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6/19/10

दांत चियारे गिफ्ट निहारे



गर्मी की छुट्टियां, ऊपर से शादियों का मौसम. आपने भी कई पार्टियां निपटा दी होंगी. मीठे से तो आपका मन भर गया होगा और गर्मी में ज्यादा खाने-पीने से बचना चाहिए. तो क्यों ना आज खाने के बजाय कुछ इनविटेशंस और गिफ्ट का मजा लिया जाए. राजू श्रीवास्तव और उन जैसे दूसरे कॉमेडियन और मिमिक्री आर्टिस्ट शादी और रिसेप्शन में भेाजन के लिए मचने वाली भगदड़ का जिक्र तो बार-बार कर चुके हैं. चलिए पार्टियों के कुछ और रोचक पहलुओं पर नजर डालते हैं. आप सोच रहे होंगे कि ब्लॉग के इस कॉलम में शादी-व्याह, पार्टी और गिफ्ट की बातें क्यों कर रहा हूं. अरे, ब्लॉगर कोई दूसरे लोक के जीव तो होते नहीं. वो भी इसी समाज में रहते हैं और पार्टी-वार्टी अटेंड करते रहते हैं. ऐसे में ब्लॉग में उनका जिक्र तो होगा ही.
कोई बारात हो या रिसेप्शन, सामने स्टेज पर एक जोड़ी सिंहासन होता है. बाराती जब नागिन डांस कर लस्त-पस्त हो जाते हैं तो द्वारचार के बाद दूल्हे को उठा कर सिंहासन पर बैठा दिया जाता है. फिर मंथर गति से सिर झुकाए दूल्हन आती है. ‘सालियो’ं और ‘जिज्जुओं’ के सपोर्ट से जयमाल होता है. दूल्हन भी सिंहासन पर विराजती है. फिर फोटो सेशन और न्योता और गिफ्ट देने का दौर चलता है. बीच में ही आधे लोग वार जोन यानी भोजन स्थल की और कूच कर जाते हैं. इधर दूल्हा लगातार दांत चियारे और दूल्हन गंभीर मुस्कान के साथ बैठे रहते हैं. उनके ठीक बगल में बारात हुई तो वधू पक्ष की सबसे विश्वसनीय महिला और रिसेप्शन हुआ तो वर पक्ष की खास महिला कॉपी-कलम लिए बैठी रहती हैं जो गिफ्ट और लिफाफे देने वालों के नाम नोट करती हैं. बड़े गिफ्ट पैकेट लेकर आने वाली ‘पार्टी’ स्टेज पर वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ पैकेट सौंपती है और 51-101 वाले धीरे से लिफाफा थमा सटक लेते हैं. अगर लिफाफे में हेफ्टी अमाउंट हुआ तो पार्टी लडक़े या लडक़ी के माता-पिता के हाथ में ही उसे सौंपती है. बर्थ डे पार्टी में भी ढेर सारे गिफ्ट पैकेट मिलते हैं. फर्क बास इतना होता है कि पैकेट, पार्टी के बाद खोले जाते हैं लेकिन कुछ लंपट किस्म के बच्चे आपके सामने पैकेट खोल कर आपकी पोल खोल देते हैं. हालांकि अक्सर होस्ट ‘बैड मैनर्स’ कह उन्हें ऐसा करने से रोक कर आपकी इज्जत बचा लेता है.
इंडियन सोसाइटी के इन ट्रेडीशंस और यादों को लेकर जब कोई भारतीय विदेश जाता है और वहां पार्टी के डिफरेंट नाम्र्स और रूल्स से रू-ब-रू होता है ब्लॉग की एक नई पोस्ट का जन्म होता है. अमेरिका और यूरोप में भी गिफ्ट्स की लिस्टिंग होती है लेकिन डिफरेंटली. कई बार तो इनविटेशन में इतने इंस्ट्रकशंस होते हैं कि गेस्ट को शक होने लगता है कि वो गेस्ट है या होस्ट. लंदन में रहने वाली शिखा वाष्र्णेय के ब्लॉग स्पंदन में उनकी पोस्ट ‘कैरेक्टर लेस गिफ्ट’ का रैपर खोल कर देखिए मजा ना आए तो गिफ्ट वापस. लिंक है http://shikhakriti.blogspot.com/2010/06/blog-post_17.html. इसी तरह स्तुति के ब्लॉग भानुमति का पिटारा में अतिथि देवो भव! शीर्षक वाली पोस्ट इस लिंक http://stutipandey.blogspot.com/2010/05/blog-post_13.html पर देखिए और मजा लीजिए पार्टी का. अच्छा चलता हूं, आज मुझे भी एक पार्टी में लिफाफा देना है.

6/8/10

इति मूत्राभिषेक!


वो रातें अभी भी मुझे याद हैं. सुस्सू वाली रात के बाद की सहर (सुबह), कहर बन कर टूटती थी मेरे कोमल मन पर. मेरी तरह आप भी तो बिस्तर पर सुस्सू करते बड़े हुए होंगे. अब सुस्सूआएगी तो करेंगे ही. कभी साफ टॉयलेट में, कभी गंदे टायलेट में, कभी दीवार पर, कभी किसी कोने में तो कभी खुले आम तो कभी चोरी छिपे. खबर तो ये भी है कि अमेरिका में स्वीमिंग पूल्स में नहाने के दौरान 25 प्रतिशत लोग पानी में ही सुस्सू कर देते हैं. ये प्रतिशत कुछ ज्यादा नहीं लगता? मान लिया जाए कि दो-तीन फीसदी लोग ही पानी में सू करते होंगे तो भी पूरा पूल सू युक्त हो गया ना? यूरिक एसिड का कंसंट्रेशन भले ही थोड़ा कम होगा और बाद में उस पानी को फिल्टर कर लिया जाए लेकिन उस समय तो आपका मूत्राभिषेक हो ही गया ना. वैसे सू-आचमन की तरह सू-स्नान भी इतना बुरा नहीं होता. याद हैं ना अपने मोरारजी भाई. हम सब तो बिस्तर पर सू-स्नान करते ही बड़े हुए हैं. पहले डायपर-वायपर कहां होते थे.
सच बताऊं, मैं तो छठे क्लास तक बिस्तर पर सू कर देता था. सू वाली रात के बाद की सहर मेरे कोमल मन पर कहर बन कर टूटती थी. छोटे-बड़े सब ताने मारते-घोड़े जैसा हो गया है फिर भी बिस्तर गीला कर देता है, शरम नहीं आती? शरम तो आती थी. पक्का इरादा कर सोता था कि आज रात बिस्तर गीला नहीं करूंगा. लेकिन गहरी नींद में सपना आता कि जोर की सू-सू आई है, मैं राजा बेटा की तरह ट्वायलट में प्रेशर रिलीज कर रहा हूं. प्रेशर खत्म होने की प्लीजेंट फीलिंग के बीच अचानक कुछ गुनगुनेपन का अहसास होता और आंख खुल जाती, टेंशन बढ़ जाता. गीले बिस्तर पर लेटे-लेटे सुबह का इंतजार करता. पोल खुलते ही फिर तानों का सिलसिला. जाड़ों में जब सू वाला गद्दा मुंडेर पर सुखाने के लिए डाला जाता तो लगता कि पूरे मोहल्ले के सामने खड़ा होकर सू सू कर रहा हूं और लोग हंस रहे हैं- वो देखो घोड़ा सू कर रहा है. किसी ने कहा, पेट में कीड़े होंगे तो कीड़े की दवा दी गई. फिर भी फर्क नहीं पड़ा. कुछ ने कहा साइकोलॉजिकल प्राब्लम है.
बिस्तर गीला करना कैसे छूटा पता नहीं. लेकिन साइकोलॉजिकल प्राब्लम तो है सू सू को लेकर शरारत करने को मन अब भी करता है. एक बार टे्रन में भारी भीड़ थी. सब टायलेट में लोग भरे हुए थे और मेरे ब्लैडर काप्रेशर बढ़ता जा रहा था. अगला स्टाप दो घंटे बाद था. जब नहीं रहा गया तो कोच के गेट पर खड़े हो कर पूरी ताकत से प्रेशर रिलीज कर दिया. उस दिन सौ की स्पीड में भाग रही ट्रेन में पीछे की कोचों में गेट पर खड़े या खिडक़ी के पास बैठे कितने लोगों ने ना चाहते हुए भी सू-आचमन किया, पता नहीं.
एक और वाकया. हॉस्टल में सेकेंड फलोर पर मेरा रूम था. मेरे विंग में दस कमरों के बाद ट्वायलेट था. जाड़ों की रात में दस कमरों को पार कर सू करने जाना पहाड़ पार करने जैसा लगता. कोशिश रहती कि नींद में ही ये काम निपटा दिया जाए. उस दिन ट्वायलेट की लाइट नही जल रही थी. आव देखा ना ताव, अंदाज से ही टारगेट की तरफ तड़-तड़ा दिया. तभी कोई चिल्लाया ये क्या हो रहा है. आवाज मारकंडे गुरू की थी जो कान पर जनेऊ चढ़ा कर नियमानुसार बैठकर मूत्र विसर्जन कर रहे थे और मैंने अंधेरे में उनका मूत्राभिषेक कर दिया था. तब से खड़े हो कर सू करने में सुरक्षित महसूस करता हूं. वैसे भी गंदे ट्वायलेट के बजाय खुले में कच्ची जमीन पर या झाड-झंखाड़ को यूरिया से पोषित करना बेहतर लगता है. हां, स्वीमिंग पूल वाला प्रयोग नहीं किया है. वैसे ऐसा कर के ‘अपने ही सुस्सू में फिसलने’ की कहावत चरितार्थ नहीं करना चाहता.

