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2/27/17

गर्दभ शक्ति बोले तो ASS power ..!

गधे को लेकर बीच बाजार में लट्ठम- लट्ठा।  किसने सोचा था कि भारत में इतने बड़े पैमाने पर गदहा युद्ध छिड़ जाएगा। गुजरात में कच्छ के गधे दुर्लभ हैं उनको जाने दें , आपके शहर में भी ओरिजनल गधे अब आसानी से कहां दिखते हैं। वैसे नकली गदहों की भरमार है।
पहले तो गधे और गदहे (मूर्ख) में अंतर समझ लीजिए गधा जैसा मेहनती, बुद्धिमान, नेक, डेडिकेटेड और क्यूट जानवर दूसरा है क्या। जो वास्तव में मूर्ख हैं लेकिन अपने को सयाना समझते वो सबसे बड़े गदहे (मूर्ख) हैं। किसी का सीधा-मासूम होना मूर्खता का प्रतीक कब से हो गया। गधे तो सिर्फ चींपों-चींपों करते, लेकिन कभी इंसानों के बारे में चीप बातें नहीं करते। गधों के बारे में बार-बार चीप बातें कर मजाक उड़ाने वालों के लो आईक्यू पर तरस आता है। गधे का आईक्यू , भैंस से कहीं बेहतर होता। भैंस के आगे बीन बजाते रहिए वो मूढ़ों की तरह पगुराती रहेगी। लेकिन गधे के आगे सारंगी बजा के देखिये वो तुरंत चींपो चींपो कर रिसपांस देगा। ज्यादा परेशान करेंगे तो मारेगा दुलत्ती। बताइए भैंस मूर्ख या गधा। गधे की ताकत समझने वाले ही गदहे (मूर्ख)हैं।
     सोचिए घोड़़ा मेहनत करे तो उसे हार्सपावर बोलते और गधा धोबी के घर से घाट तक दिनभर लादी ढोता फिरे तो बोला जाता - धोबी का गधा घर का घाट का। गधे को लेकर कितनी निगेटिवटी भर दी गई हैं हमारे मन में किसी की किस्मत साथ नहीं देती तो वो कहता फिरता .. हमारी किस्मत तो गधे के ..फलां से लिखी गई है। अब आपकी किस्मत खराब है तो इसमें गधा बेचारा क्या करे। किसी को अपमानित करना हो तो उसे गधे पर बैठाकर घुमाया जाता। इससे गधे की इमेज पर असर नहीं पड़ता लेकिन उसकी पीठ पर बैठकर जिसको घुमाया जाता वो मुंह दिखाने लायक नहीं रहता। अब गर्दभ शक्ति को पहचानने का समय गया लेकिन गधे की ताकत समझने वाले नादान हैं। गधे की पीठ हो या पिछाड़ी उसके अंगों में जितनी पावर है उतनी घोड़ों में कहां। तभी हमेशा गधे की दुलत्ती से बचने को कहा जाता, घोड़े की नहीं।
    बचपन में पढ़ा था फॉर ऐस, ऐस माने गधा, डी फॉर डंकी, डंकी माने भी गधा। लेकिन बाद में पता चला कि अंगे्रजी में ऐस का एकऔर मतलब पिछाड़ी भी होता है। सावधान किया जाता है कि अफसर की अगाड़ी और गधे की पिछाड़ी से दूर रहना चाहिए। ये कहावत भी गधे की दुलत्ती की पावर के कारण बनी है। समय के साथ गधे की पिछाड़ी, शक्ति का प्रतीक बन कर उभरी हैं गधे को सम्मान देने के लिए ही पिछाड़ी को अंग्रेजी ऐस भी बोला जाता। और बात - बात पर चुनौती दी जाती है कि अगर तुम्हारी पिछाड़ी में दम है तो फलां चीज कर के दिखाओ। यानी मूंछों का ताव और  पिछाड़ी का भाव समान है।
   तुम्हारे पिछवाड़े लात पड़ेगी, यह सुनते ही लोग बुरा मान जाते हैं। यह अंग्रेजी में भी उतना ही असरकारी है जैसे - आई विल किक योर ऐस.. वो तुरंत पलट कर जवाब देगा - किस माई ऐस। किसी को ऐसहोल बोल कर देखिए वो आपको गाली देने लगेगा। ये है ऐस पावर। गधा शालीन है, गधा धैर्यवान है बस कभी कभार चींपों-चींपों कर कहता - माइंड योर बिजनेस यू ऐसहोल..!


