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1/11/09

पॉजिटिव थिंकिंग


कहा जाता है कि खुशदिल लोग जल्दी बूढ़े नहीं होते. फिजिकली और मेंटली, दोनो. इसी तरह जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिया और पॉजिटिव थिंकिंग, जिंदगी के सफर को सहज और सरल बनाने में मदद करती है, लाख मुश्किलों, अड़चनों और अनसर्टेनिटी के बावजूद. लेकिन अगर जीवन में खुशियां ही खुशियां हों या फिर एकरूपता आ जाए तो इससे भी ऊब पैदा होती है. एकरूपता से ऊबना हमारा स्वभाव है. यह हर क्षेत्र में लागू होता है. इंटरटेनमेंट के क्षेत्र में भी. जो बातें आज मनोरंजक लगती हैं या इंटरेस्ट जगाती हैं, लगातार परोसे जाने पर वही उबाऊ हो जाती हैं. टीवी के प्रमुख चैनलों पर दिखाए जा रहे कई लोकप्रिय सीरियलोंं के साथ भी यही हो रहा है. जो सीरियल पहले चैनलों की टीआरपी के ध्वजवाहक थे, अब लोकप्रियता की निचली पायदान पर खिसक रहे हंै. क्यूंकि सास भी कभी बहू थी, कहानी घर घर की और कुमकुम जैसे सीरियलों की लोकप्रियता अब पहले जैसी नहीं रह गई है. यहां तक तो गनीमत हैं. लेकिन जब ये समाज को बीमार करने लगें तो हमें एलर्ट हो जाना चाहिए. कई शहरों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि लव ट्रायंगल, एकस्ट्रा मैरिटल अफेयर, बिट्रेयल, कांसपिरेसी, अंधविश्वास और विश्वासघात के मसालों से भरपूर ये सीरियल समाज में निगेटिव थाट्स को बढ़ा रहे हंै. महिलाएं इनसे विशेष रूप से प्रभावित हो रही हैं. इन सीरियलों को लगातार देखने वाली महिलाओं में डिप्रेशन के मामले बढ़ रहे हैं. ये सीरियल अब न केवल बोर कर रहे हैं बल्कि तनाव भी बढ़ा रहे हैं. डाक्टर भी इस बात को स्वीकारते हैं. वे सास-बहू के झगड़ों, अनैतिक रिश्तों और भूत-प्रेत वाले हॉरर सीरियलों को छोड़ कर हेल्दी ह्यूमर से कार्यक्रम देखने की सलाह देते हैं. लखनऊ, आगरा रांची और पटना जैसे शहरों में हर महीने औसतन दो से चार ऐसे मामले आ रहे हैं जिनमें इस तरह के सीरियल देखने वाली महिला डिप्रेशन को शिकार हो गईं. मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकोंके अनुसार सीरियल देखने वाला व्यक्ति उसके किरदार से खुद को जोड़ लेता है और उसी तरह सोचने लगता है. इससे शरीर में कई तरह के रासायनिक बदलाव होने लगते हैं जा ेधीरे-धीरे तनाव का रूप ले लेते हैं. इसी तरह आत्मा और पुनर्जन्म के की थीम वाले सीरियल देख हमारे मन में दकियानूसी विचार आने लगते हैं.