6/6/10

‘जहर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा’



लोगों को सिगरेट पर सिगरेट फूंकता देख बशीर बद्र का ये शेर बरबस याद आने लगता है-
‘मैं खुदा का नाम लेकर पी रहा हूं दोस्तों,
जहर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा’

दवा कितनी है ये तो पता नहीं लेकिन टोबैको के अर्ज के मर्ज में लोगों की जिंदगी तेजी से खर्च हो रही है. लेकिन वो नहीं सुधरेंगे. ऐसे लोगों को आगाह करने के लिए ही पिछले मंडे को वल्र्ड नो टोबैको डे मनाया गया. कुछ साल पहले तक कुछ गिनेचुने ‘डे’ होते थे. जैसे इंडिपेंडेंस डे, रिपब्लिक डे, टीचर्स डे और मे डे. लेकिन अब महीने में दो-तीन बार कोई ना कोई ‘डे’ मना ही लिया जाता है. कोई भी डे क्यों मनाया जाता है? सब के कारण अलग-अलग हैं. किसी बड़ी ऐतिहासिक घटना या महापुरुष के जन्मदिन या फिर किसी बड़ी समस्या या बीमारी के खिलाफ अभियान और अवेयरनेस के लिए खास ‘डे’ मनाया जाता है. बहुत सारे ‘डे’ तो यह बताने के लिए मनाए जाते हैं कि संभल जाइए वरना आपके डेज पूरे होने जा रहे हैं. लेकिन कुछ ‘डे’ ये बताने के लिए भी मनाए जाते हैं कि डोन्ट वरी, रोजी डेज आर अहेड. जैसे वैलेंटाइन्स डे, फ्रेंडशिप डे, चाकलेट डे वगैरह. कोई डे ना हो तो जब मन करे हॉलीडे मना लेना चाहिए.
डेज कोई भी हों, ये सब की सेहत की बेहतरी के लिए होते हैं. ये डेज किसी ना किसी रूप में इंसपायर करते हैं. कोई शक नहीं की टोबैको सेहत को तबाह कर देता है. फिर, सिगरेट के कश में ऐसी कौन सी कशिश है कि लोग जानते हुए भी कश पर कश खीचते हुए हर फिक्र को धुंए में उड़ाते चलते हैं. लेकिन ये धुंआ तो सदियों से उड़ाया जा रहा है. राजा-महराजा के जमाने में भी तम्बाकू की तलब लगती थी. तब लोग चिलम और स्टाइलिश हुक्का गुडग़ुड़ाते थे. हुक्का हैसियत और सोशल एक्सेप्टबिलिटी का प्रतीक था. तभी तो बात-बात पर हुक्का-पानी बंद करने की धमकी दी जाती थी. उस समय सगरेट नहीं था. हां, हुक्के की बहन बीड़ी जरूर मौजूद थी लेकिन तब भी उसे बहुत डाउन मार्केट ही समझा जाता था. भला हो गुलजार जी और मार्डन इंटलेक्चुअल्स का जिन्होंने कारपोरेट कल्चर में बीड़ी का बेड़ा गर्क होने से बचाए रखा है. गुलजार जी ने बीड़ी जलइ ले...गाना क्या लिखा लोगों के जिगर में सुलग रही चिंगारी आग की तरह धधक उठी. यंगस्टर्स तो सिगरेट भी बीड़ी जलइले के तर्ज पर ही सुलगाते हैं. लेकिन मार्डन सोसाइटी में बीड़ी दो ‘एक्स्ट्रीम’ पर ही सुलगती दिखती है. एक बिल्कुल डाउन मार्केट मजदूर और लेबर तबका में और दूसरा बिल्कुल हाई इंटलेक्चुअल्स में. इनमें रंगकर्मी, आर्टिस्ट, क्रिटिक या सोशल एक्टिविस्ट्स कोई भी हो सकता है. किसी ने बताया कि हाई सोसाइटी में ‘समथिंग डिफरेंट’ के बहाने कुछ लोग ‘बीड़ी जलइले’ की तर्ज पर बीड़ी फूकतेे हुए जताने की कोशिश करते हैं कि उनके जिगर में कितनी आग है.
वैसे इंटलेक्चुअल्स हों या कॉमनमैन, मोटर मैकेनिक हो या मैनेजमेंट गुरू, थोड़ी सी माथा-पच्ची करते ही उनकी बाडी में निकोटीन की अर्ज बढ़ जाती है. और अर्ज पूरा करने का फर्ज तो निभना ही पड़ेगा. इसके लिए कोई सिगरेट सुलगाता है, कोई पानमसाला फांकता है तो कोई मुंह में खैनी दबा लेता है. सवाल उठता है कि निकोटीन की अर्ज पैदा होने की नौबत आती ही क्यों है? कई चेन स्मोकर्स और खैनीबाजों से बात की कि गुरू ये लत लगी कैसे? सब आहें भरते बताते हैं कि शुरूआत तो शौकिया की थी. किसी ने स्टाइल मारने के लिए, किसी ने गल्र्स को इंप्रेस करने के लिए तो किसी ने माचो लुक के लिए सिगरेट सुलगाई थी. कुछ लोगों ने टाइमपास के लिए तम्बाकू का पाउच मुंह में रखा था तो कुछ ने टेंशन रिलीज करने के लिए. टेंशन कितनी दूर हुई ये तो पता नहीं लेकिन निकोटीन की अर्ज पूरी ना होने पर उनका टेंशन जरूर बढ़ जाता है. अर्ज का मर्ज कहीं इतना ना बढ़ जाए कि टाइमपास के चक्कर में हार्ट बाइपास की नौबत आ जाए. सो टोबैको छोडऩे में क्या हर्ज है.

5/22/10

ब्लॉगिंग में ब्रेक



ब्लॉगिंग में भी ब्रेक होते हैं. ब्रेक लेना तो जैसे फैशन हो गया है. थोड़ा काम किया नहीं कि ब्रेक, थोड़ा बात की नहीं कि ब्रेक, मूड बना तो ब्रेक, नहीं बना तो भी ब्रेक. बिना रुके कोई अगर सरपट भागा जा रहा है तो वो बैकवर्ड है. मार्डन कहलाना है तो भागिए मत ब्रेक लीजिए. और बौद्धिक लोगों को तो ब्रेक की कुछ ज्यादा ही जरूरत हेाती है. थोड़ा सा ज्ञान बघारिए फिर लंबी सांस लेकर कहिए, ‘आई एम टायर्ड नॉव, लेट्स हैव कॉफी’. अब कॉफी बिना तो ब्रेक बनता नहीं. ब्लॉक जगत में तो घुसते ही बौद्धिकता का ठप्पा लग जाता है. जैसे आज के जमाने में अगर आपका ई-मेल आईडी नहीं है, आप ट्विटर या फेसबुक पर नहीं है तो निहायत ही पिछड़े किस्म के व्यक्ति हैं और अगर आपका ब्लॉग नहीं है या ब्लॉगर नहीं हैं तो प्रबुद्ध नहीं. प्रबुद्ध नहीं तो ब्रेक कैसा.
ब्लॉग जगत में भी ऐसे लोगों की भरमार है जो फैशन के तौर पर ब्रेक लेते हैं. उसी तरह जैसे किसी बारात या जनवासे में दूल्हा या उसका जीज्जू नाराज हो जाए और पूरे घराती-बाराती उसे मनाने में जुट जाएं. ये लोग बीच-बीच में जायजा लेने के लिए कि कहीे ब्लॉगरों में उनका महत्व कम तो नहीं हो रहा, रिसियाने का नाटक करते हैं. ये किस बात पर तुनक जाएं कहा नहीं जा सकता. बस अचानक घोषणा कर डालते हैं कि आज से ब्लॉग लिखना बंद. कुछ नियमित ब्लॉगर पूरी तरह ‘कपाट’ बंद नहीं करते. नाराजगी जताने के लिए बस इतना कह देते हैं कि पोस्ट की फ्रीक्वेंसी कम कर रहा हूं. इसके बाद कपाट की झिरी से कनखिया कर देखते रहते हैं कि उसके ‘गोल’ के लेागों पर इसका कैसा असर हुआ और विरोधी खेमे में कैसी प्रतिक्रिया है. रिसपांस जबर्दस्त हुआ तो नाराजगी थोड़ा लम्बी चलती है और रिसपांस फीका हुआ तो किसी बहाने झोला-झंडा लेकर फिर वापस आ जाते हैं.
लेकिन ऐसे ब्लॉगर भी कम नहीं जो बीच बीच में टीवी चैनल्स की तरह अपनी टीआरपी टेस्ट करने के लिए दूसरे ‘गोल’ के छत्ते को छेड़ देते हैं. फिर तो एक-दूसरे को डंक मरने का जो युद्ध शुरू होता है वो एक दो हफ्ते बाद ही शांत होता है. ब्लॉगरों का एक तीसरा गोल भी है जिसके डंक विषैले नहीं होते लेकिन ‘ये क्या हो रहा है’ स्टाइल में व्याकुल हो कर ब्लॉग से विरक्ति का भाव दर्शाने लगते हैं. हिन्दी ब्लॉग्स पर नियमित नजर रखने वाले समझ गए होंगे कि यहां किन ब्लॉगरों और उनके ‘गोल’ की बात हो रही है लेकिन यहां उनका नाम लेकर एक और ‘ब्लॉगर बलवा’ शुरू नही करवाना चाहता. अंत में एक बात और, कोई भी ब्लॉगर कितना भी अच्छा क्यों ना लिखता हो कभी ना कभी उसकी पोस्ट में मोनोटॅनी आ ही जाती है. इस एकरूपता को तोडऩे के लिए भी बीच-बीच में ‘ब्लॉगर बलवा’ जरूरी है. इतने डंक झेलने के बाद ब्लॉगर्स के लिए ब्रेक तो बनाता ही है. तो, मिलते हैं छोटे से ब्रेक के बाद.

