही एक अनजाने भय और रोमांच से घिर जाता है. क्योंकि अलग अलग परिस्थितियों में कुत्तों को पुचकारने और दुत्कारने के फारमूले आजमा चुका हूं लेकिन दोनों का इफेक्ट सेम होता है यानी कुत्तों को जो करना हैं करेंगे. कई बार कुत्ते काटते काटते रह गए और दो बार डॉग बाइट झेल चुका हूं. दोनों ही बार मुझे 'लूसी' ने ही काटा. 'लूसी' मेरे एक अजीज मित्र की दुलारी .....? थी. कुत्तों की वाइफ को क्या कहते हैं, आप जानते ही होंगे लेकिन मित्र उस शब्द का प्रयोग करने पर नाराज हो जाते थे सो 'लूसी' ही ठीक है. मित्र के घर जाने पर इंश्योर करवाता था कि 'लूसी' आसपास ना हो लेकिन फिर भी उस कम्बख्त ने दो बार काटा. पिछले जनम की कोई खुन्नस रही होगी. मैंने दोनों बार सिंगल डोज के महंगे एंटी रैबिक इंजेक्शन ठोंकवाए. ऐसे ही एक दिन मित्र के यहां पहुचा. कॉलबेल बजाने पर 'लूसी' के भूंकने की आवाज नहीं आई. लगा कि आज जरूर उसी सोफे के नीचे दुबक कर बैठी होगी जहां से निकल कर दो बार मुझे काट चुकी है. मित्र मुहं लटकाए निकले, मैं सहमा सा ड्राइंगरूम की तरफ यह कहते हुए बढ़ा कि 'लूसी' को बांध दो. तभी भाभी जी की उदास आज आई, भाइया 'लूसी' कहीं चली गई है. चली गई मतलब? कोई उसे उठा ले गया. अरे अड़ोस पड़ोस के कुत्तों के साथ होगी, आ जाएगी. नहीं भइया सुबह से है गायब है. इन्होंने तो तब से एक निवाला मुंह में नहीं डाला है.
शाम के सात बज रहे थे. मित्र का परिवार बिना खाए पीए बैठा था लेकिन मुझे लगा रहा था कि अचानक किसी ने मेरे मुहं में गुलाब जामुन डाल दिया हो, खुशखबरी सुना दी हो. लेकिन खुशी को भरसक दबाते हुए मैंने भी सहानुभूति जताई कि कैसे पूरे घर को गुलजार रखती थी. अब कितना सूना लग रहा है. लेकिन उम्मीद मत छोड़ो रातबिरात शायद लौट आए. अगले दिन सुबह ही मित्र को फोन कर पता किया कि लूसी लौटी कि नहीं. लूसी अब तक नही लौटी थी. जिसने भी लूसी को गायब किया था उसके प्रति मन श्रद्धा से भर गया. मित्र के प्रति भी सहानुभूति थी लेकिन ये भी पता था कि कुछ दिन में वो दूसरा स्वान ले ही आएंगे. इसके बाद मैं निर्भय होकर मित्र के घर लाने लगा. जैसा फील किया सच सच बता दिया. झूठ बोलूं तो कुत्ता काटे. ये तो है पहली कड़ी. अगली कड़ी में कलुआ की कहानी.

6/11/09

जरा बचके जरा हट के...ये है इंडिया मेरी जान



ये है जिब्राल्टर का एअरपोर्ट. भौगोलिक स्थिति ऐसी कि हाई-वे और एअरपोर्ट रन-वे एक दूसरे को क्रास करते हैं. अब से रेलवे की लेवल क्रासिंग तो है नहीं कि सब-वे या ओवरब्रिज से काम चल जाएगा सो वर्केबल सॉल्यूशन यही निकाला गया कि जब प्लेन टेकऑफ या लैंड कर रहा हो तो हाई-वे बंद कर दिया जाए और जब रोड चालू हो तो रन-वे बंद. वहां ये व्यवस्था अभी तक तो ठीक से काम कर रही है और कोई हादसा नही हुआ. अब जरा उस स्थिति की कल्पना कीजिए कि अगर ये व्यवस्था भारत के किसी शहर में होती खास कर यूपी और बिहार में तो नजारा कुछ ऐसा होता...
सीन एक... प्लेन टेकऑफ करने वाला है, रोड का बैरियर गिरा हुआ है. वहां तैनात गार्ड या सिपाही लघुशंका करने या पान मसाला लाने गया हुआ है. कुछ मोटर साइकिल और स्कूटर वालों ने अपने वाहनों को तिरछा कर या लिटा कर बैरियर के नीचे से निकलने में सफलता पा ली है और चक्कर में हैं कि प्लेन निकलने से पहले रन-वे के उस पार पहुंच जाएं. तीन-चार लोग निकल भी चुके हैं और एक दूधिया जिसकी मोटर साइकिल पर दूध के कैन बंधे हैं, रनवे के बिल्कुल पास रुक कर प्लेन के निकलने का इंतजार हर रहा है.
सीन दो...
रोड के बैरियर गिरे हुए हैं. रन-वे पर प्लेन टेकऑफ के लिए दौडऩे लगा है कि अचानक प्लेन के आगे-आगे एक गाय और उसके पीछे - पीछे दो सांड़ दौड़ते दिखते हैं
सीन तीन...
फ्लाइट का टाइम हो गया है लेकिन रन-वे क्लीयर नहीं है. ठीक रन-वे को क्रास करने वाली रोड पर वसूली को लेकर ट्रैफिक पुलिस कांस्टेबल का ट्रक और टेम्पो वालों से झगड़ा हो गया है. और उन्होंने अपने वाहन अड़ा कर जाम लगा दिया है और वाहनों की कई मील लंबी कतार लग गई है.
ऊपर वाले का शुक्र है कि भारत में इस तरह की क्रासिंग नहीं है. अगर होती तो रन-वे पर टेम्पो दौड़ते और बोइंग ७४७ क्रासिंग पर डग्गामार बसों की तरह रुक कर सवारी भरते नजर आते.

6/8/09

ट्रेनों में गूंजता संगीत...


