
अक्टूबर के पहले हफ्ते में कई ऐसी चीजें हुई जो अलग-अलग होते हुए एक-दूसरे से जुड़ी हुईं हैं. पूरे देश में वन्य जीव सप्ताह मनाया गया. पिछले संडे शरद पूर्णिमा थी और 7 अक्टूबर को करवाचौथ था. ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में आकाश से अमृत बरसता है. इस लिए रात को छत पर खुले आसमान के नीचे खीर रखने की परम्परा है. सुबह उस अमृत युक्त खीर को लोग ग्रहण करते हैं. अब कम ही लोग ऐसा करते हैं क्योंकि आसमान पॉल्युशन से भरा होता है. करवाचौथ पर महिलाएं चांद देख कर व्रत तोड़ती हैं लेकिन अब पक्का नहीं कि 7 अक्टूगर को कहां-कहां आसमान साफ था. हो सकता है कि आकाश बादलों से ढंका हो. शरद पूर्णिमा के आसपास तो आसमान साफ और शीतल होता था. इस बार सब उल्टा-पुल्टा हो रहा है. बारिश के मौसम में सूखे की नौबत थी और अब शरद ऋतु में झमाझम पानी. इसी बीच एक और खबर आई कि सरकार ने गंगा की डालफिन को नेशनल एक्वाटिक एनिमल घोषित कर दिया है. ऐसा विलुप्त होती डालफिन को बचाने के लिए किया गया है. कभी पूरी गंगा डॉलफिंस से भरी रहती थी, कहा जा रहा है कि अब यहां मुश्किल से दो सौ ही बची हैं. बादलों में शरद ऋतु का चांद, बेमौसम बारिश और गायब होती डॉलफिंस, ये सब पर्यावरण में बदलाव के खतरनाक संकेत हैं. बचपन में अपने गांव में गंगा किनारे मुश्किल से आधा घंटा खड़े रहने पर पानी में गोता लगाती सूंस(डॉलफिन) दिख जाती थीं लेकिन अब नहीं दिखतीं. गंगा की डॉलफिन समुद्र्र में नहीं रह सकती और गंगा का पानी हमने इनके रहने लायक नहीं छोड़ा. बाघ और मोर के बाद गंगा की डॉलफिन को नेशनल एक्वाटिक एनिमल का दर्जा मिलना गर्व की बात तब होगी जब इनके वजूद को बनाए रखने में हम कामयाब होंगे. डॉलफिन के बहाने हमें पर्यावरण के खतरों को समझना होगा. वरना कहीं डॉलफिंस हमेशा के लिए ना चली जाएं.
हमें सभी जीवो की प्रजातिया बचाने की कोशिश करने चाहिए
ReplyDeleteAbhishek Ojha ka kahana hai:
ReplyDeleteमेरी टिपण्णी (यहाँ से टिपण्णी वाला बक्सा खुल नहीं रहा):
प्रयास (वो भी सरकारी कागजों पर) तब शुरू होता है जब पानी सर से ऊपर चढ़ने लगता है. वैसे सिस्टम को गाली देने का क्या लाभ? हम सभी दोषी हैं... अमृत की जगह अगर एसिड बरसे तो जिम्मेवार हम ही तो हैं ! कानपुर फैक्ट्री वाले गंगा को प्रदूषित करते हैं तो हम कौन सा प्लास्टिक नहीं डालते? वही बात है एक बाबू १० रुपया लेता है साहब करोडों लेते हैं. दोषी दोनों बराबर के हैं.
NICE ONE!!!!
ReplyDeleteआपके क्षेत्र में संगम में पहली बार सूंस की पीठ देखी थी, अब तो बस कभी कभी अखबार में दिखती है बिल्कुल इस अंदाज में जैसे एलियन दिखा हो.
ReplyDeleteलेकिन भैया जब गंगा गंगा नहीं रही तो सूंस तो बस एक जीव है...
सूम मैने गंडक में भी देखे थे आज से करीब 10 वर्ष पहले।
ReplyDeleteदेखिए हम लोग तभी जागते हैं जब मुआमला समाजवाद का हो जाय।मतलब यह कि समस्या ऐसी हो जाय कि उससे समाज को फायदा हो। नहीं समझे ?
दो सौ सूमों को बचाने के लिए कम से कम दो सौ का महकमा बनेगा। एकाध सौ करोड़ का बजट। यात्रा, सर्वेक्षण - मतलब टी.ए. डी.ए.। रोजगार का सृजन। कितने ही मनुष्यों का भला ! घूस घास तो भई समझ ही गए होंगे..... लाभ ही लाभ।
अब आप जैसे समाज के शत्रु पूँजीबादी ऐसी भषण फैलाते ही रहते हैं। ... मुझे किसी से डर नहीं, छाप दीजिएगा। पक्का पूँजीवादी हूँ मैं। अभी यह देख रहा हूँ कि गौरैया तक गायब हो गईं , किससे कहूँ कि उसे राष्ट्रीय पक्षी नं 2 कर दिया जाय , गिद्ध को तो नहीं कहाँ सकता !
सार्थक आलेख. निश्चित ही इस दिशा में प्रयास होना चाहिये.
ReplyDeletebahut achcha laga aapka lekh...chota sa lekh kai vishyo ko samavisht kiye hue hai....han prakriti ke seedhe khilwaad aur nahi hona chaiye
ReplyDelete