5/7/10

कान पर जूं



आप कैसे अपेक्षा कर लेते हैं कि अधिकारियों के कान पर जूं रेंगेगी. मेरे भी कान पर कमबख्त जूं नहीं रेंगी तो नहीं रेंगी. जब खूब घने बाल थे तब भी और अब जब चांद की ओर बढऩे की तैयारी है तब भी. जब खोपड़ी में जूं नहीं है तो कान पर रेंगने का सवाल ही नहीं उठता. लेकिन पब्लिक है कि बिना चेक किए कि किसी अधिकारी के सिर में जूं है या नही, अपेक्षा करने लगती हैं कि बात-बात पर उनके कान पर जूं रेंगे. अब जूं तो उड़ती नहीं कि जहां अधिकारी दिखा उड़ कर उसके कान पर रेंगने लगे. वैसे उड़ती तो छिपकली भी नहीं लेकिन एक- दो बार मेरे जूं विहीन सिर पर लैंड कर चुकी है. किसी ने कहा अपशकुन है तो किसी ने कहा ये राजयोग के लक्षण हैं. राजपाट तो मिला नहीं बाल जरूर कम हो गए. वैसे जब घने बाल थे तब भी जूं नहीं पड़ी और मैं जूं बिनवाने के सुख से हमेशा वंचित रहा. एक दो बार सिर में जूं होने का स्वांग किया लेकिन नियमित जूं बिनवाने कभी सफल नहीं हुआ. क्योंकि पारखी लोग लीक (जूं के अंडे) और डैंड्रफ में फर्क आसानी से कर लेते हैं.
जब हम लोग छोटे थे तो बालों में जूं होना (खास कर लड़कियों के) आम बात थी. जूं बीनने का बाकायदा एक सेशन होता था. ये सामाजिकता का प्रतीक था. दिन में जब भी महिलाएं थोड़ी फुरसत में होती तो, एक-दूसरे की जूं बीनने में जुट जातीं. उसमें बहुत धैर्य और एकाग्रता की जरूरत होती थी. जूं खोज-बीन सेशन का अंत ‘ककवा’ फेरने के साथ होता था. ये जूं कैप्चर करने वाली एक खास किस्म की बारीक कंघी होती है. हमारे तरफ उसे ‘ककवा’ कहा जाता है. हाट-बाजार में तो लकड़ी का भी ककवा मिलता है. इस ‘ककवा’ में खोपड़ी को छील देने की क्षमता होती है. एक बार मैं भी खोपड़ी पर ककवा चलवा चुका हूं. फिर कान पकड़ लिया.
जूं पर सिर्फ लड़कियों का एकाधिकार नहीं है. कुछ लीचड़ किस्म के लडक़ों के बालों में भी जूं रेंगती है लेकिन पता नहीं किस बेवकूफ ने कान पर जूं नहीं रेंगने का मुहावरा इजाद किया था. नीले सियार की तरह भला कौन जूं चाहेगी कि वह बालों के घने झुरमुट से निकल कर कान पर रेंगने लगे और आप उसे पट से मार दें. लेकिन कुछ ना कुछ पेंच है जरूर. बिना उड़े और बिना रेंगे जूं एक खोपड़ी से दूसरी खोपड़ी में कैसे ट्रांसफर हो जाती है. ये आज भी रहस्य है. ये भी रहस्य है कि महिला अधिकारी हो या पुरुष, सिर में झौवा भर जूं हो तब भी कान पर जूं नहीं रेंगती. आपको कभी किसी अधिकारी के कान पर जूं रेंगती मिल जाए तो बताइयेगा, ब्रेकिंग न्यूज चला दूंगा.

5/1/10

...तुम्हारी याद सताती है



चलिए आज फॉरेन घूम आएं. लेकिन यहां फॉरेन की कार, कंपनीं, गेम और मेम का जिक्र नहीं करने जा रहा. एक समय था जब फॉरेन की कारें और फॉरेन रिटर्न लोगों का इंडिया में बड़ा क्रेज था. विदेश से आए लेटर्स को भी लोग सहेज कर रखते थे. जब छुट्टियों में विदेशी इंडियन अपने गंाव-देश आते तो सब पढ़े लिखे लोग उनसे ठेठ अंग्रेजी में ही बात करने की कोशिश करते भले ही विदेशी हिन्दुस्तानी बाबू उनका अवधी या भोजपुरी में जवाब देते हों. भला हो इस इंटरनेट और मोबाइल का, जिसने अंग्रेजी का इंडियनाइजेशन कर दिया और हिन्दी का वैश्वीकरण. अब तो कोई भी अंग्रेजी में एसएमएस और मेल ठोंके देता है. स्पेलिंग गलत हो तो भी चलेगा क्योंकि माना जाता है कि ये तो नेट या एसएमएस की लैंग्वेज है. नेट ने यूनीकोड के रूप में एक ऐसा शस्त्र दे दिया है कि दुनिया के किसी छोर पर बैठ कर दे दना दन थॉट्स की फायरिंग की जा सकती है. सो भाषा के विस्तार से ब्लॉग और ब्लॉगर कैसे बच सकते हैं.

परदेस में घर की याद ज्यादा सताता है. अपने देश की बातों और यादों से जुड़े रहने का बेहतर माध्यम हैं ब्लॉग्स. तो आज बात होगी फारेन में रह रहेे देसी इंडियन ब्लॉगर्स की. फॉरेन में फर्राटेदार हिन्दी में ब्लॉगिंग कर रहे ढेरों ब्लॉगर हैं. इनमें कोई साइंटिस्ट है कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर, कोई ब्रॉडकास्टिंग से जुड़ा है तो कोई प्रोफेसर है. लेकिन ये लोग अपनी भाषा, माटी और संस्कृति से किस कदर जुड़े हैं इसका अंदाज इनके ब्लॉग्स के कंटेंट पर नजर डालने से लग जाता है. इनमें से कुछ लोग तो अपनी भाषा औैर शब्दों का प्रयोग जिस ठेठ देसी अंदाज में करते हैं उससे तो लगता ही नहीं कि ये सात समुंदर पार बैठे हैं. स्तुति पांडे ऐसी ही ब्लॉगर हैं. उनके ब्लॉग का नाम है भानुमति का पिटारा. पिटारा खोलते ही जब चचुआ, सतुआ, बछिया और मचिया निकलने लगती है तो अपनी माटी की सोंधी खुशबू का एहसास होता है. वो पेशे से सिस्टम एनालिस्ट हैं लेकिन ब्लॉग का फ्लेवर ऐसा कि स्तुति पांडे नही सतुआ पांडे ज्यादा लगती हैं. ओटारियो, कनाडा में बैठे उडऩ तश्तरी यानी समीर लाल की चर्चा भी जरूरी है.
आपको सत्या फिल्म के कल्लू मामा तो याद होंगे. उनकी जो रिस्पेक्ट गैंगस्टर्स के बीच थी वैसी ही रिस्पेक्ट उडऩ तश्तरी की ‘ब्लॉगस्टर्स’ के बीच है. वो अच्छे दोस्त की तरह किसी भी ब्लॉगर को टिपिया देते हैं. अब कनाडा से कोई टिपिया रहा है तो ब्लॉगर दांत चियारेंगे ही. इसी तरह राज भटिया जी बैठे हैं जमर्नी में लेकिन उन्हें देसी हुक्के की याद सताती है. लिस्ट तो लम्बी है फिलहाल यादों का मजा लीजिए.

4/23/10

पाsss ! की पावर



प से पवार, प से पॉवर, प से प्रफुल्ल पटेल, प से पापा, प से पूर्णा, प से पॉवर प्ले, प से प्लेन, प से पैसा, प से पुष्कर, प से प्रेमिका
प की महिमा अपरम्पार. प में आ की मात्रा लग जाए तो हो जाता है पाsss! पा माने पापा.
पॉवरफुल पवार की पार्टी के पॉवरफुल मंत्री प्रफुल्ल पटेल की बेटी पूर्णा की पावर तो देखिए- पूरे पैसेंजर्स को उतार कर प्लेन को डायवर्ट कर दिया.