2/12/17

हजरतगंज की उध्‍ाेड़-बुन..!


रफूगर श्‍ाा‌हिद हुसैन
लखनऊ का हजरतगंज, नवाबियत और नजाकत की मिसाल। समय बदला, हजरतगंज में भी बहुत कुछ बदला, अब भी बदल रहा। लेकिन अब भी बहुत कुछ ऐसा है जो बहुत नहीं बदला। आजकल हजरतगंज में खुदाई चल रही। कैथेड्रल चर्च के सामने मेट्रो का अंडरग्राउंड स्टेशन बनेगा। इसके सामने मेफेयर बिल्डिंग कभी गुलजार थी। मेफेयर फिल्म थियेटर के एक तरफ क्वालिटी रेस्त्रां दूसरी तरफ राम आडवानी की किताब की दुकान। थियेटर बंद हुआ, रेस्त्रां बंद हुआ, राम आडवानी भी गुजर गए। मेफेयर बिल्डिंग में अब रौनक कहां। 
मेफेयर की दूसरी तरफ हलवासिया बिल्डिंग के सामने एक पेट्रेल पंप था। बगल में था छोटा सा स्कूटर स्टैंड जिसका ठेकेदार मोटा सा जिसकी कमर झुकी रहती थी हमेशा । मैं स्कूटर वहीं खड़ा करता। अब वहां रिलायंस वर्ड है। इसी तरह जहां अब मल्टीलेवल पार्किंग है वहां पहले कोतवाली और फायरब्रिगेड थी। गंज के हनुमान मंदिर के पास आर्चीज गैलरी के बगल में एक सर्वप्रिय भोजनालय भी था। उसके मालिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वर्मा जी थे। खाने के
गंज में यहा कभ्‍ाी पेट्राोल पंप थ्‍ाा




बाद अक्सर  उनका भाषण भी सुनना पड़ता था। अब जहां कैफेडे है वहां केजकोजी कार्नर और कृष्णा स्वीट्स थी। वहां पनीर पकौड़ा बढिय़ा मिलता था। 
आर्काइव में करीब सौ साल पुरानी फोटो देखी। हजरतगंज में रोड के बीचोबीच कार पार्क होती थी तब। नवाब, फिरंगी और तालुकेदार मेफेयर में फिल्म देखना शान समझते थे। मैंने भी बहुत फिल्म देखी हैं यहां। बात करीब तीन दशक पुरानी है। हम मेफेयर में फिल्म देखने से पहले गंज का चक्कर लगाते थे, खूबसूरत गंज में घूमती खूबसूरती को निहारते और शान से फिल्म देखते। 
साहू थियेटर के बगल में रंजना रेस्त्रां था जहां बाद में बरिस्ता खुला। वो भी अब बंद हो चुका है। लेकिन उसके बगल की ड्राइक्लीनिंग की दुकान अभी भी जिंदा है। कितना बदल गया गंज। लेकिन अब भी कुछ है जो नहीं बदला। गंज का हनुमान मंदिर नहीं बदला, खादी की दुकान नहीं बदली, कॉफी हाउस भी वहीं है । मेफेयर के पास ही फुटपाथ पर बैठने वाला वह शख्स  भी कहां बदला जो दिन भर उधेड़-बुन में लगा रहाता। उसके सामने साड़ी और कीमती कपड़ों का ढेर लगा रहता और वो बड़ी तल्लीनता से कपड़ों के धागे उधेड़ कर उन्हें रफू करता रहता।  कुछ दिनों पहले गंज गया।  बेपनाह भीड़ में खोजने लगा अपने पुराने गंज को। तभी वो शख्स दिख गया उसी तरह उधेड़-बुन में लगा हुआ। कुछ भी तो नहीं बदला था उसमें, वही तल्लीनता, वही उधेड़-बुन।
 हां, उसके बाल जरूर सफेद हो गए थे और अब वो मेफेयर वाले फुटपाथ पर नहीं साहू के बगल में ड्राइक्लीनर के सामने बैठता है । नाम है शाहिद हुसैन उम्र करीब 65 साल। मुझसे रहा नहीं गया, पूछ ही लिया- जनाब करीब 30 साल से आपको इसी तरह रफू करते देख रहा। शाहिद हुसैन ने करेक्ट किया, 30 नहीं 40 साल से कर रहा हूं यह काम। एक जगह बैठे बैठे एक ही तरह के काम में ऊब नहीं होती? नहीं जनाब इसी तरह काम करते दो-तिहाई जिंदगी कट गई, बाकी भी कट जाएगी.. .. और राशिद हुसैन धीरे से मुस्करा दिए। उस मुस्कान में न ऊब थी न थकान। भीड़ और आपाधापी के बीच मुझे पुराना वाल गंज मिल गया था।

