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4/23/10

पाsss ! की पावर



प से पवार, प से पॉवर, प से प्रफुल्ल पटेल, प से पापा, प से पूर्णा, प से पॉवर प्ले, प से प्लेन, प से पैसा, प से पुष्कर, प से प्रेमिका
प की महिमा अपरम्पार. प में आ की मात्रा लग जाए तो हो जाता है पाsss! पा माने पापा.
पॉवरफुल पवार की पार्टी के पॉवरफुल मंत्री प्रफुल्ल पटेल की बेटी पूर्णा की पावर तो देखिए- पूरे पैसेंजर्स को उतार कर प्लेन को डायवर्ट कर दिया.

4/10/10

एक ‘नाइस’ चपत



चलिए आज थोड़ी नोकझोंक, थोड़ी दिल्लगी, थोड़ी बंदगी और थोड़ा इमोशनल अत्याचार हो जाए. ब्लॉग के मैदान में भी क्रिकेट की तरह हर कैटेगरी के खिलाड़ी मिल जाएंगे. कुछ टेस्ट मैच की तरह टुक-टुक कर देर तक खेलने वाले, कुछ वन डे मैच की तरह मौके की नजाकत समझ कर शाट लगाने वाले और कुछ ट्वेंटी-ट्वेंटी स्टाइल में हमेशा चौके-छक्के लगाने के मूड में रहने वाले. अब खिलाड़ी हैं तो दर्शक भी होंगे. दर्शक भी तरह- तरह के. कुछ खा-म-खा ताली बजाते हैं, कुछ अच्छे खेल पर एक्साइटेड हो हर्ष ध्वनि करते हैं तो कुछ बात बात पर नोकझोंक करने को आतुर रहते हैं. कुछ तो एग्र्रेसिव हो मैदान मे ं कचरा भी फेंकने लगते हैं. अब वो खिलाड़ी कैसा जिसे शाबाशी या गाली ना मिले. आप समझ गए होंगे खिलाड़ी से यहां मतलब ब्लागर्स से है. उसके रीडर्स और कमेंट करने वाले हैं दर्शक. सो आज ब्लॉग्स में कमेंट्स के खेल पर ही कंसन्ट्रेट करते हैं.
मुझे लगता है कि लोग ब्लॉगिंग की शुरुआत तो अक्सर स्वान्त:सुखाय या अभिव्यक्ति के लिए करते हैं लेकिन जब उन पर कमेंट बरसने लगते हैं, तो उनके अंदर के क्रियेटिव किड की भूख बढ़ जाती है और वो कुछ भी खाकर कुछ भी उगलने और उगलवाने पर उतारू हो जाता है. कल का बच्चा अचानक सचिन तेंदुलकर की तरह ब्लॉगिंग के मैदान में शाट लगाने लगता है. जिस तरह अच्छे शाट पर तालियां मिलती उसी तरह अच्छी पोस्ट पर अच्छी टिप्पणियां भी मिलती हैं. जितने ज्यादा कमेंट्स उतनी ज्यादा पोस्ट. धीरे-धीरे स्वान्त:सुखाय लिखने वाला ब्लॉगर बावलों की तरह किसी भी विषय पर कुछ भी लिखने लगता है. एक अच्छा भला लिखने वाला सर्वज्ञानी, अभिमानी उपदेशक और आलोचक की भूमिका में कब आ जाता है, उसे पता ही नहीं चलता. उसके लेखन में मौलिकता की जगह मैनेजमेंट हावी हो जाता है. किसी अच्छे भले लेखक का दिमाग खराब करने में टिप्पीबाजों की बड़ी भूमिका होती है. कोई कैसा भी लिखे, हर पोस्ट पर ये टिप्पणीबाज वॉह-वाह, शानदार पोस्ट, नाइस, एक्सेलेंट, बधाई, ऐसा ही लिखते रहें, जैसे चालू कमेंट कर अपना राग एक ही सुर में आलापते रहतें हैं. जैसे हाल ही में दंतेवाड़ा में नक्सिलियों ने सीआरपीएफ के जवानों का नरसंहार किया. उस पर एक ब्लॉगर ने दुख व्यक्त करते हुए नक्सली समस्या के समाधान पर बड़ी संजीदगी से कुछ कुछ बातें लिखीं थीं. उस पर एक कमेंट आया ‘नाइस’. इस कमेंट से ये पता नहीं चल पाया कि वो सज्जन किसको नाइस कह रहे हैं. एक और कमेंट था ‘बिल्कुल सही लिखा है’. अब आप दिल पर हाथ रख कर बताइए कि आप जो भी पोस्ट लिखते हैं उसे सही समझ कर ही तो लिखते हैं. कुछ टिप्पणीबाज कमेंट तो संक्षिप्त करेंगे लेकिन अपनी गली-मोहल्ले और घर का पता मोबाइल नंबर के साथ विस्तार से लिखेंगे. ऐसे ही एक और चिंतक-विचारक और बौद्धिक किस्म के ब्लागर हैं. वो चाहते हैं कि उनकी हर पोस्ट पर नेशन वाइड डिबेट हो लेकिन खुद आपकी पोस्ट पर एहसान करते हुए संक्षिप्त टिप्पणी ‘पान पर चूने की तरह’ लगा आगे बढ़ जाते हैं.
(जैसा आई नेक्स्ट के ब्लॉग-श्लॉग कालम में लिखा)

4/3/10

...चंद्रवदन मृगनयनी बाबा कहि कहि जाय



केशव केशन अस करी अरिहु ना जस कराय, चंद्रवदन मृगनयनी बाबा कहि-कहि जाय. केशव जी व्यथित हो कहते हैं कि उनके बालों ने उनकी जो गत बनाई है वैसा तो कोई दुश्मन के साथ भी नही करता. सफेद बालों के चलते सुंदर बालाएं उन्हें बाबा कह कर संबोधित करती हैं. केशव के जमाने के ‘बाबा’ आज के जमाने के ‘अंकल’ ही हुए ना. केशव तो महान कवि थे और मैं साधारण आदमी लेकिन केशव की तरह मुझे भी बच्चों को छोड़ कर कोई अंकल कहता है तो अच्छा नहीं लगता. मैं सभी स्त्रियों का सम्मान करता हूं लेकिन इस मनोविज्ञान पर मेरा वश नहीं. क्यों? इस पचड़े में नही पडऩा, बस अच्छा नहीं लगता तो नहीं लगता. जब संजू बाबा, शहरुख, सलमान या आमिर खां के आधे उम्र की बालाएं उन्हें अंकल नहीं कहती तो मैं क्यों अंकल कहलाऊं. माना कि मैं उन जैसा हैंडसम अब नहीं रहा लेकिन दिल उनसे ज्यादा युवा अब भी है.
जब कवि केशव ‘बाबा’ कहने पर अफसोस जता सकते हैं तो मैं क्यों नहीं. वो सम्मानित कवि हैं ऐसे में उनकी लाइन पकड़ लूं तो क्या हर्ज है. अब ये तो ह्यूमन साइकॉलजी है कि मनुष्य तन से नहीं तो मन से अपने को युवा समझता है और जब तक उसके अंग-प्रत्यंग जवाब नहीं देने लगते तब तक उसे पता ही नहीं चलता की वो बूढ़ा हो रहा है. मैं भी अपवाद नहीं. लेकिन ईश्वर की कृपा से अंग-प्रत्यंग अभी दुरुस्त हैं. सो थोड़े दिन यूथाफुल होने में कोई बुराई नहीं.
अब आपको बताता हूं कि इतना प्रपंच क्यों कर रहा हूं. ईश्वर की बड़ी कृपा होने पर ही ब्यूटी विद ब्रेन का काम्बिनेशन बनता है. ऐसे ही एक काम्बिनेशन वाली बाला को गूगल पर बजबजाते हुए अचानक मेरा ब्लॉग पसंद आ गया. अच्छी बात ये कि उसने फोन पर भी बात की और ब्लॉग की प्रशंसा की, बुरी बात ये कि उसने मुझे अंकल कहा भले ही इसकी अनुमति ले कर कहा हो. अब कोई अंकल कहना चाहे तो शिष्टाचार में मैं मना कैसे कर सकता हूं. मैंने खीसें निपोर कर कह दिया कहो-कहो कोई बात नहीं, लेकिन बात तो है. अरे मन से कुछ और दिन युवा रह लेने दो भाई. अंकल या बाबा कहना जरूरी है क्या? माना कि मन में मेरे प्रति बड़ा सम्मान है लेकिन नाम के आगे जी लगाने से भी तो काम चल जाता है.
खैर, कोई बात नहीं. उस बाला के ब्लॉग पर आए कमेन्ट्स में अपने जैसे चच्चुओं की लाइन लगी देखी तो बड़ा अच्छा लगा कि उस बाला ने इनमें कइयों से अंकल कहने की अनुमति जरूर ली होगी. अगर नहीं तो केशव की लाइनें एक बार फिर याद कर मैं तसल्ली कर लेता हूं.