4/10/10

एक ‘नाइस’ चपत



चलिए आज थोड़ी नोकझोंक, थोड़ी दिल्लगी, थोड़ी बंदगी और थोड़ा इमोशनल अत्याचार हो जाए. ब्लॉग के मैदान में भी क्रिकेट की तरह हर कैटेगरी के खिलाड़ी मिल जाएंगे. कुछ टेस्ट मैच की तरह टुक-टुक कर देर तक खेलने वाले, कुछ वन डे मैच की तरह मौके की नजाकत समझ कर शाट लगाने वाले और कुछ ट्वेंटी-ट्वेंटी स्टाइल में हमेशा चौके-छक्के लगाने के मूड में रहने वाले. अब खिलाड़ी हैं तो दर्शक भी होंगे. दर्शक भी तरह- तरह के. कुछ खा-म-खा ताली बजाते हैं, कुछ अच्छे खेल पर एक्साइटेड हो हर्ष ध्वनि करते हैं तो कुछ बात बात पर नोकझोंक करने को आतुर रहते हैं. कुछ तो एग्र्रेसिव हो मैदान मे ं कचरा भी फेंकने लगते हैं. अब वो खिलाड़ी कैसा जिसे शाबाशी या गाली ना मिले. आप समझ गए होंगे खिलाड़ी से यहां मतलब ब्लागर्स से है. उसके रीडर्स और कमेंट करने वाले हैं दर्शक. सो आज ब्लॉग्स में कमेंट्स के खेल पर ही कंसन्ट्रेट करते हैं.
मुझे लगता है कि लोग ब्लॉगिंग की शुरुआत तो अक्सर स्वान्त:सुखाय या अभिव्यक्ति के लिए करते हैं लेकिन जब उन पर कमेंट बरसने लगते हैं, तो उनके अंदर के क्रियेटिव किड की भूख बढ़ जाती है और वो कुछ भी खाकर कुछ भी उगलने और उगलवाने पर उतारू हो जाता है. कल का बच्चा अचानक सचिन तेंदुलकर की तरह ब्लॉगिंग के मैदान में शाट लगाने लगता है. जिस तरह अच्छे शाट पर तालियां मिलती उसी तरह अच्छी पोस्ट पर अच्छी टिप्पणियां भी मिलती हैं. जितने ज्यादा कमेंट्स उतनी ज्यादा पोस्ट. धीरे-धीरे स्वान्त:सुखाय लिखने वाला ब्लॉगर बावलों की तरह किसी भी विषय पर कुछ भी लिखने लगता है. एक अच्छा भला लिखने वाला सर्वज्ञानी, अभिमानी उपदेशक और आलोचक की भूमिका में कब आ जाता है, उसे पता ही नहीं चलता. उसके लेखन में मौलिकता की जगह मैनेजमेंट हावी हो जाता है. किसी अच्छे भले लेखक का दिमाग खराब करने में टिप्पीबाजों की बड़ी भूमिका होती है. कोई कैसा भी लिखे, हर पोस्ट पर ये टिप्पणीबाज वॉह-वाह, शानदार पोस्ट, नाइस, एक्सेलेंट, बधाई, ऐसा ही लिखते रहें, जैसे चालू कमेंट कर अपना राग एक ही सुर में आलापते रहतें हैं. जैसे हाल ही में दंतेवाड़ा में नक्सिलियों ने सीआरपीएफ के जवानों का नरसंहार किया. उस पर एक ब्लॉगर ने दुख व्यक्त करते हुए नक्सली समस्या के समाधान पर बड़ी संजीदगी से कुछ कुछ बातें लिखीं थीं. उस पर एक कमेंट आया ‘नाइस’. इस कमेंट से ये पता नहीं चल पाया कि वो सज्जन किसको नाइस कह रहे हैं. एक और कमेंट था ‘बिल्कुल सही लिखा है’. अब आप दिल पर हाथ रख कर बताइए कि आप जो भी पोस्ट लिखते हैं उसे सही समझ कर ही तो लिखते हैं. कुछ टिप्पणीबाज कमेंट तो संक्षिप्त करेंगे लेकिन अपनी गली-मोहल्ले और घर का पता मोबाइल नंबर के साथ विस्तार से लिखेंगे. ऐसे ही एक और चिंतक-विचारक और बौद्धिक किस्म के ब्लागर हैं. वो चाहते हैं कि उनकी हर पोस्ट पर नेशन वाइड डिबेट हो लेकिन खुद आपकी पोस्ट पर एहसान करते हुए संक्षिप्त टिप्पणी ‘पान पर चूने की तरह’ लगा आगे बढ़ जाते हैं.
(जैसा आई नेक्स्ट के ब्लॉग-श्लॉग कालम में लिखा)

4/3/10

...चंद्रवदन मृगनयनी बाबा कहि कहि जाय



केशव केशन अस करी अरिहु ना जस कराय, चंद्रवदन मृगनयनी बाबा कहि-कहि जाय. केशव जी व्यथित हो कहते हैं कि उनके बालों ने उनकी जो गत बनाई है वैसा तो कोई दुश्मन के साथ भी नही करता. सफेद बालों के चलते सुंदर बालाएं उन्हें बाबा कह कर संबोधित करती हैं. केशव के जमाने के ‘बाबा’ आज के जमाने के ‘अंकल’ ही हुए ना. केशव तो महान कवि थे और मैं साधारण आदमी लेकिन केशव की तरह मुझे भी बच्चों को छोड़ कर कोई अंकल कहता है तो अच्छा नहीं लगता. मैं सभी स्त्रियों का सम्मान करता हूं लेकिन इस मनोविज्ञान पर मेरा वश नहीं. क्यों? इस पचड़े में नही पडऩा, बस अच्छा नहीं लगता तो नहीं लगता. जब संजू बाबा, शहरुख, सलमान या आमिर खां के आधे उम्र की बालाएं उन्हें अंकल नहीं कहती तो मैं क्यों अंकल कहलाऊं. माना कि मैं उन जैसा हैंडसम अब नहीं रहा लेकिन दिल उनसे ज्यादा युवा अब भी है.
जब कवि केशव ‘बाबा’ कहने पर अफसोस जता सकते हैं तो मैं क्यों नहीं. वो सम्मानित कवि हैं ऐसे में उनकी लाइन पकड़ लूं तो क्या हर्ज है. अब ये तो ह्यूमन साइकॉलजी है कि मनुष्य तन से नहीं तो मन से अपने को युवा समझता है और जब तक उसके अंग-प्रत्यंग जवाब नहीं देने लगते तब तक उसे पता ही नहीं चलता की वो बूढ़ा हो रहा है. मैं भी अपवाद नहीं. लेकिन ईश्वर की कृपा से अंग-प्रत्यंग अभी दुरुस्त हैं. सो थोड़े दिन यूथाफुल होने में कोई बुराई नहीं.
अब आपको बताता हूं कि इतना प्रपंच क्यों कर रहा हूं. ईश्वर की बड़ी कृपा होने पर ही ब्यूटी विद ब्रेन का काम्बिनेशन बनता है. ऐसे ही एक काम्बिनेशन वाली बाला को गूगल पर बजबजाते हुए अचानक मेरा ब्लॉग पसंद आ गया. अच्छी बात ये कि उसने फोन पर भी बात की और ब्लॉग की प्रशंसा की, बुरी बात ये कि उसने मुझे अंकल कहा भले ही इसकी अनुमति ले कर कहा हो. अब कोई अंकल कहना चाहे तो शिष्टाचार में मैं मना कैसे कर सकता हूं. मैंने खीसें निपोर कर कह दिया कहो-कहो कोई बात नहीं, लेकिन बात तो है. अरे मन से कुछ और दिन युवा रह लेने दो भाई. अंकल या बाबा कहना जरूरी है क्या? माना कि मन में मेरे प्रति बड़ा सम्मान है लेकिन नाम के आगे जी लगाने से भी तो काम चल जाता है.
खैर, कोई बात नहीं. उस बाला के ब्लॉग पर आए कमेन्ट्स में अपने जैसे चच्चुओं की लाइन लगी देखी तो बड़ा अच्छा लगा कि उस बाला ने इनमें कइयों से अंकल कहने की अनुमति जरूर ली होगी. अगर नहीं तो केशव की लाइनें एक बार फिर याद कर मैं तसल्ली कर लेता हूं.

4/2/10

पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में




पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में आज मैं आजाद हूं दुनिया के चमन में...जब भी परिंदों को उड़ते देखता हूं तो ये लाइनें याद आने लगती हैं. कल्पनाओं को पर लग जाते हैं. उस दिन भी जब पिंजरें से करीब पचास गौरैया मुक्त की गई तो सब फुर्र-फुर्र कर उड़ गई सिर्फ एक चीड़ा नहीं उड़ सका. वो पिंजरें में ही दुबका रहा, शायद बीमार था. उसे हथेली पर रख कर उड़ाने की कोशिश की फिर भी नही उड़ा. ढेर सारी गौरैया को आजाद कराने की खुशी फीकी सी पड़ गई. मेरे एक साथी ने उस चीड़े को चिडय़ाघर के डाक्टर के पास भिजवा दिया. पता नही उसका क्या हुआ. लेकिन बाकी सब खुश थे.