11/18/16

रन फॉर मनी..!


आजकल सडक़ सडक़- गली गली लोग दौड़ रहे हैं। जो नहीं दौड़ रहे वो लाइन में लगे हैं। एटीएम के शटर गिरे हुए हैं फिर भी लोग लाइन में लगे हुए  हैं। जरा आहट होती है तो लगता है कहीं ये वो तो नहीं। 
   आपको याद हो कि न याद हो, जब गाडिय़ां कम चलती थी तब गांवों में कोई  वाहन भूले भटके आ जाता तो पीछे-पीछे गांव के लडक़ों का झुंड दौड़ पड़ता था। अब फिर से शहरों में भी कुछ खास वाहनों के पीछे लोग इस तरह  दौड़ते दिखने लगे हैं। ये हैं कैश वाहन । सडक़ पर कैश वाहन देख लोग दौड़ पड़ते हैं कि न जाने ये किस एएटीएम के सामने जा रुके।
    सूने पड़े एटीएम के सामने वैन रुकते ही मिनटों में लाइन सौ के पार हो जाती है। कैश वैन आए न आए आपको बंद पड़े एटीएम के बाहर कभी भी लाइन लगवानी हैं तो 1-2 लोग वहां खड़े हो जाइए फिर देखिए तमाशा, पीछे लंबी कतार लग जाएगी ।
   मेरे ऑफिस में भी स्टॉफ के लिए एक एटीएम लगा है। 24 घंटे में एक- डेढ़ लाख लेकर कैश वैन आती है। कैश लोड करने के पहले शिफ्ट में मौजूद लोग दौड़ पड़ते हैं लाइन लगाने। अॅाफिस में जब तब शोर उठता है आ गया, आ गया.. और लोग कुर्सी छोड़ कर उसी तरह भागते हैं जैसे भूकंप का शोर उठने पर भागते थे।  
     कुछ लोग अब मजा लेने के लिए लिए बीच बीच में आवाज देने लगे हैं - आ गया..आ गया और शुरू हो जाती है रन फॉर मनी। एटीएम पर पहुंचने पर पता लगता है अफवाह थी, वैन नहीं आई है। खिसियाए साथी झेंप मिटाने के लिए पहले टॉयलेट जाते फिर मुह पोंछते हुए अपनी सीट पे आते हैं जैसे पैसा निकालने नहीं, पेशाब करने गए थे। कई दिनों से रन फॉर मनी का यह सिलसिला जारी है। 

7/2/16

तीसरी कसम ....!

       सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है ,  न हाथी है न  घोड़ा है ...वहां पैदल ही जाना है ... यह गाना करीब ५० साल पहले बनी  फिल्म तीसरी कसम का है . वहीदा रहमान और राज कपूर की इस फिल्म का गाना क्या है पूरी ज़िन्दगी का फलसफा है . फिल्म में राज कपूर ने तीन कसमे खाई थी . हाल ही में मेंरे साथ भी कुछ ऐसा हादसा हुआ की मैंने भी तीन कसमें खाई .
       गरीब रथ एक्सप्रेस से मैं घर जा रहा था . रिजर्वेशन कन्फर्म था . ऊपर की बर्थ थी लेकिन चिपचिपाती उमस के बाद कोच में ठंडी हवा के झोंके लगे तो नीचे बैठ थोडा सुस्ताने लगा. बैग अपनी बर्थ पर ऊपर रख दिया.  ट्रेन चली  राजनीत पर  बहस  भी चल पड़ी . आधा घंटा कैसी बीता पता ही नहीं चला. पानी की बोतल के लिए बैग की तरफ हाथ बढ़ाया . लेकिन यह क्या ..? बैग ऊपर नहीं था . मैं नीचे बैठा था और किसी ने बड़ी सफाई से ऊपर से बैग साफ कर दिया था . न मुझे न सह यात्रियों को समझ आयाकि बैग गया  कहाँ . कीमती सामान के नाम पर बैग में बिलकुल नया लैपटॉप, १६ -१६ जीबी के तीन पेन ड्राइव और एक स्मार्ट फोन था. जरूरी सामान के नाम पर पढने वाला एक चश्मा , स्कूटर और अलमारी की चाभियाँ और एक हफ्ते पहले खरीदी एक कच्छी थी. इसके बाद एफ़ाइआर की औपचारिकता पूरी की गयी . 

        आमतौर पर लैपटॉप लेकर यात्रा नहीं करता . लेकिन कंपनी ने कुछ दिन पहले पुराने की जगह एक लेटेस्ट लैपटॉप दिया था. इस लिए कर्त्तव्यपारायणता से परिपूर्ण  था . सोचा ऑफिस के कुछ काम, ऑफ के दिन घर से भी निपटा लूँगा सो लैपटॉप रख लिया .  पता नहीं किसकी नज़र लग गयी . बैग मेरा चोरी हुआ था लेकिन मैं चोर जैसा मुह लिए पैदल ही घर पंहुचा . उस दिन मैंने भी तीन कसमे खाई.....
१. ट्रेन में लैपटॉप लेकर नहीं चलूँगा .
२.यात्रा में बैग हमेशा अपने पास आँख के सामने रखूँगा
३. और तीसरी कसम ..कभी ऑफिस को घर नहीं ले जाऊंगा .

6/14/16

का.. बे चिल कर रहे हो का?