4/2/10

पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में




पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में आज मैं आजाद हूं दुनिया के चमन में...जब भी परिंदों को उड़ते देखता हूं तो ये लाइनें याद आने लगती हैं. कल्पनाओं को पर लग जाते हैं. उस दिन भी जब पिंजरें से करीब पचास गौरैया मुक्त की गई तो सब फुर्र-फुर्र कर उड़ गई सिर्फ एक चीड़ा नहीं उड़ सका. वो पिंजरें में ही दुबका रहा, शायद बीमार था. उसे हथेली पर रख कर उड़ाने की कोशिश की फिर भी नही उड़ा. ढेर सारी गौरैया को आजाद कराने की खुशी फीकी सी पड़ गई. मेरे एक साथी ने उस चीड़े को चिडय़ाघर के डाक्टर के पास भिजवा दिया. पता नही उसका क्या हुआ. लेकिन बाकी सब खुश थे.

बात 20 मार्च की है. इस दिन अब लोग गौरैया दिवस मनाने लगे हैं क्योंकि गिद्धों के गायब होने के बाद गौरैया भी अब कम ही दिखती हैं. गिद्ध पर रिसर्च हो रहा है लेकिन गौरैया क्यों गायब हुईं इस पर बस बातें हो रही हैं. पता नहीं किसने और क्यों 20 मार्च का दिन गौरैया के लिए चुना. इसके पहले नहीं सुना था कि वल्र्ड स्पैरो डे भी मनाया जाता है. खैर दिवस कोई भी हो एनजीओ उसे जरूर मनाते हैं. अखबारों में एक दो दिन खबरें छपती हैं. प्यारी सी गौरैया की फोटो अच्छा से कैप्शन और कभी-कभी कविता की कुछ लाइनें गौरैया को समर्पित. कुछ लोग अपने बचपन की गौरैया को याद कर लेते हैं. फिर सब कुछ पहले की तरह. हमारे एक साथी हैं कौशल किशोर और विशाल मिश्रा. उन्होंने ने सोचा गौरैया के लिए कुछ किया जाए . वो चौक के अवैध पक्षी बाजार से करीब 50 गौरैया खरीद कर ले आए. सोचिए अब गौरैया भी बिकने लगी हैं. तय हुआ की जू में ले जाकर उन्हें उड़ा दिया जाए. जू में किसी स्कूल के बच्चे पिनिक मनाने आए थे. उनसे पूछा कि किसके घर में गौरैया घोसले बनाती हैं तो तो सिर्फ दो हाथ उठे. उन बच्चों को गौरैया के गायब होने की बात बताई गई और पूछा कि वो उन्हें पिंजरे में बंद रखना चाहते हैं या उड़ाना? तो सब ने कहा उड़ाना. पिंजरा खोल दिया गया और गौरैया फुर्र हो गईं. सिर्फ एक को छोड़ कर.
गौरैया को उड़ते देख बच्चे खुशी से उछल रहे थे. मुझे लगा जैसे मेरे आस पास बच्चे नहीं ढेर सारी गौरैया गा रही हों...पंक्षी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में आज मैं आजाद हूं दुनिया के चमन में..

3/20/10

बज़बज़ाते ब्लॉगर



आपने भुन-भुनाहट सुनी है ना. अरे वही जिसे इंग्लिश में बज कहते हैं. भौंरे, भुनगे, मक्खी या मच्छर, भुन-भुनाहट किसी की हो, हम इसे इग्नोर नहीं कर सकते. इनकी साउंड फ्रीक्वेंसी इरिटेट भी करती हैं लेकिन ब$ज इरिटेट नहीं अट्रैक्ट करता है. वो सेलेब्रिटी, इंवेंट या प्रॉडक्ट कैसा जिसमें ब$ज ना हो. सो आज ब्लॉगर्स ब$ज की बात करते हैं. वैसे तो ब्लॉग जगत में भुन-भुनाने वाले भुनगों और भौंरों की भरमार है. इनमें कुछ लुभाते हैं, कुछ डंक मारते हैं. ब्लॉग की भुन-भुनाहट फेसबुक और ट्वीटर पर तो पहले भी सुनाई पड़ती थी पर गूगल दादा के ब$ज ने सबका बाजा बजाना शुरू कर दिया है. कहा तो ये भी जा रहा है कि जल्दी गूगल, ब$ज का बॉस बन बैठेगा. गूगल ने जब से जी मेल पर बज़-बज़ाहट शुरू की है, हर तरफ ब$जर सुनाई पड़ रहा है. ब्लॉगर्स अब ब$जर की भूमिका में भी हैं. उनकी भुन-भुनाहट अचानक तेज हो गई है. फेसबुक और ट्वीटर के भौंरे और भुनगे फेंसिंग पार पर गूगल के बाड़े में मंडराने लगे हैं. बगीचा फूलों से लदा है और ब$जर्स के झुंड के झु़ंड कभी इस फूल कभी उस फूल पर मंडरा रहे हैं. कुछ ब्लागर्स तो ब्लॉग लिखना भूल कर बजिंग में बिजी हैं. और कुछ सयाने ब्लॉगर्स तो अपनी पूरी की पूरी पोस्ट ही ब$ज में उड़ेल देते हैं.
ब$ज की हालत यह है कि कब चुहलबाजी से शुरू हुई बात गंभीर बहस का रूप ले लेती है, पता ही नहीं चलता. ब$ज के बहाने आप अपने कांटैक्ट ग्रुप से होते हुए दूसरों के कांटैक्ट तक पहुंच सकते हैं. किसी को कहीं भी टीप लगाने की पूरी छूट है. किसी को चिकोटी काटिए, उस पर असर ना पड़े तो किसी और को चपत लगा कर देखिए, कभी ना कभी तो भुन-भुनाएगा ही. उनके ऐक्शन-रिऐक्शन का मजा ही कुछ और है. कभी-कभी विषय कुछ होता है और बहस किसी और बात को लेकर शुरू हो जाती है. जैसे किसी ने अपनी फोटो की जगह कैरीकेचर लगा दिया, किसी ने लुक्स पर कमेंट किया तो कोई पहनावे की नापजोख करने लगता है. किसी को कैरीकेचर इनोसेंट लगता है, किसी को फनी. किसी ने कहा कि आपने क्या पहन रखा है-बरमुडा, घुटन्ना या नेकर? बस कोई बरमुडा का इतिहास बताने लगा तो कोई घुटन्ने का बखिया उधेडऩे लगता है. एक साहब ने तो इसकी डिजाइनिंग का ऐसा पाठ पढ़ाया कि बड़े बड़े फैशन डिजायनर पानी भरें. तो आप भी मजा लीजिए ब$ज का. अरे..देखिए कोई भुनभुना रहा है.
(जैसा कि आई नेक्स्ट के ब्लॉग-श्लॉग कॉलम में लिखा)

2/28/10

संइयां भये लड़कइयां ...