समर वेकेशंस, झुलसाती गर्मी और उसमें रेलयात्रा. सोचकर ही पसीना छूटने लगता है. लेकिन कभी आपने महसूस किया है कि रेल और इसकी भीड़ के रेले में भी एक रिद्म है. तो आइए आज आपको इस रिद्म से निकलते संगीत को सुनाएं. बोगियों के भीतर गूंजता संगीत, प्लेटफार्म पर सरकता संगीत. अब ये आप पर है कि आपका 'सेंसर' इस रेडियो की कौन सी फ्रीक्वेंसी पकड़ता है.
आपको मिलवाते हैं रेलवे के रोडीज, जॉकी और रॉकी से. ये सब हैं डेली पैसेजर्स यानी रोज मिलने वाले वे चेहरे जिन्हें देख कर सामान्य यात्री टेंशन में आ जाते हैं पर इन कम्यूटर्स के माथे पर शिकन तक नहीं. भागती-धक्का खाती कभी गुर्राती, कभी मुस्कराती इस कम्युनिटी के पास होता है एमएसटी. एमएसटी बोले तो 'मैनेजमेंट का सीजन टिकट'. क्योंकि ये टिकट उन्हें सिखाता है टाइम मैनेजमेंट, सोशल नेटवर्किंग और उन्हें बचाता है मोनोटोनस लाइफ की ऊब से.
एक बार मैंने भी अपने में एक एमएसटीहोल्डर मित्र के साथ यात्रा की उन्हीं के अंदाज में. यात्रा क्या पूरे दो घंटे की फिल्म थी. एमएसटीहोल्डर्स के रूप में इसमें कई किरदार मिले. कहीं राजू श्रीवास्तव, कहीं जसपाल भट्टी, कहीं मोहम्मद रफी, कहीं बशीर बद्र तो कहीं मुकेश.
फिल्म की शुरुआत हुई मोबाइल कॉल से. नवल भाई, किस ट्रेन से जाते हो? इंटरसिटी से... आज मैं भी चलूंगा तुुहारे साथ.. वेलकम सरजी.. स्टेशन पहुंच कर काल करते हैं.. 8.10 पर ट्रेन है. मैं आधा घंटे पहले स्टेशन पहुंच गया. इंक्वायरी बोर्ड पर कुछ नहीं लिखा था, कुली ने बताया इंटरसिटी छह नंबर से जाती है. 8.05 पर नवल भाई का फोन आया, कहां हैं? छह नंबर पर खड़ा हूं. अरे.. ट्रेन तो आ गई..तीन नंबर पर आइए, ट्रेन में हूं. ये कैसी व्यवस्था है, कोई एनाउंसमेंट नहीं, ऐसे तो ट्रेन छूट जाती. मैं प्लेटफार्म नंबर तीन की ओर भागा. ट्रेन खड़ी थी. गजब की भीड़. फिर फोन किया, नवल कहां हो. इंजन की तरफ आइए, कोच 4463. मैं फोन कान में लगाए बढऩे लगा. आप दिख गए सरजी...बस सामने वाले डिब्बे में चढ़ जाइए. मैं हकबकाया सा सामने वाली कोच में चढ़ गया. भीतर पैर रखने की जगह नहीं. अंदर की तरफ आइए.. मैं यात्रियों ठेलता हुआ धीरे धीरे बढऩे लगा. तभी आवाज आई..मिल गए. मुस्कराते नवल भाई अपनी कम्युनिटी के साथ बैठे थे. बर्थ पर पहले से ही छह लोग थे. सब के सब थोड़ा हिले और मेरे लिए भी जगह बन गई. सबसे इंट्रोडक्शन हुआ..ये हैं ज़हीर भाई. उम्र 55 लेकिन जज्बात टीनएजर्स जैसे, चंदन का इत्र लगाए नफासत की मिसाल. बगल में बैठे थे रवींदर सिंह. पसीने से बचने के लिए कालर में रुमाल लगाए, कम्यूटर्स कम्युनिटी के परमानेंट मेंबर लेकिन पता चला कि साल में छह महीने बिना एमएसटी के डब्लूटी चलते हैं. उनके बगल में ईयरफोन लगाए बैठे थे रियाज भाई. पहले विंडो के पास बैठना पसंद करते थे, लेकिन अब नहीं. कुछ दिन पहले रियाज ईयरफोन लगा आंख बंद किए संगीत का लुत्फ ले रहे थे, मोबाइल उनके पेट पर रखा था ट्रेन स्पीड पकड़ती इसके पहले उचक्का उनका मोबाइल ले उड़ा. तब से विंडो से तौबा कर ली. तभी नवल का फोन बज उठा, कोई और साथी लोकेशन ले रहा था. ट्रेन सरकने लगी थी. कोच नंबर बताने का वक्त नहीं था. एक साथी ने झट से रुमाल निकाली और विंडो पर बैठे अजनबी को थमाते हुए बोला भाई साहब हाथ निकाल कर रुमाल हिलाते रहिए और लाकेशन लेने वाले से बोला सफेद रुमाल दिखे उसी कोच में चढ़ जाओ. अब ट्रेन स्पीड पकड़ चुकी थी. तभी उन्हें अपने मिसिंग साथी की याद आई. अरे, धीरू नहीं आया? फोन लगाओ. जाने दो... आजकल उनके..? साथ बैठता है दूसरे कोच में. फिर शुरू हुआ लतीफों का सिलसिला. बीच में जहीर भाई मोहम्मद रफी के अंदाज में सुरीली तान छेड़ देते थे. साथ में एक लेडी कलीग थीं सो लतीफे संभाल कर दागे जा रहे थे. एमएसटी मंडली कुछ देर के लिए गभीर भी हुई जब पता लगा कि एक साथी के फादर बहुत बीमार हैं.
तभी किसी ने कहा अच्छा सिगरेट निकालो. क्या बात कर रहे हो भाई.. ३१ मई यानी नो टोबैको डे को ही छोड़ दी, एक हफ्ता हो गया छोड़े.. किसी ने टिप्पणी की... भाई ने तीसरी बार छोड़ा है. अब ट्रेन फुल स्पीड में थी. उमस थोड़ी कम हो गई थी. लोग एडजस्ट हो चुके थे. जहीर भाई ने फिर मूड में थे.. मैं पल दो पल का शायर हूं.. पल दो पल मेरी जवानी है.. और जिंदगी अपनी रफ्तार में थी.

6/1/09

नो टोबैको डे और 'भूत'



आपने कभी सुना है कि भूत भी छुट्टी पर रहता है और भूतों में भी 'भइया' होते हैं. आपके जमाने में नहीं होता होगा लेकिन मार्डन भूत कैजुअल लीव पर रहते हैं और वीकली ऑफ भी मनाते हैं. ऐसे ही भूत से मेरा पाला पड़ा ३१ मई को. इस दिन यानी संडे को नो टोबैको डे था. मेरा आर्गनाइजेशन सामाजिक सरोकारों से जुड़े अभियानो में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेता है. सो नो टोबैको डे पर हमने भी रैली निकाली. शहर की कई संस्थाओं ने इसमें उत्साह के साथ हिस्सा लिया. एक और आर्गेनाइजेशन जो इस अभियान में हमारे साथ आया उसका नाम था 'हॉन्टेड हाउस' यानी भूत की हवेली. हर शहर-गांव में एक दो ऐसी कोठियां या खंडहर जरूर होते हैं जो भूतिया या अभिशप्त कहलाते हैं. लखनऊ के पॉश मार्केट हजरतगंज में भी एक 'हॉन्टेड हाउस' है. अब इसमें भूत तो होंगे ही. लेकिन ये भूत नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि लोगों का मनोरंजन करते हैं. सो नो टोबैको डे पर 'हॉन्टेड हाउस' भी हमारे साथ आया और रैली में भाग लेने के लिए दो भूत देने की इच्छा जताई. सिगरेट-पान मसाला के नतीजे खौफनाक होते हैं सो इस मैसेज को देने के लिए भूत से बेहतर कौन हो सकता है. हम तैयार हो गए. रैली शुरू होने वाली थी और भूत नदारद. अब ये असली भूत तो थे नहीं कि अचानक कहीं भी प्रकट हो जाएं. एक रिपोर्टर को दौड़ाया गया कि जाकर देखो भूत कहां रह गए. रिपोर्टर थोड़ी देर बाद लौटा लेकिन एक भूत के साथ. मैंने भूत से पूछा, दूसरा कहां है? भइया आज उसकी छुट्टी है. यार पहले बताना था. खैर, तुम्हारा नाम क्या है? भइया. असली नाम? सब मुझे भइया ही कहते हैं. ठीक है तैयार हो जाओ. इसके बाद भइया भूत ने सड़क पर 'नो टोबैको' की तख्ती लेकर जो पिशाच डांस किया वो देखने लायक था. मुझे लगा भूत एक हो या दो, इम्पैक्ट समान होता है.