बात 20 मार्च की है. इस दिन अब लोग गौरैया दिवस मनाने लगे हैं क्योंकि गिद्धों के गायब होने के बाद गौरैया भी अब कम ही दिखती हैं. गिद्ध पर रिसर्च हो रहा है लेकिन गौरैया क्यों गायब हुईं इस पर बस बातें हो रही हैं. पता नहीं किसने और क्यों 20 मार्च का दिन गौरैया के लिए चुना. इसके पहले नहीं सुना था कि वल्र्ड स्पैरो डे भी मनाया जाता है. खैर दिवस कोई भी हो एनजीओ उसे जरूर मनाते हैं. अखबारों में एक दो दिन खबरें छपती हैं. प्यारी सी गौरैया की फोटो अच्छा से कैप्शन और कभी-कभी कविता की कुछ लाइनें गौरैया को समर्पित. कुछ लोग अपने बचपन की गौरैया को याद कर लेते हैं. फिर सब कुछ पहले की तरह. हमारे एक साथी हैं कौशल किशोर और विशाल मिश्रा. उन्होंने ने सोचा गौरैया के लिए कुछ किया जाए . वो चौक के अवैध पक्षी बाजार से करीब 50 गौरैया खरीद कर ले आए. सोचिए अब गौरैया भी बिकने लगी हैं. तय हुआ की जू में ले जाकर उन्हें उड़ा दिया जाए. जू में किसी स्कूल के बच्चे पिनिक मनाने आए थे. उनसे पूछा कि किसके घर में गौरैया घोसले बनाती हैं तो तो सिर्फ दो हाथ उठे. उन बच्चों को गौरैया के गायब होने की बात बताई गई और पूछा कि वो उन्हें पिंजरे में बंद रखना चाहते हैं या उड़ाना? तो सब ने कहा उड़ाना. पिंजरा खोल दिया गया और गौरैया फुर्र हो गईं. सिर्फ एक को छोड़ कर.
गौरैया को उड़ते देख बच्चे खुशी से उछल रहे थे. मुझे लगा जैसे मेरे आस पास बच्चे नहीं ढेर सारी गौरैया गा रही हों...पंक्षी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में आज मैं आजाद हूं दुनिया के चमन में..

3/20/10

बज़बज़ाते ब्लॉगर



आपने भुन-भुनाहट सुनी है ना. अरे वही जिसे इंग्लिश में बज कहते हैं. भौंरे, भुनगे, मक्खी या मच्छर, भुन-भुनाहट किसी की हो, हम इसे इग्नोर नहीं कर सकते. इनकी साउंड फ्रीक्वेंसी इरिटेट भी करती हैं लेकिन ब$ज इरिटेट नहीं अट्रैक्ट करता है. वो सेलेब्रिटी, इंवेंट या प्रॉडक्ट कैसा जिसमें ब$ज ना हो. सो आज ब्लॉगर्स ब$ज की बात करते हैं. वैसे तो ब्लॉग जगत में भुन-भुनाने वाले भुनगों और भौंरों की भरमार है. इनमें कुछ लुभाते हैं, कुछ डंक मारते हैं. ब्लॉग की भुन-भुनाहट फेसबुक और ट्वीटर पर तो पहले भी सुनाई पड़ती थी पर गूगल दादा के ब$ज ने सबका बाजा बजाना शुरू कर दिया है. कहा तो ये भी जा रहा है कि जल्दी गूगल, ब$ज का बॉस बन बैठेगा. गूगल ने जब से जी मेल पर बज़-बज़ाहट शुरू की है, हर तरफ ब$जर सुनाई पड़ रहा है. ब्लॉगर्स अब ब$जर की भूमिका में भी हैं. उनकी भुन-भुनाहट अचानक तेज हो गई है. फेसबुक और ट्वीटर के भौंरे और भुनगे फेंसिंग पार पर गूगल के बाड़े में मंडराने लगे हैं. बगीचा फूलों से लदा है और ब$जर्स के झुंड के झु़ंड कभी इस फूल कभी उस फूल पर मंडरा रहे हैं. कुछ ब्लागर्स तो ब्लॉग लिखना भूल कर बजिंग में बिजी हैं. और कुछ सयाने ब्लॉगर्स तो अपनी पूरी की पूरी पोस्ट ही ब$ज में उड़ेल देते हैं.
ब$ज की हालत यह है कि कब चुहलबाजी से शुरू हुई बात गंभीर बहस का रूप ले लेती है, पता ही नहीं चलता. ब$ज के बहाने आप अपने कांटैक्ट ग्रुप से होते हुए दूसरों के कांटैक्ट तक पहुंच सकते हैं. किसी को कहीं भी टीप लगाने की पूरी छूट है. किसी को चिकोटी काटिए, उस पर असर ना पड़े तो किसी और को चपत लगा कर देखिए, कभी ना कभी तो भुन-भुनाएगा ही. उनके ऐक्शन-रिऐक्शन का मजा ही कुछ और है. कभी-कभी विषय कुछ होता है और बहस किसी और बात को लेकर शुरू हो जाती है. जैसे किसी ने अपनी फोटो की जगह कैरीकेचर लगा दिया, किसी ने लुक्स पर कमेंट किया तो कोई पहनावे की नापजोख करने लगता है. किसी को कैरीकेचर इनोसेंट लगता है, किसी को फनी. किसी ने कहा कि आपने क्या पहन रखा है-बरमुडा, घुटन्ना या नेकर? बस कोई बरमुडा का इतिहास बताने लगा तो कोई घुटन्ने का बखिया उधेडऩे लगता है. एक साहब ने तो इसकी डिजाइनिंग का ऐसा पाठ पढ़ाया कि बड़े बड़े फैशन डिजायनर पानी भरें. तो आप भी मजा लीजिए ब$ज का. अरे..देखिए कोई भुनभुना रहा है.
(जैसा कि आई नेक्स्ट के ब्लॉग-श्लॉग कॉलम में लिखा)

2/28/10

संइयां भये लड़कइयां ...


कुछ दिन पहले मालिनी अवस्थी परफार्म कर रहीं थीं-सइयां भये लड़कइयां मैं का करूं. जिसे देखो आजकल वही 'बच्चा' बना हुआ है. ये समय ही ऐसा होता है. पहले बसंत फिर फागुन इसी के बीच में वैलेंटाइंस डे और अब होली. हवा में कुछ ऐसी खुनक, ऐसी महक होती है कि छोटे तो छोटे, बयालीस बसंत दख चुके बुजुर्ग भी बहक कर 'लड़कइयां' मोड में आ जाते हैं.
लोग कहते हैं क्लाइमेट चेंज हो रहा है. इकोलॉजिकल सिस्टम गड़बड़ हो रहा है. अरे कितना भी क्लाइमेट चेंज हुआ करे, फागुन की केमिस्ट्री में कोई बदलाव नहीं आया है. पहले भी आम और आवाम, फागुन में ऐसे ही बौराते थे और अब भी बौरा रहे हैं. पहले इसे बावला होना और आजकल केमिकल लोचा कहते हैं. 'बौराने' या 'लड़कइयां' में आज भी केमेस्ट्री के वही फार्मूले लागू होते हैं बस पे्रजेंटेशन का तरीका बदल गया है. केमिस्ट्री वही है नाम बदल गए हैं. केमिस्ट्री ही आपको मन से यंग या ओल्ड बनाती है. फागुनी हवा में ऐसे कुछ केमिकल एलीमेंट्स जरूर हैं जिनके ज्यादा हो जाने से 'मोड' चेंज हो जाते हैं और 'अंकल मोड' वाले 'बच्चा' या 'लड़ंकइयां मोड' में कब आ जाते हैं पता ही नही चलता.
लेकिन कुछ लोगों में तो इस केमिकल की क्वांटिटी बाई बर्थ कुछ ज्यादा होती है और वो बारहों मास मन से यंग यानी लड़कइयां रहते हैं. ताउम्र कुछ ना कुछ नए प्रयोग और कुछ रोमांचक करने की ललक उनके लिए एंटी आक्सीडेंट्स का काम करती है. लेकिन जब कपल्स में एकबच्चा मोड में और काउंटरपार्ट 'कन्वेंशनल' मोड में तो कम्पैटिबिलिटी प्राब्लम खड़ी हो सकती है. लेकिन यहां साफ कर दूं कि प्राब्लम अक्सर सिर्फ 'कनवेंशनल' मोड वाले को होती है तभी तो वह साथी के लड़कंइयांपन से तंग आकर गाने लगता है- संइयां भये लड़कइयां मैं का करूं. और दूसरी तरफ सैंयां... दिल तो बच्चा है जी, थोड़ा कच्चा है जी.. गुनगुनाते हुए बसंत के पचास ओवर्स खेल कर भी नाटआउट. वैसे ये जब तक घर में यानी नेटवर्क एरिया में रहते हैं तो तब तक कम्पैटिबिलिटी प्राब्लम नहीं होती, लेकिन जहां वे नेटवर्क एरिया से बाहर निकले समस्या, खड़ी हो जाती है.
एक बात और, 'बच्चा' दिखने की कोशिश में बच्चों जैसी हरकत कभी मत करिएगा वरना कयामत आ जाएगी और पहनने पर नहीं पडऩे पर जूता बोलेगा चुर्र. युवा होने के लिए कभी अभिनय की जरूरत नहीं पड़ती. ये फीलिंग तो सेल्फ स्टीम्ड है, अंदर से आती है. एक सज्जन युवा दिखने के चक्कर में हाइपर टेंशन के मरीज हो गए और वक्त से पहले बूढ़े दिखने लगे. उन्होंने युवा दिखने के लिए अपने ग्रे होते बालों पर कलर्स के हर शेड अपनाए लेकिन इस टेंशन से कभी भी मुक्त नहीं हो सके कि कहीं कलर्स के केमिकल रिएक्शन से उनके बाल कम ना हो जाएं. केमिकल रिएक्शन कितना हुआ ये तो पता नही लेकिन टेंशन से उनके बाल जरूर झड़ गए. सो लड़कइयां दिखने की नहीं फील करने की चीज है. जो बात-बात पर टेंशन लेने लगे वो बच्चा कैसे रह पाएगा.
इसके ठीक उलट 'यंग फार एवर' टाइप लोग हैं. उम्र बढ रही हो, बाल सफेद हो चुके हों, पहले जैसे घने भी ना रह गए हों तो भी उनको फर्क नहीं पड़ता. एनर्जी इतनी कि यंगस्टर्स ईष्र्या करने लगते हैं. दरअसल ये एनर्जी पाजिटिव एटीट्यूड से मिलती है. जैसे एक ओल्ड होत 'यंगीज' से जब कोई यंग स्मार्ट गर्ल स्माइल के साथ बात करती तो सारे यंग कलीग्स टांट करते ..अरे उसे उसने अंकल बोला.. चिढऩे के बजाय उनका पलट कर जवाब होता यानी तुम सब अब भी मुझको एक रीयल थ्रेट मानते हो...हा हा..बस उनकी एनर्जी में इजाफा हो जाता. यही केमिकल तो एंटीआक्सीडेंट का काम करता है. इसका सीधा संबंध आपके इमैजिनेशन से है. आप जो भी इमैजिन करते हैं या लिखते हैं वो आपकी पर्सनालिटी में रिफ्लेक्ट होता है. इसमें एक्टिंग या स्वांग नही चलता. मन के रेडियो की ट्यून बदल कर कुछ और राग सुनाने का स्वांग करेंगे तो पकड़े जाएंगे. इस लिए दोस्तों 'बच्चा' बनना बच्चों का खेल नही है. हां, फागुन पार आप 'लड़कइंया' हो सकते हैं. लेकिन ऐसा करते समय इब्नेबतूता को जरूर याद कर लिया करिए.