कुछ दिन पहले मालिनी अवस्थी परफार्म कर रहीं थीं-सइयां भये लड़कइयां मैं का करूं. जिसे देखो आजकल वही 'बच्चा' बना हुआ है. ये समय ही ऐसा होता है. पहले बसंत फिर फागुन इसी के बीच में वैलेंटाइंस डे और अब होली. हवा में कुछ ऐसी खुनक, ऐसी महक होती है कि छोटे तो छोटे, बयालीस बसंत दख चुके बुजुर्ग भी बहक कर 'लड़कइयां' मोड में आ जाते हैं.
लोग कहते हैं क्लाइमेट चेंज हो रहा है. इकोलॉजिकल सिस्टम गड़बड़ हो रहा है. अरे कितना भी क्लाइमेट चेंज हुआ करे, फागुन की केमिस्ट्री में कोई बदलाव नहीं आया है. पहले भी आम और आवाम, फागुन में ऐसे ही बौराते थे और अब भी बौरा रहे हैं. पहले इसे बावला होना और आजकल केमिकल लोचा कहते हैं. 'बौराने' या 'लड़कइयां' में आज भी केमेस्ट्री के वही फार्मूले लागू होते हैं बस पे्रजेंटेशन का तरीका बदल गया है. केमिस्ट्री वही है नाम बदल गए हैं. केमिस्ट्री ही आपको मन से यंग या ओल्ड बनाती है. फागुनी हवा में ऐसे कुछ केमिकल एलीमेंट्स जरूर हैं जिनके ज्यादा हो जाने से 'मोड' चेंज हो जाते हैं और 'अंकल मोड' वाले 'बच्चा' या 'लड़ंकइयां मोड' में कब आ जाते हैं पता ही नही चलता.
लेकिन कुछ लोगों में तो इस केमिकल की क्वांटिटी बाई बर्थ कुछ ज्यादा होती है और वो बारहों मास मन से यंग यानी लड़कइयां रहते हैं. ताउम्र कुछ ना कुछ नए प्रयोग और कुछ रोमांचक करने की ललक उनके लिए एंटी आक्सीडेंट्स का काम करती है. लेकिन जब कपल्स में एकबच्चा मोड में और काउंटरपार्ट 'कन्वेंशनल' मोड में तो कम्पैटिबिलिटी प्राब्लम खड़ी हो सकती है. लेकिन यहां साफ कर दूं कि प्राब्लम अक्सर सिर्फ 'कनवेंशनल' मोड वाले को होती है तभी तो वह साथी के लड़कंइयांपन से तंग आकर गाने लगता है- संइयां भये लड़कइयां मैं का करूं. और दूसरी तरफ सैंयां... दिल तो बच्चा है जी, थोड़ा कच्चा है जी.. गुनगुनाते हुए बसंत के पचास ओवर्स खेल कर भी नाटआउट. वैसे ये जब तक घर में यानी नेटवर्क एरिया में रहते हैं तो तब तक कम्पैटिबिलिटी प्राब्लम नहीं होती, लेकिन जहां वे नेटवर्क एरिया से बाहर निकले समस्या, खड़ी हो जाती है.
एक बात और, 'बच्चा' दिखने की कोशिश में बच्चों जैसी हरकत कभी मत करिएगा वरना कयामत आ जाएगी और पहनने पर नहीं पडऩे पर जूता बोलेगा चुर्र. युवा होने के लिए कभी अभिनय की जरूरत नहीं पड़ती. ये फीलिंग तो सेल्फ स्टीम्ड है, अंदर से आती है. एक सज्जन युवा दिखने के चक्कर में हाइपर टेंशन के मरीज हो गए और वक्त से पहले बूढ़े दिखने लगे. उन्होंने युवा दिखने के लिए अपने ग्रे होते बालों पर कलर्स के हर शेड अपनाए लेकिन इस टेंशन से कभी भी मुक्त नहीं हो सके कि कहीं कलर्स के केमिकल रिएक्शन से उनके बाल कम ना हो जाएं. केमिकल रिएक्शन कितना हुआ ये तो पता नही लेकिन टेंशन से उनके बाल जरूर झड़ गए. सो लड़कइयां दिखने की नहीं फील करने की चीज है. जो बात-बात पर टेंशन लेने लगे वो बच्चा कैसे रह पाएगा.
इसके ठीक उलट 'यंग फार एवर' टाइप लोग हैं. उम्र बढ रही हो, बाल सफेद हो चुके हों, पहले जैसे घने भी ना रह गए हों तो भी उनको फर्क नहीं पड़ता. एनर्जी इतनी कि यंगस्टर्स ईष्र्या करने लगते हैं. दरअसल ये एनर्जी पाजिटिव एटीट्यूड से मिलती है. जैसे एक ओल्ड होत 'यंगीज' से जब कोई यंग स्मार्ट गर्ल स्माइल के साथ बात करती तो सारे यंग कलीग्स टांट करते ..अरे उसे उसने अंकल बोला.. चिढऩे के बजाय उनका पलट कर जवाब होता यानी तुम सब अब भी मुझको एक रीयल थ्रेट मानते हो...हा हा..बस उनकी एनर्जी में इजाफा हो जाता. यही केमिकल तो एंटीआक्सीडेंट का काम करता है. इसका सीधा संबंध आपके इमैजिनेशन से है. आप जो भी इमैजिन करते हैं या लिखते हैं वो आपकी पर्सनालिटी में रिफ्लेक्ट होता है. इसमें एक्टिंग या स्वांग नही चलता. मन के रेडियो की ट्यून बदल कर कुछ और राग सुनाने का स्वांग करेंगे तो पकड़े जाएंगे. इस लिए दोस्तों 'बच्चा' बनना बच्चों का खेल नही है. हां, फागुन पार आप 'लड़कइंया' हो सकते हैं. लेकिन ऐसा करते समय इब्नेबतूता को जरूर याद कर लिया करिए.

2/20/10

जॉर्ज और लाल मुनिया


आइए आज आपको जॉर्ज शेपर्ड से मिलाता हूं. हमारी टीम के सबसे सीनियर मेंबर. अ जेंटिलमैन विद सिंपल लिविंग. नो कम्प्लेंस नो रिग्रेट्स एंड इंज्वाइंग लाइफ ऐज इट इज. एक अच्छे इंसान और अच्छे नेबर. सो एक दिन उनके पड़ोसी एक हफ्ते के लिए कहीं बाहर जा रहे थे. उन्होंने देखरेख के लिए जार्ज के घर लालमुनिया का अपना पिंजरा रख दिया. जार्ज और उनकी फैमिली ने लालमुनियाओं की अच्छे से देखभाल की. पड़ोसी खुश हुए और वो जार्ज के बेटे के लिए बज्जियों का एक जोड़ा ले आए. जार्ज के घर में इत्तफाक से एक पुराना पिंजरा थ. सो उन्होंने बज्जियों को पिजरें में रखा और उनकी देखभाल करने लगे. लेकिन कुछ दिन बाद एक दिन एक बज्जी मर गया. अकेले बज्जी पर तरस खाकर कर जार्ज बाजार से तीन बज्जी और ले आए. लेकिन कुछ दिन बाद उनमें से दो बज्जी फिर मर गए. लेकिन बचे हुए दोनों पक्षी मेल थे सो अक्सर लड़ते रहते थे. अब जार्ज ने फिर तरस खा कर एक और पिंजरा खरीदा और दोनों को अलग अलग कर दिया. यानी दो बज्जी दो पिंजरे. जार्ज उन्हें रोज दाना चुगाते हैं. पड़ोस में लालमुनिया और जार्ज के यहां बज्जी, सब की जिंदगी आराम से कट रही थी. लेकिन नेबर को फिर कही जाना पड़ा. वो फिर लाल मुनिया का पिंजरा जार्ज के घर रख गए हैं. सो इस समय उनके घर तीन पिजरें हैं और जार्ज सबकी देखभाल कर रहे हैं. इसे कहते हैं हैप्पी एंडिंग.

2/19/10

...और फैल गया रायता




ये रायता क्यों फैला है भाई. बारात तो विदा हो गई लेकिन शादी के पंडाल के किनारे ये गाय, कौवे और कुत्ते किस ढेर पर मुंह मार रहे हैं. अच्छा-अच्छा कल रात में यहां भोज था. भुक्खड़ लोग जिस तरह भोजन पर टूट पड़े थे उसे देख कर रात में ये कुत्ते शरमा कर भाग खड़े हुए. अब फैले रायते का आराम से आनंद ले रहे हैं. अभी भी इन सबका पेट भ्रने के लिए यहां बहुत कुछ है. पुलाव, कचौडिय़ां, मटर पनीर, रायता और भी बहुत कुछ, सब गड्ड-मड्ड .
इस तरह का रायता फैलाने वाले लगता है अखबार नही पढ़ते. हाल ही में एक खबर थी कि लोग शादी-समारोहों में खाना बहुत बर्बाद करते हैं. भोज के बाद ढेर सारा खाना फेंका जाता है. यहां बचे हुए खाने की बात नहीं हो रही. वह तो 'प्रजा' में खप ही जाता है . यहां मामला प्लेट में छोड़ दिए गए खाने का है . 'कुक्कुरभोज' के बाद इस खाने को कुक्कुर ही खाते है. अखबार के उसी पेज पर एक और खबर थी जिसमें ग्राफ के जरिए बताया गया था कि गन्ना, चीनी, दाल, गेहूं और तिलहन के प्रोडक्शन में कमी आई है लेकिन मशीनों के प्रोडक्शन में इजाफा हुआ है . फिर भी लोग खाना बर्बाद करते हैं. मैंने कुक्कुर भोज में 'पार्टिसिपेट' करने वालों को ऑब्जर्व किया और पाया कि -
१. भोजन के पहले लोग चाउमीन, चाट-पकौड़े इतना भर लेते है कि 'मुख्य भोजन' के लिए पेट में जगह ही नही रह जाती फिर मन है कि मानता नहीं की तर्ज पर लोग थोड़ा-थोड़ा हर व्यंजन प्लेट में रखते जाते है. अब प्लेट भर जाने पर रायता तो फैलेगा ही.
२.सामूहिक भोज में लोगों को लगता है कि कहीं कोई आइटम खतम ना हो जाए सो दोबारा लेने के बजाय एक बार में ही प्लेट में पहाड़ बना लेते हैं. तभी तो लगता है जैसे प्रीतिभेज में लेाग हाथ में गोवर्धन पहाड़ उठाए घूम रहे हों.
३.भीड़ की रेलम पेल में कुछ लोग जोखिम ना उठाते हुए एक ही बार में सारा कुछ प्लेट में डाल लेते हैं. फिर आधा खा कर बाकी डस्टबिन के हवाले.
काश लोग थोड़ा कम खाते, गम खाते, कुक्कुरों पर नहीं खुद पर तरस खाते. लेकिन जब तक 'बीपी अंकल' और 'डायबिटीज आंटी' से इन्हें डर नहीं लगेगा तब तक इसी तरह रायता फैलता रहेगा.