5/12/09

फुफ्फा फिर रिसिया गए




कहते हैं शराब जितनी पुरानी होती है उतना ही मजा देती. लोग कहते हैं स्कॉच जितनी पुरानी होती जाती है उसका महत्व उतना ही बढ़ता जाता है. शराब में जो दर्जा पुरानी स्कॉच का है, रिश्तेदारों में वही दर्जा जीजा का है. फर्क बस इतना है कि जीजा जब पुराने हो जाते हैं तो फुफ्फा (फूफा) बन जाते हैं. लेकिन इम्पार्टेंस की इंटेसिटी वैसी ही रहती है. यह जरा सी भी कम होती दिखती है तो फुफ्फा रिसिया कर (नाराज हो कर) उसे जता देते हैं. जैसे स्कॉच का सुरूर धीरे धीरे चढ़ता है वैसे ही फुफ्फा की नाराजगी भी हौले-हौले बनी रहती है लेकिन उतनी नहीं की वो बेकाबू हो जाए. शादी-बारात और घर का कोई भी बड़ा आयोजन जीजा या फूफा के बिना अधूरा होता है. और जिसमें फुफ्फा रिसियाएं ना वो शादी कैसी. जैसे अदरक जब पुरानी या सूख जाती है तो सोंठ कहलाती है. उसी तरह दामाद जब पुराना हो जाता है तो फूफा कहलाता है. फूफा यानी घर का पुराना दामाद. वैसे शादी-ब्याह में अब समाजवाद आ गया है. शादी में घराती और बाराती में बहुत अंतर नहीं रह गया है. वधू पक्ष के रिश्तेदार अब अपने को वर पक्ष के रिश्तेदारों से किसी माने में नीचा नहीं समझते. शहर की शादियों में बारात आने में जरा देर हुई नहीं कि लड़की पक्ष के गेस्ट भोजन पर टूट पड़ते हैं. बाद में दूल्हे के यार दोस्त दरवाजे पर कितना ही नागिन डांस करें और जयमाल में नखरे दिखाएं , उन्हें देखने के लिए मुïी भर लोग ही बचते हैं. बाकी सब भोजन भट्ट बुफे फील्ड में नजर आते. ऐसे में गले में गेंदा फूल की माला डाले जीजा और फूफा घूमा करें, कोई उन्हें नहीं सेटता. घराती उन्हें ठेल-ठेल कर आगे से कचौड़ी और पूड़ी उचक ले जाते हैं. बस फूफा नाराज. जीजा-फूफा घराती हों या बाराती, अगर किसी ने पानी नहीं पूछा तो नाराज, उनके ठहरने का अलग से प्रबंध नहीं किया तो नाराज, उनका ठीक से इंट्रोडक्शन नहीं कराया तो नाराज, ठीक से विदाई नहीं दी तो नाराज. और तो और फूफा खा म खा बिना बात के नाराज. कई पुरायठ फुफ्फा तो रंग में भंग के लिए पहचाने जाते हैं. शादियों में एक से एक लजीज पकवान बने हों लेकिन फूफा की हांड़ी अलग से चढ़ती है और जरा सी लापरवाही हुई नहीं कि फूफा का चूल्हा अशुद्ध. इसके लिए अलग से एक आदमी तैनात किया जाता है कि घर के लड़के-गदेले उधर ना जाएं जिधर फूफा की हांड़ी चढ़ी होती है. वह आदमी चिल्ला-चिल्ला कर आगाह करता रहता है कि उधर नहीं जाओ फुफा खाना पका रहे हैं. गलती से गुजरे नहीं कि फूफा रिसियाए. फूफा अक्सर रिसियाए हुए ही विदा होते हैं. यह नाराजगी अगले किसी शुभ आयोजन में ही मान-मौव्वल के बाद दूर हो पाती है. लेकिन उस नए आयोजन में फुफ्फा फिर से रिसिया जाते हैं. अरे.. अरे.. उधर कहां, फुफ्फा रिसिया जाएंगे?

5/11/09

लाइफ इज ब्यूटीफुल




एक छोटी सी बच्ची. उम्र करीब चार साल. सैलून में अपने बाल कटवा रही थी. साथ में शायद उसके दादा या नाना थे. जैसा कि बच्चों के साथ होता है वह बाल कटाते हुए कम्फर्टेबल नहीं थी. सिर झुकाए कस कर आंख बंद किए हुए. बीच बीच में दबी सी आवाज...अब बस हो गया, डर लग रहा है. मम्मी के पास जाना है. नाना उसे बीच-बीच में डपट रहे थे ...किस चीज से डर लग रहा है. चुपचाप बैठो नहीं तो यहीं छोड़ दूंगा. मैंने उसके डर को डायवर्ट करना चाहा.. अरे ये तो बहादुर बच्ची है. कितना स्टायलिश बाल कट रहे हैं. शीशे में देखना कितनी स्मार्ट दिख रही हो. उसके नाना जी बोल पड़े.. अंकल को नमस्ते करो और बताओ कि दिल्ली के किस स्कूल में पढ़ती हो. उसने आंख बंद किए किए नन्हे हाथों से नमस्ते किया .. थोड़ी तोतली आवाज में बोली... आरकेपुरम ब्लाइंड स्कूल फार चिल्ड्रेन. ..अच्छा बताओ बिल्ली कैसे बोलती है? ..मियाऊं.. और बच्ची धीरे से मुस्करा दी. मैंने ध्यान से उस बच्ची को देखा. उसकी आंखें बंद थीं. लेकिन उसकी मन की आंखों तो दूसरे बच्चों की तरह ही थीं. उनमें डर और संवेदना थी तो सपने भी थे, खुशियां थीं, उम्मीदें थीं. जिंदगी वहां भी मुस्करा रही थी, किसी दूसरे बच्चों की तरह. जाने के बाद बार्बर ने बताया कि इस बच्ची को बाबू जी ने अनाथालय से गोद लिया है और उसे दिल्ली के बोर्डिंग स्कूल में रख कर पढ़ा रहे हैं. उस छोटी सी बच्ची ने मेरे मन की आंखें खोल दी थीं. मन के आकाश पर छाई धुंध कुछ कम हो गई थी. मैं राजा-तुम रंक, मैं बड़ा-तुम छोटे, मैं ज्ञानी, तुम मूरख, मेरा-तेरा और भी न जाने कितनी मृग मारीचिकाओं में फंसे हम जिंदगी के छोटे-छोटे लेकिन खूबसूरत लमहों को क्यों नहीं देख पाते, नहीं महसूस कर पाते?

5/7/09

तिनका-तिनका, ज़रा-ज़रा






चिडिय़ा, गौरैया, परिंदे, फाख्ता, घोसले, इनकी कहानियां ब्लॉग्स में भरी पड़ीं हैं. ज्यादातर ब्लागरों के परिंदे कल्पना और संवेदना की उड़ान भरते दिखते हैं. आज आपको सुनाता हूं आंखों देखी एक सच्ची कहानी. पहली मंजिल पर मेरे कमरे की खिड़की से सटा हुआ एक आम का पेड़ है. खिड़की और पेड़ की शाखाओं में बस दो हाथ का फासला. उस पर ढेर सारे परिंदे रोज आते हैं. छोटी ललमुनिया, बुलबुल से लेकर बाज, कौवे और उल्लू तक. बात एक साल पहले की है. पेड़ुकी (फाख्ता) के एक जोड़े ने न जाने क्या सोच कर मेरी खिड़की से लगी डाल पर एक घोसला बनाया था एक-एक तिनका जोड़ कर बड़ी मेहनत से. उस डाल पर बैठ फाख्ता घंटों टेर लगाते रहते थे. लगता थे कि आपस में बातें कर रहे हों. उन्हें निहारने को रोज कुछ मिनट निकाल ही लेता था.
खिड़की में जाली थी इस लिए शायद फाख्ता को मुझसे डर नहीं लगता था. फिर एक दिन उसमें दो अंडे दिखे. मेरी रुचि थोड़ी बढ़ गई. फाख्ता बारी बारी से उस पर बैठते थे. फिर एक दिन घोसले से चीं-चीं की आवाज से पता लगा कि अंडों से बच्चे निकल आए हैं. दोनों फाख्ता बारी-बारी से बच्चों को चुगाते थे. बच्चे तेजी से बढऩे लगे और उनके साथ मेरी रुचि भी. अब उनके पंख निकल रहे थे. इस हैप्पी फेमिली को देख कर सारी थकान दूर हो जाती थी. रात को एक फाख्ता जो शायद उनकी मां थी, घोसले में जरूर रहती थी. एक दिन रात दस बजे के करीब कमरे में बैठा टीवी देख रहा था कि पत्तों की तेज खड़खड़ाहट और पंखों की फडफ़डा़हट ने चौंका दिया. कुछ अनिष्ट की आशंका से खिड़की के बाहर देखा तो अंधेरे में कुछ नजर नहीं आया. घोसले पर टार्च डाली तो दोनों बच्चे सहमें से दुबके थे लेकिन फाख्ता गायब थी. सुबह भी सिर्फ बच्चों को दख कर चिंता बढ़ गई. थोड़ी देर में फाख्ता दिखी लेकिन शायद वह बच्चों की मां नहीं पिता था. कुछ देर घोसले में बैठने के बाद उड़ गया. अगली रात भी घोसले में सिर्फ बच्चे ही दिखे. शायद किसी बाज या उल्लू ने उनकी मां को निवाला बना लिया था. अगली सुबह घोसले में सिर्फ एक बच्चा था और कोई फाख्ता नहीं. दो दिन बाद वह भी नहीं दिखा. घोसला सूना हो गया था. बचे थे सिर्फ तिनके. धीरे-धीरे कर कौवे और कबूतर उन तिनकों को ले गए अपना घोसला बनाने. इस तरह एक घोसला उजड़ता देख मन भारी हो गया. कुछ दिनों बाद एक सुबह उसी दरख्त की किसी डाल पर फाख्ता के एक जोड़े की टेर सुनाई दी. कहीं कोई परिन्दा फिर से घोसला बना रहा था. पास ही फोन के खंभे में लगे जंक्शन बाक्स में गौरैया दाना लेकर आ- जा रही थी अंदर उसके बच्चे शोर मचा रहे थे. वो सहर मुझे कुछ खास लगी, रात के बाद उम्मीदों की सुबह फिर अंगड़ाई ले रही थी.