2/20/10

जॉर्ज और लाल मुनिया


आइए आज आपको जॉर्ज शेपर्ड से मिलाता हूं. हमारी टीम के सबसे सीनियर मेंबर. अ जेंटिलमैन विद सिंपल लिविंग. नो कम्प्लेंस नो रिग्रेट्स एंड इंज्वाइंग लाइफ ऐज इट इज. एक अच्छे इंसान और अच्छे नेबर. सो एक दिन उनके पड़ोसी एक हफ्ते के लिए कहीं बाहर जा रहे थे. उन्होंने देखरेख के लिए जार्ज के घर लालमुनिया का अपना पिंजरा रख दिया. जार्ज और उनकी फैमिली ने लालमुनियाओं की अच्छे से देखभाल की. पड़ोसी खुश हुए और वो जार्ज के बेटे के लिए बज्जियों का एक जोड़ा ले आए. जार्ज के घर में इत्तफाक से एक पुराना पिंजरा थ. सो उन्होंने बज्जियों को पिजरें में रखा और उनकी देखभाल करने लगे. लेकिन कुछ दिन बाद एक दिन एक बज्जी मर गया. अकेले बज्जी पर तरस खाकर कर जार्ज बाजार से तीन बज्जी और ले आए. लेकिन कुछ दिन बाद उनमें से दो बज्जी फिर मर गए. लेकिन बचे हुए दोनों पक्षी मेल थे सो अक्सर लड़ते रहते थे. अब जार्ज ने फिर तरस खा कर एक और पिंजरा खरीदा और दोनों को अलग अलग कर दिया. यानी दो बज्जी दो पिंजरे. जार्ज उन्हें रोज दाना चुगाते हैं. पड़ोस में लालमुनिया और जार्ज के यहां बज्जी, सब की जिंदगी आराम से कट रही थी. लेकिन नेबर को फिर कही जाना पड़ा. वो फिर लाल मुनिया का पिंजरा जार्ज के घर रख गए हैं. सो इस समय उनके घर तीन पिजरें हैं और जार्ज सबकी देखभाल कर रहे हैं. इसे कहते हैं हैप्पी एंडिंग.

2/19/10

...और फैल गया रायता




ये रायता क्यों फैला है भाई. बारात तो विदा हो गई लेकिन शादी के पंडाल के किनारे ये गाय, कौवे और कुत्ते किस ढेर पर मुंह मार रहे हैं. अच्छा-अच्छा कल रात में यहां भोज था. भुक्खड़ लोग जिस तरह भोजन पर टूट पड़े थे उसे देख कर रात में ये कुत्ते शरमा कर भाग खड़े हुए. अब फैले रायते का आराम से आनंद ले रहे हैं. अभी भी इन सबका पेट भ्रने के लिए यहां बहुत कुछ है. पुलाव, कचौडिय़ां, मटर पनीर, रायता और भी बहुत कुछ, सब गड्ड-मड्ड .
इस तरह का रायता फैलाने वाले लगता है अखबार नही पढ़ते. हाल ही में एक खबर थी कि लोग शादी-समारोहों में खाना बहुत बर्बाद करते हैं. भोज के बाद ढेर सारा खाना फेंका जाता है. यहां बचे हुए खाने की बात नहीं हो रही. वह तो 'प्रजा' में खप ही जाता है . यहां मामला प्लेट में छोड़ दिए गए खाने का है . 'कुक्कुरभोज' के बाद इस खाने को कुक्कुर ही खाते है. अखबार के उसी पेज पर एक और खबर थी जिसमें ग्राफ के जरिए बताया गया था कि गन्ना, चीनी, दाल, गेहूं और तिलहन के प्रोडक्शन में कमी आई है लेकिन मशीनों के प्रोडक्शन में इजाफा हुआ है . फिर भी लोग खाना बर्बाद करते हैं. मैंने कुक्कुर भोज में 'पार्टिसिपेट' करने वालों को ऑब्जर्व किया और पाया कि -
१. भोजन के पहले लोग चाउमीन, चाट-पकौड़े इतना भर लेते है कि 'मुख्य भोजन' के लिए पेट में जगह ही नही रह जाती फिर मन है कि मानता नहीं की तर्ज पर लोग थोड़ा-थोड़ा हर व्यंजन प्लेट में रखते जाते है. अब प्लेट भर जाने पर रायता तो फैलेगा ही.
२.सामूहिक भोज में लोगों को लगता है कि कहीं कोई आइटम खतम ना हो जाए सो दोबारा लेने के बजाय एक बार में ही प्लेट में पहाड़ बना लेते हैं. तभी तो लगता है जैसे प्रीतिभेज में लेाग हाथ में गोवर्धन पहाड़ उठाए घूम रहे हों.
३.भीड़ की रेलम पेल में कुछ लोग जोखिम ना उठाते हुए एक ही बार में सारा कुछ प्लेट में डाल लेते हैं. फिर आधा खा कर बाकी डस्टबिन के हवाले.
काश लोग थोड़ा कम खाते, गम खाते, कुक्कुरों पर नहीं खुद पर तरस खाते. लेकिन जब तक 'बीपी अंकल' और 'डायबिटीज आंटी' से इन्हें डर नहीं लगेगा तब तक इसी तरह रायता फैलता रहेगा.

2/13/10

ब्लॉगर बाबाओं की जय हो



इस समय मौसम सेंटियाना हो चला है यानी बाबाओं का बोलबाला है. कल शिवरात्रि पर भोले बाबा की धूम थी, हरिद्वार महाकुंभ में शाही स्नान के समय हरि की पैड़ी बाबामय हो गई थी. ज्यादातर न्यूज चैनल्स में बाबा विराजमान थे. अब तो ढाबाओं की तरह हर तरफ बाबा ही बाबा दिख रहे हैं. अब संडेे को वैलेंटाइन बाबा का बोलबाला. तो इस बार ब्लॉग्स में बाबाओं के बारें में बात करते हैं. वैसे ब्लॉगर भी किसी बाबा से कम नही होते. जो जी में आया कहा और किसी ने कुछ पलट कर कुछ सुनाया तो सुन लिया. प्रशंसा और आलोचना को समभाव से लेते हैं. अपने कहे को ज्ञानीवाणी और दूसरों की बात को नादानी कहना इनका शगल है. पॉपुलैरिटी के लिहाज से इंडिया के टॉप बाबाओं की तरह ब्लॉगर भी अपनी ऑरा से मुग्ध रहता है. इनमें में ज्यादातर समय के साथ चलने वाले मार्डन किस्म के बाबा हैं. जो टेक्नालॉजी सैवी हैं, शास्त्रीय बातों को नए तरीके से प्रेजेंट करना जानते हैं, उनका पीआर वर्क शानदार है. यही वजह है कि इसमें से तो कई सेलेब्रिटी स्टेटस को प्राप्त कर चुके हैं. पॉपुलैरिटी के मद में अक्सर बाबा लोग पॉलिटिकल लीडर की तरह बतियाने लगते हैं. ऐसे किसी टीवी चैनल पर या प्रवचन के दौरान कहीं भी हो सकता है. अब किस योग गुरू ने हाल में क्या कहा ये सब तो आप देखते और पढ़ते रहते हैं. आइए ब्लॉगर बाबाओं पर नजर डालें.
भोले बाबा की नगरी काशी के ब्लॉगर बाबा अरविंद मिश्र ने http://mishraarvind.blogspot.com पर शिवरात्रि के बहाने से अपने भक्तों (रीडर्स) को बता दिया कि उन्हें शिव तांडव स्तोत्र कंठस्थ है और उन्होंने प्रसाद स्वरूप भक्तों के लिए अपने ब्लॉग में अपनी लेजर डिस्प्ले युक्त? ऑडियो क्लिपिंग लगा दी है. वैसे उनके ब्लॉग क्वचिदन्यतोअपि.. अपने आप में एक बड़ा टंगट्विस्टर है. इसका उच्चारण करते समय बड़े बड़े लर्नेड लटपटा जाते हैं.
एक और सम्मानित ब्लॉगर हैं सुरेश चिपलूनकर. उन्होंने तो महाशिवरात्रि पर अपने ब्लाग http://blog.sureshchiplunkar.com में भक्तों के लिए एक दानपात्र ही लगा दिया है. उनके इरादे नेक हैं और प्रयास सराहनीय. उनके इस प्रयास ने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए हैं कि चिपलूनकर भाई की तरह कभी मैं भी अपने ब्लॉग पर धर्मार्थ कार्य का कोई 'चिपÓ लगा सकता हूं.
अब थोड़ी बात बाबा वैलेंटाइन की भी. कैसी विडंबना है कि वैलेंटाइंस डे आते ही लोग दो खेमो में बंट जाते हैं. एक प्रो और एक एंटी. बाबा वेलेंटाइन किसी भी देश के रहे हों, उनका निस्वार्थ और निश्छल प्रेम संदेश तो पूरी दुनिया के लिए था इसमें धर्म और संस्कृति कहां से आ गए. वेलेंटाइंस डे पर थॉट प्रवोकिंग पोस्ट लिखी है वीरेंद्र कुमार जैन ने http://rachanakar.blogspot.com/ पर. और भी ढेर सारे ब्लॉगर बाबाओं ने भोले बाबा का प्रसाद परोसा है अपनी पोस्ट के बहाने. सो ग्रहण करने के लिए लाइन से आएं.
-राजीव ओझा ने जैसा आइ नेक्स्ट में ब्लॉग-श्लॉग कॉलम में लिखा

2/6/10

इब्ने बतूता राहुल का जूता..उठाओ तो बोले चुर्र...