2/13/10

ब्लॉगर बाबाओं की जय हो



इस समय मौसम सेंटियाना हो चला है यानी बाबाओं का बोलबाला है. कल शिवरात्रि पर भोले बाबा की धूम थी, हरिद्वार महाकुंभ में शाही स्नान के समय हरि की पैड़ी बाबामय हो गई थी. ज्यादातर न्यूज चैनल्स में बाबा विराजमान थे. अब तो ढाबाओं की तरह हर तरफ बाबा ही बाबा दिख रहे हैं. अब संडेे को वैलेंटाइन बाबा का बोलबाला. तो इस बार ब्लॉग्स में बाबाओं के बारें में बात करते हैं. वैसे ब्लॉगर भी किसी बाबा से कम नही होते. जो जी में आया कहा और किसी ने कुछ पलट कर कुछ सुनाया तो सुन लिया. प्रशंसा और आलोचना को समभाव से लेते हैं. अपने कहे को ज्ञानीवाणी और दूसरों की बात को नादानी कहना इनका शगल है. पॉपुलैरिटी के लिहाज से इंडिया के टॉप बाबाओं की तरह ब्लॉगर भी अपनी ऑरा से मुग्ध रहता है. इनमें में ज्यादातर समय के साथ चलने वाले मार्डन किस्म के बाबा हैं. जो टेक्नालॉजी सैवी हैं, शास्त्रीय बातों को नए तरीके से प्रेजेंट करना जानते हैं, उनका पीआर वर्क शानदार है. यही वजह है कि इसमें से तो कई सेलेब्रिटी स्टेटस को प्राप्त कर चुके हैं. पॉपुलैरिटी के मद में अक्सर बाबा लोग पॉलिटिकल लीडर की तरह बतियाने लगते हैं. ऐसे किसी टीवी चैनल पर या प्रवचन के दौरान कहीं भी हो सकता है. अब किस योग गुरू ने हाल में क्या कहा ये सब तो आप देखते और पढ़ते रहते हैं. आइए ब्लॉगर बाबाओं पर नजर डालें.
भोले बाबा की नगरी काशी के ब्लॉगर बाबा अरविंद मिश्र ने http://mishraarvind.blogspot.com पर शिवरात्रि के बहाने से अपने भक्तों (रीडर्स) को बता दिया कि उन्हें शिव तांडव स्तोत्र कंठस्थ है और उन्होंने प्रसाद स्वरूप भक्तों के लिए अपने ब्लॉग में अपनी लेजर डिस्प्ले युक्त? ऑडियो क्लिपिंग लगा दी है. वैसे उनके ब्लॉग क्वचिदन्यतोअपि.. अपने आप में एक बड़ा टंगट्विस्टर है. इसका उच्चारण करते समय बड़े बड़े लर्नेड लटपटा जाते हैं.
एक और सम्मानित ब्लॉगर हैं सुरेश चिपलूनकर. उन्होंने तो महाशिवरात्रि पर अपने ब्लाग http://blog.sureshchiplunkar.com में भक्तों के लिए एक दानपात्र ही लगा दिया है. उनके इरादे नेक हैं और प्रयास सराहनीय. उनके इस प्रयास ने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए हैं कि चिपलूनकर भाई की तरह कभी मैं भी अपने ब्लॉग पर धर्मार्थ कार्य का कोई 'चिपÓ लगा सकता हूं.
अब थोड़ी बात बाबा वैलेंटाइन की भी. कैसी विडंबना है कि वैलेंटाइंस डे आते ही लोग दो खेमो में बंट जाते हैं. एक प्रो और एक एंटी. बाबा वेलेंटाइन किसी भी देश के रहे हों, उनका निस्वार्थ और निश्छल प्रेम संदेश तो पूरी दुनिया के लिए था इसमें धर्म और संस्कृति कहां से आ गए. वेलेंटाइंस डे पर थॉट प्रवोकिंग पोस्ट लिखी है वीरेंद्र कुमार जैन ने http://rachanakar.blogspot.com/ पर. और भी ढेर सारे ब्लॉगर बाबाओं ने भोले बाबा का प्रसाद परोसा है अपनी पोस्ट के बहाने. सो ग्रहण करने के लिए लाइन से आएं.
-राजीव ओझा ने जैसा आइ नेक्स्ट में ब्लॉग-श्लॉग कॉलम में लिखा

2/6/10

इब्ने बतूता राहुल का जूता..उठाओ तो बोले चुर्र...


इब्ने बतूता राहुल का जूता..ता..उठाओ तो बोले चुर्र... आज कल हर जगह जूतों की जयकार है. भला हो इब्ने बतूता, सर्वेेश्वर दयाल सक्सेना और गुलजार का कि जूता राग लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है. शुक्रवार को राहुल मुंबई में थे. कभी यहां कभी वहां. अम्बेडकर प्रतिमा पर फूल चढ़ाने भी पहुंचे. जूता (या चप्पल) रास्ते में उतारी. एक मंत्री जी ने हाथ से उठा कर किनारे कर दिया. उठाने में जूता बोला चुर्र, शिवसेना ने किया गुर्र्र. बोली, देखा कांग्रेस में हैं चापलूसों की जमात, राहुल की क्या करें बात. सुना है राहुल ने लाइन लगा कर लिया रेल टिकट . फिर एटीएम से पैसे निकाले फटाफट. मान लीजिए राहुल को एटीएम से पैसा निकालते देख कोई कांग्रेसी उन्हें दे देता उधार तो मचता एक नया बवाल. शिवसेना कहती ये रोड शो है फेक, कांग्रेसी कहते पार्टी खुश है मराठियों का राहुल प्रेम देख. इब्ने बतूता किसका जूता..उठाने पर बोले चुर्र..असली मुद्दा हो गया फुर्र..

2/2/10

रूम नं. 317


हे रेल देवता ट्रेन थोड़ी लेट कर देना, बड़ी कृपा होगी. आमीन! जा बच्चा ऐसा ही होगा. और उसके बाद हुआ वो जिंदगी भर नहीं भूलूंगा. इसी लिए कसम खाई है कि विश सोच समझ करूंगा, पता नहीं कब सही हो जाए. पिछले दिन अपने आर्गेनाइजेशन के वार्षिक जलसे में आगरा जा रहा था. जलसा आगरा के मशहूर फाइव स्टार होटल मुगल में था. वहां तीन दिन रुकने की उत्तम व्यवस्था थी. पहले दिन दोपहर बारह बजे रिपोर्ट करना था. ट्रेन के आगरा पहुंचने का टाइम सुबह सात बजे ही था. सोच रहा था कि पांच घंटे कहां बिताउंगा सो काश, ट्रेन दो तीन घंटे लेट हो जाए. लेकिन इसके बाद जो हुआ तो कान पकड़ लिए कि रेल देवता से कभी विश नही करूंगा.
ट्रेन सात बजे के बजाय दो बजे आगरा पहुंची. जलसा एक बजे ही शुरू हो चुका था. हांफते हुए होटल में चेक-इन की फार्मेलिटी पूरी की. बताया गया अपको रूम नं. 317 में रुकना है. उसमें मेरे पार्टनर मनोरंजन सिंह थे. उनकी ट्रेन टाइम से थी सो वो सूट-बूट पहन और टाई- टीका लगा, लंच-वंच कर कांफ्रेंस में जा डटे थे. रिसेप्शन पर एअरहोस्टेस जैसी कई 'मुगल बलाएं' मुस्कराते खड़ी थीं मे आई हेल्प यू स्टाइल में. मैंने कहा मास्टर की से मेरा रूम खोल दीजिए, पहले ही लेट हो चुका हूं. एक मलिका ए मुगल ने कहा फालो मी सर. मैंने कहा फास्ट! उसने दौड़ लगा दी. पीछे-पीछे मैं बैग लिए दौड़ रहा था उसी तरह जैसे हीरोइन के पीछे विलेन दौड़ता है. रूम नं. 317 में घुसते ही 'ट्रिपल एस' (शिट, शेव,शॉवर) को दस मिनट में पूरा करने में जुट गया.
बस यही गड़बड़ हो गई. पहले दो काम तो कुशलतापूर्वक निपट गए लेकिन शॉवर लेते समय शामत आई. बाथरूम में एक तरफ बाथ टब होता है, दूसरी तरफ बेसिन और शीशा वगैरह और दोनो के बीच में कमोड. पूरे फर्श पर टॉवेल बिछी होती है. अब टब में नहाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता, उसी में बैठ कर या खड़े होकर नहाना पड़ता है. लोग फिसलें ना इसके लिए टब के अंदर एक रबर की मैटिंग भी बिछी होती है. मेरे टब में मैटिंग बाहर रखी हुई थी. मैं स्लीपर पहने टब में खड़े होकर शॉवर से नहाने लगा लेकिन जैसे ही साबुन का पानी टब की फर्श पर पड़ा कि मैं सटाक से चारों खाने चित. संभलने का मौका ही नहीं मिला. टब के स्लोप के कारण ज्यादा चोट नही लगी लेकिन 'पिछाड़ीÓ के बल गिरने से दर्द तो महसूस हो ही रहा था. तुरंत खड़े हो देखा कि कूल्हे वगैरह सलामत हैं कि नही. दर्द पर ध्यान ना देकर जल्दी से तैयारहो कांफ्रेंस हाल में पहुंचा. लोग हसेंगे इस लिए किसी से गिरने की बात बताई नहीं.
रात को पार्टी-शार्टी हुई. करीब बारह बजे रूम पर पहुंचा. साथी मनोरंजन से थोड़ी गप मारी और लाइट बुझा कर सो गया. सुबह पहले मैं ही उठा. सो रहे मनोरंजन पर नजर पड़ी तो चौंक गया. उनकी नाक पर कट लगा हुआ था और एक आंख के नीचे काला पड़ गया था. जगा कर पूछा ये क्या हुआ. दरअसल सारी लाइट बुझा दी थी इस लिए मनोरंजन रात को अंधेरे में बाथरूम में जाते हुए दरवाजे या किसी और चीज से जा भिड़े थे. रूम नंबर 317 के बाथरूम में एक और बड़ा हादसा टल गया था. मैंने कहा मुझे जगाया क्यों नहीं? बोले आप नींद में थे इस लिए डिस्टर्ब नहीं किया. अब मैं भी खुला कि गुरू इस बाथरूम में दोपहर में तो मैं भी गिरा था. पिछाड़ी में उसकी टीस अभी भी है. एक जोरदार ठहाका और मैंने तीन कसमें खाईं- 1.अब कोई विश नहीं करूंगा 2.टब में स्लीपर पहन कर नहीं नहाउंगा 3. टब में रबर की मैट है कि नही ये पहले चेक करूंगा.