5/5/09

सुअर सकते में, मुर्गे मस्त!


मुर्गे मस्त हैं. बटेर, बत्तख, टर्की और पूरे पक्षी समाज में हर्ष की लहर है. मुर्गा एसोसिएशन ने डिस्काउंट ऑफर तक दे दिया है. मुर्गों ने मुर्गियों से और ज्यादा अंडे प्रोड्यूस करने का अपील की है. दो अंडे के साथ एक अंडा फ्री देने का भी प्रस्ताव है. मुर्गे खुश हैं कि इस बार बर्ड फ्लू के कारण बेमतलब मुर्गा संहार नहीं होगा. लेकिन सुअर समाज सकते में है. साउथ ईस्ट एशिया में रेड एलर्ट जारी कर दिया गया है. ठंडे देश के स्वाइन से मेलजोल कम रखने की सलाह दी गई है. पूरी दुनिया इस समय अल कायदा और तालिबान से उतनी दहशत में नहीं है जितनी स्वाइन फ्लू से. बर्ड फ्लू तो पुरानी बात हो गई, लोग अब इससे चिंतित नहीं होते. हां मुर्गे-मुर्गियां जरूर टेंशन में आ जाते थे. मुर्गे की जान जाती और लोगों को खाने में मजा भी नहीं आता. लेकिन 1918 के बाद अब आया है नया फ्लू. मामला स्वाइन फ्लू का है. कुछ लोगों को नहीं पता था कि यह स्वाइन क्या बला है. उन्हें लगता था कि यह स्वाइन कोई बहुत डरावना जीव होता होगा लेकिन जब पता चला कि गली - मोहल्ले में टहलने वाले सुअर को ही स्वाइन कहते हैं तो टेंशन थोड़ा कम हुआ. लेकिन स्वाइन शब्द से सुअरों को कम, कुछ पशु प्रेमियों को ऑब्जेक्शन ज्यादा है. सो सुअर फ्लू की जगह एच1एन1 वायरस ही चलेगा. डब्लूएचओ ने स्वाइन लू को लेकर लेवल-5 के खतरे का साइरन बजा दिया है. इसके बाद तो महामारी का ही ऐलान होगा. जहां तक इंडियन स्वाइन की बात है वे सकते में हैं. स्वाइन समाज ने लोगों से सलामी और सॉसेजेज से परहेज करने की अपील की है. स्वाइन फैमिलीज ने गर्मियों में हिल स्टेशन जाने का इरादा टाल दिया है. बताया गया है कि ठंडे क्षेत्र में एच1एन1 वायरस आसानी से फैलता है. हांलाकि अभी तक कहीं से स्वाइन समाज के सामूहिक संहार की खबर नही आई है. लेकिन अगर स्थिति काबू में नहीं आई तो बड़ी संख्या में सुअरों को भी शहीद होना पड़ सकता है. इंडियन सुअर यूनियन यूरोपीय, मैक्सिकन और अमेरिकी सुअर भइयों के लिए प्रार्थना सभाएं आयोजित कर रही है क्योंकि उनकी सुरक्षा में ही इनकी सुरक्षा है. जान है तो जहान है.

4/30/09

लू का संगीत


लू में है लय, लू में है संगीत, लू में है एक अजीब सी रूमानियत. लू में खिलते हैं चटख गुलमोहर और अमलताश. जब छोटा था तो लू पूरे महीने चला करती थी. अब मुश्किल से 15 दिन भी नहीं चलती. पहले गर्मी की छ़ुट्टियों का मतलब होता महीने भर लू में मस्ती. लू भरी दोपहरी हमेशा से लुभाती थी. लू में बर्फ के गोले, कुल्फी और नारंगी आइस्क्रीम वाले की आवाज कोयल की कूक सी लगा करती थी. जब लू चले तो हम चलते थे सुनसान दोपहरी में किसी की बगिया से अमिया तोडऩे. क्या एक्साइटमेंट और थ्रिल था. नमक के साथ टिकोरा (अमिया, केरियां) खाने में जो मजा था वो दशहरी, लंगड़ा और मलदहिया में भी नही मिलता. लू कभी कभी लप्पड़ भी मारती थी. सीजन में कए दो-बार लू जरूर लगा करती थी. डाट पड़ती थी कि बहेल्ला (आवारा ) की तरह दोपहर भर घूमता रहता है लू तो लगेगी ही. फिर उपचार के लिए आम का पना मिलता था. उसके आगे दुनिया की हर कोल्ड ड्रिंक फेल. इसके बाद दो-तीन दिन में सब सामान्य. फिर निकल पड़ते थे लू में. बड़े कहा करते थे कि लू की दुपहरिया में सुनसान बगिया में न जाया करो चुड़ैल या प्रेत भी होते हैं वहां. उसके कई किस्से सुनाए जाते थे कि फलनवां को गूलर के पेड़ पर झूलती मिली थी चुड़ैल. मुझे आजतक न पे्रत मिले न चुड़ैल. नाम के आगे ओझा जुड़ा है शायद इस लिए. हॉस्टल में था तो भी लू रोमांटिक फिल्म का सीन लगा करती थी. ऊपरी मंजिल पर टेन बाई टेन का कमरा खूब तपा करता था. मेरा रूम पार्टनर चाय बनाकर कहा करता था- इसे पीयो लू नहीं लगेगी. लू और भी कई कारणों से अच्छी लगती है. लू में मच्छर कम हो जाते हैं, लू में पसीना नहीं होता, घमौरियां नहीं होती, राते ठंडी होती हैं. लू में मटके के पानी की सोंधी महक अमृत का एहसास कराती है. लू में खरबूजा और तरबूज बहुत मीठा होता है. लू में कोहड़े (कद्दू) की सब्जी, कच्चे आम और पुदीने के चटनी के आगे सब आइटम पानी भरते हैं. पर अब न जाने क्यूं लू कम चला करती है. अब सड़ी गर्मी ज्यादा पड़ा करती है. सुना है लू रूठ कर चली गई है राजस्थान की ओर. लेकिन यदा कदा अब भी कुछ दिनों के लिए आती है. बीते दिनों की याद दिलाती है