1/7/09

ऐसी ही होती हैं बेटियां

ऐसी ही होती हैं बेटियां

फ्राइडे को टीवी के प्राइम टाइम पर यूं ही चैनलों के बीच टहल रहा था. टॉप चैनल्स पर टॉप क्लास के सीरियल्स और रियलिटी शोज कहीं बालिका वधू, कहीं कहीं जुनून, कहीं इंडियन आइडल तो कहीं एक खिलाड़ी एक हसीना, किसी चैनल पर वायस आफ इंडिया चल रहा था, किसी पर सारेगामापा की तरंगें थीं, तो कहीं बिग बॉस का जलवा. प्राइम टाइम में सभी चैनल्स अपना बेस्ट झोंक देते हैं. इसलिए इन शो की टाइमिंग एक होती है या उनमें ओवरलैपिंग होती. एक ही समय में उन सभी शोज को इंज्वॉय करना अपने में चुनौती है. इसमें महारत या तो मुझे हासिल है या मेरी छोटी बेटी को. मेरी बेटी तो रोज ही परिवार की नजरें बचा कर रिमोट को चैनल्स पर एक-दो बार भांज देती है. हां, मैं यह काम सिर्फ फ्राइडे को ही कर पाता हूं क्योंकि उस दिन मेरा संडे होता है यानी वीकिली ऑफ। सो आफ के दिन प्राइम टाइम में एक चैनल पर रियलिटी शो में टॉप contestant चार लड़कियों को देख रुक गया। एक अच्छी सी लड़की अच्छा सा गाना गा रही थी. वह मध्य प्रदेश के छोटे शहर रीवां से थी. उसने गजब के confidence के साथ कहा, टैलेंट है तो फर्क नही पड़ता कि वह छोटे शहर से है या बड़े. दूसरी टॉप contestant यूपी के फैजाबाद से थी. उसने भी बड़े गर्व से कहा, रियलिटी शो में इस बार लड़की ही होगी चैंपियन, व्हाई शुड ब्वाय हैव आल द फन? मजा आ गया, लगा कि आजकल ऐसी ही होती हैं बेटियां. कभी तितलियों सी, कभी नटखट गुडिय़ों सी, कभी छुईमुई की पत्तियों सी तो कभी शैतान दोस्त और कभी गंभीर स्त्रियों सी लगती हैं बेटियां। परिवार का स्पंदन और रिश्तों का बंधन होती हैं बेटियां। मुझे न जाने क्यों अच्छी लगती हैं बेटियां। लोगों को बोझ लगती होंगी, मुझे तो भीनी- भीनी सुगंध सी लगती हैं बेटियां।

1/6/09

ज़रा सी लापरवाही जी का जंजाल

कहावत है न ज़रा सी लापरवाही जी का जंजाल । ऑफिस जाने की जल्दी,स्कूटर की चाभी निकालते समय ऑफिस रैक की चाभी भी घास में gum गयी । स्पाट याद थी सो सोचा बाद में खोज लेंगे । अगले दिन सुबह उस स्पाट पर गाय ने गोबर कर दिया था । अब गोबार sookhane का इंतज़ार कर रहा हूं । काम रुका हुआ है , चाभी गोबर के नीचे,बॉस मेरे पीछे । दुआ कीजिये चाभी मिल जाए। उपले चाहिए to batayigaa

12/30/08

आगे भगवान मालिक!

आगे भगवान मालिक!

ब्लागरी करने वालों को देख पहले तो श्रद्धा उपजती है फ़िर खीज कि मेरे पास लिखने सुनांने को इतना है लेकिन कमबख्त टाइम ही नहीं । और लोग हैं कि लिखे ही जा रहे हैं वो भी एक दो पाव नहीं पसेरी भर। ब्लोगेर्स मुझे किसी बाजीगर या बावले ले कम नही लगते । रचना अच्छी बात है लेकिन रोज़ सोलह घंटे काम करने या लिखते रहने के बाद ब्लागरी का बी भी लिखने के लिए हिम्मत जुटानी पड़ती है । कभी लगता है कि ब्लागरी अफीम कि तरह है और ब्लॉगर अफीमची । ब्लॉग पर कुछ तो सटीक टिप्पणी करते हैं लेकिन कुछ खाम खाँ के शामिलबाजा बन जाते हैं। जैसे भीड़ का बे वजह कोई दे रहा हो ताली पे ताली लेकिन भेजा है खाली है। वैसे यहां मैं भी शामिल बाजा की तरह टपक पड़ा हूं। मैं झेंल रहा तो आप भी झेलिये। आगे भगवान मालिक!

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