1/29/10

राजू बिन्दास!: ...और फोन पर आई भूत की आवाज

राजू बिन्दास!: ...और फोन पर आई भूत की आवाज

त्रिवेदी की फोल्डिंग और भटनागर की रजाई



अफवाह उड़ी कि डा. प्रदीप भटनागर उदयपुर जा रहे हैं. खबर कितनी सही है ये तो पता नहीं लेकिन इसी बहाने चंडीगढ़ में उनकी रजाई की याद आ गई, जो पराए की लुगाई की तरह पता नहीं कहां गुम हो गई है. अनिल त्रिवेदी अभी भी चंडीगढ़ में ही हैं और मेरी फोल्डिंग फिर उनके पास पहुंच गई है. जिंदगी की कुछ छोटी-छोटी बातें ऐसी होती हैं जो बार-बार याद आती हैं.
बात बनारस की है. कैरियर शुरू ही किया था. मेरे साथ नगवा में मेरा एक दोस्त रहता था. वो इलाहाबाद बैंक में पीओ था. तीन कमरे के एक शानदार किराए के मकान में हम दोनो रहते थे. एक कमरे में मेरी फोल्डिंग लगी रहती थी, दूसरे में उस दोस्त की और तीसरे कमरे में हम दोनों साइकिल खड़ी करते थे जिससे घर भरा-भरा लगे. एक बड़ा सा किचेन और उससे लगा आंगन भी था. अलग-अलग कमरों में इस लिए सोते थे कि मैं देर रात लौटता था और दोस्त को सुबह जल्दी गंगा पार बैंक जाना होता था. मेरा ऑफिस लहरतारा में था. वही लहरतारा जहां कबीरदास जन्मे थे. मेरा जीवन भी फक्कड़ों जैसा ही था. एक फोल्डिंग, रजाई-गद्दा हवा की तकिया, साइकिल और एक अटैची. मेरा दोस्त राजा बेटा था, मैं सोता ही रहता और वो सुबह नहा धो कर पूरे घर में पोंछा लगा कर स्टोव पर दो कप चाय बनाता था और मुझे डरते-डरते उठाता था. मैं भी ऐसे चाय पीता जैसे बड़ा अहसान किया हो. उसके जाने के बाद फिर रजाई तान कर सो जाता. मेरा दिन 12 बजे शुरू होता. एक बार फिर से चाय बनाता. मस्ती में दिन कट रहे थे.
उस समय हमारे संस्थान में अनिल त्रिवेदी और प्रदीप भटनागर भी थे. दोनों से मेरी खूब छनती थी. एक साल बाद लखनऊ लौटने की घड़ी आ गई. फोल्डिंग बनारस में ही अपने मित्र अनिल त्रिवेदी को दे दी. साइकिल, होल्डाल, अटैची उठा कर चला आया लखनऊ. कैरियर की ज़द्दो-जहद में दो दशक कैसे बीत गए पता ही नहीं चला. इस बीच त्रिवेदी जी कलकत्ता होते हुए चंडीगढ़ पहुंच गए थे. इत्तफाक से प्रदीप भटनागर भी वहीं थे. संयोग से दो दशक बाद मैं भी वहां पहुंच गया. अनिल और मैं एक संस्थान में और प्रदीप दूसरे में. हम तीनों घर-परिवार वाले हो चुके थे लेकिन मैं और प्रदीप बच्चों के कैरियर के चलते परिवार वहां नहीं ले गए थे. हां, त्रिवेदी जी के साथ उनका परिवार था. मैं चंडीगढ़ वासियों के बीच यूपी के पइये (भैये) और छड़े (फोस्र्ड बैचलर) का लेबल लगाए बछड़ों की तरह उछल कूद मचाता था. यहां भी मेरे साथ एक बैग और कंबल ही था. त्रिवेदी जी बगल में ही रहते थे. एक गद्दा खरीद कर जमीन पर डाल दिया था. त्रिवेदी जी ने यह देखा तो बोले यार फोल्डिंग पड़ी है ले लो. अरे वही वाली जो बीस साल पहले दे गए थे. बीस साल बाद उसी फोल्डिंग पर लेट कर सेंटीमेंटल होने की अब मेरी बारी थी.
चंडीगढ़ में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. कंबल अच्छा था इस लिए उसके नीचे एक ऊनी शाल लगा कर ओढऩे से मेरा काम चल जाता था. इसी बीच प्रदीप भटनागर का तबादला भोपाल हो गया. एक दिन मेरे एक और साथी पीयूष मेरे कमरे में आए और सिर्फ कंबल देख कर परेशान हो गए कि अरे आपको तो ठंड लगती होगी. बोले, प्रदीप जी की रजाई मेरे पास रखी है, ले आता हूं. लाख कहने पर कि मुझे कोई दिक्कत नहीं, पीयूष मुझे प्रदीप की रजाई दे गए. मेरी सर्दी और आराम से कटने लगी. कुछ महीनों बाद घर लौटने का संयोग बन गया. मैंने रजाई पीयूष को थमाई, फोल्डिंग फिर धन्यवाद के साथ त्रिवेदी जी को दे दी और गद्दा एक और साथी को पकड़ा दिया. बैग उठाया और चला आया. कुछ दिन बाद पीयूष भी दूसरे शहर चले गए. त्रिवेदी जी अभी भी चंडीगढ़ में ही डटे हैं. कुछ दिन पहले दो खबरें मिली, एक- डा. प्रदीप भटनागर उदयपुर में संपादक बन कर जाने वाले हैं. दूसरी- पीयूष फिर चंडीगढ़ लौट रहे हैं. सो त्रिवेदी जी की चारपाई (फोल्डिंग) और प्रदीप जी की रजाई और अपनी तनहाई (फोरस्र्ड बैचलरशिप) याद आने लगी. पीयूष से पूछा कि वो रजाई कहां हैं लेकिन उन्हें ठीक से याद नही. फिलहाल प्रदीप जी हिसार में ही हैं और उनकी रजाई की खोज की जा रही है.