बात बहुत पुरानी नहीं है। यही कोई दो- ढाई दशक पहले, अंगरेजी बोलने वाला अपने को नवाब समझता था भले ही लिखने में बहुत मिस्टेक करता हो। लेकिन ढेर सारे ऐसे लोग थे जो ग्रामेटिकली करेक्ट अंगरेजी लिखते लेकिन पब्लिक में बोलने में लटपटा जाते। रैपिडेक्स भी उनका हौसला नहीं बढ़ा सका। भला हो इंटरनेट, सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन का, अंगरेजी का अब सोशलाइजेशन हो गया है। 
अब सब धान बाइस पसेरी।  एफबी, वाट्सऐप पर जिसे देखो अंगरेजी ढेले हुए है। नुक्कड़ पर बरफ बेचने वाला बबलू भी और चौराहे पर गुटखा बेचने वाला गुड्डïू भी। बस कम्युनिकेट हो जाए कि आप कहना क्या चाहते हैं, ग्रामर भले ही गलत हो.? हू केयर्स। जस्ट चिल यार टाइप। हाथ में स्मार्ट फोन (भले ही चीनी ब्रांड), दोनों कान में ठेपी, फटही जींस उसके पीछे खोंसा हुआ माबाइल, खोपड़ी के बचे बाल को बार-बार खड़ा करने का असफल प्रयास करते हाथ, बिना मोजे का कैनवस का जूता। सब लगे हैं कूल डूड बनने और दिखने की कोशिश में।  इन्हें देख अपको लगेगा वॉव..क्या कूल हैंं। लेकिन तभी देसी लहजे में सवाल दागेगा - का.. बे चिल कर रहे हो का? नहीं यार एक फिलिम देख रहे .. क्या माइंड ब्लोइंग फिलिम है गुरू। 
कूल डूड सा दिखने और कडक़ अंगरेजी तोडऩे वाला यह लौंडा इंटर फेल हो तो अचरज नहीं। ऐसे लोग मोमो या चाऊमीन में चिली सॉस कस के पेलते हैं फिर सुबह घंटा भर कमोड पर चिलकते हुए चिल करते (निकालते) हैं। गुद्दी (खोपड़ी के पीछे का हिस्सा) घुटाए और आगे के बाल को जेल लगा कर खड़ा किए डूड इसी तरह की बात करते कहीं भी मिल जाएंगे। लोअर, मिडिल और अपर सब क्लास में यही हाल। पूरा समाजवाद है। अपर क्लास का डूड महंगे पार्लर में गुद्दी घुटवाता है तो गरीब डूड अपनी गल्ली के सैलून में खोपड़ी पर चाइना मशीन चलवाता है। 
एक जमाना था जब लोग बाल को सलीके से संवारने के लिए जेब में कंघी रखते थे। अब कैजुअल दिखने के लिए बाल बार बार बिगाड़ते चलते हैं, अपलोड- डाउनलोड टाइप।  वाई-फाई स्पीड  बढिय़ा है तो चिल करते नहीं है नही तो चीखते हैं। और हम चिलचिलाती धूप में चिल करते इन कूल डूड को देख बोल ही देते हैं .. वॉव.. माइंड ब्लोइंग..!  

5/29/16

जवान होता एक बूढ़ा घर..

मेरा ननिहाल।मिर्जापुर का यह घ्रर बूढ़ा होकर भी जवान है। काेई ढाई सौ साल पुराना। इसका ऊपरी कलेवर बदलता रहता लेकिन दिल वही पुराना वाला।  इस घर के आगे एक नीम का पेड़ हुुआ करता था। वो उम्र पूरी कर चला गया तो उसके बाद एक गुलमोहर  लहलहाता था इस घर के सामने। पीछे एक पोखरी थी ...भटवा की पोखरी..वोभी सूख गई।  पहले बाहर वाला गेट नहीं था, सिर्फ चबूतरा था।  ऊपर टिन शेड।                                                                                                    बगल में एक कूआं था। कूओं अब भी है लेकिन उसमें पानी नहीं। धमाचौकड़ी होती। थी। दलगिरिया की माई..बिल्लाड़ो बो, किलरू साव...बिस्सू ...सेठ,  गोबरहिया गच्च..भटवा की पोखरी,पातालतोड़ कुआं ...उफ..! कितने किस्से,कितनी यादें । पहले गर्मी की छुट्टी की मतलब होता था ननिहाल और ननिहाल का मतलब मिर्जापुर, मतलब मस्ती। रोज गंगा नहाते थे। गंगाजल पीकर आते फिर चार आने की शुद्ध घी की जलेबी खाते। अब न गंगाजी वैसी रहीं न जलेबी। जाने कहां गए वो लोग जो पा..लागी और राम भज...का जवाब जियत रहा बच्चा.. से देते थे।  वो दिन भी क्या दिन थे।