इब्ने बतूता राहुल का जूता..ता..उठाओ तो बोले चुर्र... आज कल हर जगह जूतों की जयकार है. भला हो इब्ने बतूता, सर्वेेश्वर दयाल सक्सेना और गुलजार का कि जूता राग लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है. शुक्रवार को राहुल मुंबई में थे. कभी यहां कभी वहां. अम्बेडकर प्रतिमा पर फूल चढ़ाने भी पहुंचे. जूता (या चप्पल) रास्ते में उतारी. एक मंत्री जी ने हाथ से उठा कर किनारे कर दिया. उठाने में जूता बोला चुर्र, शिवसेना ने किया गुर्र्र. बोली, देखा कांग्रेस में हैं चापलूसों की जमात, राहुल की क्या करें बात. सुना है राहुल ने लाइन लगा कर लिया रेल टिकट . फिर एटीएम से पैसे निकाले फटाफट. मान लीजिए राहुल को एटीएम से पैसा निकालते देख कोई कांग्रेसी उन्हें दे देता उधार तो मचता एक नया बवाल. शिवसेना कहती ये रोड शो है फेक, कांग्रेसी कहते पार्टी खुश है मराठियों का राहुल प्रेम देख. इब्ने बतूता किसका जूता..उठाने पर बोले चुर्र..असली मुद्दा हो गया फुर्र..

2/2/10

रूम नं. 317


हे रेल देवता ट्रेन थोड़ी लेट कर देना, बड़ी कृपा होगी. आमीन! जा बच्चा ऐसा ही होगा. और उसके बाद हुआ वो जिंदगी भर नहीं भूलूंगा. इसी लिए कसम खाई है कि विश सोच समझ करूंगा, पता नहीं कब सही हो जाए. पिछले दिन अपने आर्गेनाइजेशन के वार्षिक जलसे में आगरा जा रहा था. जलसा आगरा के मशहूर फाइव स्टार होटल मुगल में था. वहां तीन दिन रुकने की उत्तम व्यवस्था थी. पहले दिन दोपहर बारह बजे रिपोर्ट करना था. ट्रेन के आगरा पहुंचने का टाइम सुबह सात बजे ही था. सोच रहा था कि पांच घंटे कहां बिताउंगा सो काश, ट्रेन दो तीन घंटे लेट हो जाए. लेकिन इसके बाद जो हुआ तो कान पकड़ लिए कि रेल देवता से कभी विश नही करूंगा.
ट्रेन सात बजे के बजाय दो बजे आगरा पहुंची. जलसा एक बजे ही शुरू हो चुका था. हांफते हुए होटल में चेक-इन की फार्मेलिटी पूरी की. बताया गया अपको रूम नं. 317 में रुकना है. उसमें मेरे पार्टनर मनोरंजन सिंह थे. उनकी ट्रेन टाइम से थी सो वो सूट-बूट पहन और टाई- टीका लगा, लंच-वंच कर कांफ्रेंस में जा डटे थे. रिसेप्शन पर एअरहोस्टेस जैसी कई 'मुगल बलाएं' मुस्कराते खड़ी थीं मे आई हेल्प यू स्टाइल में. मैंने कहा मास्टर की से मेरा रूम खोल दीजिए, पहले ही लेट हो चुका हूं. एक मलिका ए मुगल ने कहा फालो मी सर. मैंने कहा फास्ट! उसने दौड़ लगा दी. पीछे-पीछे मैं बैग लिए दौड़ रहा था उसी तरह जैसे हीरोइन के पीछे विलेन दौड़ता है. रूम नं. 317 में घुसते ही 'ट्रिपल एस' (शिट, शेव,शॉवर) को दस मिनट में पूरा करने में जुट गया.
बस यही गड़बड़ हो गई. पहले दो काम तो कुशलतापूर्वक निपट गए लेकिन शॉवर लेते समय शामत आई. बाथरूम में एक तरफ बाथ टब होता है, दूसरी तरफ बेसिन और शीशा वगैरह और दोनो के बीच में कमोड. पूरे फर्श पर टॉवेल बिछी होती है. अब टब में नहाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता, उसी में बैठ कर या खड़े होकर नहाना पड़ता है. लोग फिसलें ना इसके लिए टब के अंदर एक रबर की मैटिंग भी बिछी होती है. मेरे टब में मैटिंग बाहर रखी हुई थी. मैं स्लीपर पहने टब में खड़े होकर शॉवर से नहाने लगा लेकिन जैसे ही साबुन का पानी टब की फर्श पर पड़ा कि मैं सटाक से चारों खाने चित. संभलने का मौका ही नहीं मिला. टब के स्लोप के कारण ज्यादा चोट नही लगी लेकिन 'पिछाड़ीÓ के बल गिरने से दर्द तो महसूस हो ही रहा था. तुरंत खड़े हो देखा कि कूल्हे वगैरह सलामत हैं कि नही. दर्द पर ध्यान ना देकर जल्दी से तैयारहो कांफ्रेंस हाल में पहुंचा. लोग हसेंगे इस लिए किसी से गिरने की बात बताई नहीं.
रात को पार्टी-शार्टी हुई. करीब बारह बजे रूम पर पहुंचा. साथी मनोरंजन से थोड़ी गप मारी और लाइट बुझा कर सो गया. सुबह पहले मैं ही उठा. सो रहे मनोरंजन पर नजर पड़ी तो चौंक गया. उनकी नाक पर कट लगा हुआ था और एक आंख के नीचे काला पड़ गया था. जगा कर पूछा ये क्या हुआ. दरअसल सारी लाइट बुझा दी थी इस लिए मनोरंजन रात को अंधेरे में बाथरूम में जाते हुए दरवाजे या किसी और चीज से जा भिड़े थे. रूम नंबर 317 के बाथरूम में एक और बड़ा हादसा टल गया था. मैंने कहा मुझे जगाया क्यों नहीं? बोले आप नींद में थे इस लिए डिस्टर्ब नहीं किया. अब मैं भी खुला कि गुरू इस बाथरूम में दोपहर में तो मैं भी गिरा था. पिछाड़ी में उसकी टीस अभी भी है. एक जोरदार ठहाका और मैंने तीन कसमें खाईं- 1.अब कोई विश नहीं करूंगा 2.टब में स्लीपर पहन कर नहीं नहाउंगा 3. टब में रबर की मैट है कि नही ये पहले चेक करूंगा.