4/24/09

ऐज़ डेडली ऐज़ ड्रोन




डंडा, लकड़ी, बांस, बत्ती, अंगुली और मिर्ची, इनका प्रयोग अचानक बढ़ क्यों गया है. हरकोई डंडा, बांस, लकड़ी और मिर्ची लिए घूम रहा है और जरा सी बात पर उसके सदुपयोग पर उतारू हो जाता. कोई डंडा कर रहा है, कोई बांस और किसी को तो लकड़ी करने में ही आनंद आ जाता है. और तो और लोग बात-बात में उंगली करते फिरते हैं. आम आदमी के पास आजकल ये कुछ ऐसे हथियार आ गए हैं जिनका निशाना ड्रोन की तरह अचूक है. एक बार छोड़ दिए गए तो निशाने पर लगते जरूर हैं. जैसे आजकल सबसे निरीह क्षेत्र स्वात वैली है, जिसको देखो वही घुसा जाता है. उसी तरह लोग डंडा, लकड़ी, बांस को शरीर के सबसे निरीह क्षेत्र पर टारगेट किए रहते हैं. फर्क बस इतना है कि स्टील्थ बॉम्बर की तरह यह दिखाई नहीं देता, बस इसका असर महसूस किया जा सकता है. यदाकदा निशाना चूक भी जाता हैं और डंडा करने वाले को जवाब मिलता है 'बत्ती बना लो'. इसका असर लैंड माइन्स की तरह होता है और 'बत्ती' इग्नाइट हो गई तो इम्पैक्ट झेलना ही होता है. इसी तरह मिरची भी मुझे अचानक बहुत खूबसूरत लगने लगी है. पहले सिर्फ खाने में प्रयोग होता था अब गाने और लगाने में भी होता है. इस नाम के एफएम चैनल भी है. आप भले ही मिर्ची ना खाते हो लेकिन मिर्ची लगती जरूर है न लगे तो लोग कह कर लगवा देते हैं और इसका रंग लाल होता है. लाल मिर्ची भी इतने किस्म की होती है यह अब पता चला. पहले कश्मीरी लाल मिर्च और पहाड़ी मिर्च ही सुनी थी, अब देग्गी मिर्च और तीखा लाल भी मैदान में है. इन मिर्चों का खरीदने की जरूरत नहीं है. आपकी जुबान ही काफी है. आप कह भर दीजिए कि मिर्ची क्यों लग रही है? बस दूसरे पर असर तय है. नहीं लग रही हो तो भी लग जाएगी. निश्चिंत रहिए. मेरे पास इस समय ना तो बांस है ना लकड़ी और ना ही मिर्ची. मैं तो बस यूं ही लोगों की बात कर रहा था. वैसे एक राज की बात बताऊं वैसे कोई बांस या लकड़ी का प्रयोग करे तो आप 'बत्ती' वाला अस्त्र चला दीजिए, बिल्कुल 'पैट्रियाट' मिसाइल की तरह हमलावर की मिसाइल पर असर करेगा.

4/23/09

बुरे फंसे दूल्हे राजा


चुनाव में बुरे फंसे दूल्हे राजा। ना कार ना बाजा। खबरें तो कुछ ऐसी ही आ रही हैं. चुनाव वाले जहां कार देख रहे हैं, झट से छीन कर चुनाव ड्यूटी में लगा दे रहे हैं. और अक्षय तृतीया के चलते बैंड बाजे वालों की एक एक दिन में तीन-तीन पारियां बुक हैं. बड़ी मारा मारी है. पॉलिटिकल कैंडीडेट के चक्कर में शादी के कैंडीहडेट्स की वॉट लगी जा रही है. साइत ना निकले इस लिए कुछ तो करना ही है. सो कुछ ने नगाड़ा और पिपिहरी वाले कड़कड़उआ बाजा पार्टी बुक करा ली है. इस क्राइसिस में मुझे एक रेस्क्यू ऑपरेशन याद आ रहा है. मेरे घर नई स्कूटर लैंब्रेटा आई थी. मेरे गांव उपरौड़ा में कजिऩ की शादी थी. मेरा गांव इलाहाबाद से 35 किलोमीटर ही दूर था. बस दाब दी लैंब्रेटा. बराती तैयार, बाजा वाला तैयार लेकिन टैक्सी वाला गच्चा दे गया. समय निकला जा रहा था. दूसरी कार का प्रबंध नहीं हो पा रहा था. किसी ने कहा टेम्पो करो. लेकिन उसमें टाइम लगता सो लोगों की नजर मेरे नए स्कूटर पर पड़ी. तय हुआ दूल्हा इसी पर जाएगा. फिर क्या था मौर (मुकुट) और जोरा-जामा (पादरियों के गाउन की तरह लगने वाला वस्त्र) पहने दूल्हे राजा पिछली सीट पर विराज गए. झोरा-झामा के कारण दूल्हा लड़कियों की तरह एक ही तरफ पैर कर के बैठा था. आगे-आगे कड़कड़उआ बैंड उसके पीछे मेरी मंद गति से रेंगती स्कूटर पर सवार दूल्हे राजा. क्या नजारा था. पट्टीदार इस जुगाड़ से थोड़ा चिढ़े हुïए थे लेकिन उस समय गर्व से मेरा सीना चौड़ा हुआ जा रहा था. अब होता तो ये गाना याद आता...बाराती गारी देवैं, देवरजी स्कूटर खेवैं ससुराल गेंदा फूल...ओए होएं॥ होएं॥ओए होएं..होएं..

3/26/09

स्लम डॉग ओसामा




पूरी दुनिया के लिए लादेन भले ही खतरा हो लेकिन मीडिया के लिए बड़े काम का है. टॉप रैंकिंग चैनल्स के पास जब कुछ नहीं होता तो उन्हें लादेन याद आता है. वही बलूचिस्तान की गुफाओं और अफगानिस्तान की पहाडिय़ों में लकड़ी लिए घूमता लादेन, ओबामा और कियानी को बीच बीच में लकड़ी करता लादेन. असली स्लम डॉग मिलिनेयर तो ओसामा बिन लादेन है. अरबपति होते हुए भी कुकुरों की तरह खोह में लुका हुआ है. वह रात में कभी कभी लुक्कारी खेलता है जैसा कि मेरे गांव उपरौड़ा और ससुराल शुकुलपुर में रात में भूत लोग आग से लुक्कारी खेलते हैं. चैनल वाले तो रोज ही रात को ओसामा को लेकर लुक्कारी खेलते हैं. वैसे ओसामा मीडिया फ्रेंडली है. कुछ भी दिखाओ बुरा नहीं मानता. बीच बीच में ई-मेल भेजता रहता है और कभी-कभी बाइट के साथ वीडियो फुटेज भी. उसे लेकर चैनल्स में सिर फुटौवल होती है कि सबसे पहले मेल उसे भेजा. सुना है इंडिया टीवी के रजत शर्मा के पास ओसामा का लेटेस्ट मेल आया है. रजत जी ने ओसामा के कहने पर अपना हेयर स्टाइल थोड़ा बदला है और रजत जी के कहने पर ओसामा ने अपनी लाइफ स्टाइल बदली है
मुझे लगता है लादेन किसी दिन रजत शर्मा की आपकी आदलत में बैठा मिलेगा और अदालत के जज होंगे नरेंद्र मोदी. वैसे लादेनवा मीडिया वालों के लिए बड़े काम की चीज है. जब कोई खबर न हो तेा चला दो लादेन को. कुछ भी दिखाओ बुरा नहीं मानता. ना ही कोई कंट्राडिक्शन भेजता है. सुना है लादेन ने अब रामदेव के योगा शिविर में ज्वाइन किया है. बाबा उसे गुफा में कपाल भाती और मुल्ला उमर को अनुलोम विलोम सिखा रहे हैं