1/22/10

...और फोन पर आई भूत की आवाज


अचानक मेरे एक साथी का फोन आया नए वर्ष की बधाई देने के लिए लेकिन मुझे भूत-पिशाच याद आने लगे. मेरे नाम के आगे ओझा जरूर लगा है लेकिन भूत से कोई वास्ता नहीं पड़ा है अभी तक. पता नहीं क्यों मेरे साथी अमित गुप्ता का फोन आते ही भूत याद आने लगते हैं. अमित अम्बाला के रहने वाले हैं. अभी पानीपत में एक बड़े अखबार में बड़े पद पर हैं. बात उन दिनों की है जब मैं चंडीगढ़ में था और अमित अम्बाला में हमारे अखबार के करेस्पांडेंट थे. एक दिन परेशान से अमित ने फोन किया कि सर तबियत ठीक नहीं है. पूछा, वायरल हो गया या कोई और परेशानी है? अमित ने जो कारण बताया तो परेशान होने की बारी मेरी थी. अमित ने फोन पर एक भूत से बात कर ली थी और तब से परेशान थे. अमित गंभीर किस्म के संजीदा इंसान हैं और उनसे किसी मस्खरेपन की उम्मीद नहीं की जा सकती. लेकिन उनके साथ जो कुछ हुआ, उसका कारण अमित को नहीं समझ आ रहा था.
हुआ ये कि अमित के एक साथी ने राजस्थान से लौटने पर उसे बताया कि आज कल वहां के कुछ शहरों में एक भूत का फोन चर्चा में है. उसने अमित को एक नंबर दिया और कहा कि ये भूत का नंबर है और कई लोगों ने उससे बात की है. अमित ने नंबर तो ले लिया लेकिन मजाक समझ कर इस पर ध्यान नहीं दिया. फिर शाम को अचानक उसने अपने मोबाइल से वह नंबर डॉयल किया. उधर से कोई रिस्पांस नहीं मिला.
अगले दिन सुबह करीब नौ बजे अमित ने यूं ही सोचा कि चलो पीसीओ से ट्राई करते हैं. उसने पीसीओ से नंबर घुमाया तो उधर से किसी ने कहा हैलो. अमित को लगा कि शायद रांग नंबर लग गया. 'आप कौन?' उधर से आवाज आई , यार अमित परेशान क्यों कर रहे हो. अमित के रोंगटे खड़े हो गए. उसने हिम्मत करके फिर पूछा, आप मुझे कैसे जानते हैं, अपना नाम बताइए. उधर से किसी महिला के सिसकने और बच्चे के रोने की हल्की आवाज बीच बीच में सुनाई पड़ रही थी. उधर से फिर आवाज आई कि नाम जानने से क्या होगा, तुम हमारी मदद तो कर नही सकते. अमित बोला नहीं, मैं जर्नलिस्ट हूं. तुम्हारी मदद कर सकता हूं. उसने कहा, तो मैं आ जाऊं? हां, आओ, अमित के इतना कहते ही उसे करेंट के तेज शॉक जैसा लगा और रिसीवर हाथ से छूट गया. अमित का दिल तेजी से धड़क रहा था. उसने फिर हिम्मत कर नंबर घुमाया लेकिन उधर से, दिस नंबर डज नाट एग्जिस्ट की रिकार्डेड टोन सुनाई पड़ी. उलझन और बढ़ गई जब पीसीओ वाले ने बताया कि आप की बात तो हुई है लेकिन मीटर जीरो काल बता रहा है, कोई बिलिंग नही हुई. दिन में अमित ने कई बार कोशिश की लेकिन उस नंबर से यही जवाब मिलता रहा कि दिस नंबर डज नाट एग्जिस्ट. अमित ने अगले दिन एक्चेंज से संपर्क किया तो पता चला कि ये नंबर जयपुर साइड का है पीसीओ के नबर पर कॉल का रिकार्ड नहीं है. . अमित के साथी ने जयपुर एक्चेंज से जानकारी मांगी तो बताया गया कि ये नंबर जिनका था उनकी पूरी फैमिली की एक साल पहले रोड एक्सीडेंट में डेथ हो चुकी है. अब तो अमित को बुखार चढ़ गया. दो तीन दिन बाद नार्मल होने पर अमित ने ऑफिस आकर ये दास्तान सुनाई.
फिर क्या था वो नंबर पूरे ऑफिस में बट गया. हम लोंगों ने खबर भी छापी. सब ने नंबर लगाया लेकिन रिसपांस नही मिला. मैंने तो कई बार अकेले अपने रूम में अंधेरा कर रात दो बजे फोन लगाया कि शायद भूत से बात हो जाए लेकिन नो रिसपांस.
जब भी अमित का फोन आता है तो ये घटना याद आ जाती है. सुना है ठंडी स्याह रातों में सुनसान रास्तों पर भूतों का डेरा होता. रोज रात को करीब एक बजे अकेले की लौटता हूं. रास्ते में मिलता है 200 साल पुराना एक बरगद का पेड़, ठिठुरता हुआ चौकीदार, दुकान के शेड में रिक्शे के ओट में लेटा जाड़े को कोसता रिक्शेवाला, उसके फटे कम्बल में दुबका एक पिल्ला. और एटीएम केबिन में ऊंघता गार्ड. मुझे तो नही मिले आपको भूत या चुड़ैल तो कभी मिले हों तो बताइएगा.

1/3/10

सुना है उस चौखट पर अब शाम रहा करती है ...




मुझे पता नही क्यों एक गाना याद आ रहा है- चुन-चुन करती आई चिडिय़ा, दाल का दाना लाई चिडिय़ा, मोर भी आया कौआ भी आया...ये गाना तो बहुत पुराना है. लेकिन ऐसा ही गाना तो आजकल भी गाया जा रहा है. हां, सुर और स्वर थोड़ा बदले हुए हैं. आजकल चुन-चुन करनेवाली चिडिय़ा से कही ज्यादा पॉपुलर है ट्वीट-ट्वीट करने वाली चिडिय़ा और इसका नाम है ट्विटर. बात चाहे खास की हो या आम की, ट्विटर बोलती जरूर है. कभी कभी तो ट्वीट-ट्वीट के बाद कांव-कांव शुरू हो जाती है. शशि थरूर, चेतन भगत, आमिर खान, अमिताभ बच्चन और ऐसे ही दूसरे सेलेब्रिटी की ट्वीट्स, स्क्रैप्स और ब्लॉग्स पर बीच-बीच में हंगामा खड़ा हो जाता है. लेकिन सोशल कम्युनिटी साइट्स पर इन सब के अलावा भी ढेेर सारे ऐसे लोग भी हैं जो सेलेब्रिटी तो नहीं हैं लेकिन आपके अपने हैं, अजीज हैं. कोई आपकी सामने वाली लेन या कालोनी रहता है, कोई दूसरे शहर में, कोई विदेश में और कोई पता नहीं कहां रहता है लेकिन है आपका दोस्त.
कुछ ऐसे दोस्त या जाने-पहचाने चेहरे होते हैं जिनको रोज हैलो कहने, देखकर मुस्कराने और यूं ही गपियाने की आदत पड़ चुकी होती है. इसमें होता है आपका पुराना क्लासफेलो जो दूसरे शहर में रहता है, अपका कोई कलीग जो अब दूसरे आर्गेनाइजेशन में काम करता है या कोई पुराना साथी जो कई वर्षों बाद अचानक आपको खोज निकालता है. ऑरकुट और फेसबुक पर अचानक उसका चेहरा प्रकट हो जाता है और ट्विटर पर उसकी ट्वीट सुनाई पडऩे लगती है. अपको रोज कुछ ना कुछ भेजता है. कम्प्यूटर खोलते ही आपके काम के बीच अचानक आ टपकता है. चैटिंग करता है कभी शरारत तो कभी संजीदगी से कि यार मेरा ब्लॉग देखो, मेरा प्यार देखो, ये देखो वो देखो, कुछ याद आया. कभी कोई प्यारा सा कमेंट तो कभी मैसेज यूं ही आ टपकता है. चैटिंग और ब्लॉगिंग करते हुए हमें उनकी आदत पड़ चुकी होती है. कब वो हमारी जिंदगी के एक जरूरी हिस्सा बन जाते हैं, हमें पता ही नहीं चलता.
लेकिन कभी सोचा है कि ब्लॉग्स, ऑरकुट, ट्विटर, फेसबुक जैसे तानेबाने से अचानक कोई चला जाए तो कैसा लगता है. हम, आप, कोई भी हो सकता है. तब उनके ब्लॉग्स को कौन आगे बढ़ाएगा, कौन ट्वीट करेगा.
सोशल कम्युनिटीज में कितने लोग हैं जो अपना पासवर्ड शेयर करते हैं? यहां तक कि उनके अपनों को भी नहीं पता होता. नेट पर तो हम बहुत सोशलाइज्ड दिखते हैं लेकिन पासवर्ड के मामले में बहुत पजेसिव.
सब कुछ ठीक चलता रहता है. तभी अचानक किसी के ब्लॉग पर नई पोस्ट् आना बंद हो जाती हैं, ऑरकुट पर स्क्रैप रुक जाते हैं, मिलने की प्रॉमिस धरी रह जाती है, बहस बंद हो जाती हैं, लोग उसके ब्लॉग पर बार-बार आते हैं, बार-बार मायूस होते हैं. नो चैटिंग, नो ब्लॉगिंग, नो हैलो...ट्विटर फुर्र से उड़ जाती है. क्लिक्स धीरे-धीरे कम होते होते खत्म हो जाते हैं. पता चलता है कि नेट का कोई नॉटी अब नहीं रहा या कोई हादसा किसी ब्लॉगर को ले गया. तब याद आने लगती हैं ये लाइनें...छोड़ आए हम वो गलियां... जहां तेरी एड़ी से धूप उड़ा करती थी सुना है उस चौखट पर अब शाम रहा करती है ...
उसके ब्लॉग और बातें कुछ दिन तक याद आते हैं फिर धीरे धीरे सब भूल जाते हैं. जैसे साथ चलते चलते कोई यूं ही खो जाए. सुबह दोपहर शाम, रात चौबीस घंटे जिससे बात होती हो वो अचानक चुप हो जाए, बिना किसी गिले शिकवे, किसी अपेक्षा के चुपके से निकल जाए. उस गली में, उस रास्ते पर दोस्तों का जाना धीरे-धीरे कम हो जाए और फिर वो रास्ता ही गुम हो जाए. कैसे जीवंत सा लगने वाला वाला स्क्रैप बोर्ड अचानक इतिहास का एक दस्तावेज बन जाता है और आर्काइव्ज में रह जातीं कुछ यादें कुछ बातें, कुछ सवाल अनसुलझे, अनुत्तरित.
हाल ही में कुछ ऐसे ही जाने पहचाने चेहरे और नाम अचानक गुम हो गए तो नॉस्टेल्जिक हो गया. इस बारे में तो सोचा ही नहीं था. लेकिन वो सच था तो ये भी सच है कि जब हम सोशल कम्युनिटीज पर हैपी मोमेंट्स शेयर कर सकते हैं तो पासवर्ड भी शेयर करें, कम से कम उससे जो आपके सबसे करीब हो, सबसे अजीज हो. ताकि उस चौखट पर शाम को कोई चिराग टिमटिता रहे कोई बार-बार याद आता रहे.