5/23/16

मैं हूं न..!
थोड़ी आस्था, थोड़ी जुबानी, आज सुनाता एक सच्ची कहानी। मेरा एक दोस्त है चंद्रशेखर। बड़ा गुणी। जी न्यूज में कई साल तक मंथन करता रहा। अचानक मन उचटा, नौकरी छोड़ जा बैठा संतों के चरणों में। पूरी तरह बाबा तो नहीं बना लेकिन आजकल बाबाओं पर डाक्यूमेंट्री बनाने की धुन सवार है। जुबान पर सरस्वती जेहन में श्याम, अब यही है उसका नया मुकाम। जब राधे-श्याम हैं तो गृहलक्ष्मी का क्या काम। सो किराए के घर में चंद्रशेखर अकेले ही रहता है। और साथ रहता है माखन चोर श्याम। वैसे एक-दो मोटे चूहे भी हैं साथ देने को। मठ, मंदिर, आश्रम जहां भी जाते माखनचोर श्याम की छोटी सी प्रतिमा हमेशा साथ रहती। एक दिन चंद्रशेखर ने श्याम से पूछ ही लिया.. तुमको साथ लिए घूमता, तुम हो भी या नहीं? श्याम कहां कुछ बोलने वाले थे..।
इसी बीच चंद्रशेखर कुछ दिनों के लिए बाबा के आश्रम गया हुआ था। इस बार श्याम को साथ नहीं ले गया, छोड़ गया था घर की रखवाली को। हालांकि घर में पूंजी के नाम पर तीन लाख का एक कैमरा, एक लाख का कंप्यूटर, लैपटाप और टीवी के अलावा कुछ खास नहीं था।
लेकिन एक रात सूने घर पर चोरों की नजर पड़ ही गई। चोर छत की जाली तोडऩे लगे। पड़ोसी को आहट हुई, उसने चुपके से देखा तो चार चोर जाली तोड़ छत पर पड़ी सीढ़ी लगा आंगन में उतर रहे थे। चोरों ने फटाफट कैमरा, कंप्यूटर सब बांध लिया था , बस पैसे की तलाश में थे। पड़ोसी चुपके से छत पर उतरा। उसने आंगन में लगी सीढ़ी खींच ली और शोर मचाया। पूरा मोहल्ल जमा हो गया। पुलिस भी आ गई । चोर फंस चुके थे। पुलिस घर में घुसी, चोरों की तलाश शुरू हुई। चारों उसी कमरे में बेड के नीचे दुबके मिले जहां श्याम विराजमान थे। चोरों को क्या पता था कि जिस घर में घुस रहे हैं वहां उनसे भी बड़ा एक चोर (माखनचोर)पहले से मौजूद है। एक चोर की सुताई होने लगी तो दार्शनिक अंदाज में बोला- साहेब हम तो झोपड़ी में सोअत रहे, इहां कैसे पहुंचे नहीं पता। चंद्रशेखर को अगले दिन सूचना दी गई। घर आकर देखा तो सारा सामन तहस नहस था। लेकिन श्याम अपनी जगह विराजमान थे.. वैसे ही शांत भाव से मुस्कराहते हुए..जैसे कह रहें हों - मैं हूं न..।
....चंद्रशेखर को जवाब मिल गया था।

3/12/16

एक सफर मुख्तसर सा...!


दिल्ली मेट्रो में नैनो सी मुलाकात...इंद्रप्रस्थ से नोएडा सेक्टर 18 तक का मुख्तसर सा सफर। ...आप तो बिल्कुल नहीं बदले, कहां ठहरें हैं, कहां—कहां गए, किससे—किससे मिले, इंडिया फिर कब आएंगे, अच्छा फिर मिलते हैं,फिर से लिखना शुरू कीजिए... हमदोनों गले मिले...बाय...!
कुछ ऐसी ही थी शनिवार को मित्र अभिषेक ओझा से मेरी मुलाकात। अभिषेक अमेरिका से कुछ दिनों के लिए भारत आए थे। संडे को वापस जाएंगे। भागदौड की​ जिन्दगी में हमदोनों बस इतना सा समय निकाल सके। लेकिन दुनिया के दूसरे छोेर से आया दोेस्त मिला तो सही...मेट्रो सिटी में तो पडोसी हाथ भी नही्ं मिलाते।

10/16/14

मौसम है सेल्फियाना..