3/24/09

जैसा बोया वैसा काटा

जैसा बोया वैसा काटा ये रेशिसन मिसमैनेजमेंट का ही परिणाम है. मंदी हमारी ही करनी का फल है. यही तो मौका है इनोवेटिव और क्रिएटिव होने का. डिलिवर मोर फॉर लेस.हाल ही में एक सेमिनार में यूपीटीयू के वाइस चांसलर प्रो. प्रेमव्रत ने कुछ ऐसा ही कहा था. करीब एक हजार स्टूडेंट्स की गैदरिंग में प्रो. प्रेमब्रत एक घंटे धाराप्रवाह बोले. पूरे हाल में सन्नाटा फिर जोरदार तालियां. ये न तो किसी नेता का भाषण था ना ही बात बात पर ताली बजाने वाले लम्पट श्रोता. कहा जा रहा है कि हम कठिन दौर से गुजर रहे हैं. आगे का टाइम शायद और टफ हो. लेकिन एक बात तय है इस टफ टाइम से निकल कर अगर कोई चमकेगा तो वो इंडिया ही होगा. ऐसा यंग जेनरेशन को देख कर लगता है. इस समय दुनिया के कई डेवलप्ड कंट्रीज में आधी से ज्यादा आबादी बूढ़े और थक चुके लोगों की है तो दूसरी ओर इंडिया की आधी से ज्यादा पॉपुलेशन यंग है. एंड दिस यंग पापुलेशन इज रेयरिंग टू गो. वो सीख रहे हैं कि आग के दरिया को कैसे पार करना है. इस समय इंडियन यूथ सपने देख रहा है, डरने के लिए नहीं कुछ करने के लिए. समय के साथ उसकी सोच में जबर्दस्त बदलाव आया है. दे आर टाकिंग नो नॉनसेंस, दे मीन बिजनेस. कहा जा रहा है कि इस दौर में अगर आगे बढऩा है तो ज्यादा इनोवेटिव और क्रिएटिव होना होगा, नए आइडियाज पर रिसपांसिबल मैनर में काम करना होगा. टाई लगाए, लैपटॉप लिए अर्बन यूथ हों या बैग लटकाए हाथ में कॉपी लिए गंाव से शहर की ओर भागते यंगस्टर्स, सब की आंखों में सपना है आगे बढऩे का, सब में दिखती है ग$जब की पॉजिटिवटी. अपने इर्दगिर्द इन युवा चेहरों पर नजर डालिए. इन्हें पॉकेटमनी पेरेंट्स से न लेकर खुद अर्न करने की चिंता है. अब यंगस्टर्स लर्निंग विद अर्निंग का तरीका सीख रहे हैं. उन्हें पता है कि परफार्म नहीं किया तो पेरिश होने से कोई बचा नही सकता. उन्हें पता है कि जॉब क्रंच में 'क्रशÓ होने से बचना है तो इंटरप्रन्योरशिप के बारे में सोचना होगा, अपने को सेल करना है तो इनोवेटिव होना होगा, उन्हें पता है कि स्लोडाउन में सूख रही विदेशी धरती पर भटकने से बेहतर है कि अपने देश में रिर्सोसेज के भंडार को एक्सप्लोर कर उस पर अपने महल बनाए जाएं.

3/20/09

बोतल का जिन



मैं दारू नहीं पीता लेकिन ऐसी जमात के बीच काम करता हूं जहां ज्यादातर लोग शराब खूब पीते हैं. पार्टी शार्टी में जब साथी लोग पीकर टल्ली हो जाते हैं तो उनका भूत उतारने और घर तक पहुंचाने का जिम्मा मेरा होता है. कल भी एक पार्टी थी. उसमें कइयों का भूत झाडऩा पड़ा. टल्ली भी अलग अलग किस्म के होते हैं. मेरे एक साथी दारू पीकर बॉस को जरूर गरियाते हैं और नशा उतरने पर उन्हे कुछ नहीं याद रहता. एक साथी पार्टी में पीने के बाद उल्टी जरूर करते हैं. और एक साथी ऐसे हैं जो इतना पी लेते हैं कि अगले दिन आफिस आने की हालते में नहीं रहते. ऐसा भी नहीं कि मैने शराब चखी नहीं है. जब हास्टल में था तो 'लाओ देखें जरा स्टाइल में कभी रम, कभी व्हिस्की, कभी स्काच तो कभी जिन का एक-आध पैग ले लेता था फिर पछताता था. इस लिए नहीं कि कोई पाप किया बल्कि इस लिए कि अगले दिन खोपड़ी जरूर भन्नाती रहती थी. एक बार न्यू इयर ईव पर मुझे थोड़ा जुकाम था. एक मित्र ने जबरन थोड़ी जिन पिला दी. पता नहीं क्या हुआ कि गले 15 दिन तक मैं कफ से जकड़ गया. मेरी सूंघने और सुनने की क्षमता जाती रही. लोग बोलते थे तो मैं कान के पास हाथ ले जाकर आंय-आंय करता था. दोस्तों ने खूब मजा लिया कि अबे ओझवा के कान में जिन घुस गया है. यह जिन एंटीबायटिक लेने से ही भागा. उस दिन से कान पकड़ लिया.

3/8/09

फर्क सिर्फ नजरिए का


आज महिला दिवस है. मीडिया में आज महिलाओं पर ढेर सारी सामग्री है. बातें लगभग एक जैसी कहीं सबला, कही अबला. कहीं अत्याचार तो कहीं आत्म विश्वास की कहानी. मेरी कहानी थोड़ा फर्क है. कहानी है ब्रा या कस्बाई भाषा में बाडी की. कई दिनों से सोच रहा था कि लिखूं या न लिखूं. लेकिन आज एक बड़े इंग्लिश डेली में ब्रा का एक बड़ा सा ऐड देखा जिसमें एक माडल ने इसे पहन रखा है. बस तय कर लिया कि बाडी पर चर्चा हो जाए. पहले साफ कर दूं यह कोई अश्लील बातें नहीं हो रहीं. मैं महिलाओं का बहुत सम्मान करता हूं. ...तो कहानी कुछ यूं है कि एक बाडी कई दिनों से मेरे आफिस जाने के रास्ते में पड़ी है. बिल्कुल मैली-कुचैली. लेकिन देख कर लगता है कि कभी किसी कोठी में रही होगी. फिर पुरानी पड़ गई होगी. इस पर शायद होली भी खेली कई होगी और फिर इससे डस्टर का काम लिया गया और अब यह लावारिस पड़ी है मेरे रास्ते में. सडक़ के किनारे घास में पड़ी इस बाडी पर आफिस जाते समय मेरी नजर पड़ ही जाती है. हिन्दी में अंग वस्त्र या चोली और अंग्रेजी में ब्रेजियर या ब्रा तो समझ में आता है लेकिन इसका नाम बाडी कैसे पड़ा पता नहीं. गांव-कस्बों में यही नाम ज्यादा प्रचलित है. साप्ताहिक हाट मेले में ढेर सारी बाडी टंगी मिल जाएंगी दुकानों में. ब्रा या बाडी हमेशा चर्चा में रहती हैं. कभी महिला मुक्ति के प्रतीक के रूप में तो कभी पुरुष वर्चस्व वाले समाज में सस्ते मनोरंजन के माध्यम के रूप में. सुना है कि नारी अधिकारवादी महिलाएं इसे नहीं पहनती. गांव में तो महलाएं इसे अकसर नहीं पहनतीं? मेरी मामी भी नहीं पहनती थीं. प्राइमरी मेंं था तो एक दोस्त ने रुमाल से ब्रा बनाना सिखा दिया. उत्साह में रुमाल की ब्रा बना कर मैं घर में घूम गया. तुरन्त मुझे दो थप्पड़ मिले. तभी से बाडी के मसले पर काफी सतर्क रहने लगा. ननिहाल में कई मामा-मामी थे. गर्मी की छुट्टियां वहीं बीतती थी. वहां नाना का हुक्म चलता था. उनसे सब बच्चे डरते थे. मैं नहीं डरता था. ननिहाल में दो बातें अटपटी लगती थीं. एक- नाना और बड़े मामा को देख मामियां एक हाथ का घूंघट खींच लेती थी लेकिन ऐसा करते समय अक्सर वे ब्लाउज भी नहीं पहने होती थीं. दो- आंगन के किनारे रसोईं थी. वहां बैठी मामियों के सामने ही मामा लोग लंगोट पहने आंगन में गगरे से नहाते थे. लंगोट ऐसी कि पीछे से मामा लोगों को देख कर पूर्ण नग्नता का आभास होता था. मेरा बाल मन तब इस पर्दे और नग्नता को समझ नहीं पाया था. अब समझ में आता है. अब समझ में आता है कि ब्रा पहन कर ऐड में खड़ी नारी और बिना ब्रा और ब्लाउज के घूंघट काढ़े मामी में फर्क सिर्फ नजरिए का है. आखों में अश्लीलता है तो बाडी बेचारी क्या कर लेगी भले ही यह लोहे के बख्तरबंद की क्यों न हो. फिलहाल समस्या रास्ते में पड़ी बाडी की है. सोचता हूं कि इसे खुद हटा दूं लेकिन किसी ने देख लिया तो किस-किस को सफाई देता फिरूंगा. इसका नाम बाडी कैसे पड़ा, हो सके ता बताइयेगा.