12/29/09

मार देब चोट्टा सारे...


मेरे पड़ोस में एक अधिकारी रहते थे. आजमगढ़ के रहने वाले थे. छुट्टियों में कभी-कभी उनका एक भतीजा आता था नाम था बंटी. उम्र यही कोई आठ-नौ साल. खाने पीने में थोड़ा पिनपिनहा. मैं और अधिकारी का बेटा अक्सर बंटी को छेड़ते थे, कुछ यूं- बंटी, दूध पी..ब ? नाहीं.. बंटी, बिस्कुट खइब..? ना...हीं... बंटी, चाह पी ब... ना..आं... दू घूंट मार ल...मार देब चोट्टïा सारे. इतना कह बंटी पिनपिनाता हुआ उठ कर चला जाता था. कुछ दिन पहले एक वाक्या बंटी की याद दिला गया.
मैंने सोचा कुछ ब्लॉगर्स जो अच्छा लिखते हैं, उनकी काबिलियत का फायदा अपने पेपर के लिए उठाया जाए. दो-तीन लोग शार्ट लिस्ट हुए. इत्तफाक से सभी हाईफाई प्रोफाइल, हाई सैलरी वाले थे. ब्लॉग में पूरा पुराण लिख मारते हैं तो एक पेज पेपर के लिए लिख ही देंगे. ब्लॉग से शायद ही पैसा मिलता हो लेकिन इन लोगों से अनुरोध कर लिखवा रहा था इस लिए शिष्टाचार में जो टोकन पारिश्रमिक दिया जाता है वो भेजने के लिए उनका पता मांगा गया. कुछ पारिश्रमिक भेज रहे हैं, यह कहने पर एक ने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया- इट डज़न्ट मैटर, दूसरे ने चुपचाप रख लिया और दो अच्छे लेख और भेज दिए. लेकिन तीसरा, ब्लॉगरों में 'बंटी' निकला. बड़े मनुहार के बाद लिखा. लेकिन जब पैसे का चेक पहुंचा तो दिन में दो बार फोन किया. पहले कहा कि इसमें से सौ रुपया तो टैक्स कट जाएगा. मैंने कहा ज्यादा सैलरी वालों का तो कटता ही है. शाम को फिर फोन आया. अब गोलबंद प्रवक्ता की तरह, इतना तो मिस्त्री-प्लंबर की एक दिन की पगार है.
अब 'बंटी'नहीं खिसियाने की बारी मेरी थी. कहा, अरे पान में चूना समझ कर चबा जाइए. तो ही ही करने लगे जनाब, अरे मैं तो मजाक कर रहा था. दिन में दो दो बार फोन कर कोई पिपिनाए और फिर कह दे मैं तो मजाक कर रहा था. ऐसे में 'बंटी' तो याद आएगा ही.

12/25/09

डा. कलाम और अनुष्का



आज आपको अनुष्का के बारे में बताते हैं. अनुष्का लखनऊ के लामार्टिनियर गल्र्स स्कूल में पढऩेवाली एक बच्ची है. आम बच्चों की तरह वो भी उन लोगों से मिलना चाहती है, उनके आटोग्राफ लेना चाहती है जो उनके रोलमॉडल हैं. पिछले कुछ दिनों से बीमार होने की वजह से अनुष्का स्कूल नहीं आ रही थी. उसे पता चला कि पूर्व राष्ट्रपति डा. कलाम मंगलवार को लामार्टिनियर आ रहे हैं बच्चों से मिलने. तो बीमार होने के बावजूद वह भी ड्रेस पहन कर पहुंच गई स्कूल उनसे मिलने. हाथ में एक छोटा सा बुके और खुद बनाया गया ग्रीटिंग कार्ड. लेकिन मिलने वाले बच्चों की लिस्ट में उसका नाम नहीं था और सुरक्षा कारणों से उसे डा. कलाम से मिलने की इजाजत नहीं मिली. मायूस अनुष्का स्कूल केबाहर ही अपनी मां के साथ खड़ी हो गई कि डा. कलाम जब बाहर निकलेंगे तो शायद हाथ मिलाने का मौका मिल जाए. लेकिन पुलिस वालों ने वहां भी ज्यादा देर नहीं खड़े होने दिया. मायूस मां-बेटी काफी दूर मोड़ पर अकेले खड़ी थीं. हमारा प्रेस फोटोग्राफर विकास बाबू ठिठका सूनसान रोड पर एक बच्ची को बुके लिए खड़े देख. अनुष्का और उसकी मां के आंखों में अपने रोल मॉडल से ना मिल पाने के कारण आंसू थे. उसने सलाह दी कि अब डा. कलाम गवर्नर हाउस जाएंगे. वहां कोशिश कर लीजिए. फोटोग्राफर भी राजभवन पहुंचा तो वहां भी मां-बेटी बुके लिए खड़ी मिली. राजभवन के गेट पर सेक्योरिटी वाले ने साफ मना कर दिया कि अप्वाइंटमेंट नही है तो नहीं मिल सकते. अनुष्का ने कहा प्लीज मरो कार्ड और बुके ही पहुंचा दीजिए अंदर. सब ने हाथ खड़े कर दिए. अनुष्का गेट पर खड़ी फिर रोने लगी. बच्ची को देख फोटोग्राफर भी परेशान था. इसके पहले डा. कलाम यूपीटीयू कैम्पस में थे और फाटोग्राफर विकास वहां भी था. उसने डा. कलाम के देर तक फोटो खीचे थे. लेकिन यहां वह कुछ मदद नहीं कर नही पा रहा था. तभी वीवीआईपी सिक्योरिटी में लगा एक सीनियर अफसर विकास को देख कर रुक गया. अरे, आप तो यूपीटीयू में भी थे. आपको अभी और फोटो चाहिए. विकास ने उनसे अनुष्का का बात बताई. अधिकारी ने कहा कि डा. कलाम अभी लंच कर रहे हैं फिर दिल्ली लौट जाएंगे. मुश्किल है मिल पाना. फिर भी कोशिश करते हैं. मायूस अनुष्का लौटने जा रही थी. तभी अंदर से मैसेज आया, मां-बेटी को अंदर भेजिए. डा. कलाम ने प्यार से अनुष्का को पास बैठाया, आटोग्राफ दिए, उसकी पढ़ाई के बारे पूछा, फोटो खिंचवाई. डा. कलाम ने अपने सेक्रेटरी की हिदायत दी कि ये फोटो अनुष्का को जरूर भिजवा दें. अनुष्का खुशी- खुशी बाहर आई. उसका चेहरा फूलों की तरह खिला हुआ था. तो ऐसे डा. कलाम और ऐसे हैं आजकल के बच्चे. इस जज्बे को सलाम.

12/24/09

हम सब में है एक मंजुनाथ



खबर आई है कि मंजुनाथ पर फिल्म बनेगी. आजकल के यंगस्टर्स मंजुनाथ की तरह ही हैं. हंसमुख, फिल्मी गाना गुनगुनाते अपने में ही मगन. मंजुनाथ जब आईआईएम लखनऊ में थे तो उन्होंने अपना एक रॉकबैंड ग्रुप बनाया था नाम था 3.4 केएम. क्योंकि मेन रोड से आईआईएम की दूरी इतनी ही थी. यही पैशन अब युवाओं के सर चढ़ बोल रहा है.
दो दिन पहले एक सर्वे आया था. यह दख कर सुखद आश्चर्य हुआ कि चीन की तुलना में भारत कहीं ज्यादा यंग है. इंडिया का यूथ ड्रीमिंग, डेयरिंग, क्रिएटिव और कांशियस है. यंगस्टर्स का नजरिया अपने भविष्य को लेकर साफ है. आज का यूथ केवल सपना ही नही देखता है, उसे पूरा करने के लिए जोखिम उठाने को भी तैयार है. उसे पता है कि यंग होने का मतलब कम उम्र का होना ही नहीं, नया सोचना भी है. तभी तो उसने आपने रोल मॉडल्स में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अमिताभ बच्चन से ऊपर रखा है. डॉ. कलाम यूं ही नहीं 2020 तक एक बेहतर भारत का सपना देखते हैं. संयोग से हाल ही में डॉ. कलाम लखनऊ में थे. उनका जोर यंगस्टर्स को सही दिशा देने पर था. उन्होंने एक बार फिर युवाओं को उनकी ताकत का एहसास कराया. चार महीने पहले भी उन्होंने यही बात कही थी कि हम अपनी ताकत को समझें, अपनी पहचान बनाएं. हम क्या ऐसा नया करें जिससे लोग हमें याद करें. इसी विजन ने डॉ. कलाम को बुलंदियों पर पहुंचाया और मिसाइलमैन की पारखी नजर अगर यंगसटर्स में 2020 के वल्र्ड चैम्पियन्स देख रही है तो इसमें गलत क्या है.
एक और बात. मंजुनाथ षणमुगम पर फीचर फिल्म बनाई जाएगी. सवाल उठता है मंजुनाथ ही क्यों? दरअसल आज हर संजीदा यंगस्टर में एक मंजुनाथ सांस लेता है. देखने में सीधासाधा, जॉली और बात-बात पर फिल्मी गाना गुनगुनाने वाला लेकिन करप्शन और अन्याय के खिलाफ लड़ाई में जान की बाजी तक लगा देने वाला. डॉ. कलाम ने युवाओं की आखों में यही तूफान देखा है. तभी तो वो कहते हैं 2020 हमारा है.
अगली कड़ी में डा. कलाम और अनुष्का.