 जिसको देखो वही सेल्फी ले रहा है आजकल। जब पहली बार ‘सेल्फी’ का नाम सुना तो लगा जैसे यह कुल्फी टाइप की कोई चीज है। बाद में पता चला स्मार्टफोन की बर्फी है यह सेल्फी। लोग बार-बार इसका स्वाद चख रहे हैं और चखा रहे हैं। पपीता, खरबुज्जा, लौकी, कद्दू, सेब, सब एक भाव। सब आत्ममुग्‍ध हैं। टीन एज में आईने के सामने स्टाइल मारने में बड़ा मजा आता था अलग अलग एंगल से। लेकिन वो अदा और उसका मजा अब सेल्फी में आने लगा है-एक बार देखो, हजार बार देखो कि देखने की चीज हूं मैं .. स्टाइल में। वैसे पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से लोग ज्यादा सेल्फियाना हो गए हैं। वोट दिया और सेल्फी लिया। समझ नहीं आता कि वो अपनी बत्तीसी दिखाना चाहते हैं या टेढ़ी-मेढ़ी उंगली में लगी वोट की स्याही । मैंने भी वोट दिया और अपने पुराने सिंगल कैमरा फोन से सेल्फी लेने की कोशिश की। लेकिन रिजल्ट अच्छा नहीं आया। कैमरे का एंगल थोड़ा बिगड़ गया सो चेहरा पपीते की तरह और उंगली ककड़ी जैसी सामने आई।
      सोचिए जब कैमरा या स्मार्टफोन नहीं थे तब लोगों का काम कैसे चलता होगा। क्योकि समय के साथ इंसान ने प्रगति की है लेकिन हमारी मूल सोच(बेसिक इंस्टिंक्ट) में बहुत बदलाव नहीं आया है। जब कैमरे नहीं थे तब लोग, चित्रकार के सामने सज संवर कर बैठ जाते थे और वो कैनवास पर उनकी तस्वीर उतारता था (जैसे टाइटेनिक में हीरो के सामने हीराइन ने बैठ कर स्केच बनाया था)। लोग तेजी से सेल्फियाना हो रहे हैं। डर लगता है कि कहीं कोई प्राण न्योछावर न कर दे, जैसा कि जैसा कि प्राचीन ग्रीस में नारसिसस के साथ हुआ था। कहा जाता है कि नारसिसस(नरगिस) नाम का खूबसूरत युवक पानी में अपना प्रतिबिंब देख, उस पर इतना मोहित हुआ कि उसका हार्ट फेल हो गया था। लेकिन लगता है ‘सेल्फियाना’ बुखार भी जल्द ही उतर जाएगा। पहले सेल्फी केवल टेक सैवी अपर क्लास का शगल माना जाता था। अब कबाड़ी और खोमचे वाले भी अखबार और करैला तोलते हुए वाट्-एप और फेसबुक पर सेल्फी फेंक रहे हैं और जो ‘खास’ चीज आम हो जाए उस पर कोई जान क्यों देगा।

3/24/14

अब तेंदुआ क्या करेगा..!