3/5/09

'छोटा मुंह बड़ी बात'

आजकल ग्रैंड फिनाले का दौर चल रहा। बच्चों से लेकर बड़ों तक. कहीं बोर्ड तो कहीं एनुअल एग्जाम्स. सब परफार्म करने में जुटें हैं. बेहतर कॅरियर और फ्यूचर के लिए दे आर बाउंड टू परफार्म. सो उन पर प्रेशर तो रहेगा ही. कहते हैं कि बचपन में प्रेशर नहीं होता है. थोड़ी सी लर्निंग, थोड़ी सी डिस्पिलिन और ढेर सारी मस्ती. लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? बेहतर परफार्म करने के लिए बच्चे भी बड़ों की तरह प्रेशर में हैं. लगातार. ये पे्रशर बड़ों ने यानी पैरेंट्स ने ही डाला है. रियलिटी शोज और सीरियल्स में अचानक बच्चों की फौज कूद पड़ी है. सोचिए बच्चे बड़ों की तरह क्यूं बिहेव कर रहे हैं. किसी बच्ची के दूध के दांत टूटे हुए हैं तो किसी के टूटने के बाद फिर से उगे हैं. इनमें कोई अनारकली बना है तो कोई मेच्योर लेडी की तरह बिहेव कर रहा है. कहीं सामाजिक कुरीतियों से लडऩे के बहाने जीवन की सच्चाई को कुछ ज्यादा ही विस्तार से दिखाया जा रहा है. इसमें किरदार निभा रहे हैं बच्चे. छोटे मुहं बड़ी बात कर रहे हैं बच्चे और उस पर ताली बजा रहे हैं बड़े. बजाएं भी क्यों ना, उनसे काम भी ते बड़े ही करा रहे हैं. अपने लाडलों को चंद दिनों का स्टार बनाने के लिए कहीं उनके सितारों को गर्दिश में तो नहीं डाल रहे हम. बच्चों के जिस डॉयलाग और जिस फरफारमेंस पर लोग मुग्ध होते हैं उसे याद करने और रिहर्सल में कितना प्रेशर पड़ता है पर इसका अंदाज नहीं है लोगों को. कहीं यह चाइल्ड लेबर का 'माइल्ड वर्जनÓ तो नहीं. निसंदेह ये बच्चे टैलेंटेड हैं. रियलिटी शो हों या रियल लाइफ, बच्चों को बच्चे के ही रोल में रहने दें. 'छोटा मुंह बड़ी बातÓ के नए ट्रेंड से कहीं ये बूमिंग टैलेंट बोंसाई ना बन जाएं.

2/22/09

देर से आने के दस बहाने


देर से आने के दस बहाने





सोमवार यानी हफ्ते का पहला वर्किंग डे. बड़े-बड़े कर्मठ और वर्कोहलिक भी इस दिन अलसिया जाते हैं. जो अल्कोहल नहीं लेते वो भी. सुबह मीटिंग में देर से आने के दस बहाने. शुरू में गुस्सा आता था. अब मजा आता है. मैंने वाइफ से शर्त लगाई कि आफिस जाने के ठीक पहले आने वाले पांच फोन या मैसेज में चार देर से आने की सूचना देने वाले होंगे और मैं शर्त जीत गया. वैसे रेग्युलर देर से आने वाला कोई आडेंटिफाइड नहीं है. हर दिन नया शख्स नॉमिनेट होता है. मैंने सोचा एक महीने का रिकार्ड रखें कि सबसे ज्यादा किस वजह से लोग आफिस लेट आते हैं. जानते हैं पहले नंबर पर कौन सा बहाना था? लूजमोशंस? नहीं. सबसे बड़ा बहाना गाड़ी पक्ंचर हो गई है...घसीट कर ला रहा हूं. आसपास पंक्चर जोडऩे वाला नही है सर. दूसरे नंबर पर है ...जाम में फंस गया हूं लेट हो जाउंगा. अरे मार्जिन रख के क्यों नहीं चलते? जी बहुत तगड़ा जाम है. लूजमोशंस का बहाना तीसरे नंबर पर था. लेकिन खास बात ये थी कि जिसे सुबह की मीटिंग स्किप करनी होती है वह इस बहाने का आइटम नंबर बजाता है. रात को ऑफिस से भले चंगे जाते हैं और सुबह पेंचिस पडऩे लगती है. कुछ पर प्रकोप इतना ज्यादा होता है कि पूरे दिन की छुट्टी. लेकिन अगले दिन भले चंगे हाजिर हो जाते है. इस बीमारी की पेचीदगी आज तक नहीं समझ आई शायद तभी इसका नाम पेंचिस पड़ा होगा. जो एक दो दिन की छुट्टïी चाहते हैं वो वायरल की सूचना फोन पर देते हैं. बॉस घुडक़े ना इस लिए वाइफ से फोन कराते हैं. और भी कुछ फुटकरिया बहाने हैं जैसे वाइफ को डाक्टर को दिखाना है, पैरेंट-टीचर मीटिंग है, गइया तुड़ा कर भाग गई है, बिल ठीक करवाते आउंगा.. वगैरह वगैरह .. अच्छा आप क्यों ब्लॉग में सर खपा रहें हैं. निकलिए नहीं तो आपको भी बहाना बनाना पड़ेगा.

2/18/09

क्या यही है डेस्टिनी?