1/29/10

राजू बिन्दास!: ...और फोन पर आई भूत की आवाज

राजू बिन्दास!: ...और फोन पर आई भूत की आवाज

त्रिवेदी की फोल्डिंग और भटनागर की रजाई



अफवाह उड़ी कि डा. प्रदीप भटनागर उदयपुर जा रहे हैं. खबर कितनी सही है ये तो पता नहीं लेकिन इसी बहाने चंडीगढ़ में उनकी रजाई की याद आ गई, जो पराए की लुगाई की तरह पता नहीं कहां गुम हो गई है. अनिल त्रिवेदी अभी भी चंडीगढ़ में ही हैं और मेरी फोल्डिंग फिर उनके पास पहुंच गई है. जिंदगी की कुछ छोटी-छोटी बातें ऐसी होती हैं जो बार-बार याद आती हैं.
बात बनारस की है. कैरियर शुरू ही किया था. मेरे साथ नगवा में मेरा एक दोस्त रहता था. वो इलाहाबाद बैंक में पीओ था. तीन कमरे के एक शानदार किराए के मकान में हम दोनो रहते थे. एक कमरे में मेरी फोल्डिंग लगी रहती थी, दूसरे में उस दोस्त की और तीसरे कमरे में हम दोनों साइकिल खड़ी करते थे जिससे घर भरा-भरा लगे. एक बड़ा सा किचेन और उससे लगा आंगन भी था. अलग-अलग कमरों में इस लिए सोते थे कि मैं देर रात लौटता था और दोस्त को सुबह जल्दी गंगा पार बैंक जाना होता था. मेरा ऑफिस लहरतारा में था. वही लहरतारा जहां कबीरदास जन्मे थे. मेरा जीवन भी फक्कड़ों जैसा ही था. एक फोल्डिंग, रजाई-गद्दा हवा की तकिया, साइकिल और एक अटैची. मेरा दोस्त राजा बेटा था, मैं सोता ही रहता और वो सुबह नहा धो कर पूरे घर में पोंछा लगा कर स्टोव पर दो कप चाय बनाता था और मुझे डरते-डरते उठाता था. मैं भी ऐसे चाय पीता जैसे बड़ा अहसान किया हो. उसके जाने के बाद फिर रजाई तान कर सो जाता. मेरा दिन 12 बजे शुरू होता. एक बार फिर से चाय बनाता. मस्ती में दिन कट रहे थे.
उस समय हमारे संस्थान में अनिल त्रिवेदी और प्रदीप भटनागर भी थे. दोनों से मेरी खूब छनती थी. एक साल बाद लखनऊ लौटने की घड़ी आ गई. फोल्डिंग बनारस में ही अपने मित्र अनिल त्रिवेदी को दे दी. साइकिल, होल्डाल, अटैची उठा कर चला आया लखनऊ. कैरियर की ज़द्दो-जहद में दो दशक कैसे बीत गए पता ही नहीं चला. इस बीच त्रिवेदी जी कलकत्ता होते हुए चंडीगढ़ पहुंच गए थे. इत्तफाक से प्रदीप भटनागर भी वहीं थे. संयोग से दो दशक बाद मैं भी वहां पहुंच गया. अनिल और मैं एक संस्थान में और प्रदीप दूसरे में. हम तीनों घर-परिवार वाले हो चुके थे लेकिन मैं और प्रदीप बच्चों के कैरियर के चलते परिवार वहां नहीं ले गए थे. हां, त्रिवेदी जी के साथ उनका परिवार था. मैं चंडीगढ़ वासियों के बीच यूपी के पइये (भैये) और छड़े (फोस्र्ड बैचलर) का लेबल लगाए बछड़ों की तरह उछल कूद मचाता था. यहां भी मेरे साथ एक बैग और कंबल ही था. त्रिवेदी जी बगल में ही रहते थे. एक गद्दा खरीद कर जमीन पर डाल दिया था. त्रिवेदी जी ने यह देखा तो बोले यार फोल्डिंग पड़ी है ले लो. अरे वही वाली जो बीस साल पहले दे गए थे. बीस साल बाद उसी फोल्डिंग पर लेट कर सेंटीमेंटल होने की अब मेरी बारी थी.
चंडीगढ़ में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. कंबल अच्छा था इस लिए उसके नीचे एक ऊनी शाल लगा कर ओढऩे से मेरा काम चल जाता था. इसी बीच प्रदीप भटनागर का तबादला भोपाल हो गया. एक दिन मेरे एक और साथी पीयूष मेरे कमरे में आए और सिर्फ कंबल देख कर परेशान हो गए कि अरे आपको तो ठंड लगती होगी. बोले, प्रदीप जी की रजाई मेरे पास रखी है, ले आता हूं. लाख कहने पर कि मुझे कोई दिक्कत नहीं, पीयूष मुझे प्रदीप की रजाई दे गए. मेरी सर्दी और आराम से कटने लगी. कुछ महीनों बाद घर लौटने का संयोग बन गया. मैंने रजाई पीयूष को थमाई, फोल्डिंग फिर धन्यवाद के साथ त्रिवेदी जी को दे दी और गद्दा एक और साथी को पकड़ा दिया. बैग उठाया और चला आया. कुछ दिन बाद पीयूष भी दूसरे शहर चले गए. त्रिवेदी जी अभी भी चंडीगढ़ में ही डटे हैं. कुछ दिन पहले दो खबरें मिली, एक- डा. प्रदीप भटनागर उदयपुर में संपादक बन कर जाने वाले हैं. दूसरी- पीयूष फिर चंडीगढ़ लौट रहे हैं. सो त्रिवेदी जी की चारपाई (फोल्डिंग) और प्रदीप जी की रजाई और अपनी तनहाई (फोरस्र्ड बैचलरशिप) याद आने लगी. पीयूष से पूछा कि वो रजाई कहां हैं लेकिन उन्हें ठीक से याद नही. फिलहाल प्रदीप जी हिसार में ही हैं और उनकी रजाई की खोज की जा रही है.

1/22/10

...और फोन पर आई भूत की आवाज


अचानक मेरे एक साथी का फोन आया नए वर्ष की बधाई देने के लिए लेकिन मुझे भूत-पिशाच याद आने लगे. मेरे नाम के आगे ओझा जरूर लगा है लेकिन भूत से कोई वास्ता नहीं पड़ा है अभी तक. पता नहीं क्यों मेरे साथी अमित गुप्ता का फोन आते ही भूत याद आने लगते हैं. अमित अम्बाला के रहने वाले हैं. अभी पानीपत में एक बड़े अखबार में बड़े पद पर हैं. बात उन दिनों की है जब मैं चंडीगढ़ में था और अमित अम्बाला में हमारे अखबार के करेस्पांडेंट थे. एक दिन परेशान से अमित ने फोन किया कि सर तबियत ठीक नहीं है. पूछा, वायरल हो गया या कोई और परेशानी है? अमित ने जो कारण बताया तो परेशान होने की बारी मेरी थी. अमित ने फोन पर एक भूत से बात कर ली थी और तब से परेशान थे. अमित गंभीर किस्म के संजीदा इंसान हैं और उनसे किसी मस्खरेपन की उम्मीद नहीं की जा सकती. लेकिन उनके साथ जो कुछ हुआ, उसका कारण अमित को नहीं समझ आ रहा था.
हुआ ये कि अमित के एक साथी ने राजस्थान से लौटने पर उसे बताया कि आज कल वहां के कुछ शहरों में एक भूत का फोन चर्चा में है. उसने अमित को एक नंबर दिया और कहा कि ये भूत का नंबर है और कई लोगों ने उससे बात की है. अमित ने नंबर तो ले लिया लेकिन मजाक समझ कर इस पर ध्यान नहीं दिया. फिर शाम को अचानक उसने अपने मोबाइल से वह नंबर डॉयल किया. उधर से कोई रिस्पांस नहीं मिला.
अगले दिन सुबह करीब नौ बजे अमित ने यूं ही सोचा कि चलो पीसीओ से ट्राई करते हैं. उसने पीसीओ से नंबर घुमाया तो उधर से किसी ने कहा हैलो. अमित को लगा कि शायद रांग नंबर लग गया. 'आप कौन?' उधर से आवाज आई , यार अमित परेशान क्यों कर रहे हो. अमित के रोंगटे खड़े हो गए. उसने हिम्मत करके फिर पूछा, आप मुझे कैसे जानते हैं, अपना नाम बताइए. उधर से किसी महिला के सिसकने और बच्चे के रोने की हल्की आवाज बीच बीच में सुनाई पड़ रही थी. उधर से फिर आवाज आई कि नाम जानने से क्या होगा, तुम हमारी मदद तो कर नही सकते. अमित बोला नहीं, मैं जर्नलिस्ट हूं. तुम्हारी मदद कर सकता हूं. उसने कहा, तो मैं आ जाऊं? हां, आओ, अमित के इतना कहते ही उसे करेंट के तेज शॉक जैसा लगा और रिसीवर हाथ से छूट गया. अमित का दिल तेजी से धड़क रहा था. उसने फिर हिम्मत कर नंबर घुमाया लेकिन उधर से, दिस नंबर डज नाट एग्जिस्ट की रिकार्डेड टोन सुनाई पड़ी. उलझन और बढ़ गई जब पीसीओ वाले ने बताया कि आप की बात तो हुई है लेकिन मीटर जीरो काल बता रहा है, कोई बिलिंग नही हुई. दिन में अमित ने कई बार कोशिश की लेकिन उस नंबर से यही जवाब मिलता रहा कि दिस नंबर डज नाट एग्जिस्ट. अमित ने अगले दिन एक्चेंज से संपर्क किया तो पता चला कि ये नंबर जयपुर साइड का है पीसीओ के नबर पर कॉल का रिकार्ड नहीं है. . अमित के साथी ने जयपुर एक्चेंज से जानकारी मांगी तो बताया गया कि ये नंबर जिनका था उनकी पूरी फैमिली की एक साल पहले रोड एक्सीडेंट में डेथ हो चुकी है. अब तो अमित को बुखार चढ़ गया. दो तीन दिन बाद नार्मल होने पर अमित ने ऑफिस आकर ये दास्तान सुनाई.
फिर क्या था वो नंबर पूरे ऑफिस में बट गया. हम लोंगों ने खबर भी छापी. सब ने नंबर लगाया लेकिन रिसपांस नही मिला. मैंने तो कई बार अकेले अपने रूम में अंधेरा कर रात दो बजे फोन लगाया कि शायद भूत से बात हो जाए लेकिन नो रिसपांस.
जब भी अमित का फोन आता है तो ये घटना याद आ जाती है. सुना है ठंडी स्याह रातों में सुनसान रास्तों पर भूतों का डेरा होता. रोज रात को करीब एक बजे अकेले की लौटता हूं. रास्ते में मिलता है 200 साल पुराना एक बरगद का पेड़, ठिठुरता हुआ चौकीदार, दुकान के शेड में रिक्शे के ओट में लेटा जाड़े को कोसता रिक्शेवाला, उसके फटे कम्बल में दुबका एक पिल्ला. और एटीएम केबिन में ऊंघता गार्ड. मुझे तो नही मिले आपको भूत या चुड़ैल तो कभी मिले हों तो बताइएगा.

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