बाघ, बाघिन और अब तेंदुआ! अचानक क्या हो गया है इन सब को। जान हथेली पर लेकर जंगल से शहर की ओर भाग रहे हैं। क्या जंगली जानवरों का जायका बदल गया है? तभी तो बारहसिंघे और बकरी को छोड़ बच्चों और बड़े, बूढ़ों को चखने के लिए कस्बों और शहरों के चक्कर लगा रहे हैं। और कुद दिन पहले एक तेंदुए ने तो हद ही कर दी, सीधे मेरठ कैंट होता हुआ शहर के पॉश इलाके में जा घुसा। कहीं इन जानवरों को शुद्ध देसी मांस की जगह जंक फूड का चस्का तो नहीं लग गया। वैसे मेरठ में झलक दिखला जा स्टाइल में तेंदुआ आया और गायब हो गया।  वाइल्ड लाइफ वाले पहले तो आए नहीं जब आए तो ज्ञान बघारने लगे कि तेंदुआ जंगल लौट गया है।
      दरअसल तेंदुआ सदमें में है। उसे शहर में इतने घटिया ट्रीटमेंट की उम्मीद नहीं थी। मान लीजिए शहर घूमने का मन हो ही गया तो इसमें मजमा लगाने जैसा क्या है। लोग कामधाम छोड़ कर तमाशा देखने लगे। एक तो मजा ले रही भीड़ और ऊपर से एक्सपर्ट शिकारी की जगह लाठी-डंडे से लैस सिपाही और होमगार्ड भेज दिए स्थिति संभालने के लिए। जैसे तेंदुआ ना होकर आंदोलित आंगनबाड़ी कार्यकर्ता या दिहाड़ी संविदा कर्मी हो कि जब चाहो लाठिया दो।
    तेंदुए ने नहीं सोचा था कि शहर में जंगली जानवरों के साथ सडक़ छाप कुत्तों जैसा ट्रीटमेंट होता है। वैसे तो वो चुपचाप निकलने के फिराक में था लेकिन सामने डंडायुक्त पुलिस देखकर उसे तैश आ गया और उसने पुलिस वालों को लगा दिए दो-तीन लप्पड़। छुपते छिपाते वो मॉल के बेसमेंट में इंतजार कर रहा था कि टीवी चैनल वाले उसकी बाइट लेने जरूर आएंगे। पहले शहर से जंगल लौटे उसके एक साथी ने बताया था कि लकड़ी गोदाम में छिपे होने के बावजूद टीवी चैनल वाले उसके पास बाइट लेने पहुंच गए थे। बड़े तेज हैं, ये चैनल वाले, कहीं भी छिपो खोज निकालते हैं। इसी चक्कर में वो रात भर पॉश एरिया में टहलता रहा लेकिन जब चैनल वाले नहीं आए तो जंगल लौट गया। अगले दिन पता चला कि उसके लप्पड़ का व्यापक असर हुआ था और सेना बुलानी ली गई थी। जहां पहले दिन तमाशाइयों का मजमा था वहां अखबारों में कफ्र्यू जैसे सन्नाटे की फोटो छपी थी। उसे अफसोस हुआ कि नाहक जल्दबाजी की, शहर में एक-दो दिन और रुक जाना था। तेंदुआ फिलहाल जंगल में है। उसे इंतजार है कि कोई चैनल वाला उसकी बाइट लेने आए तो वो बताए कि उसका अगला कदम क्या होगा।

2/17/14

बाघिन मारें गाजी मियां, मजा करें अधिकारी


अजग-गजब है । आदमखोर बाघिन मुरादाबाद -बिजनौर में दस लोगों को निपटा चुकी है। बड़े बड़े शिकारी लगे हैं लेकिन बाघिन के दीदार तक नहीं हुए लेकिन बिजनौर के विधायक गाजी मियां को लगता बाघिन खोजना और वधू खोजना एक जैसा है तभी तो घोड़ी पर चढ़ कर अपने चेले-चापड़ की बैंड पार्टी के साथ जंगल में निकल गए । हां , घुड़चढ़ी की फोटो खिचवाना नहीं भूले। गनीमत है कि घोड़ी को नही पता था कि वो वधू नहीं बाघिन की तलाश में जा रहे वरना जंगल में ही उन्हें कहीं पटक कर निकल लेती। बाघिन को जब से पता चला है कि विधायक  जी बिना परमीशन के घटिया असलहों के साथ उसके पीछे लगे हैं तब से वो नाराज है और कई दिनों से दूसरे शिकार का एक निवाला भी नहीं मुंह में डाला है। इधर वन विभाग के अधिकारी मस्त हैं कि बाघिन ने उनकी रेंज में  कुछ नया टेस्ट नहीं किया है। लेकिन चिंता तो इस बात की हो रही है कि बाघिन और गाजी मियां का सामना होगा तो बाघिन पहले किसे चखेगी- घोड़ी को या घुड़सवार को !

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