12/20/09

याद आएंगे रामलाल


अखबार में काम करता हूं. हत्या, हादसा और भी तमाम बुरी खबरें आती रहती हैं. हम बिना विचलित हुए अपना काम करते रहते हैं. लेकिन कभी कभी कोई खबर दुखी कर जाती है. संडे रात खबर आई कि पुलिस हेड कांस्टबल की कार्बाइन छीन कर उसकी हत्या कर दी गई. मरने वाले का नाम था रामलाल.
सुन कर जैसे झटका लगा. वही राम लाल तो नहीं जिससे हर दूसरे -तीसरे दिन स्कूल के गेट पर मुलाकात हो जाती थी. वही रामलाल जिसने दो दिन पहले ठेले से अमरूद छाटने में मेरी मदद की थी, वही रामलाल जो सोने के दाम बढऩे परेशान था. उसे अपने छोटे बेटे की शादी करनी थी और गहने के लिए पैसे कम पड़ रहे थे. वही रामलाल जिसे देख कर लगता था कि इतना सज्जन व्यक्ति पुलिस में क्यों है. वही रामलाल जो मुख्यमंत्री के ओएसडी की सुरक्षा में तैनात था, वही रामलाल जो ेहमेशा कार्बाइन अपने साथ रखता था. वही राम लाल जो स्कूल के माली की हार्टअटैक से मौत पर दुखी था कि उसकी उम्र तो ज्यादा नही थी.
नहीं पता था कि वीवीआईपी की सुरक्षा में तैनात रामलाल खुद इतना असुरक्षित था. दूसरों के प्रोटेक्शन के लिए जिस कार्बाइन को वो हमेशा अपने साथ रखता था वही उसकी मौत का कारण बन गई. रामलाल से बस थोड़ी दिनों की इतनी सी जान पहचान थी. मेरी ओर से उसे छोटी सी श्रद्धांजलि.

12/13/09

मेरा पहला प्यार!




पिछले हफ्ते की ही तो बात है, अपनी प्रिया की सर्विर्सिंग कराई थी. उसका टायर बदलावाया था. नया सीट कवर लगवाया था. कितनी फ्रेश फ्रेश लग रही थी अपनी प्रिया. कुछ यंग सी, कुछ इठलाती सी. एक बार फिर फिर फिदा हो गया था उस पर. मैकेनिक से पूछा आयल-वायल तो चेक कर लिया है ना, कारबोरेटर साफ किया कि नहीं. अरे साहब गाड़ी बिल्कुल मक्खन है. फिर ना जाने क्या सूझा कि उससे पूछ बैठा, अच्छा बताओ कितने में बिकेगी. अरे साहब, बेचने की बात मत कीजिए, बेचना ही होगा तो मुझे दे दीजिएगा. अब ऐसी गाड़ी बनती कहां है. अरे हां, प्रिया का बनना तो कई साल पहले ही बंद हो चुका है. अब खबर आई है कि बजाज कंपनी मार्च के बाद स्कूटर बनाना बंद कर देगी. वेस्पा, लैम्ब्रेटा, प्रिया, बजाज 150, सुपर, चेतक, और इलेक्ट्रानिक, सब बंद हुईं बारी-बारी. अब बजाज कंपनी स्कूटर ही बनाना बंद कर देगी. सुन कर कुछ अच्छा नहीं लगा. इस लिए नहीं कि बाइचांस मेरे पास शुरू से प्रिया ही रही है, बल्कि इस लिए कि वेहिक्ल्स की भीड़ में एक जाना पहचाना चेहरा अब दिखना बंद हो जाएगा. वैसे भी धीरे-धीरे सड़कों पर स्कूटर दिखने कम हो गए हैं. प्रिया और बजाज तो वैसे भी बहुत कम दिखती हैं. लेकिन उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी उसे अलविदा कहने का समय आ जाएगा. अचानक मुझे प्रिया पहले से ज्यादा प्रिय, क्यूट और इनोसेंट लगने लगी. याद नही पड़ता कि इसने कभी निराश किया हो. प्रचंड गर्मी, आंधी-पानी, तूफान या वाटर लागिंग, कहीं भी कभी धोखा नहीं दिया, शिकायत नहीं की, कोई डिमांड नहीं की.

मेरे लिए तो खबर बहुत बड़ी थी. पूरा एक जमाना आंखों के सामने घूम गया. स्कूटर से जुड़ी कितनी खट्टïी-मीठी बातें याद आने लगी. कैसा संयोग है कि स्कूटर चलाना मैंने लैम्ब्रेटा से सीखा लेकिन दिल दे बैठा प्रिया को. लैम्ब्रेटी भी लाजवाब थी लेकिन उस समय भी मुझे प्रिया अधिक स्लिम, शोख, चुलबुली और स्मार्ट लगती थी. क्या गजब का पिकअब था. कालेज डेज में दोस्त की बजाज पर ट्रिपलिंग करना तो जैसे आम बात थी. कभी कभी तो शरारत में चार लोग भी लद जाते थे. लेकिन कोई फर्क नही पड़ता था. किसी भी शहर में बजाज स्कूटर पर पूरी फैमिली दिखना आम बात थी. अभी भी याद है कि एक दिन बगल में रहने वाले अंकल कुछ परेशान से आए. उनके बेटे का एग्जाम था और मोटरसाइकिल स्टार्ट नहीं हो रही थी. मैंने कहा था, बस दो मिनट अंकल अभी छोड़ता हूं. ठीक से दो किक भी तो नहीं मारनी पड़ी थी अपनी प्रिया में और गड्डी चल दी थी छलांगा मार दी. इस स्कूटर ने हर परीक्षा की घड़ी को पास किया. कितने ही मौके आए जब वह सिर्फ सवारी नहीं सहारा भी बन कर खड़ी थी. बेटी को स्कूल छोडऩे जा रहा था. रास्ते में पिछला पहिया पंक्चर हो गया. बेटी के चेहरे पर परेशानी के भाव थे. मैंने एक ईंट उठाई, गियरबाक्स के नीचे लगाई स्कूटर टेढ़ी की, बेटी से कहा, बस जरा सा सहारा दिए रहो. सिर्फ दो मिनट लगे थे पहिया बदलने में. अगले पल दौड़ रही थी प्रिया फर्राटे से. बेटी के चेहरे पर मुस्कान थी. ऐसे लम्हे तो कई हैं जब हम कभी प्रिया पर इतराए, कभी मुस्कराए तो कभी शरमाए. बात कुछ साल पहले की है. स्कूटर की डेंटिंग-पेंटिंग और ओवरहालिंग कराई थी. बिल्कुल नई नवेली दुल्हन की तरह लग रही थी. स्कूल में बच्चों की छुट्टी होने वाली थी. गेट के पास ही मेरी स्कूटर के पास आर्मी ट्रक भी खड़ा था. बच्चों के साथ लौटा तो फौजी ड्रेस में चार-पांच सरदारजी उसे घेरे खड़े था. मैंने संभल कर पूछा, क्या हुआ? उनमें से एक बोला, सर जी आपकी स्कूटर तो गजब की मेंटेन्ड है, इसके आगे मेरे सीओ साहब की स्कूटर भी फेल है.
एक बार स्कूटर से जा रहा था. पीछे से हार्न बजाते एक्टिवा पर सवार एक 'स्मार्टी' अचानक बगल में आकर बोली, अंकल साइड क्यों नहीं देते? इसके बाद वो ये गई-वो गई. क्रासिंग और मोड़ पर तो ऐसा तो अकसर होता है कि बड़ी सी बड़ी चेकिंग में भी पुलिस वाला प्रिया और बजाज की तरफ देखता तक नहीं. मैं मुस्कराता हुआ धीरे से निकल जाता हूं. कहते हैं अब बजाज स्कूटर की सेल बहुत घट गई है इसी लिए इसके प्रोडक्शन को बंद करने का फैसला लेना पड़ा. यंगस्टर्स को तो अब एक्टिवा, काइनेटिक या स्कूटी पंसद है. फ्यूल इफिशिएंसी को जाने दें तो लो मेंटिनेंस प्रिया और बजाज की खासियत इसकी सिम्प्लीसिटी ही थी. लेकिन इस सिम्प्लीसिटी की काम्प्लेक्सिटी को समझना आसान नहीं. फिलहाल इस पोर्टिको के कोने में धूल खाती स्कूटर को चमकाइए और निकल जाइए ज्वायराइड पर.

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