बात करीब तीन दशक पुरानी है. एक थी माथुर फैमिली. समाज में प्रतिष्ठा थी. लखनऊ में सप्रू मार्ग पर प्राइम लोकेशन पर डाक्टर मुरली मनोहर माथुर का एक बड़ा सा मकान था. उनका भरापूरा परिवार था. एक बेटे का नाम था ब्रिजेश, एक बेटी राधा और एक थी मांडवी. सब पढ़े लिखे सामान्य लोगों की तरह. फिर डा. माथुर की डेथ हो गई. रह गए उनके बच्चे. कुछ सालों बाद उनके एक बेटे ने यह मकान बेच दिया. घर के आगे वाले हिस्से में एक दुकान खुल गई. कुछ दिनों बाद बगल में एक दुकान और खुल गई. फिर एक और. घर बेचने वाला बेटा दिल्ली में सेटल हो गया. इसके बाद ये तीनों भाई-बहन उस घर से बाहर हो गए. वह मकान किसने किसको बेचा, किसने यहां दुकान खोलने का कितना पैसा दिया, यह अलग पेचीदा कहानी है. पर सुना है मुकदमा अभी भी चल रहा है. इधर माथुर सिस्टर्स और ब्रदर सडक़ों पर बेहाल घूमते नजर आने लगे. शुरू में मीडिया ने उनकी कहानी छापी. फिर कहा जाने लगा कि उनकी मेंटल कंडीशन ठीक नहीं. लेकिन इस पर भी डिस्प्यूट है. बाद में मीडिया ने भी उन पर ध्यान देना छोड़ दिया. माथुर सिस्टर्स और ब्रदर अब भी कभी-कभी सडक़ों पर घूमते दिख जाते हैं पहले से कहीं अधिक फटेहाल, पागलों की तरह. जो उन्हें जानते हैं वो ध्यान नहीं देते और जो नहीं जानते वो उन्हें पागल समझ कर आगे बढ़ जाते हैं. लेकिन सडक़ों पर घूमती माथुर फैमिली पागल नहीं है. कुछ दिनों पहले अचानक माथुर फैमिली दिख गई. सत्तर साल की बहन उतने ही बूढे भाई का हाथ पकड़े थी और पचहत्तर साल की एक बहन थोड़ा पीछे डगमगाती चली आ रही थी. उनसे पूछा आप माथुर फैमिली के हो? हां, आप कौन? मैं रिपोर्टर हूं. आपकी कंडीशन देखी नहीं जाती. कुछ लिखना चाहता हूं. देखिए, कुछ ऐसा वैसा निगेटिव न लिख दीजिएगा जिससे हमारा नुकसान हो जाए. चिंता मत कीजिए, वैसे आपके पास अब खोने को कुछ है भी नहीं. मेरी इसबात का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. इसके बाद तीनों भाई-बहनों ने पंडित की दुकान पर खस्ता और गुलाब जामुन खाया और आगे बढ़ गए. यह लखनऊ की सडक़ों पर भटकती वह दास्तान है जिसको हम कहते हैं डेस्टिनी. शायद यही वजह है कि एजूकेटेड और एबल-बॉडीड होते हुए भी ये अपने लिए कुछ न कर पाए.

2/6/09

सफलता की डायरी

न्यू ईयर के बसंत को हम पार कर गए हैं लेकिन इस बार डायरी की बहार नहीं है. सुनते हैं इसकी फसल बहुत अच्छी नहीं हुई है. थोड़ी बहुत जो फसल है, उसे भी रिसेशन के कारण कॉस्ट कटिंग का छिडक़ाव कर बड़ी सावधानी से काटा जा रहा है. इन सबके बावजूद उन लोगों के हाथ में नई डायरी दिख रही हैं जो आज के दौर में सक्सेसफुल हैं. उनकी सफलता का एक अहम कारण उनका वेलआर्गेनाइज्ड होना है और इसमें डायरी का रोल महत्वपूर्ण है. जी हां, डायरी का सीधा संबंध इंगेजमेंट्स और शेड्यूल से है. शेड्यूल, सलीका और सफलता में गहरा संबंध है. प्रेशर में ाी पेस के साथ परफार्म करने वाले ही आजकल सफल कहे जाते हैं. जो जितना सफल है उसका शेड्यूल उतना ही हेक्टिक है और जिसका शेड्यूल हेक्टिक है वह उतना ही आर्गेनाइज्ड है. लाख प्रेशर के बावजूद उनकी लाइफस्टाइल में एक सलीका होता है. आजकल डायरी तो डेली लाइफ का एक अहम हिस्सा है. क्या हमसब डायरी की अहमिय समझते हैं? ढेर सारे लोगों के लिए तो डायरी न्यू ईयर के आसपास गिफ्ट के रुप में बांटने की वस्तु भर है. कुछ के लिए ये ओबलाइज करने का माध्यम है. ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जो खुद तो डायरी नहीं रखते लेकिन डायरी की डीलिंग में माहिर होते हैं. ये डायरी न तो खरीदते हैं और न ही छपवाते हैं. ये तो सिर्फ बांटते या बंटवाते हैं. यानी इधर की डायरी उधर. डायरी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका संकट मोचक की है. जो डायरी मेंटेन करता है, डेली रुटीन की जरूरी बातों को दर्ज करता है, उसे डायरी कभी धोखा नहीं देती. उनके लिए तो डायरी एक पोर्टेबल इंसाइक्लोपीडिया होती है. जिनकी मेमोरी शार्प है और जो भुलक्कड़, दोनों के लिए डायरियां कंप्यूटर की भाषा में एक्स्ट्रा हार्ड डिस्क की तरह काम करती हैं. इनमें न तो वायरस आने का खतरा होता है और नहीं ये अधिक लोड पडऩे पर कंप्यूटर की तरह हैंग करती हैं. डायरी मेंटेन करके तो देखिये, आपका मेंटल प्रेशर कई गुना कम हो जाएगा.

2/1/09

राजाबाबू नहीं मरते

लांग लिव राजा बाबू.
राजाबाबू की तो डेथ हो गई. सुन कर विश्वास नही हुआ. कैसे हुई डेथ, किसने बताया? कोई कह रहा था. कौन? ठीक से याद नहीं. अरे वही राजा बाबू न जो ई टीवी में था. हां वही मथुरा वाला. सुन कर मन भारी हो गया. राजा बाबू कोई रॉयल फैमिली से नहीं था. राजाबाबू तो बस राजाबाबू था. हर कोई राजाबाबू थोड़े ही होता है. एक न्यूज चैनल का डिस्ट्रिक्ट करेस्पॉडेंट. लेकिन थोड़ा अलग था राजाबाबू. वही राजा बाबू जिसने हेड फोन लगा कर अपनी पी-टू-सी भेज दी थी. इसके पीछे उसका अपना तर्क था- कैसे पता चलता कि रिकार्डिंग सही हो रही या नहीं. वही राजा बाबू जिसको एक बार भू- माफिया ने धमकी दी तो वो तीन दिन की छुट्टी लेकर घर अलीगढ़ चला गया और अपना बीमा करा कर लौटा. माफिया से बोला अब मार भी दोगे तो घर वालों को पांच लाख मिलेंगे. घर वालों ने मेरी पढ़ाई पर इससे ज्यादा नहीं खर्च किया है. भू- माफिया ने हाथ जोड़ लिया, कहा अब कुछ भी लिखो कोई नाराजगी नहीं. आज से आप मेरे छोटे भाई. ऐसा राजाबाबू कैसे मर सकता है. एकबार डीएम ने उसे अपने कमरे के बाहर कुछ ज्यादा ही इंतजार करवा दिया. नाराज राजाबाबू एक चिट छोड़ गए-डीएम साहब मेरा वक्त भी कीमती है मुझे भी ऊपर से अफसरों की डाट पड़ती है. डीएम ने एक अफसर को भेज कर उसे वापस बुलाया. एकबार उसे फोन किया तो गलत नंबर लग गया. किसी महिला ने उठाया. मैंने कहा राजाबाबू से बात कराइए. महिला ने खिलखिलाते हुए फोन अपने हसबैंड को थमा दिया. तब पता चला कि नंबर गलत था. फिर राजाबाबू से मेरा सम्पर्क टूट गया. एक बार चेन्नै से उसका फोन आया था. वह किसी मैगजीन में था. फिर कुछ दिन पहले किसी ने बताया कि राजाबाबू नहीं रहे. फिर कल किसी ने बताया कि नहीं राजा बाबू तो अलीगढ़ में हैं. उन्होंने फोन नंबर देने का वादा किया है. मैं खुश हूं नंबर भले ही न मिले लेकिन राजाबाबू अलीगढ़ में खुश रहें. राजाबाबू ऐसे थोड़े ही मरते हैं. लांग लिव राजाबाबू.

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